असली चरित्र

ट्रेन के पहियों की एक लयबद्ध खट-खट और खिड़की से पीछे छूटते हुए पेड़ों के दृश्य मुझे हमेशा सुकून देते थे, लेकिन आज यह सफर मुझे अंदर ही अंदर एक अजीब सी बेचैनी दे रहा था। मेरे सामने वाली सीट पर मेरी पत्नी, सुमेधा बैठी थी, और उसकी त्योरियां इस बात का सुबूत थीं कि उसका मूड काफी खराब हो चुका है। कारण कोई और नहीं, बल्कि हमारे ही डिब्बे में, हमसे कुछ सीटें छोड़कर बैठा मेरा छोटा चचेरा भाई, कबीर था।

“मुझे समझ नहीं आता कि इसे हमारे ही डिब्बे में टिकट बुक करानी थी क्या?” सुमेधा ने अपनी आवाज़ को फुसफुसाहट में दबाते हुए कहा, लेकिन उसकी आँखों की नाराजगी साफ झलक रही थी। “तुम्हें तो पता है मुझे इसके आस-पास रहना बिलकुल पसंद नहीं है। कोई उसूल ही नहीं है इस लड़के की जिंदगी में। आज तक किसी एक रिश्ते में टिक कर नहीं रह पाया। कभी किसी लड़की के साथ दिखता है, तो कभी किसी और के साथ। ऊपर से कपड़े देखो इसके, घुटनों से फटी हुई जींस और हाथों में वो अजीब से बैंड। कोई कह सकता है कि ये हमारे खानदान का लड़का है? बिलकुल आवारा और चरित्रहीन लगता है।”

सुमेधा की बातें मेरे कानों में किसी पुरानी टेप-रिकॉर्डर की तरह बज रही थीं। यह पहली बार नहीं था जब उसने कबीर को लेकर इस तरह की टिप्पणी की थी। सुमेधा एक बहुत ही पारंपरिक और उसूलों वाली महिला है, जिसके लिए समाज के नियम और एक व्यक्ति का पहनावा ही उसके चरित्र का आईना होते हैं। और कबीर, वह इन सब पैमानों पर एकदम खरा नहीं उतरता था। पैंतीस साल का होने को आया था, लेकिन आज भी एक कॉलेज के लड़के जैसी जिंदगी जीता था। एक शादी टूट चुकी थी, और उसके बाद से उसका नाम कई लड़कियों के साथ जुड़ चुका था। सुमेधा को उसका यही बेपरवाह रवैया खटकता था।

सच कहूँ तो, गलती मेरी ही थी। मुझे सुमेधा को कबीर की निजी जिंदगी की इतनी बारीकियां नहीं बतानी चाहिए थीं। पति-पत्नी के बीच कुछ भी छिपना नहीं चाहिए, इसी आदर्श को मानते हुए मैंने कबीर के तलाक के असली कारण, उसकी महिला मित्रों और उसके बेबाक स्वभाव के बारे में सुमेधा को सब कुछ बता दिया था। नतीजा यह हुआ कि सुमेधा ने कबीर को पूरी तरह से एक ‘बदचलन’ इंसान का टैग दे दिया था।

लेकिन मैं कबीर को बचपन से जानता था। हाँ, वह किसी एक रिश्ते में नहीं बंध पाया, लेकिन क्या सिर्फ इसलिए वह बुरा इंसान हो गया? उसने अपनी जिंदगी में कभी किसी से झूठ नहीं बोला। जिन भी लड़कियों के साथ वह रिश्ते में रहा, उनसे उसने कभी शादी के झूठे वादे नहीं किए। यहाँ तक कि उसकी पूर्व पत्नी भी आज उसकी एक अच्छी दोस्त है। कबीर ने कभी अपनी कमियों को छिपाने के लिए शराफत का मुखौटा नहीं पहना। वह जो था, सबके सामने था। कोई फरेब नहीं, कोई धोखा नहीं। फिर भी, समाज और मेरी पत्नी की नजरों में वह एक ‘गिरा हुआ’ इंसान था।

“तुम कुछ बोल क्यों नहीं रहे हो? आज फिर अपने उस लाडले भाई के ख्यालों में खो गए?” सुमेधा की चुभती हुई आवाज़ ने मुझे मेरे ख्यालों से बाहर खींचा।

“नहीं सुमेधा, मैं बस यह सोच रहा था कि इंसान का चरित्र क्या सिर्फ उसके कपड़ों और उसकी निजी जिंदगी के फैसलों से तय होता है?” मैंने धीमे से कहा।

“और नहीं तो क्या!” सुमेधा ने तुरंत जवाब दिया। “अब जरा अपने बाईं ओर देखो।” सुमेधा ने अपनी आँखों के इशारे से मुझे हमारी ही कतार में बैठी एक दूसरी सवारी की तरफ देखने को कहा।

मैंने मुड़कर देखा। वहाँ एक अधेड़ उम्र के सज्जन बैठे थे। उम्र लगभग पचपन या साठ के करीब होगी। उन्होंने बहुत ही सलीके से इस्त्री किया हुआ सफेद कुर्ता-पायजामा पहना था। उनके चेहरे पर एक अजीब सा तेज और शांति थी। आँखों पर एक सलीकेदार चश्मा था और उनके हाथों में एक मोटी सी धार्मिक पुस्तक थी, जिसे वे बड़े ध्यान से पढ़ रहे थे। उनके पैर में चमकते हुए चमड़े के जूते थे और कलाई पर एक महंगी घड़ी बंधी थी। उनके पूरे व्यक्तित्व से एक सम्मानजनक और सभ्रांत नागरिक की छवि झलक रही थी।

“इन्हें कहते हैं शरीफ और संस्कारी इंसान,” सुमेधा ने गर्व से कहा, जैसे वह कोई बहुत बड़ा सत्य उजागर कर रही हो। “कपड़े देखो कितने शालीन हैं। चेहरे पर कितनी शांति है। सफर के दौरान भी अपना समय एक अच्छी किताब पढ़ने में लगा रहे हैं। और एक तुम्हारा भाई है, कानों में वो बड़े-बड़े हेडफोन लगाकर न जाने कौन सा फूहड़ गाना सुन रहा होगा। इंसान को उम्र के साथ इन सज्जन की तरह गरिमामय हो जाना चाहिए। तभी समाज में इज्जत मिलती है।”

मैं चुप रहा। सुमेधा की बातों में समाज का वह कटु सत्य छिपा था जिसे हम सभी मानते हैं—’जो दिखता है, वही बिकता है।’ सफेद कपड़े और एक धार्मिक किताब किसी भी इंसान को समाज की नजरों में देवता बना सकते हैं। मैं मन ही मन सोचने लगा कि काश कबीर भी थोड़ा समझदार हो जाता। कम से कम दिखावे के लिए ही सही, कपड़े ढंग के पहन लेता। किसी एक लड़की से शादी करके घर बसा लेता। तो शायद सुमेधा को या इस समाज को उससे इतनी शिकायत न होती।

ट्रेन अपनी पूरी रफ्तार पकड़ चुकी थी। बाहर शाम गहराने लगी थी और डिब्बे के अंदर की पीली रोशनी में सभी यात्री अपने-अपने कामों में व्यस्त थे। कोई सो रहा था, कोई फोन पर बात कर रहा था, और कोई खिड़की से बाहर झाँक रहा था।

मेरी नजरें अचानक फिर से उन्हीं सफेद कुर्ते वाले ‘सज्जन’ की तरफ चली गईं। लेकिन इस बार, मेरी नजरें उन पर नहीं, बल्कि उनके सामने वाली सीट पर बैठी एक युवा लड़की पर जाकर टिक गईं। लड़की की उम्र बीस-बाईस साल के करीब रही होगी। उसने एक साधारण सा सलवार सूट पहना हुआ था और वह खिड़की से बाहर देखते हुए अपने कानों में ईयरफोन लगाए हुए थी।

मैं ध्यान से देखने लगा। उन सज्जन का व्यवहार कुछ अजीब सा होने लगा था। वे अपनी धार्मिक किताब पढ़ तो रहे थे, लेकिन उनकी आँखें बार-बार किताब के ऊपर से उस लड़की की तरफ उठ रही थीं। शुरुआत में मुझे लगा कि शायद मैं कुछ ज्यादा ही सोच रहा हूँ। लेकिन अगले पंद्रह मिनटों में जो कुछ हुआ, उसने मुझे अंदर तक हिला कर रख दिया।

सज्जन ने अपनी सीट से थोड़ा और आगे खिसक कर बैठना शुरू कर दिया। उनके पैरों के बीच की दूरी कम होने लगी और धीरे-धीरे उनका जूता लड़की के पैरों को छूने लगा। लड़की ने असहज होकर अपने पैर पीछे खींच लिए। उसने एक बार उन सज्जन की तरफ देखा, लेकिन उनकी उम्र और उनके सफेद कपड़ों की शराफत देखकर शायद वह कुछ बोल नहीं पाई। उसने खुद को अपनी सीट के कोने में समेट लिया।

लेकिन उन सज्जन की हिम्मत और बढ़ गई। उन्होंने किताब को बंद कर दिया और अब वे सीधे उस लड़की को घूर रहे थे। लड़की के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं। उसकी आँखों में खौफ और बेबसी साफ देखी जा सकती थी। वह कसमसा रही थी, अपना दुपट्टा बार-बार ठीक कर रही थी और इस उम्मीद में इधर-उधर देख रही थी कि शायद कोई उसकी मदद करे।

मेरी अपनी आँखें यह सब देखकर फटी की फटी रह गईं। मेरे अंदर का खून खौलने लगा, लेकिन न जाने क्यों, एक अजीब सी हिचकिचाहट ने मुझे रोक लिया। मैं सोचने लगा कि अगर मैंने कुछ कहा, तो क्या होगा? वह आदमी उम्र में बड़ा था, देखने में एक रसूखदार व्यक्ति लग रहा था। अगर उसने पलटकर कह दिया कि ट्रेन झटके खा रही है इसलिए पैर लग गया, तो मैं क्या साबित कर पाऊँगा? समाज हमेशा ऐसे सफेदपोश लोगों का ही साथ देता है। इस ‘क्या होगा’ के डर ने मुझे अपनी सीट से उठने नहीं दिया।

तभी, मुझे अपने पीछे से किसी के तेज कदमों की आहट सुनाई दी।

मैंने मुड़कर देखा। कबीर, जो अब तक अपनी सीट पर आँखें बंद किए बैठा था, वह अपनी जगह से उठ चुका था। उसके गले में अभी भी हेडफोन लटक रहे थे, लेकिन उसकी आँखें सीधे उसी सीट की तरफ गड़ी थीं जहाँ वह लड़की बैठी थी। कबीर ने सब कुछ देख लिया था।

कबीर तेज कदमों से चलता हुआ उन सज्जन के पास गया। उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी, लेकिन आँखों में एक तेज गुस्सा था जिसे उसने बहुत चालाकी से छुपा रखा था।

“अरे अंकल जी!” कबीर ने अचानक बहुत ही तेज और खुशमिजाज आवाज़ में कहा, जिससे डिब्बे के कई लोगों का ध्यान उनकी तरफ चला गया।

सज्जन बुरी तरह चौंक गए। उन्होंने हड़बड़ाहट में अपनी किताब वापस खोल ली। “क्या… क्या बात है?” उन्होंने हकलाते हुए पूछा।

“अरे अंकल जी, मैं देख रहा हूँ कि आप काफी देर से अपनी सीट पर परेशान हो रहे हैं। शायद आपके पैरों में दर्द है, इसलिए आप बार-बार अपने पैर आगे की तरफ फैला रहे हैं,” कबीर ने एक व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ कहा। उसकी आवाज़ इतनी तेज थी कि आस-पास बैठे सभी लोग सुन रहे थे।

सज्जन का चेहरा सफेद पड़ गया। उनका ‘शराफत’ का मुखौटा अब पसीने से भीगने लगा था। “नहीं… ऐसा कुछ नहीं है। मैं ठीक हूँ,” उन्होंने नजरें चुराते हुए कहा।

“अरे ऐसे कैसे ठीक हैं! आप हमारे बुजुर्ग हैं, आपकी तकलीफ हम कैसे देख सकते हैं?” कबीर ने बिना उन्हें मौका दिए कहा। “आप एक काम कीजिए, आप मेरी उस वाली सीट पर जाकर बैठ जाइए। वहाँ पैर फैलाने की बहुत जगह है। और मैं यहाँ इस छोटी सीट पर एडजस्ट कर लूँगा। आइए उठिए!”

कबीर ने लगभग उन्हें आदेश देते हुए उनका हाथ पकड़ लिया और उन्हें आधा खड़ा कर दिया। सज्जन के पास अब कोई विकल्प नहीं बचा था। पूरे डिब्बे की नजरें उन पर थीं। अगर वे मना करते, तो उनकी असलियत सबके सामने आ जाती। अपमान और झल्लाहट से उनका चेहरा लाल हो गया था, लेकिन वे चुपचाप उठे और कबीर की बताई हुई सीट की तरफ चले गए, जहाँ से उस लड़की का चेहरा भी नहीं दिख सकता था।

कबीर अब आराम से उस लड़की के सामने वाली सीट पर बैठ गया था। उसने उस लड़की की तरफ देखा और एक हल्की सी, आश्वस्त करने वाली मुस्कान दी। लड़की की आँखों में जो डर था, वह अब एक गहरी कृतज्ञता और राहत में बदल चुका था। उसने बिना कुछ कहे, सिर्फ अपनी आँखों से कबीर को धन्यवाद कहा। कबीर ने वापस अपने कानों में हेडफोन लगाए और आँखें बंद कर लीं, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

मैं अपनी जगह पर बुत बनकर बैठा था। मेरे सामने एक ही पल में दो इंसानों का असली चरित्र पूरी तरह से बेनकाब हो गया था। एक वह, जिसके सफेद कपड़ों और धार्मिक किताब ने मेरी पत्नी को यह यकीन दिला दिया था कि वह एक देवता है, लेकिन असल में वह एक गिद्ध था। और दूसरा वह, जिसकी फटी हुई जींस, बिखरे हुए बाल और बेपरवाह जिंदगी ने उसे समाज की नजरों में चरित्रहीन बना दिया था, लेकिन असल में वही एक सच्चा इंसान और रक्षक निकला।

मैंने धीरे से सुमेधा की तरफ देखा। वह भी यह पूरा वाकया देख चुकी थी। उसके चेहरे पर अब एक अजीब सी खामोशी थी। उसकी आँखें झुकी हुई थीं और वह अपने हाथों की उंगलियों को आपस में उलझा रही थी। वह समझ चुकी थी कि उसने इंसान को पहचानने में कितनी बड़ी भूल की थी।

मुझे अब कुछ भी कहने की जरूरत नहीं थी। मैं जान गया था कि मर्यादा, शराफत और चरित्र सिर्फ कपड़ों और समाज के बनाए गए खोखले नियमों से तय नहीं होते। असली चरित्र वह होता है जो तब सामने आता है जब कोई आपको देख नहीं रहा होता, या जब किसी बेबस को आपकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है। आज मेरे ‘बदचलन’ भाई ने मुझे शराफत का वह पाठ पढ़ा दिया था, जो शायद कोई धार्मिक किताब भी नहीं पढ़ा सकती थी।

मैं मुस्कुराया, खिड़की के बाहर देखा, और सुकून से अपनी आँखें मूंद लीं। आज का सफर मुझे जिंदगी का सबसे बड़ा सबक दे चुका था।

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