भ्रम का आईना

नीता मेरी कॉलेज के दिनों की सबसे करीब सहेली थी। हम दोनों ने साथ में पढ़ाई की, साथ में सपने देखे थे, लेकिन शादी के बाद नीता की दुनिया पूरी तरह से बदल गई। उसकी शादी एक बहुत ही अच्छे परिवार में हुई थी। उसके पति, राघव, एक मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट थे और उनका काम ऐसा था कि उन्हें महीने के पंद्रह दिन शहर से बाहर ही रहना पड़ता था। नीता के परिवार में राघव के अलावा उनके दो बच्चे—बेटा रोहन और बेटी श्रुति—और राघव के बूढ़े माता-पिता थे। नीता एक ऐसी महिला थी जिसने शादी के बाद अपनी पूरी पहचान सिर्फ और सिर्फ अपने परिवार को समर्पित कर दी थी।

जब भी मेरी उससे बात होती, उसकी बातों का केंद्र सिर्फ उसका घर होता था। वह अक्सर मुझे फोन पर बताती, “जानती हो मीरा, आज सुबह चार बजे उठना पड़ा। सासू माँ का बीपी बढ़ गया था, उनके लिए काढ़ा बनाया। फिर राघव की सुबह की फ्लाइट थी, उनकी पैकिंग की क्योंकि उन्हें तो अपनी टाई और मोजे भी खुद नहीं मिलते। फिर बच्चों का लंच बॉक्स, ससुर जी की शुगर की दवाइयां… मेरे पास तो सिर खुजलाने की भी फुर्सत नहीं होती।”

मैं हमेशा उससे कहती कि नीता, तुम खुद के लिए भी कुछ समय निकाला करो। कभी पार्लर चली जाया करो, कभी किसी सहेली के साथ कॉफी पीने चली जाया करो। लेकिन वह हमेशा हंस कर मेरी बात टाल देती और एक गहरी सांस लेकर कहती, “अरे मीरा, मैं कहाँ जाऊं? मेरे घर को मेरी हर पल ज़रूरत है। राघव तो मेरे बिना एक कप चाय तक नहीं बना सकते। बच्चे भी हर छोटी चीज़ के लिए ‘मम्मी-मम्मी’ करते रहते हैं। और फिर मम्मी जी-पापा जी (सास-ससुर) की देखभाल भी तो मुझे ही करनी है। उन्हें मेरे हाथ के बिना किसी का बना खाना नहीं पचता। मैं अगर एक दिन के लिए भी बीमार पड़ जाऊं या मायके चली जाऊं, तो इस घर की ईंट से ईंट बज जाएगी। पूरा घर बिखर जाएगा। सब मुझ पर इतने निर्भर हैं, लेकिन कभी-कभी दुख होता है कि कोई मेरे इस काम को काम नहीं मानता। सब सोचते हैं कि एक हाउसवाइफ का तो ये फर्ज़ ही है। कोई मेरी मेहनत की कद्र नहीं करता, कोई दो शब्द तारीफ के नहीं बोलता।”

नीता की बातों में एक अजीब सा गुरूर भी होता था और एक गहरी पीड़ा भी। वह इस बात से खुश थी कि वह पूरे घर की धुरी है, लेकिन इस बात से दुखी थी कि उसे ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ लिया जा रहा है।

समय बीतता गया। नीता ने अभी अपना अड़तालीसवां जन्मदिन मनाया ही था। एक दिन अचानक मुझे खबर मिली कि नीता को तेज़ बुखार और सांस लेने में तकलीफ के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया है। जब मैं उसे देखने गई तो वह आईसीयू में थी। उसे सीवियर निमोनिया हो गया था जिसने उसके फेफड़ों को बहुत बुरी तरह से संक्रमित कर दिया था। ऑक्सीजन मास्क के पीछे से भी जब उसने मुझे देखा तो इशारों में यही पूछने की कोशिश कर रही थी कि राघव और बच्चों ने खाना खाया या नहीं। मुझे उस पर गुस्सा भी आया और रोना भी।

दुर्भाग्य से, नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। मात्र सात दिन अस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच झूलने के बाद, नीता ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

यह खबर हम सबके लिए एक वज्रपात जैसी थी। किसी को यकीन नहीं हो रहा था कि जो नीता हमेशा एक मशीन की तरह चलती रहती थी, वह अचानक ऐसे शांत कैसे हो सकती है। हमारे कॉलेज के व्हाट्सएप ग्रुप पर शोक संदेशों की बाढ़ आ गई। “भगवान उसकी आत्मा को शांति दे (RIP)”, “बहुत दुखद, वह बहुत अच्छी इंसान थी”—ऐसे अनगिनत मैसेज आ रहे थे।

नीता के अंतिम संस्कार में जब मैं गई, तो मैंने राघव को देखा। वह पूरी तरह से टूट चुके थे। उनकी आँखें सूजी हुई थीं, बच्चे अपनी माँ के गले लगकर ऐसे रो रहे थे जैसे उनका आसमान छिन गया हो। बूढ़े सास-ससुर का तो रो-रो कर बुरा हाल था। वहां मौजूद हर रिश्तेदार यही फुसफुसा रहा था, “हे भगवान! अब इस घर का क्या होगा? राघव तो हमेशा टूर पर रहता है। इन बूढ़े लोगों की देखभाल कौन करेगा? बच्चे तो अभी पढ़ ही रहे हैं। नीता ने तो पूरे घर को अपने दम पर बांध कर रखा था। अब यह परिवार तो पूरी तरह से बिखर जाएगा।”

मैं भी यही सोच रही थी। नीता के बिना उस घर की कल्पना करना भी असंभव लग रहा था। मुझे राघव के लिए बहुत दया आ रही थी। मुझे लग रहा था कि वह बेचारा अचानक से इस पहाड़ जैसी ज़िम्मेदारी को कैसे संभालेगा। एक तरफ उसका इतना बड़ा करियर, दूसरी तरफ बुजुर्ग माता-पिता की बीमारियां और बच्चों का भविष्य। कैसे करेगा वह यह सब अकेला?

नीता के जाने के लगभग तीन महीने बीत चुके थे। मैंने इस बीच राघव को फोन नहीं किया था क्योंकि मैं उन्हें उनके दुख से उबरने का समय देना चाहती थी। लेकिन मेरे मन में लगातार बेचैनी थी। मुझे लग रहा था कि राघव बहुत अवसाद में होंगे, घर अस्त-व्यस्त होगा, बच्चों की पढ़ाई का नुकसान हो रहा होगा। नीता अक्सर कहती थी कि राघव को तो घर के किसी सामान की जगह तक नहीं पता। मैं यही सोचकर परेशान थी कि वह इंसान जो एक गिलास पानी के लिए पत्नी पर निर्भर था, वह अब बिना पत्नी के जीवन कैसे काट रहा होगा।

एक दिन रविवार की सुबह मैंने तय किया कि मैं राघव को फोन करूंगी और अगर उन्हें किसी मदद की ज़रूरत होगी, तो मैं एक दोस्त के नाते ज़रूर करूंगी। मैंने अपना फोन उठाया और राघव का नंबर डायल किया।

फोन की घंटी पूरी बजी लेकिन किसी ने नहीं उठाया। मैंने सोचा शायद वह सो रहे होंगे या किसी काम में उलझे होंगे। लगभग डेढ़ घंटे बाद मेरे फोन की स्क्रीन पर राघव का नाम चमका। उनका कॉलबैक था।

मैंने थोड़ी घबराहट और बहुत सारी सहानुभूति के साथ फोन उठाया, “हेलो राघव… कैसे हो तुम?”

उधर से राघव की आवाज़ बहुत शांत, स्थिर और सामान्य थी। “मैं बिल्कुल ठीक हूँ मीरा। माफ़ करना, जब तुम्हारा फोन आया तब मैं उठा नहीं पाया। दरअसल, मैं अपने क्लब में था। पिछले महीने ही मैंने संडे मॉर्निंग गोल्फ खेलना शुरू किया है। थोड़ा स्ट्रेस बस्टर हो जाता है और दोस्तों के साथ सोशलाइज़ करने का भी मौका मिल जाता है। बस अभी-अभी खेलकर वापस लौटा हूँ।”

मैं एक पल के लिए सुन्न रह गई। गोल्फ? सोशलाइज़? मेरे दिमाग में तो उनके अवसादग्रस्त होने की तस्वीर छपी थी। मैंने थोड़ा संभलते हुए पूछा, “अच्छा… और घर पर सब कैसा चल रहा है? तुम तो बहुत परेशान हो गए होगे अकेले… मतलब, काम और घर सब एक साथ?”

“अरे नहीं मीरा,” राघव ने बहुत ही सहजता से जवाब दिया, “शुरू के दस-पंद्रह दिन बहुत मुश्किल थे। समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं। लेकिन फिर मैंने सब सेटल कर लिया। मैंने अपने बॉस से बात करके अपना प्रोफाइल चेंज करवा लिया है। अब मुझे महीने में पंद्रह दिन टूर पर नहीं जाना पड़ता। मैंने डेस्क जॉब और लोकल ऑपरेशन्स ले लिए हैं। सैलरी थोड़ी कम हुई है लेकिन शांति है।”

“और… और घर का काम? आंटी-अंकल की तबीयत?” मैंने हकलाते हुए पूछा।

“उसके लिए मैंने एक बहुत अच्छा इंतज़ाम कर लिया है। मैंने एक प्रोफेशनल कुक और हाउसकीपर रख लिया है। वह सुबह सात बजे आ जाता है। नाश्ते से लेकर रात के खाने तक सब वही बनाता है। मैंने उसे थोड़े पैसे बढ़ा कर दे दिए हैं, तो वह हफ्ते भर की सब्ज़ी, फल और घर का सारा राशन भी खुद ही ले आता है। मुझे तो मार्केट जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।” राघव ने बताया।

“और माता-पिता की देखभाल?” मेरे मुंह से बेसाख्ता निकला।

“हाँ, पापा को चलने में दिक्कत होती है और मम्मी की दवाइयों का भी रूटीन है, इसलिए मैंने एक मेडिकल एजेंसी से एक फुल-टाइम केयरटेकर हायर कर ली है। वह 24 घंटे घर पर ही रहती है। मम्मी-पापा को समय पर दवा देना, उन्हें नहलाना, उनकी हर ज़रूरत का ध्यान वह बहुत अच्छे से रखती है। बल्कि सच कहूँ तो नीता से भी ज़्यादा प्रोफेशनली हैंडल करती है क्योंकि वह तो ट्रेंड नर्स है।”

मैं चुप थी। मेरे पास बोलने के लिए शब्द नहीं थे।

राघव आगे कह रहे थे, “बच्चे भी अब ज़िम्मेदार हो गए हैं। रोहन ने अपनी कॉलेज की पढ़ाई पर फोकस कर लिया है और श्रुति भी अब अपने काम खुद कर लेती है। वीकेंड्स पर हम सब बाहर डिनर के लिए चले जाते हैं या कोई मूवी देख लेते हैं। जीवन धीरे-धीरे अपनी सामान्य पटरी पर लौट आया है। ऑफकोर्स, हम नीता को मिस करते हैं, लेकिन लाइफ गोज़ ऑन, राइट?”

राघव ने मुझसे और भी दो-चार बातें कीं, लेकिन मेरा दिमाग सुन्न हो चुका था। मैंने मुश्किल से “हाँ, ठीक है, अपना ख्याल रखना” कहकर फोन काट दिया।

फोन रखने के बाद मैं वहीं सोफे पर धम्म से बैठ गई। मेरी आँखों से आंसू बहने लगे। ये आंसू नीता के मरने के दुख में नहीं थे। ये आंसू नीता की उस पूरी ज़िंदगी के लिए थे, जिसे उसने एक भ्रम में जीकर खत्म कर दिया था।

नीता हमेशा सोचती थी कि वह अपरिहार्य (indispensable) है। वह सोचती थी कि उसका परिवार उसके बिना एक कदम नहीं चल सकता। उसने अपनी पूरी ज़िंदगी, अपनी इच्छाएं, अपनी सेहत, अपना सुकून सब कुछ इस परिवार पर न्योछावर कर दिया, सिर्फ यह सोचकर कि उसके बिना इनका क्या होगा। उसने अपने सीने में उठने वाले दर्द को भी सिर्फ इसलिए इग्नोर कर दिया क्योंकि उसे राघव के लिए सुबह का नाश्ता बनाना था।

और आज? आज सच्चाई मेरे सामने थी। नीता के जाने के मात्र दो-ढाई महीने के भीतर ही, राघव ने उसकी हर ज़िम्मेदारी का एक विकल्प खोज लिया था। खाना बनाने के लिए एक महाराज आ गया था, बाज़ार के काम के लिए पैसे देकर सुविधा खरीद ली गई थी, और सास-ससुर की सेवा के लिए एक ट्रेंड नर्स आ गई थी। राघव ने भी अपनी सहूलियत के हिसाब से अपना ट्रांसफर करवा लिया था और अपने तनाव को दूर करने के लिए वह गोल्फ खेलने लगा था।

नीता जिस काम को अपना अस्तित्व मानती थी, जिसे वह प्यार और त्याग का नाम देती थी, राघव के लिए वह सिर्फ एक ‘मैनेजमेंट’ का हिस्सा था, जिसे कुछ पैसों के ज़रिए आसानी से आउटसोर्स किया जा सकता था। नीता ने जो अपनी पूरी ज़िंदगी की आहुति दे दी, उसे रिप्लेस करने में इस परिवार को बमुश्किल कुछ हफ्ते लगे। घर की कोई ईंट नहीं खिसकी, कोई भूखा नहीं सोया, किसी की दवा नहीं छूटी। सब कुछ वैसे ही चल रहा था, बस नीता वहाँ नहीं थी।

आज मुझे समझ में आ रहा था कि हम महिलाएं कितने बड़े भ्रम में जीती हैं। हम खुद को एक पिलर मान लेते हैं और सोचते हैं कि हमारे हटने से छत गिर जाएगी। लेकिन हकीकत यह है कि जब हम हटते हैं, तो परिवार कोई न कोई दूसरा पिलर खड़ा कर ही लेता है। दुनिया की कोई भी जगह किसी के लिए खाली नहीं रहती। कोई किसी के बिना नहीं मरता।

नीता अगर खुद से थोड़ा प्यार करती, अपनी सेहत का ध्यान रखती, अपने लिए कुछ शौक पालती, तो शायद आज वह ज़िंदा होती। काश वह समझ पाती कि परिवार की देखभाल करना ज़रूरी है, लेकिन खुद को पूरी तरह से मिटा देना मूर्खता है। यह जो ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ वाला दर्द वह सहती थी, वह दरअसल उसका खुद का चुना हुआ रास्ता था। उसने कभी राघव को ज़िम्मेदारियाँ बांटने का मौका ही नहीं दिया और जब वह अचानक चली गई, तो राघव ने अपने तरीके से सारी ज़िम्मेदारियों को हल कर लिया।

मैं बहुत देर तक रोती रही। यह कहानी सिर्फ नीता की नहीं है, यह हमारे समाज की हर उस महिला की कहानी है जो अपने घर को अपना सब कुछ मानकर अपने वजूद को ही भूल जाती है। घर ज़रूरी है, परिवार भी ज़रूरी है, लेकिन उस परिवार की नींव में खुद को इस तरह ज़िंदा दफना देना कि आपकी अपनी कोई अहमियत ही न बचे, यह सरासर गलत है। काश, हर महिला इस सच्चाई को समय रहते समझ ले कि वह ज़रूरी हो सकती है, लेकिन अपरिहार्य (irreplaceable) नहीं।

आप कहानी के इस बिंदु तक पहुंचे हैं, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। कहानी पढ़ने के बाद आपके मन में क्या विचार आ रहे हैं? क्या आपको भी लगता है कि महिलाओं को परिवार के साथ-साथ अपने लिए भी जीना सीखना चाहिए? अपने विचार हमें ज़रूर बताएं।

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लेखिका : नेहा पटेल 

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