“सुमित्रा! तुमने वो बेबी लोशन और थर्मामीटर रखा या नहीं? और वो जो छोटी-छोटी सूती की टोपियां मैंने कल बाज़ार से लाकर दी थीं, वो बैग में हैं या तुमने बाहर ही छोड़ दीं?”
कमरे में चारों तरफ फैले सामान के बीच खड़े होकर रघुनाथ जी बड़ी बेचैनी से सूटकेस की चेन बंद करने की कोशिश कर रहे थे। उनके माथे पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा सकती थीं। पिछले तीन दिनों से उनके घर में इसी तरह की अफरा-तफरी मची हुई थी। मौका ही कुछ ऐसा था। उनकी इकलौती बेटी, काव्या, ने एक महीने पहले एक प्यारे से बेटे को जन्म दिया था। रघुनाथ जी के घुटने के ऑपरेशन की वजह से वे लोग तुरंत काव्या के पास बेंगलुरु नहीं जा पाए थे। लेकिन अब, जैसे ही डॉक्टर ने उन्हें सफर करने की थोड़ी सी इजाजत दी, रघुनाथ जी ने एक पल की भी देरी किए बिना टिकट बुक करवा लिए थे।
रसोई से हाथ पोंछते हुए सुमित्रा जी बाहर आईं और अपने पति की घबराहट देखकर मुस्कुराए बिना न रह सकीं। “अजी, सब रख लिया है। आप बेवजह इतना परेशान हो रहे हैं। काव्या वहां कोई जंगल में नहीं रह रही है, बेंगलुरु जैसे बड़े शहर में है। वहां सब कुछ मिलता है।”
रघुनाथ जी ने चश्मा नाक पर टिकाते हुए एक गहरी सांस ली और सूटकेस को किनारे खिसकाते हुए बोले, “शहर बड़ा है तो क्या हुआ? शहर तो हमारा भी कम बड़ा नहीं है, लेकिन तुम अपनी बेटी को भूल गईं क्या? जो लड़की कॉलेज जाते वक्त अपनी स्कूटी की चाबी रोज फ्रिज के ऊपर या टीवी के पीछे भूल जाती थी, जिसे अगर तुम सुबह आवाजें देकर न उठाओ तो वो दोपहर तक सोती रहे, वो भला एक नवजात बच्चे की देखभाल कैसे करेगी? मुझे तो रात-रात भर नींद नहीं आती यह सोचकर कि कहीं उसने बच्चे को दूध पिलाने में कोई लापरवाही तो नहीं कर दी! कहीं उसे ठंड तो नहीं लग गई!”
सुमित्रा जी रघुनाथ जी के पास आकर बैठ गईं और बड़े ही स्नेह से उनके कंधे पर हाथ रखते हुए बोलीं, “आपकी चिंता मैं समझ सकती हूँ। हर पिता को अपनी बेटी हमेशा एक छोटी बच्ची ही लगती है। लेकिन आप एक बहुत बड़ी बात भूल रहे हैं।”
“कौन सी बात?” रघुनाथ जी ने अचरज से पूछा।
“यही कि अब हमारी काव्या सिर्फ हमारी अल्हड़ बेटी नहीं रह गई है। अब वह एक माँ है। और प्रकृति का नियम है, जब कोई स्त्री एक बच्चे को जन्म देती है, तो उसके भीतर का सारा लड़कपन, सारी लापरवाही कहीं पीछे छूट जाती है। ईश्वर ने औरत को गढ़ा ही ऐसे है कि मातृत्व उसे हर परिस्थिति से लड़ना और उसमें ढलना सिखा देता है। जिस दिन एक बच्चा जन्म लेता है, उसी दिन एक माँ भी जन्म लेती है। आप वहां जाकर खुद देख लीजिएगा, आपको अपनी वो पुरानी भुलक्कड़ काव्या कहीं नजर नहीं आएगी।”
रघुनाथ जी ने सुमित्रा जी की बात सुन तो ली, लेकिन उनके मन का संशय अभी भी पूरी तरह से गया नहीं था। “ठीक है, तुम्हारी बात मान लेता हूँ। लेकिन अगर मुझे वहां जरा सी भी ऊंच-नीच नजर आई, या मुझे लगा कि काव्या बच्चे को नहीं संभाल पा रही है, तो तुम अगले छह महीने तक वहीं रुकोगी। दामाद जी, यानी समीर, ऑफिस जाएंगे या घर और बच्चा संभालेंगे? नहीं सुमित्रा, मैं अपनी बेटी को जानता हूँ, वो इतनी जल्दी नहीं बदल सकती।”
सुमित्रा जी ने सिर्फ मुस्कुराकर हामी भर दी, क्योंकि वे जानती थीं कि समय आने पर सच खुद-ब-खुद रघुनाथ जी के सामने आ जाएगा।
अगले दिन सुबह-सुबह उनकी फ्लाइट थी। पूरे रास्ते रघुनाथ जी ख्यालों में खोए रहे। उन्हें काव्या का बचपन याद आ रहा था। कैसे वह पूरे घर में धमाचौकड़ी मचाया करती थी। कभी कांच के गिलास तोड़ देती, तो कभी स्कूल की किताबें बारिश में भीगा कर ले आती। जब काव्या की शादी समीर से तय हुई थी, तब भी रघुनाथ जी ने समीर से एकांत में कहा था, “बेटा, मेरी बेटी थोड़ी नादान है, उसे घर के कामों की ज्यादा समझ नहीं है, उसे संभाल लेना।” समीर ने तब हंसकर कहा था कि वह काव्या को वैसे ही अपनाएगा जैसी वह है। शादी के दो साल बाद भी काव्या वैसी ही चुलबुली और बेफिक्र रही। लेकिन अब बात अलग थी। अब एक नन्ही सी जान पूरी तरह से काव्या पर निर्भर थी।
बेंगलुरु एयरपोर्ट पर उतरते ही रघुनाथ जी ने तुरंत काव्या को फोन लगाया। “बेटा, हम पहुंच गए हैं। समीर आ रहा है ना हमें लेने?”
उधर से काव्या की धीमी, लेकिन बेहद शांत आवाज आई, “हाँ पापा, समीर बस पहुंचते ही होंगे। आप लोग आराम से आइए, मैं घर पर इंतजार कर रही हूँ।”
आवाज में वो हमेशा वाली चंचलता या हड़बड़ाहट नहीं थी, जो अक्सर काव्या की पहचान हुआ करती थी। रघुनाथ जी ने इस बदलाव को महसूस तो किया, लेकिन मन ने कहा कि शायद रात भर जगी होगी, इसलिए थकी हुई है। समीर उन्हें एयरपोर्ट से लेकर घर की तरफ निकल पड़ा। रास्ते में समीर ने बताया कि कैसे काव्या ने बच्चे के आने के बाद घर का पूरा नक्शा ही बदल दिया है। रघुनाथ जी बस चुपचाप सुनते रहे।
जब वे अपार्टमेंट के दरवाजे पर पहुंचे, तो रघुनाथ जी के मन में एक तस्वीर थी—घर में सामान बिखरा होगा, ड्राइंग रूम में सोफे पर कपड़े पड़े होंगे, और काव्या परेशान सी घूम रही होगी। लेकिन जैसे ही दरवाजा खुला, रघुनाथ जी हैरान रह गए।
सामने काव्या खड़ी थी। उसने एक साधारण सा सूती सूट पहना हुआ था, बाल सलीके से बंधे हुए थे, और उसकी गोद में एक छोटा सा, गुलाबी गालों वाला फरिश्ता गहरी नींद में सो रहा था। घर का कोना-कोना चमक रहा था। कोई फालतू शोर नहीं, कोई बिखरा हुआ सामान नहीं। कमरे में एक बहुत ही हल्की, मनमोहक सी बेबी पाउडर और लैवेंडर की खुशबू महक रही थी।
“पापा! माँ!” काव्या की आँखों में खुशी के आंसू छलक आए, लेकिन उसने अपनी आवाज बहुत धीमी रखी ताकि बच्चे की नींद न टूटे। उसने इशारे से उन्हें अंदर बुलाया।
रघुनाथ जी अपनी नाती को देखकर सब कुछ भूल गए। उन्होंने धीरे से बच्चे के माथे को चूमा। सुमित्रा जी ने तुरंत बच्चे की बलाएं लीं और उसे अपनी गोद में ले लिया। काव्या ने तुरंत कहा, “माँ, आप आराम से बैठिए, मैं आप दोनों के लिए चाय और नाश्ता लेकर आती हूँ।”
“अरे नहीं बेटा, तू क्यों परेशान होती है, मैं खुद बना लूंगी,” सुमित्रा जी ने कहा।
लेकिन काव्या ने एक नहीं सुनी। वह रसोई में चली गई। रघुनाथ जी चुपचाप सोफे पर बैठ गए और अपनी नाती, जिसका नाम ‘आरव’ रखा गया था, उसे निहारने लगे। लेकिन उनकी एक आंख रसोई की तरफ भी थी, जहां काव्या काम कर रही थी।
अगले कुछ दिनों तक रघुनाथ जी घर में एक मूक दर्शक बनकर काव्या की हर एक हरकत को देखते रहे। उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि यह वही काव्या है। रात को जब आरव जरा सा भी रोता, तो काव्या समीर या सुमित्रा जी के जागने से पहले ही उठकर उसे अपनी छाती से लगा लेती। जो लड़की अलार्म की तेज आवाज से नहीं उठती थी, वह अब अपने बच्चे की एक हल्की सी आहट पर नींद से जाग जाती थी।
एक दिन सुबह रघुनाथ जी ने देखा कि काव्या आरव को नहलाने की तैयारी कर रही थी। उसने बाथटब में पानी भरा और अपनी कोहनी डालकर पानी का तापमान चेक किया। फिर उसने तौलिए से लेकर डायपर और कपड़े, सब कुछ बिल्कुल सही क्रम में बिस्तर पर लगा कर रखा। यह सब वह इतनी कुशलता से कर रही थी जैसे उसे सालों का अनुभव हो। जब वह आरव को नहला रही थी, तो उसकी आँखों में एक अजीब सी सतर्कता और हाथों में एक गजब की कोमलता थी। रघुनाथ जी को याद आया कि कैसे बचपन में काव्या ने एक बार उनके हाथ से चाय का कप गिरा दिया था क्योंकि वह बहुत जल्दबाजी में थी। आज उसी लड़की के हाथों में एक नवजात बच्चा था, और उसके हाथों में कोई कांप नहीं थी, कोई जल्दबाजी नहीं थी।
दोपहर के समय जब आरव सो रहा था, रघुनाथ जी बालकनी में बैठकर अखबार पढ़ रहे थे। सुमित्रा जी उनके पास आईं और कुर्सी पर बैठते हुए मुस्कुराईं। “तो क्या कहते हैं आप? रुकूं मैं यहां छह महीने या वापस चलें अपने घर?”
रघुनाथ जी ने अखबार नीचे किया। उनकी आँखें हल्की सी नम थीं। उन्होंने एक गहरी सांस ली और बोले, “तुम सही कह रही थी सुमित्रा। मातृत्व से बड़ा कोई जादू नहीं है इस दुनिया में। मैंने हमेशा अपनी बेटी को एक नादान बच्ची समझा, लेकिन आज उसे एक माँ के रूप में देखकर मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैंने उसे आज पहली बार सच में पहचाना है। उसने न सिर्फ इस घर को संभाला है, बल्कि उसने खुद को भी पूरी तरह से बदल लिया है।”
तभी काव्या हाथ में चाय की ट्रे लेकर बालकनी में आई। उसने चाय के कप मेज पर रखे और रघुनाथ जी के पास ही जमीन पर बैठ गई।
“पापा, आप कुछ सोच रहे हैं क्या?” काव्या ने प्यार से उनके घुटने पर हाथ रखते हुए पूछा।
रघुनाथ जी ने काव्या के सिर पर हाथ फेरा और भारी गले से बोले, “कुछ नहीं बेटा, बस यह सोच रहा था कि मेरी वो अल्हड़ सी चिड़िया, जो कल तक खुद उड़ना सीख रही थी, आज उसने कितनी खूबसूरती से अपना नया घोंसला बना लिया है। मुझे तुम पर बहुत गर्व है, काव्या।”
काव्या ने अपने पिता की बात सुनकर उनके हाथ को चूम लिया। “पापा, आप ही ने तो हमेशा कहा था कि समय आने पर इंसान सब सीख जाता है। आरव के आने के बाद मुझे लगा ही नहीं कि मुझे कुछ सीखना पड़ा, सब कुछ अपने आप ही अंदर से महसूस होने लगा।”
चाय ठंडी हो रही थी, लेकिन रघुनाथ जी को आज इसकी कोई परवाह नहीं थी। उनके मन की वह पुरानी, जिद्दी चिंता आज पूरी तरह से पिघल चुकी थी। सामने उनकी बेटी बैठी थी, जो अब सिर्फ उनकी बेटी नहीं, एक मजबूत, जिम्मेदार और ममता से भरी माँ बन चुकी थी। सुमित्रा जी ने एक नजर अपने पति की ओर देखा और हल्की सी मुस्कान के साथ अपनी चाय का घूंट भरा। उन्हें पता था कि एक पिता का अपनी बेटी के लिए जो डर था, वह आज हमेशा के लिए एक गहरे सम्मान और गर्व में बदल चुका है।
क्या आपको भी लगता है कि माँ बनने के बाद एक औरत में जादुई बदलाव आ जाते हैं? या आपने भी अपने परिवार में किसी को ऐसे ही जिम्मेदारी उठाते हुए देखा है? अपने अनुभव और विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें। हमें आपके जवाब का इंतजार रहेगा!
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