मुझे उस पांच सौ के नोट को देखकर हंसी आ गई। मैंने मन ही मन सोचा, ‘माँ भी किस दुनिया में जी रही हैं। आजकल इतने पैसों में तो बड़े अस्पतालों के पार्किंग और पर्चे का खर्च भी पूरा नहीं होता।’
कार में बैठते ही दादा जी, जो पीछे की सीट पर दर्द से कराह रहे थे, अचानक बोल पड़े, “रोहन बेटा, मुझे उस बड़े वाले अस्पताल मत ले जा। वहां वे लोग नाहक ही चीरा-फाड़ी कर देंगे और मशीनों में घुसा देंगे। मुझे पुरानी चुंगी वाले बाज़ार ले चल, वहां इलियास चाचा की इत्र की दुकान है। वो नसों और हड्डियों को अपनी उंगलियों से पहचान लेते हैं। मेरा दर्द वहीं ठीक होगा।”
लैपटॉप की स्क्रीन पर चल रहे एक बेहद जटिल आर्किटेक्चरल डिज़ाइन को फाइनल करते हुए मेरे माथे पर पसीने की बूंदे छलक रही थीं। कल सुबह विदेशी क्लाइंट्स के साथ मेरी जिंदगी की सबसे महत्वपूर्ण मीटिंग थी। यह सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं था, बल्कि मेरे करियर की वह सीढ़ी थी जिसके लिए मैंने दिन-रात एक कर दिया था। मेरे पिता एक साधारण क्लर्क रहे थे और उनकी पूरी उम्र ईएमआई और घर के खर्चों की जद्दोजहद में बीत गई थी। मैंने बचपन से ही तय कर लिया था कि मुझे उस अभावग्रस्त जीवन से बाहर निकलना है। पैसा, रुतबा और एक आलीशान जिंदगी—यही मेरे एकमात्र लक्ष्य थे।
तभी दरवाजे पर माँ की घबराई हुई आवाज़ ने मेरी एकाग्रता को झकझोर कर रख दिया। “रोहन! जल्दी से कार निकाल, दादा जी सुबह से अपने घुटने और टखने के दर्द से बेहाल हैं। अब तो उनसे खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा है। जल्दी से उन्हें अस्पताल ले जाना होगा।”
मैं झल्लाहट से भर उठा। मैंने माउस को जोर से टेबल पर पटका और गहरी सांस ली। मेरे पास एक-एक सेकंड कीमती था और ऐसे वक्त में यह नई मुसीबत आ खड़ी हुई थी। मैंने चिड़चिड़े स्वर में कहा, “माँ, आपको पता है ना कल मेरा कितना बड़ा प्रेजेंटेशन है? घर में और भी लोग हैं, किसी और को बोल दो।”
“बेटा, तेरे पापा टूर पर गए हैं और तेरी बहन अभी कॉलेज से नहीं आई है। दर्द बहुत ज्यादा है, उन्हें ऐसे तड़पते हुए नहीं देख सकती मैं,” माँ की आँखों में आंसू थे।
मैंने खीझते हुए लैपटॉप बंद किया और कार की चाबी उठा ली। मुझे पता था कि सरकारी अस्पताल जाऊंगा तो पूरा दिन कतारों में खड़ा रहना पड़ेगा, इसलिए मैंने शहर के सबसे महंगे और अत्याधुनिक ‘सिटी केयर सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल’ जाने का फैसला किया। वहां का ऑर्थोपेडिक सर्जन कम से कम एक हज़ार रुपये तो सिर्फ देखने की फीस लेगा। उसके बाद डिजिटल एक्स-रे, एमआरआई, ब्लड टेस्ट और जाने क्या-क्या। कम से कम दस हज़ार का फटका तो तय था। मेरे बैंक अकाउंट में वैसे ही पैसे कम थे। माँ ने मुझे पीछे से आवाज़ देते हुए पांच सौ रुपये का एक नोट पकड़ाया और बोली, “बेटा, यह रख ले, शायद काम आ जाए।”
मुझे उस पांच सौ के नोट को देखकर हंसी आ गई। मैंने मन ही मन सोचा, ‘माँ भी किस दुनिया में जी रही हैं। आजकल इतने पैसों में तो बड़े अस्पतालों के पार्किंग और पर्चे का खर्च भी पूरा नहीं होता।’
कार में बैठते ही दादा जी, जो पीछे की सीट पर दर्द से कराह रहे थे, अचानक बोल पड़े, “रोहन बेटा, मुझे उस बड़े वाले अस्पताल मत ले जा। वहां वे लोग नाहक ही चीरा-फाड़ी कर देंगे और मशीनों में घुसा देंगे। मुझे पुरानी चुंगी वाले बाज़ार ले चल, वहां इलियास चाचा की इत्र की दुकान है। वो नसों और हड्डियों को अपनी उंगलियों से पहचान लेते हैं। मेरा दर्द वहीं ठीक होगा।”
दादा जी की बात सुनकर मेरे दिमाग की नसें फटने को हो गईं। एक तो मेरा इतना कीमती समय बर्बाद हो रहा था और ऊपर से उनका यह अंधविश्वास! मैंने स्टीयरिंग व्हील को कसकर पकड़ते हुए कहा, “दादा जी, यह इक्कीसवीं सदी है! वो कोई झोलाछाप हड्डी बैठाने वाला होगा जो आपको उम्र भर के लिए अपाहिज कर देगा। मेडिकल साइंस ने इतनी तरक्की कर ली है और आप अभी भी उन पुराने गली-मोहल्ले के टोटकों पर विश्वास करते हैं?”
लेकिन दादा जी अपनी बात पर अड़े रहे। उनकी ज़िद के आगे मेरी एक न चली। पुरानी चुंगी का बाज़ार शहर का सबसे भीड़भाड़ वाला, धूल भरा और शोर-शराबे वाला इलाका था। मेरी नई कार उन तंग गलियों में रेंग रही थी। रिक्शे वालों की चीख-पुकार, ठेलों की भीड़ और चारों तरफ फैली अव्यवस्था देखकर मुझे उस जगह से घिन आ रही थी। बड़ी मुश्किल से एक जर्जर सी इमारत के नीचे हमने कार रोकी।
वहां एक छोटी सी दुकान थी, जिसमें से गुलाब, चमेली और खस के इत्र की मीठी-मीठी महक आ रही थी। दुकान में एक बुजुर्ग इंसान, जिनकी दाढ़ी बर्फ जैसी सफेद थी और चेहरे पर एक अजीब सा नूर था, एक छोटी सी शीशी में कुछ भर रहे थे। यही इलियास चाचा थे।
मुझे वहां का माहौल बहुत ही अनप्रोफेशनल और पिछड़ा हुआ लग रहा था। कोई रिसेप्शन नहीं, कोई अपॉइंटमेंट नहीं, कोई सफेद कोट वाला डॉक्टर नहीं। इलियास चाचा ने जैसे ही दादा जी को देखा, वे अपनी गद्दी से उठ खड़े हुए। “अरे रामदीन भाई! क्या हुआ मेरे यार को?” उन्होंने निहायत ही अपनेपन और गर्मजोशी से दादा जी को गले लगाते हुए कहा।
दादा जी ने दर्द से कराहते हुए अपना टखना दिखाया। इलियास चाचा ने तुरंत एक पुरानी लेकिन साफ दरी बिछाई और दादा जी को उस पर लिटा दिया। मुझे यह सब देखकर बहुत अजीब लग रहा था। मैं मुंह फेर कर दुकान के बाहर देखने लगा। मेरे दिमाग में बार-बार मेरे प्रोजेक्ट की डेडलाइन घूम रही थी।
इलियास चाचा ने अपने हाथों में कोई खुशबूदार तेल लिया और दादा जी के पैर को बहुत ही हल्के हाथों से सहलाने लगे। साथ ही वे दादा जी से पुराने दिनों की बातें भी कर रहे थे। दोनों अपने नौजवानी के दिनों को याद कर रहे थे, जब वे इसी बाज़ार में साइकिल से घूमा करते थे। बातों-बातों में इलियास चाचा ने अचानक एक खास एंगल से दादा जी के टखने को पकड़ा और एक हल्का सा झटका दिया।
“कड़क!” एक हल्की सी आवाज़ आई।
दादा जी के मुंह से एक आह निकली, लेकिन अगले ही पल उनके चेहरे पर छाई दर्द की लकीरें गायब हो गईं। उन्होंने अपना पैर हिलाकर देखा और उनके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान छा गई। “अरे इलियास! तूने तो जादू कर दिया। मेरा तो सारा दर्द ही छूमंतर हो गया,” दादा जी खुशी से बोले।
मैं हैरान था। जिस दर्द के लिए मैं बड़े अस्पताल के महंगे टेस्ट और हफ्तों की दवाइयों की कल्पना कर रहा था, वो बस दस मिनट में बिना किसी मशीन के ठीक हो गया था। मैंने अपने पर्स से पांच सौ रुपये का वही नोट निकाला और एक अजीब से अहंकार के साथ इलियास चाचा की तरफ बढ़ाते हुए कहा, “ये लीजिए चाचा, आपकी फीस।”
इलियास चाचा ने उस नोट को देखा और फिर मेरी तरफ देखकर बड़ी ही आत्मीयता से मुस्कुराए। उन्होंने मेरे हाथ को प्यार से वापस धकेलते हुए कहा, “अरे बेटा, यह कोई धंधा थोड़ी है। यह तो एक हुनर है, जो खुदा ने मुझे लोगों की तकलीफ कम करने के लिए अता किया है। दर्द से कराहते हुए इंसान को सुकून मिल जाए, यही मेरी सबसे बड़ी फीस है। अगर मैं इस इल्म को बेचने लगा, तो इसमें से शिफा (बरकत) उठ जाएगी।”
उन्होंने दादा जी की तरफ देखकर कहा, “रामदीन भाई, अपने पोते से कहो कि तरक्की के आसमान में जरूर उड़े, लेकिन अपनी ज़मीन और इंसानियत से जुड़ा रहे। मशीनें इमारतें बना सकती हैं, लेकिन रिश्ते और सुकून तो इंसानी रूह ही देती है।”
उनके वे शब्द सीधे मेरे दिल पर लगे। मैं, जो हर चीज़ को पैसे और मुनाफे के तराजू पर तौलता था, उस छोटे से इत्र की दुकान में खुद को बहुत बौना महसूस कर रहा था। मेरी वह महंगी शिक्षा, मेरा वह घमंड, सब उस सफेद दाढ़ी वाले बुजुर्ग की निस्वार्थ भावना के सामने पानी भर रहे थे। मैंने चुपचाप वह नोट वापस अपनी जेब में रख लिया, लेकिन उस दिन मैं अपनी जेब में सिर्फ पैसे नहीं, बल्कि जिंदगी का एक ऐसा सबक लेकर लौटा था जिसने मेरे सोचने का नज़रिया हमेशा के लिए बदल दिया। वापसी के रास्ते में कार में पूरी तरह खामोशी थी, लेकिन मेरे भीतर एक नया इंसान जन्म ले चुका था।
दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम उस पुरानी पीढ़ी की निस्वार्थ भावना और उनके गहरे ज्ञान को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं? हमें कमेंट में जरूर बताएं कि क्या आपने भी कभी किसी के अंदर ऐसा निस्वार्थ भाव देखा है।
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लेखिका : अपर्णा गोयल