बहू मायके से दूरी बनाकर रखो – आरती देवी 

निर्मला देवी के ये शब्द शिखा के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रहे थे। उसे लगा जैसे उसे किसी परिवार का हिस्सा नहीं बनाया गया है, बल्कि एक ऐसा कर्मचारी नियुक्त किया गया है जिसे सिर्फ नियम और शर्तें माननी हैं। शिखा ने हमेशा से एक ऐसे ससुराल का सपना देखा था … Read more

परिवार की नींव – सीमा श्रीवास्तव 

बाहर सड़क पर गाड़ियों का शोर था, लेकिन सत्तर वर्षीय सावित्री देवी के इस चार कमरों वाले आलीशान फ्लैट में एक अजीब सा, डरावना सन्नाटा पसरा हुआ था। दीवार पर टंगी पुरानी पेंडुलम घड़ी की टिक-टिक आज हथौड़े की तरह उनके कानों पर बज रही थी। आज उनके इकलौते पोते, रोहन की शादी थी। शादी … Read more

समाज का डर – नेहा पटेल

रघुनाथ जी के कदम आज इतने भारी लग रहे थे जैसे उनके पैरों में मन भर का सीसा बांध दिया गया हो। साठ साल की उम्र में उन्होंने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे थे। एक सरकारी स्कूल के रिटायर्ड हेडमास्टर होने के नाते पूरे मोहल्ले में उनकी एक अलग प्रतिष्ठा थी। लोग उनके आगे … Read more

कर्ज – निधि गुप्ता

देव वहीं आंगन की मिट्टी में माथा टेके फूट-फूट कर रो रहा था। आज उसके पास गाड़ी थी, बड़ा पद था, दौलत थी, लेकिन वो सब कुछ उस बीस हज़ार रुपये के कर्ज के सामने बहुत छोटा और बेमानी लग रहा था। सफलता का जश्न उस दिन मातम में बदल चुका था। सूरज ढलने को … Read more

अनपढ़ माँ – रमा शुक्ला

सुधीर बाबू की आंखों से एक आंसू छलक कर उनके गाल पर आ गया, “तेरी उस अनपढ़ और गँवार मां ने मेरे पढ़े-लिखे फैसले को फाड़ कर डस्टबिन में फेंक दिया। वह मुझसे और डॉक्टरों से लड़ पड़ी। उसने कहा, ‘मैं लंदन नहीं जानती, मैं करियर नहीं जानती, मैं बस इतना जानती हूं कि मेरे … Read more

अपनों की कीमत – गरिमा चौधरी 

सुधा बोलते-बोलते अपने बच्चों के बारे में बताने लगी। “और आप जानती हैं दीदी? लोग कहते हैं कि बच्चों को बीमारों से दूर रखना चाहिए। लेकिन मेरे दोनों बच्चे, आरव और मिष्टी, स्कूल से आते ही सबसे पहले अपनी दादी के कमरे में जाते हैं। सुबह-शाम उनके पास बैठकर अपनी तोतली ज़बान में उन्हें स्कूल … Read more

भूल सुधार – शुभ्रा बैनर्जी 

निशांत बचपन से ही बहुत संकोची स्वभाव का था।मां के सिवाय और किसी से भी खुलकर बात नहीं करता था।पति (सुशांत)हमेशा ताना देकर कहते थे निधि को”निधि कब तक तुम्हारा बेटा तुम्हारे पल्लू में छिपा रहेगा? अपने पापा से तक अजनबी जैसा व्यवहार करता है।मुझे देखते ही अंदर चला जाता है।उसे क्या तकलीफ़ है मुझसे? … Read more

उम्मीदों का नया सबेरा – मंजू ओमर

सावित्री के घर जैसे आज एक नया सबेरा हुआ है। सभी के चेहरे खुशी से खिले हैं। आठ सालों के लंबे इंतजार के बाद सावित्री की बहू की खुशी की खबर आई है। अब घर मे किलकारियां गूंजेगी, मै भी उसे गोद मे लेकर अपने सारे अरमान पूरे करूगीं। कितना तरसी हूँ ऐसा समय देखने … Read more

जो बोओगे,वही काटोगे – मृणालिका दुबे

सुनीता की सुबह रोज़ चार बजे शुरू होती थी। मुर्गे की पहली बाँग से भी पहले उसकी आँख खुल जाती। नींद चाहे पूरी हुई हो या नहीं, उसे उठना ही पड़ता था। सबसे पहले वो रसोई में जाती, गैस पर चाय चढ़ाती, फिर आटा गूँधती, बच्चों के टिफिन तैयार करती और साथ-साथ सास के लिए … Read more

जो बोया वही पाया – विनीता सिंह

धूल भरी गलियों वाले उस छोटे से गांव में रामदीन बहुत मेहनती था। सुबह हो या शाम, खेत में हल चलाता, बीज बोता। पसीना बहाता, लेकिन उसकी आंखों में उम्मीद की चमक। “थी जो बोया, वही पाया,”उनके पिता का यह कथन उसके खून में घुला था। पत्नी सुशीला दो मासूम बच्चों—लल्ला और गुड़िया—के साथ घर … Read more

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