सादगी का स्वाद 

 “अब क्या होगा? वो लोग आ गए,” सुनीता के हाथ-पैर ठंडे पड़ रहे थे। “राजीव, मेरी तो कुछ समझ नहीं आ रहा। मैं क्या मुंह दिखाऊंगी उन्हें?”

“हिम्मत रखो सुनीता, जो होगा देखा जाएगा। अब दरवाज़ा तो खोलना ही पड़ेगा,” राजीव जी ने खुद को संभालते हुए दरवाज़ा खोला।

सामने आनंद जी और रमा जी खड़े थे। उनके कपड़ों पर भी बारिश की कुछ छीटें थीं, लेकिन उनके चेहरों पर एक बहुत ही सौम्य और आत्मीय मुस्कान थी।

बाहर झमाझम बारिश हो रही थी और घने काले बादलों ने शाम होने से पहले ही शहर को अंधेरे की चादर में लपेट लिया था। राजीव जी अपनी पुरानी छतरी को झटकते हुए घर के अंदर दाखिल हुए। उनके चेहरे पर दिन भर की थकान और ऑफिस के तनाव की लकीरें साफ पढ़ी जा सकती थीं। गीले जूतों को दरवाजे के पास उतारते हुए उन्होंने एक गहरी सांस ली और सोफे पर धम्म से बैठ गए। रसोई से मसालों की हल्की-हल्की खुशबू आ रही थी। उनकी पत्नी सुनीता, जो हमेशा की तरह घर के कामों में व्यस्त थीं, बाहर हॉल में आईं और राजीव जी के खाली हाथों को देखकर उनके माथे पर सिलवटें पड़ गईं।

“राजीव, क्या तुम वो नमकीन, काजू कतली और सेब ले आए जो मैंने सुबह ऑफिस जाते वक्त तुम्हें खास तौर पर याद दिलाए थे?” सुनीता ने सवालिया नज़रों से देखते हुए पूछा।

राजीव जी का चेहरा अचानक पीला पड़ गया। उन्होंने अपना सिर पीट लिया और एक गहरी, अपराधी जैसी आवाज़ में बोले, “सुनीता, मैं सच में बहुत थक गया था। आज बैंक में ऑडिट था और इतना काम था कि मेरा दिमाग पूरी तरह से सुन्न हो चुका है। बारिश भी इतनी तेज़ थी कि गाड़ी रोककर कुछ भी खरीदने की हिम्मत ही नहीं हुई। मैं बिल्कुल भूल गया।”

सुनीता ने गहरी सांस ली और कहा, “अच्छा, तो आप बिल्कुल खाली हाथ आ गए? मैंने सुबह ही कहा था कि घर में चाय के साथ देने के लिए एक बिस्किट तक नहीं है। कल ही सारा राशन खत्म हुआ है। सोचिए, अगर इस मौसम में अचानक से कोई आ जाए तो मैं उन्हें क्या पानी के साथ सिर्फ अपनी शक्ल दिखाऊंगी?”

राजीव जी ने अपनी गलती छुपाने के अंदाज़ में कहा, “अरे इस तूफान और बारिश में कौन आने वाला है हमारे घर? तुम भी न, बस ख्याली पुलाव पकाकर परेशान होती रहती हो। एक दिन बिना नमकीन-बिस्कुट के चाय पी लेंगे तो कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ेगा।”

इतना सुनते ही राजीव जी को अचानक कुछ याद आया और उनके चेहरे का रंग ऐसे उड़ गया जैसे किसी ने उनके शरीर से सारा खून खींच लिया हो। उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। “हे भगवान! सुनीता… एक बहुत बड़ी गड़बड़ हो गई है,” राजीव जी की आवाज़ कांप रही थी।

“अब क्या हुआ? ऐसे क्यों घबरा रहे हैं? कोई फाइल ऑफिस में भूल आए क्या?” सुनीता ने तौलिया देते हुए पूछा।

“फाइल नहीं सुनीता, आज दोपहर में ही आनंद जी का फोन आया था,” राजीव जी ने रुहांसे स्वर में कहा। आनंद जी उनकी इकलौती बेटी, काव्या, के होने वाले ससुर थे। काव्या का रिश्ता पिछले ही महीने आनंद जी के बेटे के साथ तय हुआ था।

“आनंद जी का फोन? तो क्या हुआ? सब ठीक तो है न?” सुनीता के दिल की धड़कनें तेज़ होने लगीं।

“उन्होंने कहा था कि वो और उनकी पत्नी रमा जी, आज शाम को काव्या के लिए कुछ पुश्तैनी गहने और शगुन के कपड़े लेकर आ रहे हैं। वो इसी इलाके में किसी काम से आए थे तो सोचा कि मिलकर ही जाएंगे। उन्होंने मुझसे कहा था कि मैं तुम्हें बता दूं, लेकिन काम की आपाधापी में मेरे दिमाग से यह बात बिल्कुल ही निकल गई।” राजीव जी ने सिर पकड़ते हुए कहा।

सुनीता को लगा जैसे उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई हो। बेटी के होने वाले सास-ससुर पहली बार उनके घर आ रहे थे। यह एक ऐसा मौका होता है जब हर माता-पिता चाहते हैं कि वे अपनी हैसियत से बढ़कर मेहमाननवाज़ी करें, ताकि उनकी बेटी के ससुराल वालों के सामने उनका मान-सम्मान बना रहे। और यहाँ स्थिति यह थी कि घर अस्त-व्यस्त पड़ा था, सेंटर टेबल पर पुराने अखबारों का ढेर था, और सबसे बड़ी बात, रसोई में मेहमानों के सामने रखने के लिए एक सादा बिस्किट भी नहीं था।

“क्या कह रहे हैं आप? इतनी बड़ी बात आप कैसे भूल सकते हैं? आपको अंदाज़ा भी है कि वो लोग क्या सोचेंगे हमारे बारे में? वो पहली बार घर आ रहे हैं और मैं उन्हें क्या परोसूंगी? घर में तो फलों का एक दाना तक नहीं है। राजीव, यह हमारी बेटी की इज़्ज़त का सवाल है! अगर उन्हें लगा कि हम उनके स्वागत के लिए ज़रा भी गंभीर नहीं हैं, तो इसका असर काव्या के भविष्य पर पड़ सकता है।” सुनीता लगभग रोने वाली स्थिति में आ गई थीं।

“मैं अभी जाता हूँ, मैं बस अभी दौड़कर नुक्कड़ वाली दुकान से कुछ ले आता हूँ,” राजीव जी ने आनन-फानन में दोबारा अपने गीले जूते पहनने शुरू किए।

लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था। जैसे ही राजीव जी ने दरवाज़ा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया, दरवाजे की घंटी ज़ोर से बज उठी। ‘टिंग-टोंग’।

कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। सिर्फ बाहर गिरती बारिश की आवाज़ और सुनीता के धड़कते दिल की आवाज़ गूंज रही थी। दोनों एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। समय जैसे रुक सा गया था।

“अब क्या होगा? वो लोग आ गए,” सुनीता के हाथ-पैर ठंडे पड़ रहे थे। “राजीव, मेरी तो कुछ समझ नहीं आ रहा। मैं क्या मुंह दिखाऊंगी उन्हें?”

“हिम्मत रखो सुनीता, जो होगा देखा जाएगा। अब दरवाज़ा तो खोलना ही पड़ेगा,” राजीव जी ने खुद को संभालते हुए दरवाज़ा खोला।

सामने आनंद जी और रमा जी खड़े थे। उनके कपड़ों पर भी बारिश की कुछ छीटें थीं, लेकिन उनके चेहरों पर एक बहुत ही सौम्य और आत्मीय मुस्कान थी।

“अरे समधी जी, नमस्कार! देखिए, इस मौसम ने हमें कैसा भिगो दिया,” आनंद जी ने अपनी छतरी बंद करते हुए गर्मजोशी से कहा।

“नमस्ते, नमस्ते! आइए न, अंदर आइए,” राजीव जी ने हड़बड़ाहट में उनका स्वागत किया। सुनीता ने भी कांपते हाथों से उन्हें प्रणाम किया और तुरंत तौलिया लाने के लिए अंदर भागी।

रमा जी और आनंद जी सोफे पर बैठ गए। सुनीता ने जल्दी से मेज़ साफ की और पानी के गिलास लाकर रखे। सुनीता का दिल अब भी ज़ोरों से धड़क रहा था। उसकी आँखें बार-बार रसोई की तरफ जा रही थीं, जहाँ परोसने के लिए सिर्फ खाली डिब्बे उसका मुँह चिढ़ा रहे थे।

“सुनीता जी, हम अचानक आ गए, उम्मीद है आपको कोई परेशानी नहीं हुई होगी। दरअसल, हम इस तरफ से गुज़र रहे थे, तो सोचा कि अपनी होने वाली बहू से मिलते चलें और ये शगुन के कुछ कपड़े उसे दे दें,” रमा जी ने बहुत ही मीठे स्वर में कहा।

“नहीं… नहीं… परेशानी कैसी। आप तो हमारे अपने हैं। बस… वो… मैं अभी चाय बनाकर लाती हूँ,” सुनीता लड़खड़ाती आवाज़ में बोली। उसने आँखों ही आँखों में राजीव जी को इशारा किया कि वो किसी तरह चुपके से बाहर जाकर कुछ लेकर आएं।

राजीव जी बात को समझते हुए अचानक खड़े हो गए, “अरे आनंद जी, आप बैठिए। मैं बस अभी दो मिनट में बाहर से आता हूँ। वो क्या है न, मेरी गाड़ी की खिड़की शायद खुली रह गई है।”

तभी आनंद जी ने राजीव जी का हाथ पकड़ लिया। “अरे राजीव जी, गाड़ी की खिड़की खुली रहने दीजिए, बारिश का पानी ही तो है, सूख जाएगा। लेकिन इस वक्त आप इस तूफानी बारिश में बाहर मत जाइए। बैठिए हमारे पास।”

रमा जी, जो बहुत ही सुलझी हुई और पारखी नज़रों वाली महिला थीं, उन्होंने सुनीता और राजीव के चेहरों की हवाइयां उड़ते हुए देख ली थीं। वे समझ गईं कि अचानक उनके आ जाने से घर में कुछ घबराहट का माहौल है।

रमा जी ने मुस्कुराते हुए सुनीता का हाथ पकड़ लिया और उसे अपने पास बैठा लिया। “समधन जी, एक बात सच-सच बताइएगा। क्या राजीव भाई साहब ने आपको हमारे आने की सूचना नहीं दी थी?”

सुनीता झेंप गई। वह झूठ नहीं बोल पाई। उसने नज़रे झुकाते हुए कहा, “जी… वो ऑफिस के काम में इतने व्यस्त थे कि भूल गए। और सच कहूँ तो… घर में इस वक्त आपके स्वागत के लिए कोई भी खास इंतज़ाम नहीं है। बाहर इतनी तेज़ बारिश है कि ये कुछ ला भी नहीं पाए। मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस हो रही है कि आप पहली बार आए हैं और मैं आपका ठीक से सत्कार भी नहीं कर पा रही हूँ।”

कमरे में कुछ पल के लिए शांति छा गई। सुनीता को लगा कि अब आनंद जी और रमा जी नाराज़ हो जाएंगे। उन्हें लगेगा कि बेटी वालों ने उनका अपमान किया है।

लेकिन अगले ही पल, आनंद जी की एक ज़ोरदार हँसी से वह सन्नाटा टूट गया।

“अरे बस इतनी सी बात? समधन जी, आप भी कमाल करती हैं!” आनंद जी हँसते हुए बोले। “हम यहाँ कोई छप्पन भोग खाने थोड़ी आए हैं। हम तो एक नया रिश्ता जोड़ने आए हैं। और रिश्ते पकवानों से नहीं, दिलों से जुड़ते हैं।”

रमा जी ने सुनीता के कंधे पर प्यार से हाथ रखते हुए कहा, “सुनीता जी, अगर हम आपकी जगह होते, तो शायद हम भी ऐसे ही घबरा जाते। लेकिन आप भूल रही हैं कि अब हम दो अलग-अलग परिवार नहीं हैं। हम एक हैं। आप हमारी बेटी की माँ हैं। क्या जब आप अपने मायके जाती हैं, तो वहाँ छप्पन भोग की उम्मीद करती हैं? नहीं न! बस अपनों का प्यार ही काफी होता है।”

सुनीता की आँखों में नमी आ गई। उसके अंदर का सारा डर और संकोच एक पल में जैसे धुल गया।

“लेकिन फिर भी, खाली चाय कैसे…” सुनीता ने हिचकिचाते हुए कहा।

“किसने कहा खाली चाय?” रमा जी उत्साह से उठ खड़ी हुईं। “मैंने रसोई में आते वक्त देखा था कि वहाँ ताज़े प्याज़ और बेसन रखा है। बाहर इतनी बढ़िया बारिश हो रही है। ऐसे मौसम में चाय के साथ प्याज़ के पकोड़ों से बेहतर क्या हो सकता है? चलिए, आज हम दोनों समधनें मिलकर रसोई में पकोड़े बनाते हैं। आप चाय बनाइए और मैं पकोड़े तलती हूँ।”

सुनीता अवाक रह गई। “अरे नहीं रमा जी, आप मेहमान हैं, आप कैसे…”

“मेहमान नहीं, अब से मैं इस घर की बड़ी बहन हूँ,” रमा जी ने प्यार से डांटते हुए कहा और सुनीता को साथ लेकर रसोई में चली गईं।

अगले आधे घंटे में उस छोटे से घर की रसोई से सिर्फ पकोड़ों की ही नहीं, बल्कि एक बेहद खूबसूरत और पवित्र रिश्ते की महक भी उठ रही थी। रमा जी और सुनीता ने मिलकर पकोड़े तले। उधर हॉल में आनंद जी और राजीव जी ऐसे गपशप कर रहे थे जैसे बरसों पुराने दोस्त हों।

थोड़ी देर बाद जब मेज़ पर गरमा-गरम चाय और क्रिस्पी पकोड़े सजे, तो सभी ने एक साथ बैठकर बड़े चाव से उन्हें खाया। उस साधारण से नाश्ते में जो स्वाद था, वह किसी फाइव-स्टार होटल के महंगे खाने में भी नहीं मिल सकता था। उस दिन आनंद जी और रमा जी सिर्फ काव्या को शगुन देकर ही नहीं गए, बल्कि राजीव और सुनीता के दिलों पर एक ऐसी गहरी छाप छोड़ गए जो उम्र भर मिटने वाली नहीं थी।

जब वे लोग विदा लेकर गए, तो राजीव जी ने दरवाज़ा बंद किया और सुनीता की तरफ देखा। सुनीता की आँखों में खुशी के आंसू थे।

“देखा राजीव, अगर नियत अच्छी हो और लोग सच्चे हों, तो दिखावे की कोई ज़रूरत नहीं पड़ती। हम कितने भाग्यशाली हैं कि हमारी बेटी एक ऐसे घर में जा रही है जहाँ रुतबे से ज्यादा रिश्तों को अहमियत दी जाती है।”

राजीव जी ने भी मुस्कुराते हुए हामी भरी। उस रात बाहर बारिश ज़रूर हो रही थी, लेकिन उनके घर के अंदर सुकून और संतोष की एक बेहद ठंडी और मीठी बयार बह रही थी। सच ही है, जीवन में कुछ मेहमान ऐसे आते हैं जो हमारे घरों को नहीं, बल्कि अपनी सादगी और अपनेपन से हमारे दिलों को हमेशा के लिए सजा जाते हैं।

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