रेशमी धागों की चुभन

लाल सुर्ख रंग, उस पर चमकता हुआ असली ज़री का सुनहरा काम और रेशम की वो मखमली छुअन… मालती की गोद में रखी वो बनारसी साड़ी किसी नवविवाहिता के सपनों जैसी हसीन लग रही थी। लेकिन मालती की आँखों से गिरते आंसुओं की अनवरत धारा उस रेशम पर गिरकर गहरे धब्बे बना रही थी। अभी … Read more

रिश्तों की गर्माहट: एक अनकहा एहसास

 “अगले दिन विहान ने दादी से बहाना बनाया कि आपने उसे दो जैकेट दिलवाई हैं। एक स्कूल के लिए और एक घर के लिए। उसने कहा कि नीली वाली जैकेट उसे चुभती है इसलिए वह इसे नहीं पहनेगा। वो मासूम अपनी दादी को वह जैकेट ओढ़ाकर सुला देता है। और क्योंकि उसका खुद का कमरा … Read more

रिश्ता और स्वाभिमान – ज्योति गुप्ता

 रविवार का दिन था, किंतु शहर के जाने-माने व्यापारी और व्यापारी मंडल के अध्यक्ष राजेंद्र जी अपनी आलीशान कोठी के शानदार शयनकक्ष में उदास अकेले बैठे थे। व्यापार जगत में उनकी धाक थी; हर छोटा-बड़ा व्यापारी उनकी बात सिर-आँखों पर रखता था। मगर आज उनकी आँखों के सामने बीती रात का वह कड़वा दृश्य बार-बार … Read more

“हम सब साथ हैं” – लक्ष्मी कानोडिया ‘अनिका’

आगरा की व्यस्त गलियों के बीच, राजा मंडी में एक तीन मंज़िला पुराना लेकिन मजबूत घर था, जहां शर्मा परिवार कई पीढ़ियों से साथ रह रहा था। घर की सबसे ऊपरी मंज़िल पर दादी-जी रहती थीं—सफेद बाल, मुस्कुराती आँखें और कहानियों का खजाना। बीच वाली मंज़िल पर रमेश शर्मा, उनकी पत्नी काव्या और दो बच्चे—ध्रुव … Read more

*स्वाभिमान मेरा भी* – तोषिका

“कहा जा रही हो बेटा? आज तुम्हे लड़के वाले आ रहे है देखने।” मोहन ने अपनी बेटी निशा को पीछे से टोकते हुए बोला। निशा घूमी और उसने बोला “बस बाहर थोड़ा कॉलेज के लिए समान लेने जा रही हू, जल्दी ही आ जाऊंगी।”  तभी मोहन ने ताने मारते हुए बोला “सारा दिन बाहर घूम … Read more

चेहरे के ऊपर चेहरा रखती हो तुम बहू – मंजू ओमर

और भाई अम्मा कहां है दिखाई नहीं दे रही  हैं। अजय ने बड़े भाई विजय से पूछा, अरे वह अंदर है, वह देखो आ गई। अरे अजय आया है क्या आज। हां माँ बहुत दिन हो गए थे तुमसे मिले हुए तो आ गया तुमसे मिलने । अजय  और पत्नी सुमन ने झुक कर माँ  … Read more

स्वाभिमान की रक्षा – गीता वाधवानी

 सुबह 5:00 का अलार्म बड़ी तेज बज रहा था। निधि का बिल्कुल उठने का मन नहीं कर रहा था। वह बहुत ही थकी हुई थी। लेकिन मन मार कर आखिर उठाना ही पड़ा क्योंकि उसे ऑफिस पहुंचने में रोज देर हो जाती थी और घर के काम भी निपटाने  होते थे।      वह जल्दी से नहा … Read more

कुछ बंधन तोड़ देना ही अच्छा होता है – कायनात परवीन

​गाँव की चौपाल पर जब भी बेटियों की शिक्षा या उनके सपनों की बात होती, तो बुज़ुर्गों का एक ही जवाब होता—”लड़कियों की हद घर की चारदीवारी तक ही ठीक है।” मीरा भी इसी गाँव की एक सीधी-साधी लड़की थी, जिसके सपनों का आसमान बहुत बड़ा था, लेकिन उसके पाँव में ‘परंपराओं और सामाजिक बंदिशों’ … Read more

कुछ बंधन तोड़ देना ही अच्छा होता है – मधु वशिष्ठ

कुछ बंधन तोड़ देना ही अच्छा होता है और मैंने वही किया है। मैं यहां ही खुश हूं। पापा अब आपकी अकेले रहने की उम्र नहीं है, माधुरी ने कहा। पवन भी साथ में ही खड़ा था, उसने भी धीरे से कहा पापा आप चाहो तो आप मेरे साथ आकर रह सकते हो? पहली बात … Read more

वात्सल्य का नया सवेरा

शिखा ने एक गहरी सांस ली। “विकास, मैं पिछले कई हफ्तों से देख रही हूं कि माँ जी अंदर ही अंदर घुल रही हैं। वह रात-रात भर सोती नहीं हैं, कल रात भी ढाई बजे बरामदे में अकेली बैठी थीं। उनका खाना-पीना भी नाम मात्र का रह गया है। बाबूजी के अचानक चले जाने का … Read more

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