अनन्या शीशे के सामने बैठी अपनी परछाई को एकटक निहार रही थी। आज वह फिर से लाल जोड़े में सजी थी। माथे पर सजी बिंदी, हाथों में रची मेहंदी और बालों में लगे मोगरे के फूलों की महक—सब कुछ वैसा ही था जैसा पाँच साल पहले था। लेकिन इस बार उसके मन का कोलाहल उस मोगरे की महक से कहीं ज्यादा हावी था। घर के बाहर शहनाई की धुन बज रही थी, मेहमानों की आवाजाही से पूरा घर भरा हुआ था। हर तरफ उल्लास और मंगल गीतों की गूँज थी, लेकिन अनन्या के कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था। यह सन्नाटा उसके अंदर चल रहे उस तूफान का था, जिसे बाहर बैठे रिश्तेदार और यहाँ तक कि उसके अपने माता-पिता भी नहीं सुन पा रहे थे।
पहली शादी के घाव अभी भी उसके जहन में हरे थे। जब वह पहली बार दुल्हन बनी थी, तो उसकी आँखों में एक सुनहरे भविष्य के अनगिनत सपने थे। एक ऐसा राजकुमार जो उसे पलकों पर बिठाएगा, एक ऐसा घर जहाँ उसकी हर बात को अहमियत मिलेगी। लेकिन असलियत उन सपनों से कोसों दूर थी। उस रिश्ते ने उसे केवल तिरस्कार, अकेलेपन और आंसुओं के सिवा कुछ नहीं दिया। वह रिश्ता तो टूट गया, लेकिन अनन्या के अंदर का विश्वास भी अपने साथ ले गया। अब जब वह दोबारा इस दहलीज पर खड़ी थी, तो उसके कदम पीछे की ओर खिंच रहे थे।
कमरे का दरवाज़ा खुला और उसकी माँ, सरिता जी, अंदर आईं। उनकी आँखों में खुशी के आँसू थे। उन्होंने अनन्या के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और नज़र उतारते हुए बोलीं, “मेरी बच्ची आज दुनिया की सबसे खूबसूरत दुल्हन लग रही है। भगवान तुम्हारे और विक्रम के इस नए सफर को हमेशा खुशियों से भरा रखे।” माँ की बातें सुनकर अनन्या ने एक फीकी सी मुस्कान तो दे दी, लेकिन उसके अंदर का डर और गहरा हो गया।
जब भी उसने अपने मन की उलझन माँ या पिताजी से कहनी चाही, तो उनका एक ही जवाब होता, “बेटा, बीता हुआ कल एक बुरा सपना था, उसे भूल जाओ। इंसान को अकेले ज़िंदगी काटना बहुत भारी पड़ता है। कल को हम नहीं रहेंगे, तो तुम्हारा कौन होगा? विक्रम एक बहुत सुलझा हुआ और समझदार इंसान है, वह तुम्हें बहुत खुश रखेगा।”
अनन्या जानती थी कि उसके माता-पिता उसकी भलाई ही चाहते हैं। उन्हें समाज के तानों से ज्यादा अपनी बेटी के अकेलेपन की फिक्र थी। लेकिन क्या उनका यह फैसला सही था? क्या किसी और के सहारे के बिना एक औरत का वजूद अधूरा होता है? और सबसे बड़ा सवाल—क्या विक्रम सच में उस दर्द को समझ पाएगा जो अनन्या ने सालों तक चुपचाप सहा है? क्या वह उसके इस खालीपन को भर पाएगा, या यह रिश्ता भी चंद दिनों बाद एक बोझिल समझौते में तब्दील हो जाएगा?
विक्रम से उसकी मुलाकातें बहुत कम हुई थीं। जो थोड़ी बहुत बातें हुईं, उनमें औपचारिकता ज्यादा और अपनेपन की गर्माहट कम थी। विक्रम की भी यह दूसरी शादी थी। उसकी पहली पत्नी का एक बीमारी के चलते निधन हो गया था। शायद इसीलिए विक्रम की आँखों में भी एक गहरा ठहराव और खामोशी थी। लेकिन क्या दो खामोशियाँ मिलकर एक मधुर संगीत बना सकती हैं? या फिर वे एक-दूसरे को और भी गहरे सन्नाटे में धकेल देंगी?
समय अपनी गति से भाग रहा था। बाहर से बुलावा आ गया कि मुहूर्त का समय हो रहा है और दुल्हन को मंडप में ले जाना है। अनन्या की सहेलियाँ उसे सहारा देकर बाहर की ओर ले चलीं। उसकी भारी लहंगे की हर एक सलवट उसे अपने अतीत के बोझ जैसी लग रही थी। जैसे ही वह मंडप के पास पहुँची, उसकी नज़र सामने बैठे विक्रम पर पड़ी। शेरवानी में सजे विक्रम के चेहरे पर एक शांत सौम्यता थी। उसने जब अनन्या की तरफ देखा, तो उसकी आँखों में न तो कोई अधीरता थी और न ही किसी तरह का अधिकार जताने की भावना। बस एक सम्मानजनक स्वीकृति थी।
पंडित जी के मंत्रोच्चार के बीच विवाह की रस्में शुरू हुईं। हर एक रस्म के साथ अनन्या का दिल ज़ोर से धड़क रहा था। जब कन्यादान की रस्म आई और पिता ने अनन्या का हाथ विक्रम के हाथ में सौंपा, तो अनन्या की उँगलियाँ डर से ठंडी पड़ चुकी थीं। विक्रम को शायद इस बात का अहसास हो गया। उसने बहुत ही कोमलता से अनन्या के हाथ को थामा, मानो वह किसी नाज़ुक काँच की गुड़िया को पकड़े हो। उसकी उस हल्की सी छुअन में एक अनकहा आश्वासन था—”मैं हूँ, घबराओ मत।”
फिर वह समय आ गया जिसका अनन्या को सबसे ज्यादा डर था—सात फेरे। जब वे दोनों अग्नि के चारों ओर घूमने के लिए खड़े हुए, तो अनन्या के पैर मानो ज़मीन से चिपक गए हों। उसे याद आ रहा था कि कैसे पहली बार इन्हीं फेरों को लेते हुए उसने कितने वादे किए थे, जो बाद में कांच के टुकड़ों की तरह चुभने लगे। उसका दम घुटने लगा और उसके कदम लड़खड़ा गए।
तभी विक्रम ने धीरे से, पर मजबूती से उसका हाथ पकड़ा। उसने पीछे मुड़कर अनन्या की आँखों में देखा और बहुत ही धीमी आवाज़ में कहा, “जल्दबाज़ी मत करो। अपने समय के हिसाब से कदम बढ़ाओ। मैं तुम्हारे साथ-साथ ही चलूँगा, न तुमसे आगे, न तुमसे पीछे।”
वे चंद शब्द अनन्या के लिए किसी जादुई मरहम से कम नहीं थे। उन शब्दों में कोई झूठा वादा नहीं था कि ‘मैं तुम्हारे सारे दुख हर लूँगा’, बल्कि एक सच्चा साथी बनने का आश्वासन था। उस एक पल ने अनन्या के अंदर जमे हुए डर के बर्फ को थोड़ा सा पिघला दिया। उसने एक गहरी साँस ली और विक्रम के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने लगी। सातों फेरे पूरे हुए, सिंदूर दान हुआ और देखते ही देखते अनन्या एक बार फिर से किसी की पत्नी बन गई।
विदाई का समय हमेशा की तरह भावुक था। लेकिन इस बार अनन्या के आँसुओं में केवल मायका छूटने का दुख नहीं था, बल्कि अपने उस डरे और सहमे हुए अतीत को भी हमेशा के लिए पीछे छोड़ देने की एक गहरी छटपटाहट थी। गाड़ी में बैठते ही एक अजीब सी शांति छा गई। विक्रम ने रास्ते भर कोई बेवजह की बात नहीं की। उसने बस गाड़ी का एसी थोड़ा धीमा किया और एक हल्का सा सुरीला संगीत चला दिया। उसकी यह समझदारी अनन्या को भीतर तक सुकून दे रही थी।
ससुराल पहुँचने पर गृहप्रवेश की रस्में हुईं। यहाँ भीड़-भाड़ कम थी और जो लोग थे, उनकी आँखों में अनन्या के लिए हमदर्दी से ज्यादा एक सम्मान था। रस्मों के बाद जब अनन्या को उसके कमरे में ले जाया गया, तो उसकी धड़कनें फिर से तेज़ हो गईं। फूलों से सजे उस कमरे में उसे अपना दम घुटता हुआ सा महसूस हो रहा था। उसे डर था कि अब उसे एक आदर्श पत्नी की भूमिका निभानी पड़ेगी। उसे डर था उन उम्मीदों का, जो एक पति अपनी नई नवेली दुल्हन से रखता है।
कुछ देर बाद कमरे का दरवाज़ा खुला और विक्रम अंदर आया। अनन्या ने घबराहट में अपनी नज़रें नीचे झुका लीं और अपने लहंगे के पल्लू को उँगलियों में कसकर लपेट लिया। विक्रम ने कमरे की कुंडी लगाई और आकर सोफे पर बैठ गया। उसने अपने सिर से साफा उतारा और एक गहरी साँस ली।
फिर वह उठा और मेज़ पर रखे जग से दो गिलास पानी डाला। एक गिलास उसने अनन्या की तरफ बढ़ाया। अनन्या ने कांपते हाथों से गिलास लिया। विक्रम वापस अपनी जगह पर बैठ गया और बहुत ही सहज स्वर में बोला, “आज का दिन हम दोनों के लिए ही बहुत थका देने वाला था। मैं जानता हूँ कि तुम्हारे मन में इस वक्त हज़ारों सवाल और कई सारे डर चल रहे होंगे।”
अनन्या ने चौंककर विक्रम की तरफ देखा।
विक्रम ने मुस्कुराते हुए अपनी बात जारी रखी, “अनन्या, हम दोनों ही ज़िंदगी के उस पड़ाव से गुज़रे हैं जहाँ हमने बहुत कुछ खोया है। यह शादी कोई समझौता नहीं है, बल्कि एक-दूसरे का सहारा बनने की एक कोशिश है। मैं तुमसे यह उम्मीद बिल्कुल नहीं करता कि तुम आज से ही इस घर को अपना मान लो या मुझे अपना पति मानकर मेरे प्रति सारी जिम्मेदारियाँ निभाने लगो। रिश्तों को पनपने में समय लगता है। और हमारे पास पूरी ज़िंदगी है।”
अनन्या की आँखें भर आईं। वह जिस बात से सबसे ज्यादा डर रही थी, विक्रम ने उसे कितनी आसानी से खत्म कर दिया था।
“मैं बस इतना चाहता हूँ,” विक्रम ने आगे कहा, “कि हम इस नए सफर की शुरुआत एक पति-पत्नी की तरह नहीं, बल्कि दो अच्छे दोस्तों की तरह करें। एक ऐसा दोस्त जिससे तुम अपने मन की हर बात कह सको, बिना इस डर के कि मैं तुम्हें जज करूँगा। तुम जब तक चाहो, जितना समय चाहो, ले सकती हो। इस कमरे में, इस घर में और मेरी ज़िंदगी में, तुम्हें हमेशा अपनी निजता और अपना सम्मान मिलेगा।”
विक्रम की बातें सुनकर अनन्या के दिल पर रखा वह भारी पत्थर अचानक से खिसक गया। उसके अंदर सालों से जो एक बाँध बना हुआ था, वह टूट गया और उसकी आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। लेकिन यह दुख के आँसू नहीं थे। यह उस सुकून के आँसू थे जिसकी उसे बरसों से तलाश थी।
उस रात उस सजे हुए कमरे में कोई रस्म नहीं निभाई गई, बल्कि दो टूटे हुए दिलों ने एक-दूसरे के घावों पर मरहम लगाने की एक खूबसूरत शुरुआत की। अनन्या को अब यह विश्वास हो चला था कि हर रात के बाद सवेरा ज़रूर होता है। उसका यह नया सफर अब किसी डर या समझौते की बुनियाद पर नहीं, बल्कि सम्मान, समझ और एक मूक उम्मीद के सहारे आगे बढ़ने वाला था। यह महज़ एक दूसरी शादी नहीं थी, बल्कि उसकी ज़िंदगी की एक सच्ची और सुकून भरी दूसरी शुरुआत थी।
दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि हर इंसान ज़िंदगी में एक दूसरे मौके और सच्ची खुशियों का हकदार होता है? क्या समाज को दूसरी शादी को लेकर अपना नज़रिया और अपनी उम्मीदें नहीं बदलनी चाहिए? अपने विचार और अनुभव हमारे साथ कमेंट्स में ज़रूर साझा करें।
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