अनदेखी बेड़ियाँ: ‘चार लोगों’ का खौफ

विदाई की रुलाई और सफर की थकान से राधिका का पोर-पोर दर्द कर रहा था। भारी लहंगे और गहनों के बोझ से उसका शरीर जैसे सुन्न पड़ गया था। ससुराल की दहलीज पार करने के बाद उसने सोचा कि अब वह अपने कमरे में जाकर थोड़ी देर आँखें मूंद लेगी। लेकिन अभी वह बिस्तर के किनारे बैठी ही थी कि दरवाजे पर उसकी सास सावित्री देवी की आवाज गूंजी, “अरे बहू, अभी आराम करने का समय नहीं है।

मोहल्ले की औरतों का जमावड़ा लगा है बाहर। जल्दी से बाहर आ जाओ। अगर नई बहू कमरे में बंद रही तो लोग क्या कहेंगे कि मायके से कोई संस्कार नहीं सीख कर आई, आते ही बिस्तर पकड़ लिया।” राधिका ने अपनी भारी पलकों को उठाया, थकान को एक गहरी सांस के साथ भीतर धकेला

और दर्पण के सामने खड़ी होकर अपना सिंदूर और माथे की बिंदिया ठीक करने लगी। वह भारी कदमों से सास के पीछे-पीछे दालान में आ गई। वहाँ औरतों की भीड़ थी, जो उसे ऐसे घूर रही थी जैसे वह कोई प्रदर्शनी की वस्तु हो।

तभी मुहल्ले की सरला ताई ने अचानक हाथ बढ़ाकर राधिका का पल्लू थोड़ा पीछे कर दिया ताकि उसका चेहरा ठीक से देख सकें। जैसे ही पल्लू थोड़ा खिसका, सावित्री देवी ने तुरंत अपनी आँखें तरेरी और फुसफुसाते हुए कहा, “बहू, ये क्या तरीका है? सिर पर पल्लू ठीक से रखो। बाहर की औरतें देखेंगी

तो क्या कहेंगे कि आजकल की लड़कियों को बड़ों की शर्म-हया ही नहीं है।” राधिका ने बिना कुछ कहे चुपचाप अपना पल्लू माथे के नीचे तक खींच लिया। उस भरी गर्मी में रेशमी साड़ी और घूंघट के अंदर उसका दम घुट रहा था, लेकिन “लोग क्या कहेंगे” के डर ने उसकी आवाज दबा दी थी।

शुरुआत में राधिका को लगा कि यह पाबंदियां और यह “चार लोगों” का डर सिर्फ शादी के शुरुआती कुछ दिनों की बात है। उसे लगा था कि एक बार घर में सब सामान्य हो जाएगा तो ये रस्में और ये बंदिशें थोड़ी कम हो जाएंगी। लेकिन उसका यह सोचना उसकी सबसे बड़ी भूल थी। वह उस घर में एक इंसान नहीं,

बल्कि समाज के सामने पेश की जाने वाली एक कठपुतली बन गई थी। उसके उठने-बैठने, खाने-पीने, यहाँ तक कि उसके हंसने पर भी “चार लोगों” का पहरा था।

राधिका ने कई बार चाहा कि वह इस घुटन के बारे में अपने पति मोहित से बात करे। मोहित एक सीधा और शांत स्वभाव का इंसान था, लेकिन घर के मामलों में वह कभी अपनी माँ के खिलाफ नहीं बोलता था। राधिका यह बात जानती थी, इसलिए हर बार वह बात शुरू करने से पहले ही अपने होंठ सिल लेती।

एक दिन, शादी के करीब तीन महीने बाद, राधिका और मोहित ने बाहर जाकर फिल्म देखने और डिनर करने का मन बनाया। राधिका बहुत खुश थी; उसने बड़ी चाव से अपनी पसंद की एक हल्की और खूबसूरत साड़ी निकाली थी। लेकिन जैसे ही दोनों बाहर जाने के लिए कमरे से निकले, सावित्री देवी ने उन्हें टोक दिया। “कहाँ की तैयारी हो रही है?” सावित्री देवी ने कठोर स्वर में पूछा। मोहित ने झिझकते हुए कहा, “माँ, वो जरा बाहर तक जा रहे थे, थोड़ा घूम आएंगे।”

सावित्री देवी ने माथे पर सिलवटें डालते हुए कहा, “अरे, अभी शादी की मेहंदी का रंग भी ठीक से फीका नहीं पड़ा है और तुम दोनों मटरगश्ती करने चल दिए? मोहल्ले वाले देखेंगे तो क्या कहेंगे कि शादी होते ही बेटा जोरू का गुलाम हो गया और बहू को घर में टिकने की आदत नहीं है।

चुपचाप घर में बैठो, मैंने खाना बना दिया है।” उस दिन राधिका के सारे अरमान आँसुओं में बह गए। वह चाहकर भी अपने पति के साथ बालकनी में बैठकर एक कप चाय तक नहीं पी सकती थी, क्योंकि अगर सामने वाले घर की ताई ने देख लिया तो ताने सुनने पड़ेंगे कि “देखो, कैसे दिन दहाड़े मियाँ-बीवी हँस-हँस कर बातें कर रहे हैं।” राधिका को लगता जैसे वह किसी जेल में है, जहाँ कैद तो अदृश्य है, लेकिन उसकी सलाखें बहुत मजबूत हैं।

समय बीतता गया और “लोग क्या कहेंगे” का यह अदृश्य बोझ राधिका के कंधों पर और भारी होता गया। कुछ समय बाद राधिका गर्भवती हो गई। यह खबर सुनकर घर में खुशियों का माहौल होना चाहिए था, लेकिन राधिका के लिए यह सफर और भी मुश्किल हो गया। गर्भावस्था के शुरुआती महीनों में उसे बहुत कमजोरी महसूस होती थी,

चक्कर आते थे और रसोई की गंध से उबकाई आती थी। डॉक्टर ने उसे पूर्ण आराम की सलाह दी थी। लेकिन सावित्री देवी की सोच वही पुरानी थी। जब राधिका सुबह उठने में थोड़ी देरी कर देती, तो सास ताना मारती, “अरे बहू, हमारे जमाने में तो हम डिलीवरी वाले दिन तक चक्की पीसते थे और पानी भरते थे।

तू दिन भर ऐसे खाट तोड़ेगी तो लोग क्या कहेंगे कि आजकल की लड़कियां कितनी कमजोर और कामचोर होती हैं। थोड़ा हाथ-पैर चलाएगी तो बच्चा भी तंदुरुस्त होगा।” उस भयंकर तकलीफ और उबकाई के बीच भी राधिका रसोई में खड़ी होकर रोटियां बेलती रहती। उसे आराम का एक पल मयस्सर नहीं था क्योंकि उन “चार लोगों” की काल्पनिक नजरें हमेशा उस पर गड़ी रहती थीं।

नौ महीने के लंबे और कष्टदायी सफर के बाद राधिका ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया। बेटी का नाम अनन्या रखा गया। घर में एक नई जान के आने से रौनक तो आई, लेकिन राधिका की जिम्मेदारियां और भी ज्यादा बढ़ गईं। अब उसे केवल घर का ही नहीं, बल्कि अनन्या का भी पूरा ख्याल रखना था।

और यहीं से शुरू हुआ उन “चार लोगों” की मुफ्त सलाहों का नया सिलसिला। कोई रिश्तेदार आता तो कहता, “बहू, इसे ये वाला दूध मत पिलाना,” तो कोई दूसरा कहता, “इसे सर्दी में ऐसे कपड़े मत पहनाना।” राधिका का शरीर डिलीवरी के बाद बहुत कमजोर हो चुका था।

उसे सही पोषण और आराम की सख्त जरूरत थी, लेकिन घर में हर किसी को सिर्फ इस बात की फिक्र थी कि बाहरी लोग उनके रहन-सहन के बारे में क्या कहेंगे। सही डाइट न मिलने और लगातार भाग-दौड़ के कारण राधिका की सेहत दिन-ब-दिन गिरती जा रही थी। उसकी आँखों के नीचे गहरे काले घेरे पड़ गए थे और चेहरे की चमक पूरी तरह से गायब हो गई थी।

इस मुश्किल घड़ी में राधिका की जिंदगी में एक और बड़ा तूफान आना बाकी था। एक दिन अचानक खबर आई कि सावित्री देवी के मायके में उनके बड़े भाई को दिल का दौरा पड़ा है। सावित्री देवी को तुरंत अपने मायके जाना पड़ा। और ठीक उसी समय, मोहित की कंपनी ने उसे एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट के लिए दो महीने के लिए शहर से बाहर भेज दिया। अब उस बड़े से घर में राधिका और उसकी छोटी सी बेटी अनन्या बिल्कुल अकेले रह गए थे।

राधिका पर तो मानो दुखों का पहाड़ ही टूट पड़ा था। उसका शरीर पहले ही कमजोरी से जूझ रहा था, और अब पूरे घर की जिम्मेदारी, सफाई, खाना पकाना, और ऊपर से छोटी बच्ची का हर पल रोना—सब कुछ उसे ही संभालना था। जो “चार लोग” राधिका को उठते-बैठते ताने देते थे, नसीहतें देते थे, आज जब उसे सच में किसी की मदद की जरूरत थी, तो उनमें से एक भी इंसान उसके दरवाजे पर झांकने तक नहीं आया। राधिका की दिनचर्या इतनी दर्दनाक हो गई थी

कि कभी-कभी वह दिन में खाना तक नहीं बना पाती थी। बच्ची रोती रहती, और राधिका उसे चुप कराते-कराते खुद भी रोने लगती। कई बार ऐसा होता कि वह सुबह का बासी खाना ही रात को पानी के साथ निगल कर सो जाती। घर के काम का कोई अंत नहीं था।

जो बर्तन पहले समय पर धुल जाते थे, वे अब सिंक में पड़े-पड़े सूख जाते और राधिका उन्हें रात को एक ही बार में धोती। राधिका के लिए नींद अब एक ऐसा सपना बन गई थी जो कभी पूरा नहीं होता था। बच्ची रात-रात भर जागती और राधिका अपनी सूजी हुई आँखों से उसे लोरी सुनाती रहती।

उन अकेले बिताए गए हफ्तों ने राधिका की आँखें पूरी तरह खोल दीं। बुखार में तपते हुए जब वह खुद उठकर पानी पी रही थी, तब उसे समझ में आया कि जिन “चार लोगों” के डर से उसकी सास ने उसकी पूरी जिंदगी पर पाबंदियां लगा रखी थीं, जिन “चार लोगों” को खुश करने के लिए उसने अपने अरमानों का गला घोंट दिया था,

वे लोग वास्तव में कहीं थे ही नहीं। वे सिर्फ एक भ्रम थे, एक खोखला डर था, जिसे समाज ने औरतों को दबाने के लिए एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया था। जब वह दर्द से तड़प रही थी, तब कोई “लोग क्या कहेंगे” वाला व्यक्ति उसे दवा देने नहीं आया था।

उस दिन राधिका के अंदर का डर हमेशा के लिए खत्म हो गया। उसने तय कर लिया कि अब वह अपनी और अपनी बेटी की जिंदगी किसी अनजान “समाज” के डर से नहीं जिएगी। वह अब वही करेगी जो उसके और उसकी बच्ची के लिए सही होगा। उसने खुद को समेटा, अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना शुरू किया, और अपनी शर्तों पर जीना सीख लिया, क्योंकि उसे समझ आ गया था कि जिंदगी उसकी है, किसी और की नहीं।

क्या आपने भी कभी अपनी जिंदगी में इन ‘चार लोगों’ के तानों और दखलंदाजी का सामना किया है? समाज के इस दोहरे रवैये पर आपके क्या विचार हैं? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।

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लेखिका : सीमा श्रीवास्तव 

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