निशा जब भी आईने के सामने खड़ी होती थी, तो उसे अपनी आँखों की गहराई में एक अजीब सी खामोशी नज़र आती थी। लाल रंग की खूबसूरत बनारसी साड़ी, माथे पर सजी चमकती बिंदी और कलाइयों में खनकती चूड़ियाँ—आज वह पूरी तरह से एक सजी-धजी और खुशहाल पत्नी लग रही थी। लेकिन इस खुशी के पीछे एक ऐसा अतीत था, जिसने निशा को सालों तक रुलाया था। निशा का इस पूरी दुनिया में अपना खून का कोई रिश्ता नहीं था। उसका पूरा बचपन ‘ममता सदन’ नाम के एक अनाथालय की सर्द और बेजान दीवारों के बीच बीता था।
उसे आज भी याद था कि कैसे हर दिवाली या होली पर वह अनाथालय के बड़े से लोहे के गेट के पास खड़ी रहती थी। दूसरे बच्चे जब खिलौने और मिठाइयां देखकर खुश होते, तब निशा की छोटी-सी आँखें सिर्फ किसी ऐसे इंसान को ढूंढ़ती थीं जो आकर कहे, “निशा, मैं तुम्हारा अपना हूँ। चलो, घर चलते हैं।” लेकिन वह इंतज़ार कभी खत्म नहीं हुआ। अनाथालय की वो रातें बहुत लंबी और डरावनी होती थीं, जहाँ उसे लोरी सुनाने वाली कोई माँ नहीं थी और गिरने पर संभालने वाला कोई पिता नहीं था। उसने अपनी पूरी ज़िंदगी खुद को एक अनचाहा बोझ ही समझा था।
लेकिन हर अँधेरी रात के बाद एक सुबह जरूर आती है, और निशा की ज़िंदगी में वह सुबह बनकर आया ‘अनुराग’।
अनुराग शहर के उसी बैंक में काम करता था, जहाँ निशा ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद क्लर्क की नौकरी जॉइन की थी। निशा हमेशा अपने काम से काम रखती थी। लंच ब्रेक में भी वह अपनी सीट पर अकेली बैठकर खाना खाती। उसकी इस खामोशी और गहरी उदासी ने अनुराग का ध्यान अपनी ओर खींचा। अनुराग एक बेहद हंसमुख, सुलझा हुआ और खुले विचारों वाला इंसान था। उसने धीरे-धीरे निशा से बातचीत शुरू की। पहले दोस्ती हुई और फिर अनुराग ने निशा के उस खालीपन को इस कदर समझ लिया, जैसे वह निशा की आत्मा को पढ़ सकता हो।
जब अनुराग ने निशा के सामने शादी का प्रस्ताव रखा, तो निशा घबरा गई थी। उसने रोते हुए कहा था, “अनुराग, मेरे पास तुम्हें देने के लिए कोई परिवार नहीं है। मेरे पीछे खड़े होने वाले कोई रिश्तेदार नहीं हैं। समाज क्या कहेगा कि तुमने एक अनाथ लड़की से शादी कर ली?”
तब अनुराग ने निशा के आंसू पोंछते हुए बहुत ही कोमलता से कहा था, “निशा, रिश्ते खून से नहीं, प्यार और परवाह से बनते हैं। आज से तुम्हारे आंसुओं का सफर यहीं खत्म होता है। अब तुम कभी अकेली नहीं हो। मैं सिर्फ तुम्हारा पति नहीं, तुम्हारा परिवार हूँ, तुम्हारा सबसे पक्का दोस्त हूँ, और तुम्हारा वो साया हूँ जो धूप हो या छाँव, हमेशा तुम्हारे साथ चलेगा।”
अनुराग ने सिर्फ ये बातें कही नहीं, बल्कि उन्हें जी कर दिखाया। उसने अपने परिवार को मनाया और पूरे सम्मान के साथ निशा को अपने घर की बहू बनाकर लाया। निशा को जो प्यार एक पिता से मिलना चाहिए था, वह अनुराग के संरक्षण में मिला, जो दुलार एक दोस्त से चाहिए था, वह अनुराग की हंसी-ठिठोली में मिला।
आज उनकी शादी को पूरे चार साल हो गए थे। निशा आईने के सामने खड़ी अपने उसी अतीत को याद करके मुस्कुरा रही थी। आज शाम को दोनों ने अपनी एनिवर्सरी के मौके पर शहर के एक बहुत ही शानदार रेस्टोरेंट में डिनर करने का प्लान बनाया था। निशा तैयार होकर कमरे में बैठी अनुराग का इंतज़ार कर रही थी कि तभी दरवाजे की घंटी बजी।
अनुराग अपने हाथ में गुलाबों का एक बड़ा सा गुलदस्ता लिए खड़ा था। “हैप्पी एनिवर्सरी, मेरी जान!” उसने मुस्कुराते हुए गुलदस्ता निशा को थमा दिया।
“थैंक यू अनुराग। चलें? मुझे बहुत ज़ोर की भूख लगी है,” निशा ने अपना पर्स उठाते हुए कहा।
अनुराग ने गाड़ी स्टार्ट की, लेकिन गाड़ी रेस्टोरेंट के रास्ते पर जाने के बजाय शहर के एक पुराने इलाके की तरफ मुड़ गई। निशा ने अचरज से पूछा, “अनुराग, हम कहाँ जा रहे हैं? रेस्टोरेंट तो दूसरी तरफ है।”
“बस थोड़ा सा इंतज़ार कर लो मेरी रानी, आज का डिनर कुछ खास है,” अनुराग ने आँख मारते हुए कहा।
कुछ देर बाद गाड़ी एक बड़े से लोहे के गेट के सामने रुकी। निशा ने जैसे ही बाहर देखा, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। वह ‘ममता सदन’ था—वही अनाथालय जहाँ उसका बचपन बीता था। निशा का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा।
“हम यहाँ क्यों आए हैं?” निशा की आवाज़ कांप रही थी।
अनुराग बाहर निकला और उसने निशा के लिए दरवाज़ा खोला। “आओ तो सही।”
जैसे ही निशा ने अनाथालय के हॉल में कदम रखा, वहां का नज़ारा देखकर उसके आंसू छलक पड़े। पूरा हॉल गुब्बारों और रंग-बिरंगी लाइटों से सजा था। सामने एक बड़ी सी टेबल पर बहुत सारा खाना रखा था। अनाथालय के सारे बच्चे और वहां की केयरटेकर, जिन्हें निशा ‘अम्मा’ कहती थी, सब वहां मौजूद थे। बच्चों ने एक साथ ज़ोर से चिल्लाकर कहा, “हैप्पी एनिवर्सरी निशा दीदी!”
अनुराग ने निशा के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “मुझे पता है निशा, तुम्हें बड़ी-बड़ी पार्टियां या महंगे तोहफे नहीं चाहिए। तुम हमेशा से इस जगह के बच्चों को वो खुशियां देना चाहती थी, जो तुम्हें बचपन में नहीं मिलीं। आज हमारी एनिवर्सरी का डिनर हम अपने इस ‘परिवार’ के साथ करेंगे। और हाँ, मैंने ‘ममता सदन’ की पांच बच्चियों की आगे की पूरी पढ़ाई की ज़िम्मेदारी भी आज ही ली है… तुम्हारे नाम से।”
निशा फूट-फूट कर रोने लगी। लेकिन ये आंसू दुख के नहीं थे। ये उस असीम सुकून के आंसू थे, जो एक इंसान को तब मिलता है जब उसे बेइंतहा चाहने वाला कोई मिल जाता है। उसने अनुराग को कसकर गले लगा लिया। आज निशा को यकीन हो गया था कि वह अब अनाथ नहीं है। उसे दुनिया का सबसे अमीर परिवार मिल गया था, जिसका खज़ाना अनुराग का बेपनाह और निस्वार्थ प्यार था।
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