समझौतों की धूप-छांव
सत्यनारायण जी की आंखों में अंगारे दहक उठे। उन्होंने भरे गले से कहा, “यह घर तुम्हारी माँ के कंगन और मेरी उम्र भर की कमाई से बना है समर। मर्यादा और संस्कारों से समझौता करने की एक सीमा होती है। अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। यदि तुम्हें इस तरह जीना है, तो … Read more