“मैं समझ गई हूं बेटा,” मालती देवी ने अपनी साड़ी के पल्लू से आंखें साफ करते हुए एक हल्की मुस्कान के साथ कहा। “अब बहुत हो गया मेरा यह हठ। कल रविवार है। कल दोपहर का खाना इस घर की रसोई में नहीं बनेगा। कल हम सब—मैं, तुम्हारे बाबूजी, तुम दोनों और हमारे पोते-पोती—सब मिलकर उसी जगह जाएंगे जहां नीलिमा अपनी सालगिरह पर हमें ले जाना चाहती थी। और हां, मैं कोई बहाना नहीं बनाऊंगी। जो तुम लोग खिलाओगे, वही खुशी-खुशी खाऊंगी।”
अलमारी का भारी शीशम का दरवाजा जोर की आवाज के साथ बंद करते हुए नीलिमा का चेहरा गुस्से और मायूसी से लाल हो रहा था। उसने अभी-अभी अपनी खूबसूरत चंदेरी सिल्क की नीली साड़ी वापस हैंगर पर टांग दी थी। भोपाल की हल्की गुलाबी ठंड वाली सुहानी शाम थी और बाहर जाने के लिए इससे बेहतरीन मौसम नहीं हो सकता था।
“बस बहुत हो गया! हर बार का यही तमाशा है। जब भी पूरे परिवार के साथ बाहर जाने की बात आती है, मांजी के पास हमेशा कोई न कोई बहाना तैयार रहता है। कभी सिर में दर्द, कभी घुटनों की तकलीफ, तो कभी बाहर के खाने की अशुद्धता। अरे, अगर बाहर का नहीं खाना तो मैं घर से उनके लिए सात्विक खिचड़ी या फल पैक करके ले चलने को तैयार थी। आज के दौर में हर अच्छे रेस्तरां में शुद्ध बिना प्याज-लहसुन का खाना आसानी से मिल जाता है। मगर नहीं, उन्हें तो बस हर बात पर अड़ जाना है!” नीलिमा ने पलंग पर बैठे अपने पति सिद्धांत से अपनी पूरी भड़ास निकाल दी।
सिद्धांत अपनी घड़ी का फीता कसते हुए एक गहरी सांस लेकर उठा और नीलिमा के कंधे पर हाथ रखते हुए बोला, “नीलिमा, शांत हो जाओ। मैं समझ सकता हूं कि तुम्हारा गुस्सा जायज है। आज हमारी शादी की आठवीं सालगिरह है, तुमने हफ्ते भर पहले से यह प्लान बनाया था। चलो, मैं एक बार फिर चलकर अम्मा और बाबूजी से बात करता हूं। शायद वे मान जाएं।”
“रहने दीजिए सिद्धांत, कोई फायदा नहीं होने वाला।” नीलिमा की आंखों में आंसू छलक आए। “बाबूजी तो तैयार भी थे, उन्होंने तो अपना नया कुर्ता भी निकाल लिया था। मगर मांजी ने ऐन वक्त पर कह दिया कि उनकी तबीयत ठीक नहीं लग रही और आज मंगलवार है तो वे शाम को बाहर का अन्न मुंह में नहीं डालेंगी। दुनिया में लोग तरसते हैं कि उनके सास-ससुर उनके साथ बाहर घूमने जाएं, और हमारे घर में सब कुछ उलटा है। हम हाथ जोड़कर विनती करते हैं, फिर भी कोई कद्र नहीं। अगर सिर्फ हम दोनों और बच्चे ही जाते तो कोई भी सामान्य दिन चल जाता, लेकिन आज के खास दिन मैं अपने बड़ों को घर पर अकेला छोड़कर बाहर खाना खाने नहीं जा सकती। मेरा मन ही नहीं मानेगा। आप बाहर से ही कुछ मंगवा लीजिए, हम घर पर ही खा लेंगे।”
सिद्धांत बेबसी से अपनी पत्नी को देखता रह गया। नीलिमा का दिल बहुत साफ था। वह चाहती तो बच्चों और सिद्धांत को लेकर निकल सकती थी, लेकिन संस्कारों ने उसके कदम रोक दिए। सिद्धांत ने फोन निकाला और चुपचाप खाना ऑर्डर करने लगा, लेकिन उसके दिमाग में यही उधेड़बुन चल रही थी कि आखिर मां के इस व्यवहार की जड़ क्या है।
घर की बुजुर्ग मालती देवी एक बेहद नियम-धर्म वाली महिला थीं। उनके दिन की शुरुआत भोर में चार बजे गंगाजल छिड़कने और तुलसी को जल चढ़ाने से होती थी। पूजा-पाठ, कथा-कीर्तन, मंदिर के भंडारे या किसी साधु-संत के प्रवचन का बुलावा आ जाए तो वे बिना एक पल गंवाए तैयार हो जाती थीं। पैरों का दर्द, कमर की तकलीफ—सब कुछ पल भर में गायब हो जाता था। मगर जैसे ही घर के किसी सदस्य के साथ किसी शादी, पारिवारिक दावत, पिकनिक या होटल जाने की बात उठती, अचानक उनकी सारी बीमारियां उभर आती थीं। पति कैलाश जी, जो स्वभाव से बहुत मिलनसार और जिंदादिल इंसान थे, उन्हें भी कई बार मालती देवी के इस हठ के आगे झुकना पड़ता था। वे दोस्तों से मिलने जाना चाहते, तो मालती देवी वार-त्योहार का हिसाब लगाकर उन्हें घर में ही रोक लेतीं। इस वजह से घर का माहौल अक्सर बोझिल हो जाता था।
कुछ दिन यूं ही तनाव के साए में बीत गए। एक दिन दोपहर के समय मालती देवी अपने कमरे से निकलीं और सीधे सिद्धांत के पास पहुंचीं। चेहरे पर एक अजीब सा उत्साह था।
“सिद्धांत, आज शाम को समय पर दफ्तर से घर आ जाना। तुम्हारी बड़ी बहन वंदना के यहां से पूरे परिवार का न्योता आया है। उसके बेटे रोहन ने इंजीनियरिंग की परीक्षा में राज्य स्तर पर टॉप किया है। इसी खुशी में उन्होंने घर पर सत्यनारायण भगवान की कथा और प्रसाद का बड़ा आयोजन रखा है। समधी जी ने खास तौर पर कहा है कि पूरे परिवार को साथ आना है।” मालती देवी ने अपना आदेश सुनाते हुए कहा।
सिद्धांत ने लैपटॉप से नजरें उठाईं और ठंडे स्वर में बोला, “अम्मा, आज शाम को मेरा घर आना मुमकिन नहीं होगा। मैंने और नीलिमा ने बहुत पहले से अपने कुछ पुराने दोस्तों के साथ एक नाटक देखने का कार्यक्रम बना रखा है। टिकटें भी बुक हो चुकी हैं और सारे दोस्त सीधे वहीं पहुंच रहे हैं। हम ऐन वक्त पर उन्हें धोखा नहीं दे सकते। आप और बाबूजी चले जाइए। अगर नाटक जल्दी खत्म हुआ तो हम वापसी में दीदी के यहां आते हुए पैर छू लेंगे।”
यह सुनते ही मालती देवी का चेहरा तमतमा गया। वे मंदिर वाले कमरे की ओर कदम बढ़ाते हुए जोर-जोर से बड़बड़ाने लगीं, ताकि रसोई में काम कर रही नीलिमा तक उनकी आवाज साफ पहुंचे।
“हां-हां, अब अपनी सगी बहन के घर पूजा में जाने के लिए समय कहां बचेगा! आजकल की औलादों को तो बस बाहर की चकाचौंध और दोस्तों की महफिलें ही अच्छी लगती हैं। घर में भगवान का काम हो तो बहाने हजार हैं। सब नास्तिक होते जा रहे हैं। हमें क्या, हम तो पुराने जमाने के लोग हैं, हमारी बात की भला क्या कीमत!”
कमरे में बैठे कैलाश जी ने अपनी चश्मा ठीक किया और धीरे से मुस्कुराते हुए बोले, “मालती, अब बड़बड़ाना बंद करो और तैयार हो जाओ। समधी जी के घर देर से पहुंचना ठीक नहीं लगेगा। वैसे भी, जब वहां वंदना अपने भाई और भाभी को साथ नहीं देखेगी तो पूछेगी जरूर। लेकिन मुझे पूरा भरोसा है कि तुम कोई न कोई बढ़िया सा बहाना बना ही लोगी, इसमें तो तुम्हारी पुरानी महारत है।”
मालती देवी ने तिनक कर कहा, “हां, आप भी हमेशा बच्चों की तरफदारी कीजिए। मेरा दर्द तो कोई समझता ही नहीं। सब के सब मेरे खिलाफ एक हो जाते हैं।”
तय समय पर कैलाश जी और मालती देवी एक ऑटो रिक्शा करके वंदना के घर पहुंचे। घर के बाहर टेंट लगा था और रिश्तेदारों की चहल-पहल थी। जैसे ही वे मुख्य द्वार पर पहुंचे, वंदना की सास, यानी उनकी समधन मनोरमा जी, उनका स्वागत करने आगे आईं।
“अरे समधिन जी! आइए, आइए! बहुत देर कर दी आपने। हम तो कब से आपका ही इंतजार कर रहे थे,” मनोरमा जी ने मुस्कुराते हुए गर्मजोशी से मालती देवी को गले लगाया। लेकिन फिर उनकी नजरें दोनों के पीछे खाली दरवाजे पर टिक गईं।
“अरे, लेकिन सिद्धांत, बहू नीलिमा और दोनों प्यारे बच्चे कहां हैं? वे नजर नहीं आ रहे? क्या वे दूसरी गाड़ी से आ रहे हैं?” मनोरमा जी ने सहजता से पूछा।
मालती देवी के चेहरे का रंग उड़ गया। वे मन ही मन शब्द तलाशने लगीं कि क्या कहें। तभी कैलाश जी ने बात संभालते हुए कहा, “समधिन जी, दरअसल बच्चों का पहले से कोई बहुत जरूरी काम तय था, इसलिए वे नहीं आ पाए।”
तभी अंदर से वंदना दौड़ती हुई आई। अपनी मां और पिता को देखकर उसके चेहरे पर जो खुशी आई थी, वह तुरंत गायब हो गई जब उसने देखा कि उसका भाई और भाभी साथ नहीं हैं।
“अम्मा! भैया और भाभी नहीं आए? रोहन कितनी देर से अपने मामा का इंतजार कर रहा था। उसने तो कहा था कि जब तक मामा नहीं आएंगे, वह केक नहीं काटेगा और न ही प्रसाद बांटेगा। आपने उन्हें साथ क्यों नहीं लिया?” वंदना की आवाज में साफ नाराजगी और मायूसी झलक रही थी।
मालती देवी ने अपनी झेंप मिटाने के लिए कहा, “अरे वंदना, तू तो जानती है आजकल के बच्चों को। उनका अपना दायरा है, अपने दोस्त हैं। नाटक देखने चले गए। अब हम बूढ़ों की कौन सुनता है।”
वंदना ने अपनी मां की आंखों में देखा और एक भारी सांस ली। वह अपनी मां के स्वभाव से अच्छी तरह वाकिफ थी। उसने धीरे से अपनी मां का हाथ पकड़ा और उन्हें भीड़ से थोड़ा अलग एक खाली कमरे में ले गई।
“अम्मा, सच-सच बताओ, क्या तुमने भैया और भाभी से सीधे मुंह बात की थी? या फिर वही हुआ जो हमेशा होता है?” वंदना ने सीधे सवाल किया।
मालती देवी चौंक गईं, “तू क्या कहना चाहती है वंदना? मैं अपनी ही औलाद से सीधे मुंह बात क्यों नहीं करूंगी?”
वंदना ने कुर्सी खींचकर अपनी मां को बैठाया और खुद उनके घुटनों के पास बैठ गई। उसने बहुत प्यार और गंभीरता से कहा, “अम्मा, पिछले हफ्ते जब भैया की सालगिरह थी, नीलिमा भाभी का फोन आया था मेरे पास। वे बच्चों की तरह रो रही थीं। उन्होंने पूरे उत्साह से एक सुंदर जगह टेबल बुक की थी ताकि आप सबको एक शाम आराम दे सकें। लेकिन आपने ऐन वक्त पर सिरदर्द का बहाना बना दिया और जाने से साफ मना कर दिया। भाभी ने मुझसे कहा कि दीदी, अगर हम सिर्फ अपनी खुशी देखते तो चले जाते, लेकिन अपने बड़ों को भूखा या अकेला छोड़कर जाना हमारे संस्कारों में नहीं है। इसलिए उन्होंने अपना पूरा कार्यक्रम रद्द कर दिया और चुपचाप घर पर बैठ गईं।”
मालती देवी ने नजरें चुराते हुए कहा, “तो क्या गलत किया मैंने? उस उम्र में मुझे बाहर के होटलों का शोर-शराबा नहीं भाता। मुझे अपने घर की शांति पसंद है।”
“अम्मा, बाहर जाना शोर-शराबा नहीं, परिवार को एक धागे में पिरोने का जरिया होता है,” वंदना ने समझाते हुए कहा। “जब बच्चे हमारी खुशी के लिए हमारे साथ मंदिर के घंटों लंबे आयोजनों में खड़े रह सकते हैं, बिना किसी शिकायत के व्रत-त्योहारों में हाथ बंटा सकते हैं, तो क्या हमारा यह फर्ज नहीं बनता कि हम भी कभी-कभी उनकी खुशियों में शरीक हों? रिश्ता दोनों तरफ से निभाया जाता है, अम्मा। अगर आप हर बार उनकी छोटी-छोटी खुशियों को नकारेंगी, तो धीरे-धीरे वे आपसे उम्मीद करना ही छोड़ देंगे। आज भैया और भाभी का आपके साथ न आना कोई बगावत नहीं है, यह उस निराशा का नतीजा है जो आपने अनजाने में उनके मन में भर दी है। अगर परिवार में हर कोई सिर्फ अपनी शर्तों पर ही जिएगा, तो वह घर नहीं, धर्मशाला बन जाएगा।”
वंदना की बातें किसी आईने की तरह मालती देवी के सामने उनकी अपनी गलतियों को उजागर कर रही थीं। उन्होंने कभी इस नजरिए से सोचा ही नहीं था। उन्हें हमेशा लगता था कि उम्र के इस पड़ाव पर परिवार को उनके नियमों के अनुसार चलना चाहिए। उन्होंने यह कभी नहीं देखा कि उनकी इस जिद्द की वजह से बहू का मन कितना दुखता था और बेटा कितनी बेबसी महसूस करता था।
कथा का कार्यक्रम संपन्न हुआ, लेकिन पूरे समय मालती देवी का मन पूजा में नहीं लगा। उनके कानों में वंदना के शब्द गूंज रहे थे—’अगर आप उनकी खुशियों में शरीक नहीं होंगी, तो वे आपसे उम्मीद करना छोड़ देंगे।’ उन्हें अपनी उस सालगिरह की शाम याद आई, जब नीलिमा ने बिना किसी शिकवे के उनकी बनाई खिचड़ी खाई थी और चुपचाप बर्तन समेटे थे।
रात करीब साढ़े दस बजे जब कैलाश जी और मालती देवी घर लौटे, तो घर में शांत अंधेरा था। लिविंग रूम की बत्ती जल रही थी और नीलिमा सोफे पर बैठी किसी किताब के पन्ने पलट रही थी। सिद्धांत शायद बच्चों को सुलाने अंदर गया था।
मालती देवी और कैलाश जी को अंदर आते देखकर नीलिमा तुरंत उठ खड़ी हुई। चेहरे पर कोई कड़वाहट लाए बिना, उसने स्वाभाविक आदर के साथ कहा, “मां जी, बाबूजी, आप लोग आ गए? हाथ-मुंह धो लीजिए, मैं गर्म दूध लेकर आती हूं।”
मालती देवी ने अपनी बहू को सिर से पैर तक देखा। सादी सी सूती साड़ी, चेहरे पर थकावट, लेकिन व्यवहार में वही पुराना आदर। मालती देवी का दिल भर आया। वे आगे बढ़ीं और उन्होंने नीलिमा का हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया।
नीलिमा चौंक गई। उसने कभी अपनी सास को इस तरह भावुक रूप में नहीं देखा था।
“बहू… मुझे माफ कर दे,” मालती देवी का गला रुंध गया।
नीलिमा घबरा गई, “मां जी! यह आप क्या कह रही हैं? मुझसे कोई भूल हो गई क्या?”
तभी कमरे से सिद्धांत भी बाहर आ गया। उसने देखा कि उसकी मां की आंखों से आंसू बह रहे थे।
मालती देवी ने सिद्धांत और नीलिमा दोनों को अपने पास बुलाया और बोलीं, “नहीं नीलिमा, भूल तुमसे नहीं, मुझसे हुई थी। मैं अपनी उम्र, अपने नियमों और अपने हठ के खोल में इतनी सिमट गई थी कि मुझे दिखाई ही नहीं दिया कि मेरे इस व्यवहार से तुम दोनों का दिल कितना दुखता है। मैं भूल गई थी कि परिवार केवल पूजा-पाठ से नहीं चलता, एक-दूसरे की छोटी-छोटी खुशियों में शामिल होने से चलता है। तुमने हमेशा मेरी हर बात का मान रखा, लेकिन मैंने कभी तुम्हारी एक शाम की खुशी की कद्र नहीं की।”
सिद्धांत ने आगे बढ़कर अपनी मां के आंसू पोंछे, “अम्मा, ऐसा मत कहिए। हम तो बस यही चाहते थे कि हम सब मिलकर साथ में कुछ पल बिताएं।”
“मैं समझ गई हूं बेटा,” मालती देवी ने अपनी साड़ी के पल्लू से आंखें साफ करते हुए एक हल्की मुस्कान के साथ कहा। “अब बहुत हो गया मेरा यह हठ। कल रविवार है। कल दोपहर का खाना इस घर की रसोई में नहीं बनेगा। कल हम सब—मैं, तुम्हारे बाबूजी, तुम दोनों और हमारे पोते-पोती—सब मिलकर उसी जगह जाएंगे जहां नीलिमा अपनी सालगिरह पर हमें ले जाना चाहती थी। और हां, मैं कोई बहाना नहीं बनाऊंगी। जो तुम लोग खिलाओगे, वही खुशी-खुशी खाऊंगी।”
कैलाश जी ने अचरज से अपनी पत्नी को देखा और फिर ठहाका मारकर हंस पड़े, “अरे वाह मालती! आज तो सचमुच कोई चमत्कार हो गया। लगता है समधिन जी की चाय में कोई जादुई असर था!”
पूरे घर में हंसी की लहर दौड़ गई। नीलिमा की आंखों में खुशी के आंसू थे। उसने झुककर मालती देवी के पैर छुए, तो मालती देवी ने उसे सीने से लगा लिया। घर की हवा में जो भारीपन और खिंचाव पिछले कई महीनों से घुला हुआ था, वह एक ही पल में कपूर की तरह उड़ गया।
अगले दिन पूरा परिवार एक सुंदर, शांत पारिवारिक रेस्तरां में बैठा था। बच्चों की खिलखिलाहट, कैलाश जी के पुराने किस्से और मालती देवी के चेहरे पर खिली ममतामयी मुस्कान यह बता रही थी कि जब दिल के दरवाजे खुलते हैं, तो हर फासला अपने आप मिट जाता है। नीलिमा और सिद्धांत ने एक-दूसरे का हाथ थामा और दोनों के चेहरों पर एक गहरी संतुष्टि तैर गई—उनका परिवार अब सचमुच एक हो चुका था।
परिवार सिर्फ एक छत के नीचे साथ रहने का नाम नहीं है, बल्कि एक-दूसरे की खुशियों और भावनाओं का सम्मान करने का नाम है। क्या आपके घर या आसपास भी कभी ऐसा हुआ है कि बुजुर्गों की जिद्द या बच्चों की व्यस्तता के कारण रिश्तों में ऐसी खटास आई हो? ऐसे मौकों पर रिश्तों को बचाने के लिए किसे झुकना चाहिए—बड़ों को या छोटों को? अपनी राय और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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लेखिका : गरिमा चौधरी