दो टूटे हुए दिल

अनन्या शीशे के सामने बैठी अपनी परछाई को एकटक निहार रही थी। आज वह फिर से लाल जोड़े में सजी थी। माथे पर सजी बिंदी, हाथों में रची मेहंदी और बालों में लगे मोगरे के फूलों की महक—सब कुछ वैसा ही था जैसा पाँच साल पहले था। लेकिन इस बार उसके मन का कोलाहल उस … Read more

गहरे घाव

निशा जब भी आईने के सामने खड़ी होती थी, तो उसे अपनी आँखों की गहराई में एक अजीब सी खामोशी नज़र आती थी। लाल रंग की खूबसूरत बनारसी साड़ी, माथे पर सजी चमकती बिंदी और कलाइयों में खनकती चूड़ियाँ—आज वह पूरी तरह से एक सजी-धजी और खुशहाल पत्नी लग रही थी। लेकिन इस खुशी के … Read more

आत्मसम्मान माँ का

पैंसठ वर्षीया सावित्री देवी के हाथों में चाय का कप हल्का-हल्का कांप रहा था। सुबह के सात बजे थे और रसोई से उनकी बहू तान्या की कर्कश आवाज़ पूरे घर में गूंज रही थी। “पता नहीं इस घर में दूध की नदियां बहती हैं क्या! सुबह उठते ही सबको दो-दो बार चाय चाहिए। बैठे-बैठे मुफ्त … Read more

सबक

सावित्री देवी जब सुबह उठीं, तो उन्होंने देखा कि पूरा सिंक जूठे बर्तनों से भरा है और घर में झाड़ू तक नहीं लगी है। तभी सुहासिनी जमाइयां लेती हुई बाहर आई और बोली, “माँ जी, आज तो मेरे सिर में बहुत भयंकर दर्द है। मुझसे तो खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा। मीनल दीदी को … Read more

ममता के नियम

अंजलि के जाते ही कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया मानो किसी ने वक्त को वहीं थाम दिया हो। अंजलि के उन चंद शब्दों ने सुमित्रा देवी के अंतर्मन पर किसी हथौड़े की तरह वार किया था। उनके पास अंजलि की बात का कोई जवाब नहीं था। जो नसीहतें वे अपनी बेटी को उसके ससुराल … Read more

संघर्ष

ड्राइंग रूम के सोफे पर बैठी नंदिनी अपने पच्चीस साल के बेटे सिद्धार्थ को सूटकेस पैक करते हुए देख रही थी। सिद्धार्थ कल सुबह मुंबई जा रहा था, लेकिन मुंबई जाने से पहले उसे शहर के दूसरे कोने में अपने पिता से मिलने जाना था। जब नंदिनी ने देखा कि वह अपने पिता की ‘दूसरी … Read more

रिश्ते पैसों से नहीं संस्कार से निभाते हैं – तोषिका

हमें इन पैसों की जरूरत नहीं है, क्योंकि हम *रिश्ते पैसों से नहीं संस्कार से निभाते हैं*। शालिनी ने अपने बेटे राघव से बोला। आपने ही तो मुझे कहा था “घर आ जा, बेटा तेरी बहुत याद आ रही है। तेरे पापा की भी तबियत ठीक नहीं चल रही है।” तो मैं आ गया और … Read more

उम्र के साथ इंसानी रिश्ते अपनी अहमियत खो देते हैं?

उस दिन सुधा की आँखों में आँसू आ गए थे। उसने आयुष को सीने से लगाते हुए कहा था, “पागल बच्चे, मेरी तो जान तुझमें बसती है। मैं तुझे छोड़कर भला कहाँ जा सकती हूँ?” माधवी और आस-पड़ोस की औरतों ने तब मुस्कुराते हुए कहा था कि सुधा सचमुच बहुत भाग्यशाली है जिसे इतना प्रेम … Read more

बदलाव की शुरुआत

शाम का समय था। सुमित्रा जी रसोई में खड़ी अपने और अपने पति के लिए चाय छान रही थीं। घर में एक अजीब सी शांति थी, लेकिन यह शांति अचानक एक तेज़ और कर्कश आवाज़ से टूट गई। आवाज़ उनके बेटे विकास के कमरे से आ रही थी। “मैंने तुम्हें तीन बार कॉल किया! तुम्हारी … Read more

कुलकलंकिनी – सुनीता मलिक सोलंकी

दो शब्दों का मेल “कुल” और “कलंकिनी”।अर्थात्‌ परिवार पर कलंक हो जो …यह शब्द अक्सर समाज में महिलाओं पर लगाए जाने वाले दोहरे मानकों और उन पर रखी जाने वाली अपेक्षाओं को दर्शाता है। समाज महिलाओं को उनके परिवार की इज्जत का प्रतीक मानता है और उन पर कई तरह की जिम्मेदारियाँ डालता है । … Read more

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