रिश्तों की उलझन

 सुमित्रा जी ने नीलिमा को गले से लगा लिया और ममता भरे स्वर में कहा, “बहू, तू हमारी बेटी जैसी है। नए घर में आकर खुद को ढालना आसान नहीं होता, हम तेरी परेशानी समझते हैं। इस घर पर जितना सौरभ का हक है, उतना ही तेरा भी है। तेरे माता-पिता हमारे समधी हैं, उनका … Read more

कोरे आँगन में खिली लाल चूनर

 कल्याणी जी ने भावुक होकर कहा, “यह कंगन मेरी माँ ने मुझे दिए थे। आज तक इन्हें किसी रस्म में पहनने की हिम्मत नहीं जुटा पाई, पर आज मैं इन्हें अपनी बेटी को सौंप रही हूँ। तुम मेरी सिर्फ बहू नहीं, इस घर की रौनक हो। माना कि शादी के वक्त मैं अपनी झिझक के … Read more

दूरियों के पार का अपनापन

 “मैं समझ गई हूं बेटा,” मालती देवी ने अपनी साड़ी के पल्लू से आंखें साफ करते हुए एक हल्की मुस्कान के साथ कहा। “अब बहुत हो गया मेरा यह हठ। कल रविवार है। कल दोपहर का खाना इस घर की रसोई में नहीं बनेगा। कल हम सब—मैं, तुम्हारे बाबूजी, तुम दोनों और हमारे पोते-पोती—सब मिलकर … Read more

स्वाभिमान का स्वाद

 अंजलि ने मेरी हथेलियों को अपने हाथों में थाम लिया। उसकी आंखें कृतज्ञता से भीग गईं, “आंटी, यह सब आपकी वजह से हुआ है। अगर उस दिन आपने मुझे रोने के लिए छोड़ने के बजाय यह रास्ता न दिखाया होता, मेरा हाथ न थामा होता, तो शायद आज मैं मायके के किसी कोने में लाचारी … Read more

रेत की दीवारें

 “आठ लाख रुपये? क्या पागलपन है! माँ, आपको समझ भी आता है कि आठ लाख होते क्या हैं? इस उम्र में इतनी बड़ी सर्जरी का कोई तुक है? अगर ऑपरेशन के बाद भी आप चलने लायक नहीं हुईं तो? सारा पैसा पानी में बह जाएगा। आजकल डॉक्टर सिर्फ बिल बनाने के लिए सर्जरी की सलाह … Read more

कांच के महल की दरारें

  “यह आपने क्या किया सिद्धार्थ? बिना किसी दूसरी नौकरी के आपने इस्तीफा दे दिया? बच्ची का स्कूल, मकान का किराया, घर का राशन… ये सब कैसे चलेगा?” सिद्धार्थ ने बड़ी बेपरवाही और बेशर्मी से अवनि की तरफ देखा और अपने कंधे उचकाते हुए बोला, “तुम किसलिए हो? तुम्हारी नौकरी तो चल ही रही है ना! … Read more

स्वाभिमान की उड़ान

 अंकिता का एक-एक शब्द सुमित के अंतर्मन पर हथौड़े की तरह लगा। एक पर्दा सा उसकी आंखों से हट गया। उसने महसूस किया कि वह अपने खोखले पौरुष के गुरूर में कितना अंधा हो चुका था। जिस औरत ने इस घर को मंदिर बनाया, उसी के सपनों की बलि चढ़ाकर वह खुद को बड़ा साबित … Read more

उजालों का सफर

शशिकांत जी ने आगे बढ़कर अपने बेटे की पीठ थपथपाई। उनका सीना आज गर्व से चौड़ा हो गया था। “बेटा, आज तूने साबित कर दिया कि आधुनिकता और बड़ी नौकरियाँ हमारे संस्कारों को तब तक नहीं छीन सकतीं, जब तक हमारे भीतर अपनों के लिए सच्चा प्रेम ज़िंदा है।” कुछ ही देर में सदाशिव सदन … Read more

अनदेखी तपस्या

 सुहानी की आंखें तुरंत खुल जाती हैं। वह इंसान है आलोक, कोई मशीन नहीं। उसे भी थकान होती है, उसे भी दर्द होता है। पर बदले में वह क्या मांगती है? बस तुम्हारे दो मीठे बोल और थोड़ा सा सम्मान। और तुम उसे क्या देते हो? ताने और तिरस्कार?” आलोक फूट-फूट कर रो पड़ा। “दीदी, … Read more

धूप की पहली किरण

 आरव की एक-एक बात अवनि के सीने में तीर की तरह उतर रही थी। वह पच्चीस साल की पढ़ी-लिखी, समझदार युवती थी, जिसके सामने पूरी जिंदगी पड़ी थी। डॉक्टर बार-बार कह रहे थे कि वह न केवल जीवित रहेगी बल्कि पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने पैरों पर चलेगी। उसका रोग कट चुका था, उसकी सांसें … Read more

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