उम्र के साथ इंसानी रिश्ते अपनी अहमियत खो देते हैं?

उस दिन सुधा की आँखों में आँसू आ गए थे। उसने आयुष को सीने से लगाते हुए कहा था, “पागल बच्चे, मेरी तो जान तुझमें बसती है। मैं तुझे छोड़कर भला कहाँ जा सकती हूँ?” माधवी और आस-पड़ोस की औरतों ने तब मुस्कुराते हुए कहा था कि सुधा सचमुच बहुत भाग्यशाली है जिसे इतना प्रेम करने वाला श्रवण कुमार जैसा बेटा मिला है।

बीस साल… यह समय कहने को तो एक संख्या मात्र है, लेकिन किसी इंसान की ज़िंदगी में यह एक पूरा युग होता है। माधवी जब स्टेशन से बाहर निकली, तो बनारस की वो पुरानी हवा उसके चेहरे से टकराई। हवा में आज भी वही पुरानी गंध थी, जिसमें धूप, अगरबत्ती और गंगा के किनारे की नमी मिली हुई थी। बीस साल पहले उसके पति का तबादला इस शहर से हो गया था। तब से लेकर आज तक ज़िम्मेदारियों की ऐसी आंधी चली कि उसे पीछे मुड़कर देखने का मौका ही नहीं मिला। आज अपनी भतीजी की शादी में शामिल होने के लिए उसे बनारस आने का अवसर मिला था, तो उसने तय किया कि वह अपने पुराने मोहल्ले ‘शिवालय घाट’ की उन तंग गलियों में ज़रूर जाएगी, जहाँ उसने अपनी शादी के शुरुआती और सबसे खूबसूरत सात साल बिताए थे।

स्मृतियों का पिटारा खुल चुका था। रिक्शे पर बैठे-बैठे माधवी की आँखों के सामने पुराने चेहरे तैरने लगे। उन चेहरों में सबसे उजला चेहरा था ‘सुधा’ का। सुधा, जो उसके घर के ठीक सामने वाले मकान में रहती थी। सुधा और माधवी की उम्र में ज़्यादा फासला नहीं था, इसलिए दोनों की बहुत गहरी दोस्ती हो गई थी। सुधा का स्वभाव इतना मिलनसार था कि मोहल्ले का हर व्यक्ति उससे अपनत्व महसूस करता था। लेकिन सुधा की ज़िंदगी का केंद्र उसका इकलौता बेटा ‘आयुष’ था।

आयुष उस समय मुश्किल से छह या सात साल का रहा होगा। माधवी को आज भी याद है कि कैसे वह बच्चा अपनी माँ की परछाईं बनकर रहता था। जब सुधा छत पर कपड़े सुखाने जाती, तो आयुष उसकी साड़ी का पल्लू पकड़कर सीढ़ियाँ चढ़ता। जब सुधा रसोई में रोटियाँ बेलती, तो वह स्लैब के पास खड़ा होकर उसे देखता रहता। एक दिन की बात माधवी के ज़ेहन में बिल्कुल ताज़ा थी। मोहल्ले में किसी बुज़ुर्ग का देहांत हो गया था और सब लोग वहाँ शोक जताने गए थे। सुधा भी वहाँ गई थी। जब वह लौटकर आई तो आयुष बहुत ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। उसने अपनी माँ के गले में अपनी छोटी-छोटी बाहें डाल दीं और सिसकते हुए बोला था, “माँ, मुझे प्रॉमिस करो कि तुम मुझे छोड़कर कभी भगवान जी के पास नहीं जाओगी। अगर तुम चली गई तो मैं भी साँस लेना बंद कर दूँगा। मैं तुम्हारे बिना ज़िंदा नहीं रहूँगा।”

उस दिन सुधा की आँखों में आँसू आ गए थे। उसने आयुष को सीने से लगाते हुए कहा था, “पागल बच्चे, मेरी तो जान तुझमें बसती है। मैं तुझे छोड़कर भला कहाँ जा सकती हूँ?” माधवी और आस-पड़ोस की औरतों ने तब मुस्कुराते हुए कहा था कि सुधा सचमुच बहुत भाग्यशाली है जिसे इतना प्रेम करने वाला श्रवण कुमार जैसा बेटा मिला है। यह बात पूरे मोहल्ले में मशहूर थी कि आयुष अपनी माँ के बिना एक कौर खाना भी नहीं खाता। सुधा को भी अपने बेटे के इस असीम प्रेम पर बड़ा नाज़ था। वह अक्सर माधवी से कहती थी, “दीदी, मेरा आयुष मेरी जान है। बुढ़ापे में यही मेरा सबसे बड़ा सहारा बनेगा।”

सोचते-सोचते रिक्शा एक पुरानी और पहचानी सी गली के नुक्कड़ पर आकर रुक गया। माधवी ने पैसे दिए और पैदल ही गली में दाखिल हुई। बीस सालों में मोहल्ला बहुत बदल गया था। पुराने खपरैल वाले घरों की जगह अब कंक्रीट के छोटे-छोटे अपार्टमेंट्स ने ले ली थी। रास्ते संकरे हो गए थे और हर तरफ बेतरतीब तार झूल रहे थे। लेकिन सुधा का घर अभी भी वहीं था, बस उसका रंग उड़ चुका था। जिस लोहे के गेट पर कभी चमेली की बेल लहलहाती थी, वहाँ आज जंग लगा हुआ था। घर के बाहर पसरा सन्नाटा किसी अनहोनी की गवाही दे रहा था।

माधवी के कदमों में एक अजीब सी झिझक थी। उसने सोचा था कि दरवाज़ा खटखटाते ही सुधा अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ बाहर आएगी, या शायद आयुष, जो अब एक गबरू जवान हो चुका होगा, दरवाज़ा खोलेगा और अपनी ‘माधवी आंटी’ को पहचान कर खुश हो जाएगा। भारी मन से माधवी ने दरवाज़े पर लगी पुरानी कॉल बेल दबाई। अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई। उसने कुछ पल इंतज़ार किया और फिर से बेल बजाई।

कुछ देर बाद दरवाज़े की कुंडी खुलने की आवाज़ आई। दरवाज़ा खुला और सामने एक बेहद कमज़ोर, सफेद बालों और झुकी हुई कमर वाले बुज़ुर्ग खड़े थे। माधवी को उन्हें पहचानने में कुछ पल लगे। यह सुधा के पति, दीनानाथ जी थे। लेकिन यह वो दीनानाथ जी नहीं थे जिन्हें माधवी जानती थी। वो तो एक हट्टे-कट्टे, हमेशा हँसने-मुस्कुराने वाले व्यक्ति थे। आज जो शख्स सामने खड़ा था, उसकी आँखों की चमक पूरी तरह से बुझ चुकी थी और चेहरे की झुर्रियों में गहरी उदासी जमी हुई थी।

“पहचाना मुझे भाई साहब? मैं माधवी… बीस साल पहले हम सामने वाले मकान में रहते थे,” माधवी ने उत्साह और घबराहट के मिले-जुले भाव से कहा।

दीनानाथ जी की सूनी आँखों में अचानक एक हरकत हुई। वे ध्यान से माधवी को देखने लगे और फिर उनके सूखे होंठों पर एक बहुत ही फीकी सी मुस्कान आई। “अरे माधवी बहन! आओ, आओ… अंदर आ जाओ। तुमने इतने सालों बाद कैसे याद किया?”

माधवी अंदर दाखिल हुई। घर की हालत देखकर उसका दिल बैठ गया। जो आँगन कभी सुधा के हाथों की सजावट से चमकता था, आज वहाँ धूल की परत जमी थी। गमलों में पौधे सूखकर काँटा हो चुके थे। दीवारों से पपड़ियाँ गिर रही थीं। घर में एक अजीब सी सीलन और अकेलेपन की महक थी। माधवी सोफे के एक किनारे पर बैठ गई। दीनानाथ जी अंदर से एक गिलास पानी लेकर आए।

“सुधा कहाँ है भाई साहब? बाज़ार गई है क्या? और आयुष कैसा है? अब तो बहुत बड़ा हो गया होगा… मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा कि मैं इतने सालों बाद आप लोगों से मिल रही हूँ,” माधवी ने एक ही साँस में सारे सवाल पूछ डाले।

दीनानाथ जी वहीं सामने एक कुर्सी पर धम्म से बैठ गए। उनके चेहरे का रंग अचानक से सफेद पड़ गया और आँखों में जैसे सावन के बादल उमड़ आए। उन्होंने गहरी साँस ली और काँपती हुई आवाज़ में बोले, “सुधा तो चली गई बहन…”

“चली गई? कहाँ?” माधवी को जैसे बात समझ ही नहीं आई।

“दुनिया से चली गई माधवी… तीन साल हो गए उसे गुजरे हुए,” दीनानाथ जी ने अपनी आँखें पोंछते हुए कहा।

माधवी के हाथ से पानी का गिलास छलकते-छलकते बचा। वह सन्न रह गई। जिस सुधा की उम्र अभी बमुश्किल पचपन-छप्पन साल रही होगी, वो दुनिया छोड़ गई? “यह… यह कैसे हो गया भाई साहब? वो तो बिल्कुल ठीक थी। क्या हुआ था उसे?”

दीनानाथ जी ने एक शून्य की ओर घूरते हुए बताना शुरू किया, “बीमारी ने खा लिया उसे। कैंसर हो गया था। लेकिन सच कहूँ तो वो बीमारी से नहीं मरी… वो तो इंतज़ार में घुट-घुट कर मरी।”

माधवी का दिल ज़ोर से धड़कने लगा, “इंतज़ार? किसका इंतज़ार? आयुष कहाँ था?”

दीनानाथ जी की आँखों से अब आँसू बेरोकटोक बहने लगे। “आयुष… वही आयुष जिसके बिना सुधा एक पल भी नहीं रह पाती थी, वही आयुष जिसने उसकी जान ले ली। बारहवीं के बाद हमने उसे पढ़ने के लिए बाहर भेज दिया था। बहुत होशियार था, स्कॉलरशिप मिल गई तो वो इंजीनियरिंग करने विदेश चला गया। हम दोनों बहुत खुश थे कि हमारा बेटा आसमान छू रहा है। पढ़ाई पूरी होने के बाद उसे वहीं सिडनी में नौकरी मिल गई। शुरुआत में सब ठीक था। वो रोज़ फोन करता था। फिर धीरे-धीरे फोन कम होने लगे। उसने वहीं एक लड़की से शादी कर ली। हमने सोचा, चलो बच्चों की खुशी में ही हमारी खुशी है।”

कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया था, जिसे सिर्फ दीनानाथ जी की सिसकियाँ तोड़ रही थीं। माधवी अवाक होकर सुन रही थी।

“जब सुधा की बीमारी का पता चला, तो डॉक्टर ने कहा कि आखिरी स्टेज है। मैंने आयुष को फोन किया, रोया, गिड़गिड़ाया कि बेटा एक बार आकर अपनी माँ को देख ले। उसकी माँ दिन-रात दरवाज़े की तरफ टकटकी लगाए रहती थी। उसे लगता था कि अभी उसका आयुष आएगा और बचपन की तरह उसे गले लगाकर कहेगा कि ‘माँ, मैं आ गया हूँ’। लेकिन आयुष के पास बहाने थे… कभी प्रोजेक्ट, कभी वीज़ा, तो कभी बीवी की प्रेगनेंसी। उसने पैसे खूब भेजे, लेकिन पैसे से कहीं कोई माँ बचती है?” दीनानाथ जी का गला रुँध गया था।

माधवी को वो बचपन वाला आयुष याद आ रहा था, जो कहता था कि माँ के बिना वो साँस नहीं ले सकता। आज वही आयुष अपनी माँ को मौत के मुहाने पर अकेला छोड़कर सात समंदर पार अपनी दुनिया में मगन था।

“आखिरी के दस दिन बहुत भयानक थे, माधवी बहन,” दीनानाथ जी ने काँपते हाथों से माथा पकड़ा, “सुधा की आवाज़ चली गई थी। वो बोल नहीं पाती थी, बस दरवाज़े को देखती रहती थी। मैंने आयुष को वीडियो कॉल किया, तो उसने कहा कि वो मीटिंग में है, बाद में बात करेगा। उस दिन सुधा ने पानी पीना छोड़ दिया। उसकी आँखों से बस आँसू गिरते रहते थे। वो उस बेटे का इंतज़ार कर रही थी जिसके लिए उसने अपनी पूरी जवानी, अपनी सारी खुशियाँ कुर्बान कर दी थीं। और अंत में… बिना अपने लाल का चेहरा देखे, वो एक दिन चुपचाप अपनी आँखें हमेशा के लिए मूँद ली।”

“और अंतिम संस्कार?” माधवी के मुँह से बस इतना ही निकला।

“नहीं आया वो…” दीनानाथ जी ने कड़वाहट से मुस्कुराते हुए कहा, “उसने कहा कि अब आकर भी क्या फायदा, माँ तो चली ही गई। उसने यहीं पंडित जी के खाते में पैसे डलवा दिए और मुझसे कहा कि मैं ही सब कर दूँ। जिस बेटे को वो अपने हाथों से निवाला खिलाती थी, उस बेटे ने उसकी चिता को मुखाग्नि तक नहीं दी। अब मैं इस खाली घर में अपनी मौत का इंतज़ार कर रहा हूँ।”

माधवी से अब और वहाँ बैठा नहीं गया। उसकी छाती में जैसे कोई भारी पत्थर रख दिया गया हो। उसने दीनानाथ जी के पैर छुए, उन्हें ढांढस बंधाया और भारी कदमों से घर के बाहर निकल आई।

गलियों से वापस लौटते हुए माधवी का दिमाग सुन्न था। वह सोच रही थी कि इंसान का मन कितना विचित्र होता है। बचपन का वो निश्छल प्रेम, वो गहरा लगाव, जवानी आते ही कहाँ वाष्प बनकर उड़ जाता है? समय, दूरी और अपनी नई दुनिया की चकाचौंध में इंसान अपने उन जड़ों को कैसे भूल जाता है जिन्होंने उसे सींचकर बड़ा किया था? ईश्वर ने इंसानी स्वार्थ को न जाने किस मिट्टी से गढ़ा है, जो अपनी सुविधा और ज़रूरत के हिसाब से अपने रिश्तों की परिभाषा बदल लेता है। कल तक जो बच्चा माँ के आँचल के बिना सोता नहीं था, आज वो उसी माँ की मौत की खबर सुनकर अपनी मीटिंग में व्यस्त रहता है। सच ही है, दुनिया में सबसे जल्दी अगर कोई चीज़ अपना रंग बदलती है, तो वो है इंसान की फितरत।

माधवी ने एक गहरी साँस ली, पीछे मुड़कर उस बंद होते हुए घर को देखा, और रिक्शे में बैठ गई। लेकिन उसके कानों में आज भी उस छोटे से आयुष की आवाज़ गूँज रही थी— “माँ, मैं तुम्हारे बिना साँस नहीं ले सकता…” जो अब एक बहुत बड़े और क्रूर झूठ में बदल चुकी थी।

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D बदलाव की शुरुआत

शाम का समय था। सुमित्रा जी रसोई में खड़ी अपने और अपने पति के लिए चाय छान रही थीं। घर में एक अजीब सी शांति थी, लेकिन यह शांति अचानक एक तेज़ और कर्कश आवाज़ से टूट गई। आवाज़ उनके बेटे विकास के कमरे से आ रही थी।

“मैंने तुम्हें तीन बार कॉल किया! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरा फोन इग्नोर करने की? अगर अगली बार ऐसा हुआ, तो एक थप्पड़ खींच कर दूंगा, सारा दिमाग ठिकाने आ जाएगा तुम्हारा!”

सुमित्रा जी के हाथ ठिठक गए। चाय छलक कर स्लैब पर गिर गई। उन्होंने जो सुना, उस पर उन्हें एक पल के लिए यकीन ही नहीं हुआ। विकास… उनका पढ़ा-लिखा, एक मल्टीनेशनल कंपनी में ऊंचे पद पर काम करने वाला बेटा, अपनी नई-नवेली पत्नी अंजलि से इस तरह बात कर रहा था? महज़ एक कॉल न उठाने पर थप्पड़ मारने की धमकी?

सुमित्रा जी रसोई के दरवाज़े पर बुत बनकर खड़ी रह गईं। उनका दिमाग तेज़ी से दौड़ने लगा। वह सोच में पड़ गईं कि अगर महज़ कॉल ना उठाने पर वह थप्पड़ की बात कर रहा है, तो बंद कमरे में वह किस हद तक गिरता होगा? यह कैसी दूषित मानसिकता है? और अंजलि… वह बेचारी कैसे इस घुटन भरे और डरावने माहौल में जी रही होगी? सुमित्रा जी का दिल बैठ गया। यह समाज की एक बहुत ही कटु और भयानक सच्चाई थी, जो आज उनके अपने घर की दहलीज लांघ कर अंदर आ चुकी थी।

अखबारों के पन्ने रोज़ ऐसी ही खबरों से रंगे होते हैं—कोई दहेज के लिए जलाई गई, किसी को बात-बात पर पीटा गया, कहीं किसी का मानसिक उत्पीड़न हुआ। हम सब अपने ड्राइंग रूम में बैठकर अफ़सोस जताते हैं और चाय की चुस्कियों के साथ चर्चा करके भूल जाते हैं। आज देश में महिलाओं और बच्चियों के साथ जो कुछ भी घिनौना हो रहा है, वह कहीं न कहीं इसी दूषित मानसिकता का ही तो परिणाम है। हम मोमबत्तियां निकालते हैं, कड़े कानूनों की मांग करते हैं, लेकिन क्या सिर्फ कुछ लोगों को सज़ा दे देने से यह मानसिकता कम या बंद हो सकती है? सुमित्रा जी का अंतर्मन चीख कर कह रहा था—बिल्कुल नहीं!

कहते हैं ना कि अगर बीमारी को जड़ से खत्म करना है, तो इलाज भी जड़ पर ही करना होगा। यह जो घृणित मानसिकता है, इसका इलाज भी अब जड़ से ही होना ज़रूरी बन चुका है। सुमित्रा जी को अपना अतीत याद आने लगा। जब विकास छोटा था और उसने मोहल्ले की एक बच्ची को धक्का दिया था, तो सुमित्रा जी ने यह कहकर बात टाल दी थी कि “लड़के तो थोड़े नटखट होते ही हैं, उसे मारना मत।” जब कॉलेज में विकास ने अपनी छोटी बहन पर पाबंदियां लगाईं और खुद देर रात तक दोस्तों के साथ बाहर घूमा, तब भी सुमित्रा जी ने ‘बेटे’ के मोह में उसकी गलतियों पर पर्दा ही डाला था।

आज उन्हें अपनी उन तमाम गलतियों का एहसास एक झटके में हो गया। उन्होंने ही अपने लाड़-प्यार में इस ज़हरीले पौधे को सींचा था। अपने बेटों को सही-गलत समझाना, उन्हें महिलाओं की इज्ज़त करना सिखाना बहुत ज़रूरी था, न कि उनकी गलतियों पर पर्दा डालना, जो अक्सर हमारे समाज में देखा और सुना जाता है। अगर आज़ादी के इतने सालों बाद भी समाज में बेटियां सुरक्षित नहीं हैं, तो यह हम माताओं के लिए भी बेहद शर्म की बात है, क्योंकि हम ही तो इन बेटों की परवरिश करती हैं।

सुमित्रा जी ने तय किया कि वह आज अपनी उस गलती को सुधारेंगी। उन्होंने भारी कदमों से विकास के कमरे की तरफ रुख किया। दरवाज़ा आधा खुला था। अंजलि सिर झुकाए खड़ी थी, उसके हाथों में कपड़े थे जिन्हें शायद वह समेट रही थी, और उसकी आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे। विकास अभी भी गुस्से में अपनी उंगली अंजलि की तरफ दिखा रहा था।

“विकास!” सुमित्रा जी की कड़क आवाज़ ने कमरे के सन्नाटे को चीर दिया।

विकास अपनी माँ को अचानक वहां देखकर थोड़ा सकपकाया। “अरे माँ, आप? कुछ नहीं, बस मैं अंजलि को समझा रहा था कि इसे फोन हमेशा अपने पास रखना चाहिए। पता नहीं कहाँ ध्यान रहता है इसका।”

“समझा रहे थे? या थप्पड़ मारने की धमकी दे रहे थे?” सुमित्रा जी कमरे के अंदर आईं और सीधे अंजलि के पास जाकर खड़ी हो गईं।

विकास ने नज़रें चुराते हुए अपनी मर्दानगी की ढाल ली और बोला, “माँ, ये पति-पत्नी के बीच की बात है। आप बीच में मत पड़िए। इसने मेरा ज़रूरी कॉल नहीं उठाया, मुझे गुस्सा आ गया।”

“पति-पत्नी के बीच की बात में थप्पड़ और जलालत कहाँ से आ गई?” सुमित्रा जी की आँखों में एक ऐसी आग थी जो विकास ने पहले कभी नहीं देखी थी। “तुम भूल गए विकास कि तुम भी एक औरत के पेट से जन्मे हो। क्या मैंने तुम्हें यही संस्कार दिए हैं? एक कॉल न उठाने पर तुम्हारा पुरुषार्थ इतना आहत हो गया कि तुम एक लड़की पर हाथ उठाने की बात करने लगे? तुम्हारी इस नीच सोच को देखकर मुझे आज खुद पर और अपनी परवरिश पर घिन आ रही है।”

विकास हक्का-बक्का रह गया। उसने कभी उम्मीद नहीं की थी कि उसकी माँ उसकी पत्नी का इस तरह साथ देगी। “माँ, आप छोटी सी बात का बतंगड़ बना रही हैं।”

“ये छोटी बात नहीं है विकास!” सुमित्रा जी लगभग दहाड़ उठीं। “ये शुरुआत है उस भयानक मानसिकता की जो आगे चलकर औरतों को पैर की जूती समझने लगती है। आज तुमने थप्पड़ की बात कही है, कल तुम हाथ भी उठाओगे। वो लड़की अपना पूरा परिवार, अपना घर छोड़कर तुम्हारे भरोसे यहाँ आई है, और तुम उसे उसके काम में ज़रा सी चूक होने पर डरा रहे हो? सुन लो मेरी बात कान खोलकर, अगर इस घर में रहना है, तो अंजलि को अपनी बराबरी का सम्मान देना सीखना होगा। अगर तुम्हारी मर्दानगी किसी औरत को डराने में बसती है, तो तुम मेरे बेटे कहलाने लायक नहीं हो।”

सुमित्रा जी ने पलटकर अंजलि के कंधे पर प्यार से हाथ रखा। अंजलि, जो अब तक खामोश थी, अपनी सास का यह रूप देखकर फफक कर रो पड़ी। उसने अपनी सास को कभी इतनी मजबूती से अपने साथ खड़े नहीं देखा था। सुमित्रा जी ने अंजलि के आंसू पोंछे और कहा, “मुझे माफ़ कर दे बेटी। मैंने एक बेटा तो पैदा कर लिया, लेकिन उसे एक अच्छा इंसान बनाना भूल गई। पर आज मैं तुझे वचन देती हूँ, इस घर में तुझे कभी डर कर जीने की ज़रूरत नहीं है। ये घर जितना मेरा है, उतना ही तेरा भी है।”

उन्होंने वापस विकास की तरफ देखा। “तुम अभी और इसी वक्त अंजलि से माफी मांगोगे। और यह याद रखना, अगर भविष्य में तुमने कभी भी अंजलि से या किसी भी औरत से इस लहज़े में बात की, तो मैं खुद तुम्हें इस घर से बाहर निकाल दूंगी। एक औरत का सम्मान करना सीखो, वरना समाज में तुम्हारी उन महँगी डिग्रियों का कोई मोल नहीं है।”

विकास का सारा अहंकार चूर-चूर हो गया था। अपनी माँ के इस रौद्र और न्यायप्रिय रूप के आगे उसकी एक न चली। उसे अपनी गलती का गहरा एहसास हुआ। उसने सिर झुकाकर अंजलि से अपनी बदतमीज़ी के लिए माफी मांगी।

सुमित्रा जी जानती थीं कि एक दिन की डांट से सदियों पुरानी मानसिकता रातों-रात नहीं बदलेगी, लेकिन उन्होंने इसकी शुरुआत कर दी थी। उन्होंने समझ लिया था कि बदलाव की यह शुरुआत हम महिलाएं ही कर सकती हैं। अगर हर माँ अपने बेटे की गलतियों को छुपाने के बजाय उसे वहीं टोक दे, तो शायद किसी भी बेटी को बंद कमरे में थप्पड़ की धमकियां नहीं सुननी पड़ेंगी।

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