ममता के नियम

अंजलि के जाते ही कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया मानो किसी ने वक्त को वहीं थाम दिया हो। अंजलि के उन चंद शब्दों ने सुमित्रा देवी के अंतर्मन पर किसी हथौड़े की तरह वार किया था। उनके पास अंजलि की बात का कोई जवाब नहीं था। जो नसीहतें वे अपनी बेटी को उसके ससुराल वालों के खिलाफ दे रही थीं, अंजलि ने उसी नसीहत का आईना सुमित्रा देवी के सामने रख दिया था। 

सुबह की पहली किरण के साथ ही सुमित्रा देवी के घर का आंगन बर्तनों की खनक और झाड़ू की सरसराहट से जाग उठता था। घर की बहू, अंजलि, पिछले तीन सालों से इस घर की धुरी बनी हुई थी। उसका दिन सुबह पाँच बजे शुरू होता और रात के ग्यारह बजे तक वह एक मशीन की तरह काम करती रहती। सुमित्रा देवी स्वभाव से बेहद सख्त और पारंपरिक विचारों वाली महिला थीं। उनका मानना था कि बहू चाहे कितनी भी पढ़ी-लिखी क्यों न हो, उसकी असली परीक्षा रसोई और घर के कामकाज में ही होती है। अंजलि ने भी बिना किसी शिकायत के इस जीवन को अपना लिया था। वह अपने पति राहुल और सास सुमित्रा देवी की हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का ध्यान रखती, लेकिन बदले में उसे अक्सर ताने और कमियों का ही सामना करना पड़ता। “चाय में पत्ती ज़्यादा हो गई,” “दाल में नमक कम है,” “कपड़े ठीक से इस्त्री नहीं हुए”—ये सुमित्रा देवी के रोज़मर्रा के संवाद थे, जिन्हें अंजलि खामोशी से पी जाती थी।

आज का दिन घर में कुछ खास था। सुमित्रा देवी की इकलौती और लाडली बेटी, शिखा, शादी के छः महीने बाद पहली बार कुछ दिनों के लिए मायके आ रही थी। शिखा की शादी एक बहुत ही संपन्न और बड़े परिवार में हुई थी। सुबह से ही सुमित्रा देवी ने अंजलि को हुक्मों की झड़ी लगा रखी थी। “अंजलि, शिखा को पनीर की सब्ज़ी बहुत पसंद है, वो बना लेना। और हाँ, बेसन के लड्डू भी तैयार रखना, वो हमेशा कहती है कि मेरे हाथ के लड्डू उसे बहुत याद आते हैं। घर का कोना-कोना चमकना चाहिए, मेरी बेटी को कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए।” अंजलि बिना उफ किए रसोई में पसीने से लथपथ होकर सारे पकवान तैयार कर रही थी। उसे अपनी ननद के आने की खुशी थी, लेकिन काम के बोझ और सास के लगातार पड़ते दबाव ने उसे भीतर तक थका दिया था।

दोपहर के करीब बारह बजे दरवाजे पर गाड़ी रुकने की आवाज़ हुई। सुमित्रा देवी दौड़कर दरवाज़े तक गईं। शिखा कार से उतरी, उसके चेहरे पर एक अजीब सी थकान और झुंझलाहट थी। सुमित्रा देवी ने अपनी बेटी को गले लगा लिया और उसकी आरती उतारकर उसे अंदर लाईं। शिखा सीधे अपनी माँ के कमरे में जाकर बिस्तर पर लेट गई। अंजलि ने मुस्कुराकर शिखा का स्वागत किया और उसके लिए ठंडा शरबत लेकर आई, लेकिन सुमित्रा देवी ने अंजलि को तुरंत रसोई में वापस भेज दिया कि वह जल्दी से ताज़ा खाना परोसे।

कमरे में अब माँ और बेटी अकेली थीं। सुमित्रा देवी ने प्यार से शिखा के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, “क्या बात है मेरी गुड़िया? चेहरा इतना उतरा हुआ क्यों है? ससुराल में सब ठीक तो है न? तेरे सास-ससुर और ननदें कैसा बर्ताव करते हैं तेरे साथ?”

शिखा, जो मानो इसी सवाल का इंतज़ार कर रही थी, भड़क उठी। “माँ, क्या बताऊँ! आपने मुझे किस जेल में धकेल दिया है? वो घर नहीं, एक कारखाना है। सुबह से लेकर रात तक बस काम, काम और काम। सासू माँ को तो मेरी कोई परवाह ही नहीं है। उन्हें बस अपने नियम और कायदों से मतलब है। मेरी दोनों ननदें तो बस हुक्म चलाना जानती हैं। अगर मैं एक कप चाय भी अपने लिए बनाकर बैठ जाऊँ, तो चारों तरफ से आँखें तन जाती हैं। मुझे तो ऐसा लगता है जैसे मैं उस घर की बहू नहीं, कोई बिना पगार की नौकरानी हूँ। मेरी तो ज़िंदगी ही नर्क हो गई है माँ!”

शिखा की बातें सुनकर सुमित्रा देवी की आँखों में आँसू आ गए। उनका मातृत्व अपनी बेटी की तकलीफ सुनकर तड़प उठा। उनका चेहरा गुस्से से लाल हो गया और वे अपनी बेटी को सांत्वना देते हुए बोलीं, “हे मेरे भगवान! मेरी इतनी नाज़ुक सी बच्ची, जिसे मैंने कभी एक गिलास पानी तक खुद नहीं लेने दिया, वो उस घर में पिस रही है? ये लोग कितने ज़ालिम हैं! शिखा, तू बिल्कुल चिंता मत कर। तुझे किसी से दबने या डरने की ज़रूरत नहीं है। तू कोई बेसहारा नहीं है। तू उस घर की बहू है, कोई दासी नहीं। अब से अगर कोई तुझ पर हुक्म चलाए, तो तू भी मुँह तोड़ जवाब देना।”

शिखा ने अपने आँसू पोंछते हुए कुछ तेज़ स्वर में कहा, “हाँ माँ, आप सही कह रही हैं। मैं भी अब चुप नहीं रहने वाली। अबकी बार जब मैं वहाँ वापस जाऊँगी, तो अपने साथ एक बड़ी सी कैंची लेकर जाऊँगी। जो भी ननद या सासू माँ मुझ पर ताना कसेगी, उसी कैंची से उनकी ज़बान कतर दूँगी। बहुत सह लिया मैंने, अब और नहीं।” शिखा के इन शब्दों में मायके के लाड-प्यार से उपजा हुआ एक अजीब सा गुरूर और गुस्सा था।

सुमित्रा देवी ने बेटी की पीठ थपथपाते हुए कहा, “बिल्कुल सही! यही करना तू। औरत को अपना हक छीनना आना चाहिए। हम अपनी बेटियों को ससुराल में ज़ुल्म सहने के लिए नहीं भेजते। तू शेरनी बन कर रह उस घर में।”

ठीक उसी समय, दरवाज़े पर एक हल्की सी आहट हुई। अंजलि, जिसके हाथों में खाने से सजी हुई एक बड़ी सी ट्रे थी, कमरे में दाखिल हुई। उसने माँ-बेटी की यह पूरी बातचीत सुन ली थी। अंजलि के चेहरे पर थकान थी, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी शांति थी। जैसे ही सुमित्रा देवी की नज़र अंजलि पर पड़ी, उनका मातृत्व जो कुछ पल पहले शिखा के लिए उबल रहा था, वह अचानक एक कठोर सास के रूप में बदल गया। अपनी बेटी की ससुराल की सारी खीझ, सारा गुस्सा उन्होंने बिना सोचे-समझे अपनी ही बहू पर उतार दिया।

“अंजलि! तुम यह खाना अब लेकर आ रही हो? क्या तुम्हें घड़ी देखना नहीं आता? मेरी बच्ची सुबह से सफर करके आई है, भूख के मारे उसकी जान निकल रही होगी, और महारानी जी को खाना लाने में इतनी देर लग गई! एक काम मैंने तुम्हें सौंपा था, वो भी तुम ढंग से नहीं कर सकती। मेरे तो भाग्य ही खोटे हैं जो मुझे तुम्हारे जैसी सुस्त और बेपरवाह बहू मिली है। पता नहीं तुम्हारे मायके वालों ने तुम्हें कुछ तमीज़ और तौर-तरीके सिखाए भी हैं या बस ऐसे ही हमारे मत्थे मढ़ दिया!” सुमित्रा देवी की आवाज़ कमरे की दीवारों से टकराकर लौट रही थी।

कमरे में एक पल के लिए भारी सन्नाटा छा गया। शिखा अपनी माँ के इस रूप को देखकर थोड़ी असहज हुई, लेकिन वह कुछ नहीं बोली। अंजलि चुपचाप आगे बढ़ी और उसने सलीके से खाने की ट्रे मेज़ पर रख दी। रोज़ाना ताने सुनने वाली अंजलि आज कुछ अलग महसूस कर रही थी। उसने कुछ पल पहले ही सुना था कि कैसे एक माँ अपनी बेटी को ससुराल में ‘शेरनी’ बनने और ज़बान पर ‘कैंची’ चलाने की नसीहत दे रही थी, और वही माँ अपनी बहू को एक मामूली सी देरी पर अपमानित कर रही थी। अंजलि का स्वाभिमान आज खामोश रहने को तैयार नहीं था।

अंजलि सीधी खड़ी हुई। उसने सुमित्रा देवी की आँखों में आँखें डालीं, उसकी आवाज़ में न तो कोई गुस्सा था, न ही कोई बदतमीज़ी, बस एक गहरी और चुभने वाली सच्चाई थी।

“माँ जी,” अंजलि ने बेहद शांत स्वर में कहना शुरू किया, “मेरी माँ ने मुझे घर-गृहस्थी के सारे संस्कार दिए हैं। उन्होंने मुझे बड़ों का सम्मान करना, सबका पेट भरना और हर परिस्थिति में ढलना सब सिखाया है। लेकिन हाँ… शायद मेरी माँ से एक बड़ी चूक हो गई। वो मुझे विदाई के वक्त वो ‘कैंची’ देना भूल गईं, जिसका ज़िक्र अभी शिखा दीदी कर रही थीं। मुझे लगता है, अबकी बार जब मैं अपने मायके जाऊँगी, तो अपनी माँ से वो कैंची ज़रूर माँग कर लाऊँगी। वैसे, मुझे ज़्यादा कैंचियों की ज़रूरत नहीं पड़ेगी माँ जी, मेरा काम तो सिर्फ एक कैंची से ही चल जाएगा।”

यह कहकर अंजलि ने एक नज़र शिखा पर डाली, जो अब नज़रें चुरा रही थी, और फिर बिना कोई और शब्द कहे, वह कमरे से बाहर निकल गई।

अंजलि के जाते ही कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया मानो किसी ने वक्त को वहीं थाम दिया हो। अंजलि के उन चंद शब्दों ने सुमित्रा देवी के अंतर्मन पर किसी हथौड़े की तरह वार किया था। उनके पास अंजलि की बात का कोई जवाब नहीं था। जो नसीहतें वे अपनी बेटी को उसके ससुराल वालों के खिलाफ दे रही थीं, अंजलि ने उसी नसीहत का आईना सुमित्रा देवी के सामने रख दिया था। शिखा भी खामोश थी, क्योंकि उसे भी यह एहसास हो गया था कि जो शिकायतें वह अपनी सास और ननदों से कर रही है, ठीक वैसा ही या उससे भी बुरा बर्ताव उसकी अपनी माँ, उसकी भाभी के साथ कर रही है। दोनों माँ-बेटी के गले से खाना नीचे नहीं उतर रहा था। उस दिन उस कमरे में रखे हुए स्वादिष्ट पकवानों से ज़्यादा कड़वा वह सच था, जिसे अंजलि ने बेहद शालीनता से परोस दिया था।

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