यादगार यात्रा

गोमती एक्सप्रेस आज अपने तय समय से चार घंटे की देरी से चल रही थी। कादंबरी खिड़की से माथा टिकाए बाहर के धुंधले नज़ारों को देख रही थी। ज़िंदगी भी तो इसी बारिश के धुंधले शीशे जैसी हो गई थी, जहाँ बाहर बहुत कुछ था मगर अंदर से सब धुंधला ही नज़र आता था। घर में अचानक आई एक मुसीबत ने उसे लखनऊ से दिल्ली  के इस सफर पर मजबूर कर दिया था। छोटे भाई के एक्सीडेंट की खबर सुनकर उसे आनन-फानन में निकलना पड़ा था। एसी डिब्बे में टिकट कन्फर्म नहीं हुआ, तो मजबूरी में स्लीपर क्लास के जनरल कोटे में बैठना पड़ा। चारों तरफ लोगों का शोर, मूंगफली वाले की आवाज़, रोते हुए बच्चों की चीखें और पसीने की मिली-जुली गंध थी, लेकिन कादंबरी इन सबसे बेखबर अपने ख्यालों में गुम थी।

तभी कानपुर स्टेशन पर एक हुजूम अंदर दाखिल हुआ। कादंबरी ने अपने सामान को थोड़ा समेटा ताकि कोई और बैठ सके। तभी उसकी नज़र उस शख्स पर पड़ी जो अपने गीले छाते को झटकते हुए ठीक उसके सामने वाली खाली सीट पर आकर बैठ गया।

कादंबरी की सांसें जैसे एक पल के लिए रुक सी गईं। वह चेहरा, जिसे उसने पिछले बाईस सालों से नहीं देखा था, आज अचानक इतनी करीब था। वह समीर था। वही समीर, जिसके साथ उसने कभी पूरी ज़िंदगी बिताने के ख्वाब बुने थे, जिसके साथ उसने कॉलेज की सीढ़ियों पर बैठकर भविष्य के रंगीन महल खड़े किए थे।

बाईस साल पहले की वो गर्मियाँ कादंबरी को आज भी याद थीं। उसके पिता, ठाकुर सूर्यप्रताप सिंह, शहर के जाने-माने रसूखदार इंसान थे। उनके घर की दीवारें जितनी ऊंची थीं, वहां के नियम उतने ही सख्त। कादंबरी घर की बड़ी बेटी थी, और समीर एक साधारण से मास्टर जी का बेटा, जो कविताएं लिखता था और आसमान छूने के सपने देखता था। दोनों की दुनिया अलग थी, लेकिन दिल के तार जुड़ चुके थे। जब ठाकुर साहब को इस बात की भनक लगी, तो घर में भूचाल आ गया। कादंबरी की माँ ने रो-रोकर अपने सुहाग और परिवार की इज्जत का वास्ता दिया। छोटे भाई-बहनों के भविष्य का डर दिखाया गया। एक तरफ समीर का निश्छल प्यार था और दूसरी तरफ परिवार की इज्जत का भारी बोझ।

कादंबरी ने टूटकर परिवार को चुना था। उसने समीर से मुंह मोड़ लिया और पिता की पसंद के एक बड़े व्यापारी, सुधीर से शादी कर ली। सुधीर एक अच्छा इंसान था, लेकिन वो प्यार, वो जज़्बात जो समीर के लिए थे, वो किसी और के लिए कभी पैदा नहीं हुए। परिवार की जिम्मेदारियों में, बच्चों की परवरिश में, और सुधीर के बड़े परिवार को संभालने में कादंबरी ने खुद को ऐसा झोंका कि उसे याद ही नहीं रहा कि वो कभी ‘कादंबरी’ भी थी, मिसेज सुधीर बनने से पहले।

और आज… आज वही समीर उसके सामने बैठा था। उसने कादंबरी की तरफ देखा भी नहीं। वो शायद अपनी ही किसी उधेड़बुन में था। उम्र ने समीर पर भी अपना असर छोड़ा था। उसके घने काले बालों में अब सफेदी झांकने लगी थी। पेट थोड़ा बाहर आ गया था, और आंखों पर एक मोटे फ्रेम का चश्मा चढ़ गया था। लेकिन उसकी वो आदत… सोचते हुए अपने होठों को हल्के से चबाने की आदत, आज भी वैसी ही थी। उसने अपनी जेब से एक पुराना सा चश्मा निकाला और अपने मोबाइल की स्क्रीन में खो गया।

कादंबरी के दिल में एक अजीब सी हलचल होने लगी। उसने झट से अपनी साड़ी का पल्लू सिर पर खींच लिया। उसे अचानक अपने रूप की चिंता होने लगी। सुधीर के जाने के बाद से उसने खुद पर ध्यान देना ही छोड़ दिया था। बालों में डाई किए हुए महीनों हो गए थे, और सफेद जड़ें साफ नज़र आने लगी थीं। आंखों के नीचे काले घेरे और चेहरे पर झुर्रियां उसकी ज़िंदगी के कड़े संघर्षों की कहानी चीख-चीख कर कह रही थीं। क्या समीर उसे इस हाल में पहचान पाएगा? क्या वो उसे इस रूप में देखना चाहेगा?

एक अजीब सी शर्मिंदगी और घबराहट ने उसे घेर लिया। वह उठी और भीड़ को चीरती हुई वॉशरूम की तरफ भागी। ट्रेन का वॉशरूम साफ नहीं था, लेकिन उसे परवाह नहीं थी। उसने अपने हैंडबैग से फेसवाश निकाला और ठंडे पानी से अपना चेहरा धोया। सामने लगे गंदे शीशे में उसने खुद को निहारा। समय सच में कितनी जल्दी बीत जाता है। वह खूबसूरत, चुलबुली लड़की जिसे लोग पलट-पलट कर देखते थे, आज एक थकी हुई अधेड़ उम्र की औरत बन गई थी। उसने शीशे में देखकर एक फीकी सी मुस्कान बिखेरी और अजीब सा मुँह बनाया। “तुम अब वो नहीं रही कादंबरी,” उसने खुद से बुदबुदाते हुए कहा। शीशा वापस बैग में डाला और अपनी सीट की तरफ लौट आई।

जब वह वापस लौटी, तो उसने देखा कि वो साहब तो खिड़की की तरफ से उसका बैग सरकाकर खुद खिड़की के पास बैठ गए थे। कादंबरी को हल्की सी झुंझलाहट हुई। ‘ये आदमी कभी नहीं सुधरेगा, इसे हमेशा खिड़की की सीट चाहिए,’ उसने मन ही मन सोचा।

वह चुपचाप अपनी जगह पर बैठ गई। ट्रेन फिर से चल पड़ी थी। कुछ देर तक दोनों के बीच खामोशी रही। सिर्फ ट्रेन के पहियों की छुक-छुक और बाहर बरसती बारिश की आवाज़ थी। तभी चाय वाले की आवाज़ आई, “चाय, गरम चाय!”

समीर ने उसे रोका, “भैया, दो कप चाय देना।”

चाय वाला चाय दे ही रहा था कि अचानक ट्रेन ने एक ज़ोरदार झटका लिया। चाय के कुछ छींटे समीर के कुर्ते पर और कुछ कादंबरी की साड़ी के किनारे पर गिरे।

“ओह, आई एम सो सॉरी!” समीर ने तुरंत अपनी जेब से रुमाल निकालते हुए कहा। उसने अपनी सीट से उठकर कादंबरी की तरफ देखा, “आपको ज़्यादा गर्म तो नहीं लगा…?”

उसके शब्द बीच में ही अटक गए। उसने कादंबरी को गौर से देखा। चश्मे के पीछे उसकी आंखें सिकुड़ गईं। वो पल, वो चंद सेकंड कादंबरी को सदियों जैसे लगे। समीर के चेहरे पर पहले अचरज, फिर अविश्वास, फिर खुशी और अंत में एक गहरी शांति के भाव तैर गए।

“कादंबरी…?” उसकी आवाज़ में एक अजीब सा कंपन था।

कादंबरी ने नज़रें झुका लीं, फिर धीरे से सिर हिलाया और पल्लू को थोड़ा ढीला कर दिया। “कैसे हो समीर?”

समीर वहीं अपनी सीट पर धम्म से बैठ गया। “मैं… मैं ठीक हूँ। तुम? तुम यहाँ, इस ट्रेन में? और वो भी जनरल डिब्बे में अकेले?”

कादंबरी ने एक लंबी सांस ली और अपने छोटे भाई के एक्सीडेंट की बात बताई। समीर ने सब बहुत ध्यान से सुना।

“सुधीर जी कैसे हैं? बच्चे?” समीर ने हिचकिचाते हुए पूछा।

“सुधीर अब नहीं रहे। पांच साल हो गए। हार्ट अटैक से अचानक ही चले गए। दोनों बेटियां अपने-अपने ससुराल में खुश हैं। मैं बस अब यूं ही, ज़िम्मेदारियों के बचे-खुचे पन्नों को समेट रही हूँ,” कादंबरी ने एक बहुत ही शांत आवाज़ में कहा, जिसमें कोई शिकायत नहीं थी, बस एक ठहराव था। “और तुम? तुमने तो कभी शादी के बारे में सोचा भी नहीं था?”

समीर हल्का सा मुस्कुराया, उसने अपना चश्मा उतारा और उसे रुमाल से साफ करने लगा। “हाँ, सोचा तो नहीं था। लेकिन माँ की ज़िद के आगे झुकना पड़ा। नीता बहुत अच्छी इंसान है। एक बेटा है, अभी इंजीनियरिंग कर रहा है। बस चल रही है ज़िंदगी।”

दोनों फिर से खामोश हो गए। यह वो खामोशी नहीं थी जो अजनबियों के बीच होती है। यह वो खामोशी थी जिसमें बाईस सालों के वो सारे सवाल, वो सारे जवाब छिपे थे, जिन्हें अब शब्दों की ज़रूरत नहीं थी।

समीर ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा, “तुम्हें पता है, मैंने बरसों तक तुम्हें हर भीड़ में, हर चौराहे पर ढूंढा। मैं अक्सर सोचता था कि अगर तुम कभी मिलीं, तो क्या कहूंगा। बहुत गुस्सा था मेरे अंदर। बहुत सवाल थे कि तुमने वो फैसला क्यों लिया।”

कादंबरी की आंखों में नमी आ गई, लेकिन उसने आंसू बहने नहीं दिए। “और अब?”

समीर ने उसकी तरफ मुड़कर देखा, और उसके चेहरे पर एक बहुत ही नरम, बहुत ही सुकून भरी मुस्कान थी। “अब? अब जब तुम्हें देखा, तो लगा कि जैसे एक पुरानी और अधूरी किताब का आखिरी पन्ना मिल गया हो। कोई सवाल नहीं बचा कादंबरी। हम सब अपनी-अपनी किस्मत, अपनी-अपनी पारिवारिक मजबूरियों के कैदी हैं। तुमने जो किया, वो उस वक्त तुम्हारे परिवार के लिए सही था। मैं खुश हूँ कि तुम सलामत हो और तुमने अपनी ज़िंदगी को इतनी गरिमा के साथ जिया।”

कादंबरी को लगा जैसे उसके सीने से कोई बहुत भारी पत्थर हट गया हो। बरसों से जो एक अपराधबोध वो अपने अंदर लिए घूम रही थी, समीर की एक मुस्कान ने उसे धो दिया था।

“बालों में ये सफेदी और आंखों पर चश्मा… तुम काफी बदल गए हो समीर,” कादंबरी ने माहौल को हल्का करने की कोशिश करते हुए कहा।

समीर ज़ोर से हंस पड़ा। “हाँ, और तुम भी तो। वो तुम्हारी दो चोटियां और लाल बिंदी… अब कहाँ गईं? लेकिन सच कहूं कादंबरी, इन झुर्रियों में ज़िंदगी का जो तजुर्बा है, वो तुम्हारी उस कमसिन उम्र की खूबसूरती से कहीं ज़्यादा कीमती और हसीन है।”

कादंबरी मुस्कुरा दी। उसने अपना पल्लू सिर से पूरी तरह हटा लिया। अब उसे अपने सफेद बालों और झुर्रियों को छिपाने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं हो रही थी। जो इंसान उसकी रूह से वाकिफ था, उसके सामने इस झूठे आवरण की क्या बिसात थी।

अगला स्टेशन आने वाला था। समीर का स्टेशन आ गया था। वो उठा, अपना बैग उठाया और छाता सीधा किया।

“अच्छा, अब मैं चलता हूँ। अपना ख्याल रखना कादंबरी,” समीर ने कहा।

“तुम भी अपना ख्याल रखना समीर,” कादंबरी ने कहा।

समीर कुछ दूर चला, फिर पलटा और मुस्कुराते हुए बोला, “वैसे, खिड़की वाली सीट पर कब्ज़ा जमाने की मेरी आदत आज भी नहीं गई।”

कादंबरी हंस पड़ी। समीर भीड़ में कहीं गुम हो गया। ट्रेन फिर से चल पड़ी। कादंबरी ने अपना बैग उठाया और उस खिड़की वाली सीट पर बैठ गई जहाँ अभी समीर बैठा था। अब बाहर का नज़ारा धुंधला नहीं था। बारिश रुक चुकी थी और बादलों के बीच से सूरज की किरणें झांक रही थीं। ज़िंदगी भी तो इसी बारिश के बाद की धूप जैसी ही थी – थोड़ी ठंडी, थोड़ी गर्म, लेकिन खूबसूरत।

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