“हँस इसलिए रही हूँ सिद्धार्थ, क्योंकि आज मुझे समझ आया कि तुम जैसे लोग प्रेम की नहीं, केवल अपनी सत्ता की भाषा समझते हो। तुमने समझा था कि तुमने मुझे इस घर के पिंजरे में ऐसा कैद कर दिया है कि मैं अपनी आवाज़ ही भूल गई हूँ। पर तुमने गलत समझा था। तख्ती पर नाम लिखवाने के लिए अगर किसी वजूद की ज़रूरत होती है, तो अब तुम मेरा वजूद भी देखोगे।”
उस दिन के बाद से घर में एक मूक क्रांति शुरू हो गई।
गर्मियों की उस तपी हुई दोपहर में जब घर के मुख्य द्वार पर सुनहरे अक्षरों वाली चमचमाती पीतल की तख्ती ठोकी जा रही थी, तब हथौड़े की हर एक चोट अनन्या के सीने पर किसी भारी पत्थर की तरह पड़ रही थी। उस तख्ती पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—’डॉ. सिद्धार्थ वर्मा एवं सपरिवार’।
अनन्या दालान के एक कोने में खड़ी उस चमकते हुए धातु के टुकड़े को घूर रही थी। शादी के सात साल बीत चुके थे। सात साल पहले जब उसने अपने परिवार, अपनी पसंद की नौकरी और अपने शहर को छोड़कर इस घर में कदम रखा था, तो उसने सोचा था कि प्रेम की बुनियाद पर बना यह आशियाना उसका अपना होगा। कॉलेज के दिनों में सिद्धार्थ के इर्द-गिर्द हमेशा लड़कियों की भीड़ लगी रहती थी। आकर्षक व्यक्तित्व, हर बात पर गहरी दार्शनिक बातें करने की कला और ऐसा अंदाज़ मानो दुनिया की हर परेशानी का हल उसके पास हो। उस समय सिद्धार्थ के पीछे भागने वाली दर्जनों लड़कियों में अनन्या भी एक थी। सिद्धार्थ हर किसी को यह अहसास कराता था कि वह उसके लिए बेहद खास है, लेकिन भीतर से वह केवल अपने आकर्षण और अपनी सत्ता के मद में चूर रहता था।
अनन्या को हासिल करने के लिए सिद्धार्थ ने बड़े-बड़े वादे किए थे। कहा था कि वह उसके सपनों को पंख देगा, उसकी लेखनी और उसकी सोच का सम्मान करेगा। पर फेरे लेते ही हवा का रुख बदल गया। धीरे-धीरे अनन्या को यह अहसास कराया जाने लगा कि अब उसकी अपनी कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। वह सिद्धार्थ के कोट की जेब में सजे उस रेशमी रुमाल की तरह थी, जिसे बाहर की दुनिया को अपनी शान दिखाने के लिए करीने से सजाकर रखा जाता है, लेकिन जिसे अपनी मर्जी से हिलने-डुलने का कोई हक नहीं होता।
सिद्धार्थ अक्सर बहुत ही मीठे शब्दों में अनन्या के आत्मविश्वास की जड़ें काटता था। “अनन्या, तुम्हें बाहर की दुनिया की समझ कहाँ है? तुम घर संभालो, यही तुम्हारी असली खूबसूरती है। तुम्हारी हर ज़रूरत पूरी करना मेरा फ़र्ज़ है, तुम्हें किसी काम या नाम के पीछे भागने की क्या ज़रूरत?”
शुरुआत में अनन्या को यह बातें प्यार लगीं। उसने अपने लिखे हुए आलेख, कहानियाँ और स्वतंत्र विचारों को एक पुरानी डायरी में बंद करके आलमारी के सबसे निचले रैक में दबा दिया। उसने खुद को सिद्धार्थ के परिवार, उसकी सास जानकी देवी और ननद की पसंद के साँचे में इस तरह ढाला कि कई बार वह आईने के सामने खड़ी होती तो खुद से पूछती—’क्या मैं वही अनन्या हूँ जो कभी वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में मंच हिला देती थी, या फिर मैं केवल दूसरों की स्वीकृति की भीख माँगने वाली एक परछाईं बन चुकी हूँ?’
उस दिन जब नेम प्लेट लगी, तो जानकी देवी ने अपनी कमर पर हाथ रखकर गर्व से कहा, “वाह भाई! अब लग रहा है कि किसी खानदानी डॉक्टर का घर है। सिद्धार्थ का नाम दूर से ही चमक रहा है।”
अनन्या ने धीमे स्वर में कह ही दिया, “सिद्धार्थ, इस तख्ती पर मेरा नाम भी तो साथ में आ सकता था? यह घर जितना तुम्हारा है, उतना ही मेरा भी तो है।”
सिद्धार्थ ने एक बनावटी, हल्की हँसी के साथ अनन्या के कंधे पर हाथ रखा और व्यंग्य भरे लहजे में कहा, “अनन्या, तुम भी बच्चों जैसी बातें करती हो। ‘सपरिवार’ लिखा है न? उसमें तुम, माँ, सब आ गए। वैसे भी बाहर की दुनिया में मेरी पहचान से ही इस घर की पहचान है। तुम्हारा नाम लिखने का कोई तार्किक आधार तो होना चाहिए न? तुमने ऐसा क्या किया है जो तख्ती पर तुम्हारा नाम आए? नाम कमाने के लिए कुछ अलग वजूद होना चाहिए।”
सिद्धार्थ के उस ठंडे, अहंकारी चेहरे और उन चुभते शब्दों ने अनन्या के भीतर सोए हुए स्वाभिमान को झकझोर कर रख दिया। वह अपमान का घूँट पीकर चुप नहीं बैठी। इस बार उसकी आँखों से आँसू नहीं गिरे। इसके उलट, अनन्या के होठों पर एक बेपरवाह, खनकती हुई हँसी फूट पड़ी।
वह इतनी ज़ोर से और इतनी सहजता से हँसी कि सामने खड़ा सिद्धार्थ भौंचक्का रह गया। उसका पुरुषोचित दंभ उस हँसी की गूँज से हिल गया।
“हँस क्यों रही हो तुम?” सिद्धार्थ ने अपनी भौहें सिकोड़ते हुए पूछा।
अनन्या ने अपनी साड़ी का पल्लू झाड़ा, बिल्कुल वैसे जैसे कोई अपनी देह पर गिरे किसी मामूली कीड़े को झटक देता है। उसने सिद्धार्थ की आँखों में सीधे देखते हुए कहा, “हँस इसलिए रही हूँ सिद्धार्थ, क्योंकि आज मुझे समझ आया कि तुम जैसे लोग प्रेम की नहीं, केवल अपनी सत्ता की भाषा समझते हो। तुमने समझा था कि तुमने मुझे इस घर के पिंजरे में ऐसा कैद कर दिया है कि मैं अपनी आवाज़ ही भूल गई हूँ। पर तुमने गलत समझा था। तख्ती पर नाम लिखवाने के लिए अगर किसी वजूद की ज़रूरत होती है, तो अब तुम मेरा वजूद भी देखोगे।”
उस दिन के बाद से घर में एक मूक क्रांति शुरू हो गई। अनन्या ने किसी से कोई झगड़ा नहीं किया, न ही उसने घर के अपने कर्तव्यों से मुँह मोड़ा। लेकिन उसके भीतर की लाचारी अब एक चट्टानी संकल्प में बदल चुकी थी। सुबह चार बजे उठकर वह घर का सारा काम निपटाती, सास के लिए दवा और नाश्ते का इंतज़ाम करती, और उसके बाद अपने कमरे में बैठकर अपनी पुरानी अधूरी पढ़ाई और लेखन में जुट जाती। उसने समाजशास्त्र में अपनी पीएच.डी. के लिए शोध प्रस्ताव तैयार किया और साथ ही एक गैर-सरकारी संस्था के साथ मिलकर घरेलू हिंसा और महिलाओं के अधिकारों पर ज़मीनी स्तर पर काम करना शुरू किया।
शुरुआत में जानकी देवी ने ताने मारे, “बहू का मन अब चौके-चूल्हे से उचट रहा है। बाहर जाने की हवा लग गई है।” सिद्धार्थ ने भी कई बार उसे भावनात्मक रूप से कमजोर करने की कोशिश की, “तुम ये सब करके साबित क्या करना चाहती हो? लोग हँसेंगे मुझ पर कि डॉक्टर की पत्नी एनजीओ में धक्के खा रही है।”
पर अनन्या हर तानों का जवाब सिर्फ एक शांत मुस्कान और अपने काम की लगन से देती थी। उसने बहस करना छोड़ दिया था।
छह महीने बीतते-बीतते अनन्या की मेहनत रंग लाने लगी। उसने ज़मीनी हकीकत पर जो शोध और आलेख लिखे, वे राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में छपने लगे। एक दिन स्थानीय प्रशासन और महिला आयोग ने शहर के टाउन हॉल में एक बड़े सम्मान समारोह का आयोजन किया। उस आयोजन में अनन्या को ‘महिला सशक्तिकरण और उत्कृष्ट सामाजिक शोध’ के लिए प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया जाना था।
समारोह के लिए जब निमंत्रण पत्र घर आया, तो उस पर मुख्य अतिथि के रूप में शहर के बड़े-बड़े अधिकारियों के साथ-साथ सम्मानित वक्ता के रूप में ‘डॉ. अनन्या शर्मा (वर्मा)’ का नाम सबसे ऊपर छपा था।
सिद्धार्थ ने जब वह कार्ड देखा, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जिस पत्नी को वह केवल ‘सपरिवार’ की गुमनाम छाया समझता था, आज उसका नाम शहर के सबसे बड़े मंच पर गूँजने वाला था। उस दिन सिद्धार्थ और जानकी देवी भी अनमने ढंग से उस सभागार में पहुँचे।
जब मंच पर अनन्या का नाम पुकारा गया, तो तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूँज उठा। अनन्या ने खादी की एक सादी साड़ी पहनी थी, लेकिन उसके चेहरे पर स्वाभिमान और आत्मविश्वास का एक ऐसा तेज़ था जिसके आगे बड़े-बड़े ओहदे फीके पड़ रहे थे।
माइक संभालते ही अनन्या ने किसी शिकायत या कड़वाहट के बिना बोलना शुरू किया, “एक स्त्री का जीवन केवल दूसरों के साँचों में ढलने के लिए नहीं होता। हम अक्सर सोचते हैं कि घर केवल ईंट-पत्थर और पुरुषों के नाम से चलता है, लेकिन सच यह है कि जब तक घर के भीतर रहने वाली स्त्री अपनी पहचान और अपने आत्मसम्मान को नहीं पहचानती, तब तक कोई भी मकान सच्चा घर नहीं बन सकता। सम्मान किसी से माँगा नहीं जाता, वह अपने संकल्प और अपनी साधना से अर्जित किया जाता है। मैं आज यहाँ किसी के विरोध में नहीं खड़ी हूँ, बल्कि मैं अपनी उस खोई हुई पहचान के साथ खड़ी हूँ जो हर स्त्री का जन्मसिद्ध अधिकार है।”
उसका भाषण इतना प्रभावशाली और संवेदना से भरा था कि हॉल में मौजूद हर शख्स खड़ा होकर तालियाँ बजाने लगा। आगे की कतार में बैठे सिद्धार्थ का सिर शर्म और पश्चाताप से झुक गया था, लेकिन साथ ही उसके मन के किसी कोने में अनन्या के प्रति एक अनजाना, गहरा आदर भी जन्म ले रहा था। उसे अहसास हुआ कि उसने जिस स्त्री को अपनी संपत्ति समझा था, वह तो आकाश की तरह विशाल और स्वतंत्र थी।
अगले दिन सुबह, जब धूप आँगन में फैली, तो बाहर मुख्य द्वार पर खट-खट की आवाज़ आने लगी।
अनन्या चाय की प्याली लेकर बाहर आई तो उसने देखा कि सिद्धार्थ खुद हाथ में पेचकस लिए दरवाजे के पास खड़ा था। उसने पुरानी नेम प्लेट हटा दी थी। उसकी जगह एक नई, पहले से भी सुंदर और बड़ी तख्ती लगाई जा रही थी।
उस नई तख्ती पर लिखा था—
डॉ. अनन्या शर्मा
डॉ. सिद्धार्थ वर्मा
‘सृजन कुंज’
अनन्या को दरवाजे पर खड़ा देखकर सिद्धार्थ मुड़ा। उसकी आँखों में इस बार कोई दंभ या अहंकार नहीं था, बल्कि एक सच्चा संकोच और सम्मान था।
सिद्धार्थ ने आगे बढ़कर अनन्या के हाथ अपनी हथेलियों में ले लिए। “मुझे माफ़ कर दो अनन्या। मैं भूल गया था कि प्रेम का मतलब किसी को अपने साये में दबाना नहीं, बल्कि उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना होता है। तुमने मुझे आईना दिखाया है। आज इस घर की चौखट तुम्हारे नाम से ही पूरी हुई है।”
अनन्या ने उस तख्ती को देखा और फिर सिद्धार्थ को। उसके होठों पर एक बार फिर वही प्यारी, सहज मुस्कान खिल उठी। इस बार वह हँसी किसी दंभ को चकनाचूर करने के लिए नहीं थी, बल्कि एक नए, बराबरी और सम्मान पर टिके रिश्ते के स्वागत के लिए थी। उसने जानकी देवी की तरफ देखा, जो बरामदे में खड़ी मुस्कुरा रही थीं।
घर की उस चौखट पर अब सिर्फ नाम नहीं बदला था, बल्कि उस परिवार की सोच, संवेदना और रूह बदल चुकी थी। अनन्या ने साबित कर दिया था कि जब एक स्त्री अपने आत्मसम्मान के लिए दृढ़ता से खड़ी होती है, तो समाज की संकीर्ण सीमाएँ खुद-ब-खुद उसके सम्मान में झुक जाती हैं।
प्रिय पाठकों,
क्या किसी स्त्री का नाम और उसकी पहचान केवल उसके पति या परिवार के दायरे में ही सिमट कर रह जानी चाहिए? क्या आज भी हमारे समाज में महिलाओं को अपना वजूद साबित करने के लिए ऐसी ही खामोश लड़ाइयाँ लड़नी पड़ती हैं? इस प्रेरक अंत पर आपकी क्या राय है? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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लेखिका : आराधना मिश्रा