विदाई की शहनाइयाँ बज रही थीं। मीरा की बुआ ने उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा था, “तू तो बहुत किस्मत वाली है री मीरा। ससुराल में कोई सास-ससुर का झंझट नहीं। सास तो है नहीं, बस ससुर जी हैं, वो क्या ही कहेंगे। अब तो पूरे घर की मालकिन तू ही है। आराम से अपने मन की करना, कोई रोक-टोक करने वाला नहीं।” मीरा ने अपनी बुआ की बात सुनकर एक हल्की सी मुस्कान दे दी थी, लेकिन उसके मन के किसी कोने में एक अजीब सी हलचल थी। क्या सच में सास का न होना एक सौभाग्य है? समाज ने हमेशा सास को एक ऐसी खलनायिका के रूप में चित्रित किया है जो सिर्फ ताने मारती है और बहू पर हुक्म चलाती है। लेकिन क्या एक घर बिना उस बुजुर्ग महिला के सच में घर बन पाता है?
मीरा जब अपने ससुराल, यानी अपने पति विहान के घर पहुँची, तो द्वार पर ससुर जी ने आरती की थाली ले रखी थी। विहान की माँ का देहांत तीन साल पहले ही एक लंबी बीमारी के कारण हो गया था। घर बहुत बड़ा और खूबसूरत था, लेकिन दरवाजे पर कदम रखते ही मीरा को एक अजीब सा सूनापन महसूस हुआ। ऐसा लगा जैसे दीवारों पर रंग तो नया है, लेकिन घर की आत्मा कहीं खो गई है। कोई ऐसा नहीं था जो उसके सिर पर पल्लू रखकर उसे घर के मंदिर तक ले जाए, या उसकी ठोड़ी छूकर कहे कि “मेरी बहू तो चाँद का टुकड़ा है।” एक रस्म अदायगी सी हुई और मीरा अपने कमरे में आ गई। बुआ की “राज करने” वाली बात अब उसे एक ठंडे और एकांत कमरे जैसी लग रही थी।
शादी के कुछ दिनों बाद विहान की बड़ी बहन, शिखा दीदी और उनके पति (जीजा जी) घर आए। शिखा दीदी के आने से घर में थोड़ी रौनक आ गई। मीरा भी बहुत खुश थी कि चलो, घर में किसी महिला सदस्य का तो साथ मिलेगा। उसने सुबह से ही रसोई में मोर्चा संभाल लिया। इंटरनेट से देखकर और अपनी माँ से फोन पर पूछकर उसने तरह-तरह के पकवान बनाए। शाही पनीर, दाल मखनी, पुलाव, और गाजर का हलवा। उसने सोचा कि दीदी और जीजा जी खुश हो जाएंगे।
शाम को जब सब डाइनिंग टेबल पर बैठे, तो शिखा दीदी ने मीरा का हाथ पकड़ कर कहा, “भाभी, तुम्हारे आने से घर में फिर से जान आ गई है। माँ के जाने के बाद तो मैं इस घर में आने से भी कतराती थी। घर काटने को दौड़ता था। अब तुम आ गई हो तो मुझे लगता है कि मैं अपने मायके आ सकती हूँ। अब तुम्हीं को माँ की तरह इस घर को जोड़कर रखना है।” मीरा ने मुस्कुराकर हामी भरी, लेकिन उसके कंधों पर एक अदृश्य बोझ सा आ गया।
खाना खाते हुए जीजा जी ने भी खूब तारीफ की। “वाह मीरा जी, खाना तो बहुत स्वादिष्ट बना है। विहान तो बहुत लकी है।” लेकिन अचानक उनके चेहरे पर एक उदासी सी छा गई। वे शिखा की तरफ देखकर बोले, “लेकिन शिखा, मम्मी जी के हाथ की उस बेसन वाली कढ़ी की बात ही कुछ और थी ना? जब भी हम आते थे, वो चाहे कितनी भी बीमार क्यों न हों, मेरे लिए वो कढ़ी जरूर बनाती थीं। उनके हाथों में तो जैसे जादू था। खैर, अब वो स्वाद कहाँ मिलेगा।”
जीजा जी ने ये बात मीरा को नीचा दिखाने के लिए नहीं कही थी, उनका लहजा बहुत भावुक था। लेकिन मीरा के दिल में एक हल्की सी टीस उठ गई। उसे लगा कि वह चाहे कितनी भी मेहनत कर ले, वह उस माँ की जगह कभी नहीं ले सकती जिसने इस घर को अपने खून-पसीने से सींचा था। उसने सोचा, काश सासु माँ आज जीवित होतीं, तो वह उनसे वो कढ़ी बनाना सीखती, उनके साथ रसोई में खड़ी होकर बातें करती, और शायद तब जीजा जी को भी वही पुराना स्वाद मिल जाता।
दिन बीतते जा रहे थे। मीरा का अपनी सहेली नेहा से फोन पर बात करना एक रोज़ का काम था। नेहा की शादी को दो साल हो चुके थे और उसकी सास बहुत सख्त मिजाज की थीं। लेकिन आज जब नेहा का फोन आया तो उसकी आवाज़ में एक अलग ही खुशी थी। “मीरा, तुझे पता है? आज सुबह-सुबह मैं जब उठी तो मैंने अपनी सास के पैर छुए। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखकर कहा- सदा सुहागन रहो, दूधो नहाओ पूतो फलो, तुम्हारे सुहाग की उम्र लंबी हो। यार, सुबह-सुबह ऐसे आशीर्वाद मिल जाएं तो दिन ही बन जाता है।”
मीरा फोन पकड़े हुए बस सुनती रही। उसके होंठों पर एक फीकी सी मुस्कान थी। उसने नेहा से तो कुछ नहीं कहा, लेकिन फोन रखने के बाद उसकी नज़र कमरे की दीवार पर टंगी अपनी सासु माँ की तस्वीर पर गई। तस्वीर पर चढ़ी चंदन की माला और तस्वीर में मुस्कुराता हुआ वो चेहरा। मीरा मन ही मन सोचने लगी, “लोग कहते हैं कि मैं आज़ाद हूँ, मुझ पर कोई हुक्म चलाने वाला नहीं। लेकिन किसी ने ये क्यों नहीं बताया कि बिना सास के मुझे कोई ये आशीर्वाद देने वाला भी नहीं है। मैं सुबह उठकर किसके पैर छूकर अपने सुहाग की लंबी उम्र का आशीर्वाद माँगू? कौन मुझे डांटकर कहेगा कि बहू, आज ये त्योहार है, ऐसे तैयार हो जा?” वह बस तस्वीर को निहारती रही और उसकी आँखों से एक आँसू छलक कर तस्वीर के फ्रेम पर जा गिरा।
कुछ महीनों बाद दीवाली का त्योहार आया। शादी के बाद मीरा की पहली दीवाली थी। मायके में तो पहली दीवाली का बड़ा चाव होता है। घर के बाहर रंगोली बनाते हुए उसने देखा कि पड़ोस वाली आंटी अपनी बहू सुप्रिया के साथ बाहर खड़ी हैं। सुप्रिया ने बहुत सुंदर लाल रंग की साड़ी पहनी हुई थी और उसके हाथों में नई चूड़ियाँ थीं। मीरा ने जब सुप्रिया की तारीफ की, तो सुप्रिया चहकते हुए बोली, “अरे भाभी, ये सब तो सासु माँ की मेहरबानी है। आज सुबह ही उन्होंने मुझे अपने संदूक से निकालकर ये पुश्तैनी साड़ी दी है। बोलीं कि पहली दीवाली है, मेरी बहू सबसे सुंदर दिखनी चाहिए। और तो और, उन्होंने मुझे रसोई में घुसने तक नहीं दिया, सारा काम खुद कर रही हैं।”
मीरा ने अपनी साधारण सी साड़ी की तरफ देखा। विहान ने उसे बहुत महंगे तोहफे दिए थे, ससुर जी ने भी उसे शगुन का लिफाफा दिया था, लेकिन एक सास जो अपनी बहू का शृंगार करवाती है, अपनी पुरानी जेवर और साड़ियों में से चुनकर कुछ खास देती है, वो प्यार और दुलार मीरा के पास नहीं था। उसके पास आज़ादी तो थी, पर वो स्नेह बरसाने वाली सास नहीं थी जो उसे एक बेटी की तरह सजाए-संवारे। उस दिन दीवाली के दीयों की रोशनी में भी मीरा को अपने घर का आँगन थोड़ा अँधेरा ही लगा।
त्योहार बीतने के बाद एक दिन शिखा दीदी का फोन आया। बातों-बातों में उन्होंने पूछा, “भाभी, शादी को इतने महीने हो गए, तुम दोनों कहीं घूमने नहीं गए? विहान को बोलो कि तुम्हें हनीमून पर कहीं बाहर ले जाए। आख़िर शादी के बाद का यही तो समय होता है घूमने-फिरने का।”
रात को जब विहान ऑफिस से आया, तो मीरा ने चाय देते हुए बहुत प्यार से उससे पूछा, “विहान, मेरे मायके वाले और दीदी भी पूछ रहे थे कि हम कहीं घूमने क्यों नहीं गए। क्या हम कुछ दिनों के लिए शिमला या केरल नहीं जा सकते?”
विहान ने चाय का कप मेज पर रखा और एक गहरी साँस ली। उसने मीरा का हाथ अपने हाथों में लेकर कहा, “मीरा, मैं जानता हूँ कि हर नई शादीशुदा जोड़े की तरह तुम्हारे भी कुछ अरमान हैं। मैं तुम्हें पूरी दुनिया घुमाना चाहता हूँ। लेकिन… लेकिन हम पापा को छोड़कर कैसे जा सकते हैं?”
मीरा ने हैरानी से पूछा, “क्यों? बापूजी को क्या हुआ है? वो तो बिल्कुल ठीक हैं। हम बस एक हफ्ते के लिए ही तो जाएंगे।”
विहान की आँखें नम हो गईं। “तुम नहीं जानती मीरा। जब से माँ गई हैं, पापा अंदर से पूरी तरह टूट चुके हैं। वो दिन में तो खुद को मजबूत दिखाते हैं, लेकिन रात को कई बार वो घबरा कर उठ जाते हैं। माँ उनके जीवन का वो हिस्सा थीं जिसके बिना वो एक कदम नहीं चल सकते थे। जब मैं घर में रहता हूँ, तो उन्हें तसल्ली रहती है कि कोई अपना उनके पास है। अगर हम दोनों उन्हें इस खाली घर में अकेले छोड़कर चले गए, तो वो अकेलेपन से घबरा जाएंगे। क्या हम कुछ समय और इंतज़ार नहीं कर सकते?”
मीरा ने विहान की आँखों में उस बेटे की पीड़ा देखी जो अपनी माँ को खो चुका था और अब अपने पिता को खोने के डर से जूझ रहा था। मीरा ने तुरंत विहान का हाथ कसकर पकड़ लिया और बोली, “मुझे कहीं नहीं जाना विहान। बापूजी हमारे लिए सबसे पहले हैं। जहाँ हमारा परिवार है, वहीं मेरा सबसे बड़ा सुख है।”
विहान ने राहत भरी साँस ली, लेकिन मीरा के मन में एक बार फिर वही बात गूँज उठी। अगर आज सासु माँ होतीं, तो बापूजी अकेले नहीं होते। अगर वो होतीं, तो शायद वो खुद हँसते हुए विहान और मीरा को आशीर्वाद देकर विदा करतीं और कहतीं कि “तुम दोनों घूम कर आओ, हम बुड्ढे-बुढ़िया तो घर संभाल ही लेंगे।”
उस रात मीरा को नींद नहीं आई। वह चुपचाप उठी और बापूजी के कमरे की तरफ गई। दरवाजा थोड़ा खुला था। उसने देखा कि बापूजी अपनी पत्नी की तस्वीर को हाथ में लिए चुपचाप बैठे थे। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। मीरा का दिल भर आया। उसे समझ आ गया कि जिस ‘राज’ और ‘आनंद’ की बात उसकी बुआ और सहेलियाँ करती थीं, वो सिर्फ एक छलावा है। असली आनंद तो भरे-पूरे परिवार में होता है, जहाँ बुजुर्गों की डांट में भी प्यार छुपा होता है। एक सास सिर्फ ताने मारने वाली औरत नहीं होती, वो एक धागा होती है जो पूरे परिवार को, ससुर को, बच्चों को, और आने वाली बहू को एक माला में पिरो कर रखती है।
अगले दिन से मीरा ने घर की कमान एक अलग तरीके से संभाल ली। उसने अब सासु माँ की कमी पर रोना छोड़ दिया। उसने उनकी तस्वीर के सामने खड़े होकर मन ही मन वादा किया, “माँ जी, मैं आपको कभी नहीं देख पाई, लेकिन मैं आपकी उस जगह को भरने की पूरी कोशिश करूँगी जो आप इस घर में छोड़ गई हैं।” उसने बापूजी के सुबह उठने से लेकर रात के सोने तक का रूटीन वैसा ही कर दिया जैसा उसकी सास किया करती थीं। शिखा दीदी जब अगली बार आईं, तो मीरा ने यूट्यूब से देखकर बिल्कुल वैसी ही कढ़ी बनाई। जीजा जी ने कढ़ी खाते ही कहा, “अरे वाह! इसमें तो बिल्कुल मम्मी जी के हाथों वाला स्वाद है।” ये सुनकर मीरा की आँखें भर आईं। उसे लगा जैसे तस्वीर में से निकलकर सासु माँ ने उसके सिर पर हाथ रख दिया हो।
उसने जान लिया था कि सास के बिना घर पर ‘राज’ तो किया जा सकता है, लेकिन उस घर को ‘स्वर्ग’ बनाने के लिए जो ममता, जो संस्कार और जो परंपराओं की छाँव एक माँ देती है, उसकी कमी दुनिया की कोई भी आज़ादी पूरी नहीं कर सकती।
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आप सभी पाठकों से एक सवाल है: क्या सच में आज के समाज ने सास-बहू के रिश्ते को सिर्फ लड़ाई-झगड़े तक सीमित कर दिया है, या इसके पीछे छुपे उस गहरे प्रेम को हम भूल गए हैं? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं!
लेखिका : मीना मिश्रा