“पैसे कागज के टुकड़े हैं प्रज्ञा!” रघुनाथ जी की आवाज में एक गूंज थी। “वे मेहनत से दोबारा कमाए जा सकते हैं। मैंने जो मेहनत की, वह किसी जुए में नहीं लगाई थी, अपनी बेटी की काबिलियत पर लगाई थी। मुझे अपनी मेहनत पर गर्व है और तेरी लगन पर पूरा भरोसा है। तूने साल भर जो तपस्या की है, क्या वह ज्ञान व्यर्थ हो गया? नहीं, वह तेरे भीतर है। तू हारी तब नहीं जब तेरा नाम लिस्ट में नहीं आया, तू तो तब हारेगी जब तू मैदान छोड़कर भाग जाएगी।”
रघुनाथ जी एक साधारण दर्जी थे। कस्बे के मुख्य बाजार के एक संकरे कोने में उनकी ‘रघु टेलर्स’ नाम की छोटी सी दुकान थी। उनकी पत्नी जानकी दिन भर घर का कामकाज निपटाने के बाद बची हुई फुर्सत में कपड़ों पर तुरपाई और काज-बटन का काम कर लिया करती थीं, ताकि चार पैसे और जुड़ सकें।
रघुनाथ और जानकी खुद कभी स्कूल की चौखट भी ठीक से नहीं लांघ पाए थे। गरीबी और पारिवारिक जिम्मेदारियों ने उनके अपने बचपन को बहुत पहले ही छीन लिया था। मगर उनकी दो बेटियां थीं—बड़ी बेटी प्रज्ञा और छोटी बेटी गरिमा। रघुनाथ जी का हमेशा से यह मानना था कि विद्या वह अनमोल धन है जिसे न कोई चुरा सकता है और न ही कोई छीन सकता है। वे अपनी दोनों बेटियों को वह हर मुकाम हासिल करते देखना चाहते थे, जिससे वे खुद जीवन भर महरूम रहे थे।
बड़ी बेटी प्रज्ञा बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि की थी। जब वह दसवीं कक्षा में थी, तभी कस्बे के सरकारी अस्पताल में आए एक युवा डॉक्टर को देखकर उसके मन में चिकित्सा सेवा का बीज अंकुरित हो गया था। सफेद कोट, गले में स्टेथोस्कोप और मरीजों की जान बचाते हुए चेहरे पर एक अलौकिक सुकून—प्रज्ञा ने ठान लिया था कि वह डॉक्टर ही बनेगी। बारहवीं में उसने पूरे जिले में विज्ञान संकाय में सर्वोच्च अंक हासिल किए।
लेकिन मेडिकल प्रवेश परीक्षा की राह कोई आसान डगर नहीं थी। इसके लिए बड़े शहर जाकर किसी प्रतिष्ठित संस्थान से कोचिंग लेना जरूरी माना जाता था। प्रज्ञा अपने घर के हालात से भली-भांति वाकिफ थी। उसने देखा था कि कैसे उसके पिता हर महीने दुकान का किराया और घर का राशन जुटाने के लिए एक-एक रुपये का हिसाब जोड़ते थे। माँ की पुरानी साड़ियों में लगे अनगिनत पैबंद उसकी आंखों से कभी ओझल नहीं होते थे। इसलिए उसने अपने इस बड़े ख्वाब को अपने सीने में ही दफन कर लिया और कस्बे के ही एक छोटे से डिग्री कॉलेज में सामान्य बीएससी में दाखिला लेने की बात कही।
एक दिन शाम को जब रघुनाथ जी चाय की चुस्की ले रहे थे, तब छोटी बेटी गरिमा ने दबे पांव आकर उनके कान में फुसफुसाया, “पापा, दीदी रात-रात भर जागकर डॉक्टर बनने वाली किताबें पढ़ती हैं, पर दिन में कहती हैं कि उन्हें आगे नहीं पढ़ना। वो आपसे कोचिंग की बात इसलिए नहीं कर रहीं क्योंकि उन्हें लगता है कि हमारे पास पैसे नहीं हैं।”
यह सुनते ही रघुनाथ जी का कलेजा भर आया। उन्होंने उसी वक्त अपनी सिलाई रोक दी। रात को खाने की मेज पर जब प्रज्ञा ने थाली परोसी, तो रघुनाथ जी ने सीधे उसकी आंखों में देखा।
“प्रज्ञा बेटा, तू मुझसे कुछ छिपा रही है?”
प्रज्ञा सकपका गई, “नहीं तो पापा, भला मैं क्या छिपाऊंगी?”
“फिर तूने यह क्यों नहीं बताया कि तुझे डॉक्टर की तैयारी के लिए शहर जाना है?” रघुनाथ जी का स्वर बेहद गंभीर था।
प्रज्ञा ने नजरें झुका लीं, “पापा, वो बहुत खर्चीली पढ़ाई है। बड़े शहर में रहने का खर्च, कोचिंग की भारी-भरकम फीस… हम इतने साधन संपन्न नहीं हैं। मैं यहीं रहकर सामान्य पढ़ाई कर लूंगी। कोई छोटी-मोटी नौकरी मिल ही जाएगी।”
रघुनाथ जी ने अपनी खुरदरी हथेली प्रज्ञा के सिर पर रखी और बड़े ही धीरज से बोले, “बेटा, एक बात हमेशा याद रखना। मां-बाप का काम सिर्फ बच्चों को पालना नहीं, बल्कि उनके सपनों को पंख देना भी होता है। तूने सपना देखा है, तो उसे पूरा करने की जिद्द भी रख। पैसे कहाँ से आएंगे, फीस कैसे भरी जाएगी, यह सोचना तेरा काम नहीं है। तू बस अपनी मेहनत और किताबों पर ध्यान दे।”
जानकी ने भी अपनी बेटी के कंधे पर हाथ रखते हुए ढांढस बंधाया, “हाँ प्रज्ञा, तेरी पढ़ाई के आड़े हम अपनी तंगी को कभी नहीं आने देंगे। तू बेझिझक आगे बढ़।”
माता-पिता के इस अटूट विश्वास के आगे प्रज्ञा नतमस्तक हो गई। उसने शहर के कोचिंग संस्थान में दाखिला ले लिया। रघुनाथ जी ने अपनी बचत के सारे पैसे, जानकी के कुछ पुश्तैनी गहने और कस्बे के एक साहूकार से थोड़ा कर्ज लेकर पहले साल की फीस भर दी। रघुनाथ जी ने दुकान पर काम के घंटे बढ़ा दिए। सुबह सात बजे से लेकर रात ग्यारह बजे तक वे लगातार कपड़े सिलते रहते। उनकी आंखों के नीचे काले घेरे पड़ गए, उंगलियों में सुइयों के चुभने के अनगिनत निशान उभर आए, मगर चेहरे पर कभी थकान की शिकन नहीं दिखी। उन्हें बस अपनी बेटी का सफेद कोट नजर आता था।
प्रज्ञा ने भी शहर जाकर दिन-रात एक कर दिया। वह सुबह चार बजे उठती, देर रात तक लाइब्रेरी में बैठती और एक-एक विषय को गहराई से समझती। वह किसी भी शादी-ब्याह, त्योहार या उत्सव में शामिल नहीं हुई। उसके दिमाग में सिर्फ एक ही धुन सवार थी—माता-पिता के पसीने की हर बूंद का कर्ज अपनी सफलता से चुकाना है।
आखिरकार परीक्षा का दिन आया। प्रज्ञा ने पूरी लगन से पेपर दिया। परीक्षा खत्म होने के बाद वह घर लौट आई। परिणाम आने में करीब डेढ़ महीने का वक्त था। यह डेढ़ महीना पूरे परिवार के लिए भारी था।
एक दोपहर, जब बाहर चिलचिलाती धूप थी, परिणाम घोषित होने की खबर आई। कस्बे के साइबर कैफे में जाकर प्रज्ञा ने अपना रोल नंबर डाला। कंप्यूटर स्क्रीन पर जैसे ही अंक और मेरिट सूची खुली, प्रज्ञा की सांसें अटक गईं। उसका नाम मेरिट सूची की अंतिम सीमा से महज कुछ अंकों से चूक गया था। वह सरकारी मेडिकल कॉलेज की सीट हासिल करने से कुछ ही फासले पर रह गई थी।
प्रज्ञा के पैरों तले से जमीन खिसक गई। कैफे से घर तक का रास्ता उसने कैसे तय किया, उसे खुद याद नहीं था। घर पहुंचते ही उसने सीधे अपने कमरे का रुख किया, अंदर से सिटकनी बंद कर ली और बिस्तर पर गिरकर फफक पड़ी।
शाम को जब रघुनाथ जी थके-हारे घर लौटे, तो घर का सन्नाटा उन्हें काटने लगा। आमतौर पर घर में गरिमा की खिलखिलाहट और प्रज्ञा की पढ़ाई की आवाजें गूंजती थीं, मगर आज एक अजीब सी बेचैनी पसरी थी। रसोई के दरवाजे पर जानकी खड़ी थीं, उनकी आंखें लाल थीं और पल्लू से आंसुओं को दबाए हुए थीं।
“कहाँ है प्रज्ञा?” रघुनाथ जी ने अपनी साइकिल दीवार से टिकाते हुए हड़बड़ाहट में पूछा।
“अंदर कमरे में है जी… दोपहर से दरवाजा बंद किए पड़ी है। न कुछ खाया है, न पानी पिया है। सिर्फ रोए जा रही है। बहुत आवाजें दीं, पर दरवाजा नहीं खोलती,” जानकी की आवाज भरभरा गई।
रघुनाथ जी के चेहरे पर चिंता की गहरी लकीरें खिंच गईं। उन्होंने अपने भारी कदमों को प्रज्ञा के कमरे की तरफ बढ़ाया। दरवाजे पर हाथ रखकर उन्होंने हल्के से थपथपाया, “प्रज्ञा… बेटा, दरवाजा खोल। देख तेरे पापा आए हैं।”
भीतर से केवल सिसकियों की आवाज आई।
“बेटा, अगर तू ऐसे दरवाजा बंद कर लेगी, तो हम किससे बात करेंगे? दरवाजा खोल, मुझे अपनी बेटी से बात करनी है,” रघुनाथ जी का स्वर बेहद कोमल था।
कुछ पलों की खामोशी के बाद सिटकनी खुलने की धीमी सी आवाज आई। रघुनाथ जी ने धीरे से दरवाजा धकेला। कमरे में खिड़कियों के पर्दे गिरे हुए थे और चारों तरफ घुप्प अंधेरा छाया हुआ था। कमरे का वह अंधेरा प्रज्ञा के मन की हताशा को साफ बयां कर रहा था। रघुनाथ जी ने दीवार पर हाथ फेरकर बिजली का स्विच दबा दिया।
अचानक रोशनी फैलते ही प्रज्ञा ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया, “पापा… बत्ती बुझा दीजिए। मुझे इस अंधेरे में ही रहने दीजिए। मैं इस उजाले का सामना करने के काबिल नहीं बची।”
रघुनाथ जी ने बत्ती बंद नहीं की। वे आगे बढ़े और प्रज्ञा के पास खाट पर बैठ गए। प्रज्ञा का रो-रोकर बुरा हाल था। उसकी आंखें सूजी हुई थीं और होंठ सूखे पड़े थे।
“क्या हुआ मेरी गुड़िया को?” रघुनाथ जी ने उसके सिर पर हाथ फेरा।
प्रज्ञा अपने आंसुओं का बांध और न रोक सकी। वह फूट-फूटकर रघुनाथ जी के सीने से लिपट गई, “पापा… मैं सब कुछ बर्बाद कर आई। मैं परीक्षा पास नहीं कर पाई। मेरी रैंक बहुत पीछे रह गई। पूरे साल की मेहनत, आपकी रात-दिन की कमाई, मां के कंगन… मैंने सब मिट्टी में मिला दिया। मुझे माफ कर दीजिए पापा, मैं एक अच्छी बेटी नहीं बन सकी।”
रघुनाथ जी ने उसके आंसुओं से भीगे चेहरे को अपनी हथेलियों में थाम लिया और बोले, “बस इतनी सी बात? तू इसके लिए अपनी जान सुखा रही है?”
“पापा, यह छोटी बात नहीं है!” प्रज्ञा हिचकियों के बीच चीख उठी। “आपने मेरे लिए अपने सुख-चैन को बेच दिया। एक दिन भी दुकान बंद नहीं की, बीमारी में भी दवा नहीं ली ताकि मेरी किताबें आ सकें। और मैंने क्या किया? मैं हार गई। अब मैं आगे कभी कोई किताब नहीं छूऊंगी। कोई इम्तिहान नहीं दूंगी। आप जहाँ कहेंगे, जिस लड़के से कहेंगे, मैं सिर झुकाकर शादी कर लूंगी। मेरा कोई सपना नहीं है अब। मैं आप पर और बोझ नहीं बन सकती।”
कमरे के दरवाजे पर जानकी और गरिमा भी आकर खड़े हो गए थे। जानकी की आंखों से भी आंसू बह रहे थे।
रघुनाथ जी ने एक गहरी सांस ली। उनकी आवाज में न तो कोई गुस्सा था और न ही कोई निराशा। उसमें सिर्फ एक पिता का अटूट संकल्प और परिपक्व समझ थी।
“प्रज्ञा, मेरी तरफ देख,” रघुनाथ जी ने धीर-गंभीर स्वर में कहा। प्रज्ञा ने सहमी नजरों से पिता को देखा।
“बेटा, जब तू छोटी थी और पहली बार चलना सीख रही थी, तो याद है तू कितनी बार गिरी थी?” रघुनाथ जी ने पूछा।
प्रज्ञा चुप रही।
रघुनाथ जी ने आगे कहा, “तू सौ बार गिरी होगी। घुटने भी छिले, रोई भी। अगर उस दिन तू यह सोच लेती कि गिरना एक पाप है और चलने की कोशिश बंद कर देती, तो क्या आज अपने पैरों पर खड़ी हो पाती? असफलता कोई अंतिम पड़ाव नहीं होती, बेटा। असफलता केवल यह बताती है कि सफलता का प्रयास पूरे मन से नहीं हुआ था या रास्ते में कहीं कोई कमी रह गई थी।”
“लेकिन पापा, आपके पैसे…”
“पैसे कागज के टुकड़े हैं प्रज्ञा!” रघुनाथ जी की आवाज में एक गूंज थी। “वे मेहनत से दोबारा कमाए जा सकते हैं। मैंने जो मेहनत की, वह किसी जुए में नहीं लगाई थी, अपनी बेटी की काबिलियत पर लगाई थी। मुझे अपनी मेहनत पर गर्व है और तेरी लगन पर पूरा भरोसा है। तूने साल भर जो तपस्या की है, क्या वह ज्ञान व्यर्थ हो गया? नहीं, वह तेरे भीतर है। तू हारी तब नहीं जब तेरा नाम लिस्ट में नहीं आया, तू तो तब हारेगी जब तू मैदान छोड़कर भाग जाएगी।”
तभी जानकी आगे बढ़ीं और प्रज्ञा के हाथ में पानी का गिलास थमाते हुए बोलीं, “तेरी माँ इतनी कमजोर नहीं है कि कंगन जाने पर रोए। मेरी असली दौलत तो मेरी बेटियां हैं। अगर हम दोनों तेरा साथ देने के लिए तैयार हैं, तो तू अपने कदम पीछे क्यों खींच रही है?”
गरिमा ने भी दीदी का हाथ थाम लिया, “दीदी, आप तो हमेशा मुझे सिखाती थीं कि जो डर गया वो मर गया। आज आप खुद डर रही हैं? मुझे अपनी डॉक्टर दीदी पर पूरा भरोसा है।”
प्रज्ञा अपने पूरे परिवार को देख रही थी। कोई उलाहना नहीं, कोई शिकायत नहीं, कोई ताना नहीं। केवल निस्वार्थ प्रेम, भरोसा और संबल। समाज जहाँ बेटियों की एक नाकामी पर उनके पर कतर कर उन्हें ब्याहने की जल्दी में लग जाता है, वहीं उसके अनपढ़ और गरीब माता-पिता उसके टूटे हुए पंखों को सहलाकर उसे फिर से उड़ने का हौसला दे रहे थे।
“तो… तो क्या आप लोग मुझसे सच में नाराज नहीं हैं?” प्रज्ञा ने रुंधे हुए कंठ से पूछा।
रघुनाथ जी मुस्कुराए, उनकी आंखों के कोरों में नमी चमक उठी, “नाराज हम तब होंगे जब हमारी शेरनी जैसी बेटी एक असफलता के सामने घुटने टेक देगी। उठ, अपने आंसू पोंछ। गलतियों को पहचान, देख कि कहाँ कमी रह गई। एक बार फिर पूरी ताकत से वार कर।”
प्रज्ञा ने अपनी दोनों हथेलियों से आंसुओं को पोंछ डाला। उसके भीतर की मायूसी की जगह अब एक नई ज्वाला ने ले ली थी। उसने पिता के सीने से लगकर दृढ़ स्वर में कहा, “पापा, मैं वादा करती हूँ। इस बार मैं अपनी गलतियों को सुधारूंगी। जब तक उस सफेद कोट को पहनकर आपके सामने नहीं आऊंगी, तब तक चैन की सांस नहीं लूंगी।”
कमरे में खिड़की के पर्दे हटा दिए गए। बाहर ढलती शाम के बाद आसमान में चांद अपनी शीतल रोशनी बिखेर रहा था। वह कमरा, जो कुछ देर पहले तक निराशा के घने अंधकार में डूबा था, अब नई उम्मीदों, दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास के उजालों से भर गया था। प्रज्ञा ने अपनी मेज पर बिखरी किताबों को समेटा और एक नए जोश के साथ अंधेरे से रोशनी की ओर अपना पहला मजबूत कदम बढ़ा दिया।
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