“पापा! ओ पापा! जल्दी चलिए, दादी बाथरूम में गिर गई हैं। उनके घुटने से बहुत खून बह रहा है और वह दर्द से तड़प रही हैं।” दस साल का रोहन हांफते हुए अपने माता-पिता के बेडरूम के दरवाजे पर खड़ा था। उसकी आंखों में डर और चेहरे पर घबराहट साफ झलक रही थी।
विशाल और आलीशान बेडरूम के अंदर, शहर के जाने-माने समाज सेवक और बिजनेसमैन, विनीत, शीशे के सामने खड़े होकर अपनी महंगी इटालियन सिल्क की टाई की गांठ ठीक कर रहे थे। बिस्तर पर उनकी पत्नी, काम्या, अपने डिजाइनर लहंगे की प्लेट्स को संवारते हुए अपनी हेयर स्टाइलिस्ट को बाल सेट करने के निर्देश दे रही थीं। कमरे में महंगे परफ्यूम की महक तैर रही थी और एक अजीब सी जल्दबाजी का माहौल था।
“अरे बेटा रोहन, तुम इतना घबरा क्यों रहे हो? गिर गई होंगी, उम्र हो गई है उनकी, संतुलन बिगड़ जाता है। जाकर कहो कि ठंडे पानी से धो लें, खून रुक जाएगा।” विनीत ने टाई को परफेक्ट शेप देते हुए बिना मुड़े ही जवाब दिया।
“पापा, वो पानी डाल चुके हैं दादाजी, पर खून नहीं रुक रहा। दादी का घुटना बहुत सूज गया है, वो रो रही हैं। दादाजी कह रहे हैं कि शायद हड्डी खिसक गई है।” रोहन ने लगभग रुआंसे स्वर में कहा।
“रोहन, प्लीज! अभी तुम बाहर जाओ। देख नहीं रहे हो मम्मा और पापा को कितनी देर हो रही है? आज शहर के सबसे बड़े ऑडिटोरियम में हमारा फंक्शन है। मम्मा का मेकअप खराब हो जाएगा अगर मम्मा अभी स्ट्रेस लेंगी तो।” काम्या ने आईने में खुद को निहारते हुए बड़ी बेरुखी से कहा।
विनीत ने अपनी घड़ी देखी, जो किसी आम आदमी की साल भर की कमाई से भी ज्यादा कीमत की थी, और माथे पर बल डालते हुए बोला, “तुम्हारे दादाजी को भी ना, हर छोटी बात का बतंगड़ बनाने की आदत है। कोई हड्डी-वड्डी नहीं टूटी होगी। बस मोच आ गई होगी। जाओ, दादाजी से कहो कि वो जो नीले रंग की दर्द निवारक ट्यूब है, वो लगा दें और दादी को एक पेनकिलर दे दें।”
“लेकिन पापा, दादी से उठा ही नहीं जा रहा है…” रोहन ने फिर कोशिश की।
“बस रोहन! मैंने कह दिया ना, हम अभी बहुत व्यस्त हैं। हमें वहाँ मुख्य अतिथि के तौर पर पहुँचना है। तुम जाकर अपने वीडियो गेम्स खेलो, हम आते हैं।” विनीत ने कड़क आवाज में कहा। रोहन अपना सा मुंह लेकर वहाँ से चला गया।
“विनीत डार्लिंग,” काम्या ने अपनी हीरे की अंगूठी को चमकते हुए देखा और कहा, “आज का तुम्हारा भाषण बिल्कुल तैयार है ना? याद रखना, तुम्हें आवाज में वो भारीपन और आंखों में वो करुणा लानी है, जो पीआर एजेंसी ने सुझाई थी। जब तुम ‘बुजुर्गों के एकाकीपन’ पर बोलोगे, तो थोड़ा रुक जाना, ताकि लोगों को तालियां बजाने का समय मिल सके। प्रेस वाले सामने ही बैठे होंगे, पोज एकदम परफेक्ट होना चाहिए।”
“तुम फिक्र मत करो काम्या,” विनीत ने परफ्यूम छिड़कते हुए मुस्कुराकर कहा। “मैंने वो स्पीच रट ली है। बस तुम ध्यान रखना कि जब मंच पर बुजुर्गों को शॉल ओढ़ाने की बारी आए, तो तुम मेरे बिल्कुल बगल में खड़ी रहना। हमारी ‘पावर कपल’ वाली इमेज मीडिया में बहुत अच्छी जाती है।”
तैयार होने के बाद, दोनों पति-पत्नी अपने कमरे से निकले। बाहर हॉल में सन्नाटा था, लेकिन निचले माले पर बने माता-पिता के छोटे से कमरे से हल्की-हल्की कराहने की आवाजें आ रही थीं। विनीत ने एक औपचारिकता निभाने के लिए उस कमरे की तरफ कदम बढ़ाए।
कमरे के अंदर का दृश्य किसी को भी विचलित कर देने वाला था। अस्सी वर्ष के बुजुर्ग दीनानाथ जी अपनी पत्नी सुमित्रा देवी के पास फर्श पर बैठे थे। सुमित्रा देवी का पैर बुरी तरह सूज चुका था और उनके चेहरे पर दर्द की गहरी लकीरें खिंची थीं। दीनानाथ जी अपने कांपते हाथों से बर्फ की सिकाई करने की नाकाम कोशिश कर रहे थे।
“क्या हुआ मां? आपको भी आज ही गिरना था? संभल कर नहीं चल सकतीं क्या?” विनीत ने दरवाजे पर खड़े-खड़े ही अपनी नाराजगी जाहिर की।
सुमित्रा देवी ने अपने बेटे को देखा, उनकी आंखों में आंसू थे, लेकिन होंठों पर कोई शिकायत नहीं। दीनानाथ जी ने गहरी सांस ली और बोले, “बेटा, फर्श पर साबुन का पानी रह गया था, फिसल गई। मुझे लगता है कि मामला गंभीर है, हड्डी टूट गई है या दरक गई है। दर्द बर्दाश्त के बाहर है। तू जरा अपनी गाड़ी से इसे पास वाले अस्पताल तक छोड़ दे। डॉक्टर एक बार एक्स-रे कर लेगा तो तसल्ली हो जाएगी।”
“बाबूजी! आप हमेशा अपने पुराने जमाने के नुस्खे और अपने ये खौफनाक अनुभव मेरे ऊपर थोपने लगते हैं,” विनीत ने झुंझलाते हुए कहा। “जरा सी चोट लगी है और आप सीधा हड्डी टूटने पर पहुँच गए। मैंने कहा ना, कोई पेनकिलर दे दीजिए। मेरे पास अभी बिल्कुल समय नहीं है। आज मेरी संस्था का इतना बड़ा वार्षिक समारोह है। पूरे शहर का मीडिया आ रहा है। कमिश्नर साहब आ रहे हैं। मैं वहां लेट नहीं हो सकता।”
दीनानाथ जी ने अपने बेटे के महंगे सूट और उसकी आंखों में दिख रही निर्ममता को देखा। उन्होंने कुछ कहना चाहा, याद दिलाना चाहा कि जब बचपन में विनीत साइकिल से गिरा था और उसके घुटने में मामूली सी खरोंच आई थी, तो कैसे दीनानाथ जी ने अपना जरूरी काम छोड़कर उसे गोद में उठाकर अस्पताल की दौड़ लगाई थी। लेकिन आज, उनके शब्द गले में ही अटक गए।
“मैं लौटकर डॉक्टर को बुला लूंगा। अभी आप लोग शोर मत मचाइएगा, रोहन डर जाता है।” यह कहकर विनीत पलट गया। काम्या ने भी दूर से ही कहा, “टेक केयर मां जी,” और दोनों अपनी चमचमाती मर्सिडीज में बैठकर ऑडिटोरियम की तरफ निकल गए। पीछे छूट गई एक बूढ़ी मां की सिसकियाँ और एक बेबस पिता की खामोशी।
ऑडिटोरियम खचाखच भरा हुआ था। हर तरफ रंग-बिरंगी रोशनियाँ, बड़े-बड़े बैनर और कैमरे लगे थे। बैनरों पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था- “वरिष्ठ नागरिक सुरक्षा एवं सम्मान समारोह – क्योंकि बुजुर्ग हमारी जड़ें हैं।”
विनीत और काम्या के पहुँचते ही हॉल तालियों की गूंज से भर गया। कैमरों के फ्लैश चमकने लगे। विनीत ने हाथ जोड़कर, बहुत ही शालीनता और विनम्रता का मुखौटा पहनकर सबका अभिवादन स्वीकार किया। कार्यक्रम की शुरुआत हुई और जल्द ही वह समय आ गया जिसके लिए विनीत ने इतनी तैयारियां की थीं—उसका भाषण।
विनीत मंच पर गया। उसने माइक को पकड़ा, गहरी सांस ली और अपनी सधी हुई, भावुक आवाज में बोलना शुरू किया। “देवियो और सज्जनो, आज का दिन किसी उत्सव का नहीं, बल्कि आत्म-मंथन का दिन है। हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं, जहाँ हम ऊँची-ऊँची इमारतें तो बना रहे हैं, लेकिन हमारे घरों की नींव, यानी हमारे बुजुर्ग, दरक रहे हैं। बुजुर्ग हमारे समाज की धरोहर हैं। उनके सफेद बालों में सिर्फ सफेदी नहीं, बल्कि जिंदगी का वो तजुर्बा है, जो किसी किताब में नहीं मिलता। आज कितने ही बुजुर्ग अपने ही घरों में अकेलेपन का शिकार हैं। उन्हें पैसों की नहीं, बस दो पल के प्यार और सम्मान की जरूरत होती है।”
हॉल में पिन-ड्रॉप साइलेंस था। लोग विनीत के शब्दों के जादू में बंधे थे। काम्या आगे की पंक्ति में बैठकर गर्व से मुस्कुरा रही थी।
विनीत ने आगे कहा, “बुजुर्गों की सेवा करना हमारा सिर्फ कर्तव्य नहीं, बल्कि उनका मौलिक अधिकार है। जो समाज अपने वृद्धों का सम्मान नहीं कर सकता, वो समाज कभी तरक्की नहीं कर सकता। हमारी संस्था आज से सौ ऐसे बुजुर्गों को गोद ले रही है, जिनका कोई सहारा नहीं है। हम उनके इलाज, उनके खान-पान और उनके सम्मान की पूरी जिम्मेदारी उठाएंगे।”
भाषण खत्म होते ही पूरा ऑडिटोरियम खड़े होकर तालियां बजाने लगा (स्टैंडिंग ओवेशन)। कई लोगों की आंखें नम थीं। इसके बाद सम्मान समारोह शुरू हुआ। मंच पर शहर के वृद्ध आश्रमों से लाए गए बुजुर्गों को शॉल, फल और छड़ियां बांटी जा रही थीं।
तभी, मंच पर एक बहुत ही कमजोर और बूढ़ी महिला, जो ठीक से चल भी नहीं पा रही थी, विनीत से शॉल लेते समय लड़खड़ा गई। उनके हाथ से उनकी लकड़ी की छड़ी छूटकर गिर गई और वो खुद भी गिरने वाली थीं। तभी अचानक काम्या अपनी जगह से उठी और दौड़कर मंच पर गई। उसने झट से उस बूढ़ी महिला को थाम लिया और विनीत ने झुककर उनके पैर छुए और छड़ी उठाकर उनके हाथ में दी।
उस एक पल में, ऑडिटोरियम में मौजूद दर्जनों कैमरों के फ्लैश एक साथ चमके। मीडिया वालों को अगले दिन के अखबार के लिए फ्रंट पेज की सबसे बेहतरीन तस्वीर मिल चुकी थी। हर कोई विनीत और काम्या की दरियादिली, उनके संस्कारों और उनकी महानता के कसीदे पढ़ रहा था। कार्यक्रम बहुत बड़ी सफलता रहा।
देर रात, जब विनीत और काम्या अपनी शानदार गाड़ी में घर लौट रहे थे, तो दोनों बेहद खुश थे। काम्या अपने फोन पर सोशल मीडिया चेक कर रही थी।
“विनीत! देखो, तुम्हारी स्पीच का वीडियो वायरल हो गया है। हजारों लाइक्स और कमेंट्स आ रहे हैं। सब तुम्हें आज के जमाने का श्रवण कुमार कह रहे हैं,” काम्या ने चहकते हुए कहा।
विनीत ने भी गर्व से मुस्कुराते हुए स्टीयरिंग व्हील पर हाथ फेरा, “मैंने कहा था ना काम्या, पब्लिक को इमोशनल चीजें बहुत पसंद आती हैं। कल के सारे अखबारों में हम ही हम छाए रहेंगे।”
अपनी जीत के खुमार में डूबे हुए दोनों जब घर पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि घर का मुख्य दरवाजा खुला हुआ था और उनके पड़ोस में रहने वाले शर्मा जी और एक डॉक्टर बाहर खड़े थे। विनीत का दिल एक पल के लिए धक से रह गया। वह गाड़ी से उतरा और अंदर की तरफ भागा।
हॉल में दीनानाथ जी सोफे पर सिर झुकाए बैठे थे। उनकी आंखें सूजी हुई थीं। रोहन उनके पास बैठा उनके आंसू पोंछ रहा था।
“क्या हुआ बाबूजी? मां कहाँ है? और ये शर्मा जी यहाँ क्या कर रहे हैं?” विनीत ने घबराहट में पूछा।
दीनानाथ जी ने धीरे से सिर उठाया। उनकी आंखों में अब कोई बेबसी नहीं थी, बल्कि एक ऐसा खालीपन था जो किसी भी गुस्से से ज्यादा खतरनाक होता है। उन्होंने भारी आवाज में कहा, “तुम्हारी मां अस्पताल में है, विनीत। तुम तो अपने सम्मान समारोह में व्यस्त थे, इसलिए मैंने ही शर्मा जी को फोन करके बुला लिया था। डॉक्टर ने बताया है कि उसकी जांघ की हड्डी (फीमर बोन) तीन जगह से टूट गई थी। वो पिछले पांच घंटों से असहनीय दर्द में तड़प रही थी। अभी-अभी उसका ऑपरेशन शुरू हुआ है।”
विनीत सन्न रह गया। उसके हाथ से उसकी महंगी कार की चाबी छूटकर फर्श पर गिर गई।
“हड्डी टूट गई? लेकिन… लेकिन मुझे लगा कि सिर्फ मोच…” विनीत हकलाने लगा।
शर्मा जी, जो पिछले कई सालों से इस परिवार को जानते थे, आगे आए और बोले, “विनीत बेटा, बुरा मत मानना, लेकिन आज तुमने साबित कर दिया कि तुम्हारे लिए तुम्हारे माता-पिता सिर्फ इस घर के एक कोने में पड़े पुराने फर्नीचर से ज्यादा कुछ नहीं हैं। अगर मैं समय पर नहीं आता, तो दर्द के मारे चाची जी की जान भी जा सकती थी। खैर, तुम लोग थके हुए होगे, आराम करो। मैं अस्पताल जा रहा हूँ, दीनानाथ जी को भी वहीं ले जा रहा हूँ।”
दीनानाथ जी धीरे से उठे और शर्मा जी के साथ दरवाजे की तरफ बढ़ गए। उन्होंने पलट कर अपने बेटे को एक बार भी नहीं देखा।
अगली सुबह, शहर के सभी प्रमुख अखबारों के पहले पन्ने पर विनीत और काम्या की वो तस्वीर छपी थी, जिसमें वे मंच पर उस बूढ़ी महिला को सहारा दे रहे थे। तस्वीर के नीचे मोटे अक्षरों में लिखा था— “वरिष्ठ नागरिक दिवस पर समाज सेवक विनीत ने पेश की मानवता की मिसाल: बुजुर्गों के मसीहा बनकर उभरे।”
ड्राइंग रूम की टेबल पर वो अखबार पड़ा था। रोहन, जो सुबह से खामोश था, उस अखबार को देख रहा था। उसने अखबार उठाया और अपने पिता के पास गया, जो रात भर की बेचैनी के कारण सोफे पर ही बैठे हुए थे।
“पापा,” रोहन की बालसुलभ लेकिन गंभीर आवाज ने विनीत की तंद्रा तोड़ी। रोहन ने अखबार की तस्वीर पर उंगली रखते हुए पूछा, “पापा, आप पेपर में तो दूसरों की दादियों को गिरने से बचा रहे हैं, फिर कल आपने अपनी दादी को क्यों गिरने दिया? क्या घर के बुजुर्गों को दर्द नहीं होता?”
एक दस साल के बच्चे का यह मासूम लेकिन चुभता हुआ सवाल विनीत के सीने में किसी खंजर की तरह उतर गया। उसके पास कोई जवाब नहीं था। उसके सारे सम्मान, सारी तालियां, सारे अवार्ड और सोशल मीडिया के लाखों लाइक्स, उस एक सवाल के सामने राख हो चुके थे। विनीत उस तस्वीर को देखता रहा, जिसमें वो एक महान इंसान दिख रहा था, लेकिन हकीकत में, वो एक ऐसा खोखला बेटा बन चुका था, जिसने अपनी ही जड़ों को सूखने के लिए छोड़ दिया था। अखबार में छपी वो मुस्कुराती हुई तस्वीर, असल में उसके चरित्र के दोहरेपन पर एक तमाचा मार रही थी, जिसकी गूंज उसे शायद उम्र भर सुनाई देने वाली थी।
पाठकों से एक सवाल:
क्या आपने भी अपने आस-पास ऐसे दोहरे चरित्र वाले लोगों को देखा है, जो बाहर तो आदर्शवाद का चोला पहने रहते हैं, लेकिन अपने ही घर में अपनों की परवाह नहीं करते? विनीत की इस हरकत पर आपकी क्या राय है? क्या समाज में दिखावे की बीमारी हमारी संवेदनशीलता को निगलती जा रही है? अपने विचार हमें कमेंट करके जरूर बताएं।
“अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।”