आरव की एक-एक बात अवनि के सीने में तीर की तरह उतर रही थी। वह पच्चीस साल की पढ़ी-लिखी, समझदार युवती थी, जिसके सामने पूरी जिंदगी पड़ी थी। डॉक्टर बार-बार कह रहे थे कि वह न केवल जीवित रहेगी बल्कि पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने पैरों पर चलेगी। उसका रोग कट चुका था, उसकी सांसें सुरक्षित थीं, उसका भविष्य उसका इंतजार कर रहा था। और फिर भी वह खुद को एक कोने में समेटकर मौत की भीख मांग रही थी।
सफेद दीवारें, चारों तरफ फैली फिनॉयल की तीखी गंध और लगातार बजती मॉनिटर की ‘बीप-बीप’ की आवाज किसी को भी अंदर तक तोड़ देने के लिए काफी थी। जयपुर के एक प्रतिष्ठित कैंसर केयर सेंटर के कमरा नंबर 304 में सन्नाटा पसरा हुआ था। खिड़की से छनकर आती सुबह की धूप सीधे बिस्तर पर पड़ रही थी, जहां पच्चीस साल की अवनि निष्प्राण सी लेटी थी। महज तीन दिन पहले ही उसकी रीढ़ की हड्डी के पास मौजूद ट्यूमर की एक बेहद जटिल और लंबी सर्जरी हुई थी। डॉक्टरों ने रीढ़ की नसों को बचाते हुए उस जानलेवा गांठ को पूरी तरह निकाल फेंका था। चिकित्सा विज्ञान की नजर में यह एक चमत्कारी सफलता थी, पर अवनि के लिए यह सांसों का केवल एक अंतहीन और बेमकसद बोझ बनकर रह गया था।
अवनि एक होनहार आर्किटेक्ट थी। उसने अपनी आंखों में ऊंची इमारतों के नक्शे, अपने परिवार के लिए एक खूबसूरत आशियाना और दुनिया भर में अपना नाम कमाने के न जाने कितने सुनहरे सपने संजोए थे। कुछ ही महीनों में उसे अपनी पहली बड़ी परियोजना के सिलसिले में विदेश जाना था, लेकिन किस्मत ने ऐसा पासा पलटा कि वह ड्राइंग बोर्ड छोड़कर अस्पताल के बिस्तर पर सिमट गई। उसके खूबसूरत रेशमी बाल, जो कभी उसकी कमर तक लहराते थे, कीमोथेरेपी के शुरुआती दौर में ही झड़ चुके थे। अब उसका सिर एक सूती स्कार्फ से ढका था। वह पूरे दिन शून्य में घूरती रहती, मानो जिंदगी से उसका हर नाता टूट चुका हो।
बिस्तर के पास रखी लोहे की कुर्सी पर उसकी मां जानकी जी बैठी थीं। उनकी आंखें रात भर जागने के कारण सूज गई थीं और चेहरे की झुर्रियों में बेटी के दर्द का गहरा साया साफ दिखाई दे रहा था। जानकी जी ने कांपते हाथों से कटोरी से दलिया का एक चम्मच उठाया और अवनि के होठों के करीब ले गईं।
“अवनि, मेरी बच्ची, थोड़ा सा खा ले। देख, डॉक्टर साहब ने कहा है कि दवाइयां असर तभी करेंगी जब तू कुछ खाएगी। दो दिन से तूने ढंग से पानी भी नहीं पिया है। ऐसे शरीर कैसे संभलेगा?” जानकी जी के स्वर में एक बेबस मां की अथाह पीड़ा घुली हुई थी।
अवनि ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसने धीरे से अपना मुंह दूसरी तरफ मोड़ लिया। उसकी आंखों से आंसू की एक बूंद लुढ़क कर तकिए में जज्ब हो गई। उसके भीतर एक गहरा आक्रोश और घनघोर हताशा थी। वह मन ही मन सोच रही थी कि भगवान ने उसके साथ ही ऐसा अन्याय क्यों किया। क्या बिगाड़ा था उसने किसी का? जिस उम्र में उसके साथी दुनिया फतह करने की तैयारी कर रहे थे, उस उम्र में वह दूसरों के सहारे करवट बदलने को मजबूर थी।
तभी दरवाजे की कुंडी धीरे से खुली और सीनियर ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. अनुराग वार्ड में दाखिल हुए। उनके चेहरे पर हमेशा रहने वाली एक शांत और आश्वस्त करने वाली मुस्कान थी। उनके हाथ में अवनि की ताज़ा मेडिकल फाइल थी। उन्होंने जानकी जी को सांत्वना भरी नजरों से देखा और फिर अवनि के बिस्तर के करीब आ गए।
“कैसी महसूस कर रही हो अवनि? आज का पल्स और बीपी तो बहुत बढ़िया है,” डॉक्टर अनुराग ने बेहद अपनेपन से पूछा।
अवनि खामोश रही। उसकी पथराई नजरें खिड़की के बाहर किसी अदृश्य बिंदु पर टिकी रहीं।
डॉक्टर अनुराग ने गहरी सांस ली और उसके कंधे पर हौले से हाथ रखा। “अवनि, मैं जानता हूं कि तुम किस मानसिक दौर से गुजर रही हो। लेकिन तुम्हें यह समझना होगा कि सबसे मुश्किल पड़ाव पार हो चुका है। ट्यूमर पूरी तरह निकाला जा चुका है और बायोप्सी रिपोर्ट भी उम्मीद से कहीं बेहतर आई है। तुम्हारी रीढ़ बिल्कुल सुरक्षित है। अगर तुम चाहो, तो अगले छह महीनों में फिजियोथेरेपी और कुछ एहतियाती साइकिलों के बाद तुम बिल्कुल अपनी पुरानी जिंदगी में लौट सकती हो। अपने पैरों पर दौड़ सकती हो, अपने प्रोजेक्ट्स पूरे कर सकती हो। तुम्हें ईश्वर ने दूसरा जीवन दिया है, पर तुम हो कि उससे मुंह फेर कर बैठी हो। अगर मन ही हार मान लेगा, तो हमारी सारी दवाइयां और सर्जिकल तकनीक धरी की धरी रह जाएंगी।”
अवनि का सब्र आखिरकार टूट गया। उसकी रुलाई फूट पड़ी, जिसमें बरसों का संचित दर्द और गुस्सा बाहर आ गया। “क्या बचा है डॉक्टर मेरी इस जिंदगी में? मैं एक अपंग की तरह बिस्तर पर पड़ी हूं। मेरे सारे सपने, मेरा करियर, मेरी पहचान… सब इस बीमारी ने छीन लिया। मुझे ऐसी जिंदगी नहीं चाहिए जो दर्द और रहम की मोहताज हो। काश मैं उस ऑपरेशन टेबल से कभी उठी ही न होती!”
जानकी जी अपनी सिसकियां दबाने के लिए मुंह पर पल्लू रख कर रोने लगीं।
डॉक्टर अनुराग विचलित नहीं हुए। वे ऐसी हताशा को रोज देखते थे। उन्होंने अवनि के हाथ को थपथपाया और बिना कुछ कहे वार्ड के बाहर की तरफ देखा। उन्होंने गलियारे में खड़े एक अर्दली को कुछ इशारा किया। कुछ ही पलों बाद वार्ड का दरवाजा खुला और पहियों वाली कुर्सी पर एक ग्यारह साल का बालक कमरे के भीतर आया।
उस बच्चे का नाम आरव था। गोल-मटोल चेहरा, बड़ी-बड़ी कजरारी आंखें और चेहरे पर एक ऐसी मासूम चमक जिसे देखकर कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता था कि वह मौत के साये में जी रहा है। उसके सिर पर भी बाल नहीं थे और कलाई पर ड्रिप की सुइयों के ढेरों नीले निशान थे। उसके हाथों में लकड़ी की एक छोटी सी तख्ती और कुछ रंग-बिरंगी मिट्टी के खिलौने थे।
“अवनि, इससे मिलो, यह आरव है,” डॉक्टर अनुराग ने कहा। “जब यह साढ़े आठ साल का था, तब इसे हड्डियों का एक दुर्लभ और आक्रामक कैंसर डिटेक्ट हुआ था। पिछले ढाई सालों में इसके शरीर पर तीन बड़ी सर्जरी हो चुकी हैं। इसके बाएं पैर का निचला हिस्सा इस बीमारी की भेंट चढ़ गया। यह बच्चा जानता है कि इसका इलाज अब सिर्फ समय को आगे बढ़ाने के लिए है, इसे पूरी तरह ठीक करने की कोई गारंटी किसी डॉक्टर के पास नहीं है। लेकिन इसके बावजूद, पूरे पीडियाट्रिक वार्ड में आरव से ज्यादा खिलखिलाने वाला और जीने की चाह रखने वाला इंसान तुम्हें नहीं मिलेगा। यह हर हफ्ते हमारे नए मरीजों से मिलने आता है ताकि उन्हें याद दिला सके कि सांस लेने का मतलब क्या होता है।”
डॉक्टर अनुराग जानकी जी को ढांढस बंधाते हुए और अवनि के सिर पर हाथ रखकर अगले वार्ड के राउंड के लिए चले गए।
कमरे में कुछ पल के लिए गहरा सन्नाटा छा गया। अवनि ने कनखियों से उस छोटे से बच्चे को देखा। आरव अपनी व्हीलचेयर को खुद ही अपने नन्हें हाथों से घुमाता हुआ अवनि के बिस्तर के बिल्कुल पास ले आया। उसके चेहरे पर न कोई संकोच था, न किसी तरह का डर।
“दीदी, नमस्ते! मेरा नाम आरव है। डॉक्टर अंकल कह रहे थे कि आप बहुत सुंदर घर और पुलों के नक्शे बनाती हो? मुझे भी दिखाओगी कभी?” आरव ने बड़ी ही सहजता और मिठास से पूछा।
अवनि ने कोई उत्तर नहीं दिया, बस उसे देखती रही। उस बच्चे की आंखों में एक अजीब सा ठहराव और प्रकाश था।
आरव ने अपनी गोद में रखी लकड़ी की तख्ती उठाई। उस पर उसने रंग-बिरंगी मिट्टी से एक बेहद खूबसूरत चिड़िया बनाई थी, जो एक टूटी हुई डाली पर बैठकर अपने पंख फैलाए आसमान की तरफ देख रही थी। रंग भले ही थोड़े इधर-उधर फैले थे, लेकिन उस कलाकृति में एक अजीब सा जीवन धड़क रहा था।
“दीदी, यह देखिए। यह मैंने आज सुबह ही बनाई है। इसे बनाने में मेरे हाथ बहुत कांप रहे थे क्योंकि कल रात मुझे कीमो का इंजेक्शन लगा था, लेकिन मैंने हार नहीं मानी। अच्छी लग रही है न?” आरव ने गर्व से तख्ती अवनि की तरफ बढ़ाई।
अवनि न चाहते हुए भी उस चिड़िया को देखने लगी। उसने धीरे से पूछा, “यह डाली टूटी हुई क्यों है?”
आरव मुस्कुराया, उसकी मुस्कान में उम्र से कहीं ज्यादा परिपक्वता थी। “क्योंकि डाली टूट भी जाए, तो भी चिड़िया गिरती नहीं है दीदी। चिड़िया को डाली पर नहीं, अपने पंखों पर भरोसा होता है। जब मेरा पैर काटा गया था, तब मैं बहुत रोया था। मुझे लगता था कि अब मैं कभी खेल नहीं पाऊंगा, कभी स्कूल नहीं जा पाऊंगा। लेकिन मेरी मां ने मुझे सिखाया कि पैर तो सिर्फ चलने के लिए होते हैं, उड़ने के लिए तो हौसला चाहिए। अब मैं अपने इस एक पैर और बैसाखी के सहारे भी इतना तेज चलता हूं कि वार्ड के सारे बच्चे मुझसे हार जाते हैं।”
अवनि के दिल में जैसे किसी ने बिजली का तार छू दिया हो। उसने अविश्वास से पूछा, “तुम्हें डर नहीं लगता आरव? तुम्हें दर्द नहीं होता?”
“दर्द तो बहुत होता है दीदी,” आरव ने अपनी कलाई के नीले निशानों को सहलाते हुए कहा। “जब सुई चुभती है, तो कभी-कभी बहुत रोना आता है। लेकिन डर किस बात का? डॉक्टर अंकल कहते हैं कि शायद मैं कभी बहुत बड़ा न हो पाऊं, शायद मेरी उम्र लंबी न हो। पर मुझे लगता है कि अगर मुझे दस दिन भी मिले हैं, तो मैं उन दस दिनों में रोकर अपनी मां को दुखी क्यों करूं? मैं हर रोज सुबह उठकर भगवान को ‘थैंक यू’ बोलता हूं कि उन्होंने मुझे आज का सूरज देखने दिया। मैं रोज नई-नई चीजें बनाता हूं। अगर मैं चला भी गया, तो मेरी बनाई हुई ये चिड़िया, ये खिलौने सबको याद दिलाएंगे कि आरव हमेशा हंसता रहता था।”
आरव की एक-एक बात अवनि के सीने में तीर की तरह उतर रही थी। वह पच्चीस साल की पढ़ी-लिखी, समझदार युवती थी, जिसके सामने पूरी जिंदगी पड़ी थी। डॉक्टर बार-बार कह रहे थे कि वह न केवल जीवित रहेगी बल्कि पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने पैरों पर चलेगी। उसका रोग कट चुका था, उसकी सांसें सुरक्षित थीं, उसका भविष्य उसका इंतजार कर रहा था। और फिर भी वह खुद को एक कोने में समेटकर मौत की भीख मांग रही थी।
दूसरी तरफ यह मासूम बच्चा था, जिसके पास न तो लंबी उम्र का भरोसा था और न ही शरीर के सारे अंग सलामत थे, फिर भी वह जिंदगी के हर एक कतरे को उत्सव की तरह जी रहा था।
अवनि ने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए और आरव के नन्हें, ठंडे हाथों को थाम लिया। उसकी आंखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला, लेकिन इस बार ये आंसू हताशा के नहीं, बल्कि अपनी भूल के पश्चाताप और आत्मग्लानि के थे।
“आरव… तुमने मुझे कितनी बड़ी बात सिखा दी। मैं कितनी स्वार्थी हो गई थी। अपने थोड़े से दर्द के आगे मुझे अपनी मां का रोना, डॉक्टरों की मेहनत और इस जीवन का वरदान कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा था।” अवनि की आवाज रुंध गई।
आरव ने अपनी छोटी सी उंगलियों से अवनि के गालों पर बहते आंसू पोंछ दिए। “दीदी, आप तो बहुत बहादुर हो। डॉक्टर अंकल कह रहे थे कि आपकी इतनी बड़ी सर्जरी हुई और आपने सब सह लिया। अब आपको रोना नहीं है। आप जल्दी से ठीक हो जाओ, फिर मेरे लिए एक सुंदर सा सपनों का घर डिजाइन करना, जिसमें बहुत बड़ी खिड़कियां हों और खूब सारी धूप आती हो।”
“हां आरव, मैं करूंगी। मैं तुम्हारे लिए सबसे सुंदर घर बनाऊंगी,” अवनि ने एक दृढ़ संकल्प के साथ मुस्कुराते हुए कहा। कई हफ्तों बाद उसके चेहरे पर पहली बार एक सच्ची और खिली हुई मुस्कान लौटी थी।
उसने पास खड़ी अपनी मां की तरफ देखा, जो अवाक होकर अपनी बेटी को देख रही थीं। अवनि ने अपना हाथ बढ़ाया और मां का पल्लू पकड़कर कहा, “मां, मुझे बहुत तेज भूख लगी है। मुझे वह दलिया खिला दो ना।”
जानकी जी के चेहरे पर जो खुशी की लहर दौड़ी, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता था। कांपते हाथों से उन्होंने दलिया का चम्मच अवनि के मुंह में डाला। अस्पताल के उस छोटे से कमरे में ऐसा लगा जैसे निराशा का घना कोहरा छंट गया हो और नई जिंदगी की ताजी धूप भीतर उतर आई हो।
अवनि समझ चुकी थी कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विकट क्यों न हों, जीवन हमेशा जीने के लिए होता है, घुट-घुट कर मरने के लिए नहीं। आरव नाम की उस नन्हीं सी लौ ने उसके भीतर बुझ चुकी उम्मीद की मशाल को फिर से प्रज्वलित कर दिया था। अब उसे लड़ना था, जीतना था और अपनी जिंदगी के हर एक पल को पूरी शिद्दत से जीना था।
जीवन में कई बार हम छोटी-मोटी असफलताओं या शारीरिक कष्टों से इतने टूट जाते हैं कि हमें अपनी सांसें भी बोझ लगने लगती हैं। हम यह भूल जाते हैं कि हमारे पास जो बचा है, वह उससे कहीं अधिक मूल्यवान है जो हमने खो दिया है।
आपको अवनि और नन्हें आरव की इस जंग से क्या सीख मिली? क्या आपको भी लगता है कि जिंदगी की असली ताकत हमारी सोच और सकारात्मक दृष्टिकोण में छुपी होती है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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