ड्राइंग रूम के सोफे पर बैठी नंदिनी अपने पच्चीस साल के बेटे सिद्धार्थ को सूटकेस पैक करते हुए देख रही थी। सिद्धार्थ कल सुबह मुंबई जा रहा था, लेकिन मुंबई जाने से पहले उसे शहर के दूसरे कोने में अपने पिता से मिलने जाना था। जब नंदिनी ने देखा कि वह अपने पिता की ‘दूसरी पत्नी’ के लिए भी एक महंगा तोहफा पैक कर रहा है, तो उसके भीतर जैसे किसी ने मुट्ठी भर रेत डाल दी हो। नंदिनी अपने बेटे से अक्सर यह पूछना चाहती थी कि जब वह अपने पिता को किसी पराई स्त्री के साथ उसी घर में हंसते-मुस्कुराते देखता है, जिस घर की नींव उसकी माँ ने रखी थी, तो उसे कैसा महसूस होता है? क्या उसके खून में कभी यह उबाल नहीं आता कि जिस जगह पर उस दूसरी औरत का कब्ज़ा है, वह जगह असल में उसकी माँ की है?
लेकिन नंदिनी यह सवाल कभी नहीं पूछती। वह जानती है कि सिद्धार्थ का जवाब क्या होगा। वह बहुत ही सहजता से कह देगा, “मॉम, उन्होंने शादी कर ली है, हमें मूव ऑन करना चाहिए।” सिद्धार्थ एक नामी मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता है, उसने कानून और समाज की किताबें पढ़ी हैं। वह बहुत अच्छी तरह जानता है कि उसकी माँ, नंदिनी से कानूनी तौर पर तलाक लिए बिना उसके पिता का वह दूसरा रिश्ता पूरी तरह से अवैध है। लेकिन फिर भी, एक पुरुष होने के नाते वह अपने पिता के इस गुनाह को बहुत आसानी से ‘हालात’ या ‘निजी चुनाव’ का नाम देकर स्वीकार कर लेता है।
विडंबना तो देखिए, वही सिद्धार्थ जब नंदिनी के एनजीओ के किसी पुरुष सहकर्मी या किसी पुराने कॉलेज मित्र को घर पर चाय पीते हुए देखता है, तो उसकी आँखों में एक अजीब सी वितृष्णा और शक तैरने लगता है। वह अच्छी तरह जानता है कि वह व्यक्ति सिर्फ एक सहकर्मी है और उनकी बातचीत पूरी तरह से औपचारिक और काम तक सीमित है, फिर भी उसके माथे पर बल पड़ जाते हैं। नंदिनी को याद है, कुछ साल पहले जब उसने अपने काम के सिलसिले में घर का एक कमरा एक सज्जन को किराए पर दिया था, तो सिद्धार्थ ने आसमान सिर पर उठा लिया था। उसकी नज़रों में एक अनकहा सा सवाल होता था कि कहीं उसकी माँ की उस पुरुष के साथ कोई अंतरंगता तो नहीं है?
नंदिनी सोचती है कि आधुनिकता का चोला ओढ़ने वाला उसका बेटा असल में कितना खोखला है। सिद्धार्थ खुद मुंबई में एक बेहद ‘ओपन’ लाइफस्टाइल जीता है। वह अपने फ्लैट में कई लड़कियों के साथ पार्टी करता है, यहाँ तक कि शुरुआत के दिनों में वह एक लड़की के साथ रूम भी शेयर करता था। उसने तब कहा था, “मॉम, यह बहुत नॉर्मल है, हम सिर्फ अच्छे दोस्त हैं और रूममेट्स हैं।” अगर एक लड़का और लड़की सिर्फ दोस्त हो सकते हैं, तो वही नियम उसकी माँ पर क्यों लागू नहीं होता? वह अपनी माँ के जीवन में किसी पुरुष की एक सामान्य उपस्थिति से भी इतना आशंकित क्यों हो जाता है?
सिद्धार्थ बहुत महत्वाकांक्षी और मेहनती है। बारहवीं के बाद जब उसके पिता ने दूसरी औरत को घर में ला बिठाया, तो उस सौतेली माँ के रोज-रोज के तानों और पक्षपात से तंग आकर सिद्धार्थ घर छोड़कर चला गया था। उसने कॉल सेंटर में रात-रात भर काम किया, खुद की पढ़ाई का खर्च उठाया और बिना किसी परिवार की मदद के अपना एक मुकाम बनाया। वैसे भी उसके पिता के पास अपनी उस नई पत्नी और उससे हुए बच्चों की जिम्मेदारियों से फुर्सत ही कहाँ थी जो वे सिद्धार्थ की ओर ध्यान देते।
नंदिनी अपने बेटे के इस कड़े संघर्ष की तहे दिल से इज्ज़त करती है। उसे फख्र है कि उसका बेटा अपने पैरों पर खड़ा है। लेकिन उसे जो बात सबसे ज्यादा चुभती है, वह यह है कि सिद्धार्थ उसकी, यानी अपनी माँ की महत्वाकांक्षा और संघर्ष को हमेशा गलत या मामूली क्यों समझता है?
नंदिनी का अतीत भी तो कांटों से भरा था। उसका पति, विकास, उस दूसरी औरत के प्रेम में इतना अंधा हो चुका था कि उसने नंदिनी को घर में एक कैदी की तरह रखा हुआ था। न उसे बाहर जाने की इजाज़त थी, न ही आगे पढ़ने की। जब घुटन बर्दाश्त से बाहर हो गई, तो नंदिनी को भी समाज की उन किले जैसी मजबूत और ऊंची दीवारों को तोड़कर भागना पड़ा था। उसने अकेले रहकर अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी की, सिलाई-कढ़ाई करके पैसे जुटाए और फिर महिलाओं के हक के लिए अपना एक एनजीओ खड़ा किया।
नंदिनी अक्सर खुद से सवाल करती है कि अगर पिता के घर के दमघोंटू माहौल से सिद्धार्थ का भागना सही था, तो अपने स्वाभिमान और जीवन की रक्षा के लिए मेरा भागना गलत कैसे हो गया?
सिद्धार्थ हमेशा अपने संघर्ष को एक ‘हीरो’ की तरह पेश करता है। वह मानता है कि उसने दुनिया जीती है। जबकि सच्चाई यह है कि जब सिद्धार्थ संघर्ष कर रहा था, तब भले ही वह अकेला था, लेकिन वह एक पुरुष था। समाज की सड़कें एक युवा लड़के के लिए उतनी खौफनाक नहीं होतीं। नंदिनी के साथ तो सच में कोई नहीं था। एक अकेली, परित्यक्ता स्त्री का संघर्ष किसी भी पुरुष के संघर्ष से हज़ार गुना ज्यादा कठिन और खतरनाक होता है। भले ही लड़ाई का मैदान एक ही हो, लेकिन एक औरत को पैसे और करियर के साथ-साथ हर कदम पर भूखे भेड़ियों जैसी नज़रों से अपनी देह और अपनी अस्मिता बचाने का एक अलग और खामोश संघर्ष भी करना पड़ता है।
पर सिद्धार्थ यह सब कुछ नहीं मानता। जब भी नंदिनी कभी अपनी पुरानी तकलीफों का ज़िक्र करती है, तो वह बहुत ही रूखेपन से कहता है, “मॉम, प्लीज! सब संघर्ष करके ही आगे बढ़ते हैं। दुनिया में हर कोई लड़ रहा है, आपने कोई बड़ा तीर नहीं मार लिया है!”
नंदिनी चुप रह जाती है। उसे समझ आ गया है कि उसके बेटे की इस सोच में जो इतना बड़ा झोल है, वह उसकी शिक्षा की कमी नहीं, बल्कि उसकी जड़ों में बैठी पितृसत्ता है। वह चाहे जितना भी मॉडर्न क्यों न हो जाए, वह आज भी स्त्री और पुरुष को एक समान दृष्टि से नहीं देख सकता। उसकी निगाह में पुरुष के गुनाह उसकी ‘आज़ादी’ हैं और उसका संघर्ष उसकी ‘महानता’, लेकिन एक स्त्री, चाहे वह उसकी माँ ही क्यों न हो, उसकी निगाह में बस एक स्त्री है, जिसे सिर्फ त्याग और पवित्रता के एक बहुत ही संकीर्ण सांचे में फिट बैठना चाहिए।
क्या हमारे समाज के पढ़े-लिखे युवाओं की सोच भी अंदर से इतनी ही खोखली है? क्या एक माँ को हमेशा शक के दायरे में रखना और पिता की गलतियों पर पर्दा डालना ही आज की पीढ़ी का न्याय है? अपनी राय हमें कमेंट में जरूर बताएं।
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