साझी देहरी की दीवार

“साथी ऐसे होते हैं क्या बलवंत जी?” मैंने भीतर आते हुए कहा, “दो साल पहले जब इस कॉलोनी से लोग पलायन कर रहे थे, तो हम दोनों ने इसी सोफे पर बैठकर कसम खाई थी कि चाहे कुछ भी हो जाए, हम अपना आशियाना छोड़कर नहीं जाएंगे। और अगर कभी जाने की नौबत आई भी, तो साथ तय करेंगे कि यहाँ कौन आएगा। पर आपने मुझे बिना बताए, चुपचाप उस कुख्यात कबाड़ी लाला मक्खनलाल से मकान का सौदा पक्का कर लिया? आपको पता भी है कि लाला यहाँ गोदाम बनाएगा, दिन-रात ट्रकों की आवाजाही होगी और असामाजिक गुंडों का जमघट लगेगा? हमारी बहु-बेटियों का निकलना दूभर हो जाएगा!”

सुबह की हल्की गुलाबी धूप अभी तुलसी के चौबारे पर उतरी ही थी कि बाहर गली में हलचल मच गई। चाय का घूंट भरते हुए मैंने खिड़की का पर्दा थोड़ा खिसकाया। सामने वाले घर की सीढ़ियों पर त्रिवेदी जी, यानी हमारे नए पड़ोसी, अपने हाथ में पीले रंग का एक भारी सा पैकेट थामे खड़े थे। उनकी नज़र रसोई की खिड़की से बर्तन मांजती मेरी पत्नी उमा पर पड़ी तो उन्होंने बेहद संकोच के साथ आवाज़ दी, “भाभी जी, मास्टर साहब घर पर हैं क्या? ज़रा उनसे दो मिनट मिल लेते।”

उमा ने हाथ पोंछते हुए बाहर की तरफ इशारा किया, “अरे त्रिवेदी जी, आइए-आइए, वो तो कब से बरामदे में ही बैठे अखबार उलट रहे हैं।”

त्रिवेदी जी भारी कदमों से अंदर आए। उनके चेहरे पर अजीब सी हड़बड़ाहट और गहरा अहसास था। उन्होंने टेबल पर रखी पुरानी अखबारी मेजपोश पर काजू कतली का डिब्बा रखा और अचानक आगे बढ़कर मुझे दोनों बांहों में भींच लिया। जब वे पीछे हटे, तो उनकी चश्मे के पीछे छुपी आँखें पूरी तरह छलछला रही थीं। हाथ जोड़ते हुए वे कांपते होंठों से कुछ कहना चाह रहे थे, पर आवाज़ कंठ में ही फंस कर रह गई थी।

मैं अचकचा गया। समझ नहीं आया कि हँसूँ या धीरज बंधाऊँ। मैंने मुस्कुराते हुए उनके कंधे पर हाथ रखा, “अरे त्रिवेदी भाई, सुबह-सुबह यह कैसी पहेली? मिठाई का डिब्बा भी लाए हैं और आँखों में सावन-भादो भी उमड़ रहा है! सब कुशल-मंगल तो है न? कोई बात बिगड़ गई क्या?”

त्रिवेदी जी ने कुरते की जेब से रूमाल निकालकर चश्मा उतारा और आँखें पोंछते हुए गहरी सांस ली, “मास्टर साहब… आज जब सब्जी मंडी में मेरी मुलाकात बलवंत सिंह जी से हुई, तो उन्होंने मुझे वह सच बताया जो आपने मुझसे छुपा रखा था। जबसे उनकी बात सुनी है, कलेजा भर आया है। मैं सोच भी नहीं सकता था कि इस मतलबी दौर में कोई इंसान पड़ोस की मर्यादा और एक भले परिवार के सम्मान के लिए इतना बड़ा त्याग भी कर सकता है!”

त्रिवेदी जी की बात सुनकर मेरा अतीत में चला गया मन अचानक उस खिड़की पर जाकर टिक गया, जहाँ से इस पूरी कहानी की नींव पड़ी थी।

यह बात मुश्किल से दस-बारह दिन पुरानी थी। हमारी ‘शांति विहार’ कॉलोनी कभी एक गुलज़ार बस्ती हुआ करती थी, जहाँ हर शाम बच्चों की किलकारियों और बुजुर्गों की गपशप से सड़कें चहकती थीं। लेकिन पिछले पाँच-सात सालों में शहर का मिजाज बदला। नए कमर्शियल हब बनने लगे, पुराने मोहल्ले में प्रॉपर्टी डीलरों के गिद्ध मंडराने लगे। धीरे-धीरे पुराने बाशिंदे अपने पुश्तैनी मकान ऊँचे दामों में बिल्डरों और बाहरी व्यापारियों को बेचकर दूर-दराज की पॉश कॉलोनियों में बसते चले गए।

जो नए लोग आ रहे थे, वे या तो उन मकानों को गोदामों में तब्दील कर रहे थे या फिर ऐसे असामाजिक तत्वों को भारी किराए पर चढ़ा रहे थे जिनका मोहल्ले के मान-सम्मान और चैन-ओ-अमन से कोई वास्ता नहीं था। शाम ढलते ही शराब की बोतलें, गाली-गलौज और गाड़ियों का अंधाधुंध शोर आम बात होने लगी थी। हमारे इर्द-गिर्द के सात-आठ परिवार जा चुके थे। अब उस पूरी कतार में केवल दो ही पुराने घर बचे थे—एक मेरा और ठीक सामने हमारे लंगोटिया यार, बलवंत सिंह जी का।

जब बलवंत जी के घर के बाहर भी ‘मकान बिकाऊ है’ का बोर्ड टंगा, तो उमा अंदर तक टूट गई थी। एक शाम उसने आँगन में लगे उस पारिजात के पेड़ के तने पर हाथ फेरते हुए मुझसे सजल नेत्रों से कहा था, “सुनिए जी, क्या हमें भी यह सब छोड़कर जाना पड़ेगा? हमारे बच्चों का बचपन इन दीवारों में कैद है, बाबूजी की अंतिम सांसें इस आँगन ने देखी हैं। अगर बलवंत भाई साहब भी चले गए, तो हम अकेले इस वीराने में कैसे जी पाएंगे? पड़ोसिन भाभी तो कह रही थीं कि तुम भी देर मत करो, बाज़ार में जैसे ही कोई ग्राहक मिले, घर निपटा दो, वरना बाद में औने-पौने दाम भी नहीं मिलेंगे।”

मैंने उमा के कंधे पर हाथ रखकर भरोसा तो दिलाया कि हम कहीं नहीं जाएंगे, लेकिन सच यह था कि मेरे अपने भीतर का हौसला भी डोल रहा था। जिस मोहल्ले को अपना खून-पसीना देकर सींचा हो, उसे यूं बिखरते देखना किसी जीते-जी मरने जैसा था।

दुख जब बर्दाश्त से बाहर हो गया, तो मैं एक शाम सीधे बलवंत जी के घर पहुँच गया। बलवंत जी ड्राइंग रूम में कुछ कागज़ात समेट रहे थे।

मैंने दरवाज़े पर ही खड़े होकर, अपने स्वभाव के विपरीत थोड़ी तल्ख आवाज़ में कहा, “बलवंत भाई, आपने हमारे साथ दगा किया है!”

बलवंत जी चौंक गए। उन्होंने चश्मा माथे पर सरकाया और हैरान होकर बोले, “कैसी बातें कर रहे हो, मास्टर? मैंने तुम्हारे साथ क्या दगा कर दिया? हम तो चालीस साल के साथी हैं।”

“साथी ऐसे होते हैं क्या बलवंत जी?” मैंने भीतर आते हुए कहा, “दो साल पहले जब इस कॉलोनी से लोग पलायन कर रहे थे, तो हम दोनों ने इसी सोफे पर बैठकर कसम खाई थी कि चाहे कुछ भी हो जाए, हम अपना आशियाना छोड़कर नहीं जाएंगे। और अगर कभी जाने की नौबत आई भी, तो साथ तय करेंगे कि यहाँ कौन आएगा। पर आपने मुझे बिना बताए, चुपचाप उस कुख्यात कबाड़ी लाला मक्खनलाल से मकान का सौदा पक्का कर लिया? आपको पता भी है कि लाला यहाँ गोदाम बनाएगा, दिन-रात ट्रकों की आवाजाही होगी और असामाजिक गुंडों का जमघट लगेगा? हमारी बहु-बेटियों का निकलना दूभर हो जाएगा!”

बलवंत जी ने नज़रें चुरा लीं। वे कुछ देर खामोश रहे, फिर अपनी लाचारी जताते हुए बोले, “मास्टर, तुम जज्बाती हो रहे हो। मैं भी तो मजबूर हूँ। मेरे बेटे को कनाडा जाने के लिए पैसों की सख्त दरकार है। मैंने त्रिवेदी जी को यह घर देने की पूरी कोशिश की थी। त्रिवेदी जी शरीफ आदमी हैं, सरकारी स्कूल के रिटायर्ड शिक्षक हैं, उनका परिवार भी संस्कारी है। लेकिन वे मेरे मांगे रेट से पूरे तीन लाख रुपये कम दे रहे हैं। जबकि लाला मक्खनलाल मुझे मुंहमांगी कीमत कैश में दे रहा है। तुम ही बताओ, अपने बुढ़ापे में मैं तीन लाख का घाटा क्यों सहूँ?”

“घाटा और नफा ही सब कुछ होता है क्या, बलवंत भाई?” मैंने उन्हें कुरेदा, “त्रिवेदी जी जैसा भला, सभ्य और सात्विक परिवार अगर आपका पड़ोसी बनेगा, तो इस मोहल्ले की रूह ज़िंदा रहेगी। लाला के चंद रुपयों के लालच में आप इस पूरी गली का सुकून दांव पर लगा रहे हैं?”

“कहना बहुत आसान है मास्टर! पर तीन लाख कोई छोटी रकम नहीं होती। मैं अपनी जेब से तीन लाख का नुकसान नहीं उठा सकता,” बलवंत जी अपनी जिद पर अड़े रहे।

कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। मुझे अपनी सारी जमा-पूंजी, अपनी पेंशन और भविष्य की तमाम जरूरतें एक पल में घूमती नज़र आईं। लेकिन दूसरी तरफ मेरे सामने तीस साल का वह रिश्ता और अपने घर की शांति थी।

मैंने गहरी सांस ली और बलवंत जी की आँखों में आँखें डालकर पूछा, “यानी सारा फसाद सिर्फ उन तीन लाख रुपयों का है?”

“हाँ, वही तीन लाख!” बलवंत जी ने रूखेपन से जवाब दिया।

“ठीक है। वो तीन लाख रुपये आप मुझसे ले लीजिए। पर शर्त यह है कि यह मकान आप त्रिवेदी जी को ही बेचेंगे, और इस बात की भनक त्रिवेदी जी के कानों तक नहीं पड़नी चाहिए।”

बलवंत जी अवाक रह गए। उन्हें लगा शायद मैं मज़ाक कर रहा हूँ। लेकिन जब मैं अपने घर गया और अपनी संदूकची से अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट तोड़कर लाया हुआ तीन लाख का चेक लाकर उनके हाथ में थमा दिया, तो उनके हाथ कांपने लगे। उनका चेहरा शर्म और अचरज के मिले-जुले भावों से पीला पड़ गया।

“यह… यह क्या कर रहे हो मास्टर? तुम पागल हो गए हो क्या? अपनी गाढ़ी कमाई का चेक मुझे दे रहे हो? और ऊपर से कह रहे हो कि त्रिवेदी को बताना भी मत! अगर मैं उसे बता दूँगा, तो कम से कम वह अहसानमंद होकर भविष्य में तुम्हें पाई-पाई लौटा तो देगा!” बलवंत जी की आवाज़ में कंपन था।

मैंने मुस्कुराते हुए उनका हाथ पकड़ लिया, “बलवंत भाई, त्रिवेदी जी स्वाभिमानी इंसान हैं। अगर उन्हें पता चला कि उनके मकान के लिए किसी तीसरे ने अपनी जेब से पैसे भरे हैं, तो उनका स्वाभिमान उन्हें यह सौदा कभी करने नहीं देगा। वे हाथ पीछे खींच लेंगे। और मैं यह सौदा किसी एहसान के लिए नहीं, अपनी देहरी की सलामती के लिए कर रहा हूँ। एक शरीफ और नेक इंसान अगर मेरा पड़ोसी बन जाए, तो उसके आगे मेरे लिए यह तीन लाख रुपये तिनके के बराबर हैं। शांति और गरिमा की कोई कीमत नहीं होती, भाई साहब।”

मेरी यह बात सुनकर उम्र में मुझसे सात साल बड़े बलवंत जी की रीढ़ मानो झुक गई। उनका अहंकार, उनका नफा-नुकसान सब कुछ उस चेक की कागज़ी औकात के सामने बौना साबित हो गया। उनकी आँखों से टप-टप आंसू गिर पड़े।

उन्होंने एक पल मुझे देखा, फिर उस तीन लाख के चेक को बीच से फाड़कर दो टुकड़े कर दिए और मेज पर फेंक दिया।

“मुझे माफ़ कर दो, मेरे भाई,” बलवंत जी रुंधे गले से बोले, “आज तुमने मुझे सिखा दिया कि दौलत जेब में होती है, इंसानियत सीने में। मैं इतना गिर गया था कि चंद कागज़ के टुकड़ों के लिए अपने भाई के घर की शांति बेचने चला था। मुझे ये तीन लाख नहीं चाहिए। यह मकान त्रिवेदी जी का ही होगा, उसी दाम में जो वे दे सकते हैं!” और उसी वक्त उन्होंने अपने फोन से त्रिवेदी जी का नंबर मिला दिया था।

…वर्तमान में लौटते हुए, जब मैंने त्रिवेदी जी को देखा, तो वे अब भी उसी श्रद्धा भाव से मुझे निहार रहे थे।

“मास्टर साहब,” त्रिवेदी जी ने मेरा हाथ अपने दोनों हाथों में थामते हुए कहा, “बलवंत जी ने आज जब मुझे यह दास्तान सुनाई, तो मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उन्होंने कहा कि मास्टर ने मुझे इंसान बना दिया, वरना मैं तो सौदागर बन चुका था। आज मैं यहाँ सिर्फ मिठाई खिलाने नहीं आया हूँ। आज मैं आपको यह वचन देने आया हूँ कि जब तक इस सीने में सांस है, यह पड़ोसी आपके हर सुख में पीछे और हर दुख में सबसे आगे खड़ा रहेगा। अब यह मकान सिर्फ मेरा नहीं, हमारी साझी देहरी है।”

बरामदे के कोने में खड़ी उमा की आँखों में भी खुशी के आंसू चमक रहे थे। हवा में पारिजात के फूलों की खुशबू तैर रही थी। मुझे लगा, जैसे उजड़ते हुए शहर के बीचों-बीच, इंसानियत और अपनत्व का एक छोटा सा खूबसूरत बगीचा फिर से लहलहा उठा था।

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