दो शब्दों का मेल “कुल” और “कलंकिनी”।अर्थात् परिवार पर कलंक हो जो …यह शब्द अक्सर समाज में महिलाओं पर लगाए जाने वाले दोहरे मानकों और उन पर रखी जाने वाली अपेक्षाओं को दर्शाता है।
समाज महिलाओं को उनके परिवार की इज्जत का प्रतीक मानता है और उन पर कई तरह की जिम्मेदारियाँ डालता है । तो बुराई भी क्या ? किन्तु बुराई तब है जब बेटों को जिम्मेदारियाँ या परिवार की इज्जत का पैमाना नहीं बताया जाता।
“कुलटा है वो… कुलछिनी… नाम डुबो दिया पूरे खानदान का।”
पंचायत की चौपाल से आवाज़ आई और 19 साल की प्रभा के कान सुन्न हो गए। कल तक जो चाची-ताई उसे ‘बिटिया’ कहकर बुलाती थीं, आज नज़रें चुरा रही थीं। प्रभा का कसूर? कि प्रभा ने गाँव के स्कूल मास्टर संजय से प्रेम-विवाह कर लिया था। संजय दूसरी जाति का था। प्रभा के पिता ने पंचायत बुलाई — “बेटी ने कुल में कलंक लगाया , इसका मर जाना ही ठीक।”
प्रभा बरामदे में सिर झुकाए खड़ी थी। संजय उसका हाथ थामे था। सरपंच प्रभा के पिता का नाम लेकर बोला, “जितेन्द्र, वैसे तो बेटी पराया धन है, पर दूसरी बिरादरी जा नाक कटाएगी? हुक्का-पानी बंद इसका।” प्रभा की माँ दबी ज़ुबान में बोली, “पर मास्टर जी पढ़े-लिखे हैं , सरकारी नौकरी है …”
“चुप कर,” जितेन्द्र गरजा, “नौकरी से कुल थोड़े धुलता है? लड़की जात, ज़रा सी चूकी नहीं कि कुलछिनी का ठप्पा लग गया।”
उसी रात प्रभा और संजय को गाँव छोड़ना पड़ा। शहर में संजय ने एक कमरे के क्वार्टर में नई ज़िंदगी शुरू हुई। प्रभा ने सिलाई सीखी, संजय स्कूल जाता। 5 साल बीते। प्रभा अब दो बच्चों की माँ थी। संजय हेडमास्टर बन गया। इसी बीच गाँव से ख़बर आई — जितेंद्र को लकवा मार गया। बड़ा बेटा शहर में था, आया नहीं। छोटा बेटा नशे में ज़मीन बेच चुका था। घर में प्रभा की माँ अकेली। पंचों ने फ़ैसला सुनाया, “जितेन्द्र की देखभाल कौन करेगा? बहू तो भाग गई थी दहेज के लिए।”
किसी ने धीरे से कहा, “उसकी कुलछिनी बेटी को बुलाओ, शायद…” “चुप!” दूसरा बोला, “कुलटा का मुँह कौन देखे?”ख़बर प्रभा तक पहुँची। संजय ने कहा, “मत जाओ। जिन्होंने तुम्हें मरा मान लिया, उनके लिए क्यों?” प्रभा रात भर सो न सकी। सुबह बच्चों को लेकर बस पकड़ी ।संजय भी साथ चल पड़ा।
रामपुर पहुँची तो घर में सन्नाटा। माँ सूखकर काँटा हो गई थी, जितेंद्र खाट पर। प्रभा को देखते ही माँ फूट-फूटकर रोई। जितेन्द्र की आँखों में सिर्फ़ शर्म। बोल न सका, पर हाथ उठाकर इशारा किया — पास आ बेटी
प्रभा ने पिता के पास आई , डॉक्टर बुलाया, दवा शुरू कराई। मोहल्ले की औरतें दूर से देखतीं, फुसफुसातीं, “देखो कुलछिनी ही सेवा कर रही है बाप की ।”
शाम को चौपाल में जा खड़ी हुई। वही पंच, वही सरपंच वही चौपाल
बोली, “सरपंच काका, कुल क्या होता है? सिर्फ़ मर्द की पगड़ी? या बेटी के आँसू भी?आज मेरा बाप खाट पर है। आपके कुल वाले बेटे कहाँ हैं? वो जो बिरादरी की नाक ऊँची रखते थे?”
सन्नाटा।
प्रभा आगे बोली, “मैंने प्रेम किया, जात नहीं देखी। पर बाप को मरता नहीं छोड़ पाई मैं । तो कुल को कलंक किसने लगाया काका ? मैंने, या उन बेटों ने जो ज़मीन बेचकर दारू पी गए? अगर प्रेम कुलछन है, तो हाँ, मैं हूँ। पर माँ-बाप को लावारिस छोड़ना क्या — कुलभूषण होता है काका ?”
चौपाल की गरदन झुक गई। जितेन्द्र की आँखों से आँसू बहे।
बस इतना कहा “बेटी…” 6 महीने प्रभा ने सेवा की। जितेन्द्र चलने लगा। जाते वक्त गाँव की वही ताई जिसने ‘कुलटा’ कहा था, प्रभा के हाथ में गुड़ थमाकर बोली, “बिटिया, माफ़ कर दे। कुललाज तो तूने ही रखी। हम ही कलंकिणी निकले।”
प्रभा शहर लौट आई। संजय ने पूछा, “बुरा लगा?”
प्रभा मुस्कुराई, “नहीं। समझ आया कि ‘कुलटा’ गाली नहीं, समाज का आईना है। जो आईना दिखाए, वही कुलछिनी कहलाए । असली कलंक वो है जो बेटी को बोझ समझे, बहू को दासी, और औरत को सिर्फ़ इज़्ज़त ढोने वाली गठरी।”
आज प्रभा अपने सिलाई सेंटर में, गाँव की लड़कियों को हुनर सिखाती है। बोर्ड पर लिखवाया है — *”कुल की इज़्ज़त बेटी के कदमों से नहीं, सोच से बनती है।”
आज रामपुर में कोई लड़की अगर अपनी मर्ज़ी से शादी कर ले, तो पंचायत नहीं बैठती। लोग कहते हैं, “प्रभा मास्टरनी की तरह निकली है… कुल को तारने वाली बिटिया।”
कुलटा, कुलछिनी, कुलकलंकिनी — ये शब्द नहीं, सोच का कोढ़ हैं। और कोढ़ इलाज माँगता है, इज़्ज़त नहीं।
@सुनीता मलिक सोलंकी मुजफ्फरनगर उप्र