“यह आपने क्या किया सिद्धार्थ? बिना किसी दूसरी नौकरी के आपने इस्तीफा दे दिया? बच्ची का स्कूल, मकान का किराया, घर का राशन… ये सब कैसे चलेगा?”
सिद्धार्थ ने बड़ी बेपरवाही और बेशर्मी से अवनि की तरफ देखा और अपने कंधे उचकाते हुए बोला, “तुम किसलिए हो? तुम्हारी नौकरी तो चल ही रही है ना! कौन सा भूखे मर रहे हैं हम। जब तक मुझे कोई बड़ी पोस्ट नहीं मिलती, तब तक तुम संभालो घर। वैसे भी तुम दिन-रात वुमन एम्पावरमेंट की बातें करती हो, अब साबित करो।”
शाम ढलते ही जब बारिश की फुहारें खिड़की के शीशों से टकराईं, तो बालकनी में रखी मोगरे की बेल से एक भीनी सी महक उठने लगी। उसी वक़्त दरवाजे की घंटी बजी। अवनि ने जैसे ही दरवाजा खोला, सामने उसकी कॉलेज की सबसे चहेती सहेली शालिनी खड़ी थी। पूरे छह साल बाद दोनों का आमना-सामना हुआ था। शालिनी ने पलक झपकते ही अवनि को गले से लगा लिया और उसके दो कमरों के सुसज्जित फ्लैट को चारों तरफ़ से निहारते हुए बोली, “अरे वाह अवनि! तू तो वाकई अपनी शर्तों पर जी रही है। न कोई संयुक्त परिवार का झंझट, न किसी का हुक्म, न सुबह उठकर चाय-नाश्ते की लंबी कतार। सिद्धार्थ जैसा हैंडसम और समझदार पति और यह प्यारी सी नन्हीं परी नव्या! सच कहूं तो हम सब कॉलेज की लड़कियां आज भी तेरी किस्मत से जलती हैं। तूने लव मैरिज करके अपनी दुनिया को जन्नत बना लिया।”
शालिनी तो अपनी ही रौ में बोले जा रही थी, मगर उन अल्फ़ाज़ों की चोट इतनी गहरी थी कि अवनि के होंठों की हल्की सी मुस्कान अचानक थरथराने लगी। उसकी पलकें भारी हो गईं और आंखों के किनारों से दो मोटे आंसू फिसलकर उसके गालों पर ढुलक गए।
शालिनी का उत्साह अचानक सन्नाटे में बदल गया। उसने अवनि के दोनों हाथ अपने हाथों में थाम लिए और चौंक कर पूछा, “अरे अवनि! क्या हुआ? मैंने कुछ गलत कह दिया क्या? तू तो बच्चों की तरह रोने लगी! क्या बात है सखी, तू तो इतनी मजबूत थी, मुझसे अपनी बात छुपाएगी?”
अवनि ने भर्राए हुए गले से एक गहरी सांस ली। वह शालिनी को कैसे समझाती कि जिस आज़ादी और ऐशो-आराम को दुनिया उसकी किस्मत समझ रही थी, वह दरअसल भीतर से खोखले हो चुके एक समझौते का नाम था। यह कहानी सिर्फ़ एक प्रेम विवाह की नहीं, बल्कि उस भ्रम के टूटने की थी जो उसने कभी बड़े नाज़ से पाला था।
यह सब कुछ सात साल पहले भोपाल के एक आईटी पार्क से शुरू हुआ था। अवनि और सिद्धार्थ एक ही बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करते थे। दोनों का मिजाज अलग था, पर सिद्धार्थ की बातों का जादू और उसकी परवाह अवनि को भा गई थी। जब दोनों ने शादी का फैसला किया, तो अवनि के परिवार ने सिरे से इस रिश्ते को नकार दिया। अवनि के पिता अपने पारंपरिक उसूलों के पक्के थे। उन्होंने साफ़ कह दिया था, “अगर तू अपनी मर्जी से ही सात फेरे लेना चाहती है, तो हमारे दरवाजे तेरे लिए हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। कल को कोई मुसीबत आई, तो यह मत सोचना कि मायके की दहलीज तेरे आंसुओं का बोझ उठाएगी।”
अवनि को उस वक्त अपने प्यार पर बेपनाह भरोसा था। उसने बगावत का रास्ता चुना। उधर सिद्धार्थ के परिवार ने शादी का खुला विरोध तो नहीं किया, मगर उन्होंने अवनि को कभी दिल से बहू का दर्जा नहीं दिया। शादी के बाद ससुराल वालों का व्यवहार ऐसा था मानो अवनि उनके बेटे के जीवन में एक गैर-जरूरी दखल हो। किसी तीज-त्योहार या पारिवारिक उत्सव में अवनि को कभी वह सम्मान और प्यार नहीं मिला, जिसकी हर नई नवेली दुल्हन उम्मीद करती है। सिद्धार्थ भी धीरे-धीरे अपने परिवार के ठंडे रवैये के आगे आंखें मूंदने लगा।
अवनि ने फिर भी कभी शिकायत नहीं की। उसने अपनी गृहस्थी को ही अपना मंदिर मान लिया। वह सुबह छह बजे उठकर घर का सारा काम निपटाती, सिद्धार्थ के लिए उसकी पसंद का नाश्ता बनाती और फिर खुद भी नौ बजे ऑफिस के लिए निकल पड़ती। शाम को लौटकर दोबारा वही रसोई, वही झाड़ू-पोंछा और कपड़े। वह दिन-रात खटती, ताकि सिद्धार्थ को कभी यह न लगे कि उसने गलत लड़की से शादी की है। दोनों की आमदनी अच्छी थी, इसलिए शुरुआती कुछ महीने किसी हसीन ख्वाब की तरह बीते।
मगर रिश्तों की असली परीक्षा तब शुरू हुई, जब शादी के एक साल बाद अवनि मां बनने वाली थी।
जब डॉक्टर ने अवनि की गर्भावस्था की पुष्टि की, तो अवनि की आंखों में खुशियों के सितारे चमक उठे। उसने सबसे पहले अपनी मां को फोन मिलाया। मां ने बस रूखे स्वर में कहा, “ख्याल रखना अपना, अब तो वैसे भी तुम पर ही सब निर्भर है।” मां की यह बेरुखी अवनि के सीने में तीर की तरह चुभी। उधर जब सिद्धार्थ ने अपनी मां को बताया, तो उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा, “अच्छा है, पर आजकल के खर्चे बहुत हैं, तुम दोनों समझदारी से चलना।” किसी ने यह नहीं पूछा कि बहू की तबीयत कैसी है या उसे किसी सहारे की ज़रूरत तो नहीं।
गर्भावस्था का पांचवां महीना आते-आते अवनि का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। लगातार लैपटॉप के सामने बैठने और घर के भारी कामों के कारण उसका रक्तचाप खतरनाक स्तर तक बढ़ गया। पैरों में इतनी सूजन आ गई कि उसका चलना-फिरना दूभर हो गया। डॉक्टर ने सख्त चेतावनी दी, “अवनि, तुम्हें तुरंत बेड रेस्ट की ज़रूरत है। अगर तुमने तनाव और भागदौड़ कम नहीं की, तो गर्भस्थ शिशु के लिए जानलेवा खतरा हो सकता है।”
अवनि को मजबूरी में अपने प्रोजेक्ट से बिना वेतन की मेडिकल लीव लेनी पड़ी। घर की पूरी आर्थिक जिम्मेदारी अब सिद्धार्थ के कंधों पर आ गई थी। और यहीं से सिद्धार्थ का वह चेहरा सामने आने लगा जिसे अवनि ने कभी नहीं देखा था। जो सिद्धार्थ पहले प्यार भरे वादे करता था, वह अब बात-बात पर चिढ़ने लगा। घर में जब भी कोई दवा या फल का बिल आता, वह माथे पर शिकन लाकर कहता, “खर्चे इतने बढ़ गए हैं कि मेरी सैलरी तो महीने की पंद्रह तारीख को ही खत्म हो जाती है। तुम भी आराम करने बैठ गईं।”
अवनि उस तनाव को झेल नहीं पाई और गर्भावस्था के आठवें महीने की शुरुआत में ही उसे प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। डॉक्टरों को आनन-फानन में ऑपरेशन करना पड़ा। नव्या का जन्म समय से पहले हो गया था। बच्ची का वजन बेहद कम था, सांस लेने में तकलीफ थी, जिसके चलते उसे पूरे बीस दिनों तक इनक्यूबेटर और एनआईसीयू में रखना पड़ा। अस्पताल का बिल लाखों में पहुंच गया। उस कठिन समय में सिद्धार्थ अस्पताल के बिलों को देखकर अवनि पर इस तरह बिफरता मानो समय से पहले बच्ची का पैदा होना अवनि की कोई साज़िश या लापरवाही थी।
अस्पताल से घर आने के बाद अवनि के जीवन का सबसे अंधकारमय दौर शुरू हुआ। बच्ची दिन-रात रोती थी। टांकों के दर्द से कराहती अवनि को अकेले ही रात-रात भर जागकर नव्या को गोद में लेकर टहलना पड़ता था। जब भी वह सिद्धार्थ से थोड़ा सहारा मांगती, सिद्धार्थ चादर तानते हुए झिड़क देता, “अवनि, दिमाग मत खराब करो। मुझे कल सुबह नौ बजे क्लाइंट मीटिंग अटेंड करनी है। अगर नींद पूरी नहीं हुई तो नौकरी चली जाएगी। बच्चे को संभालना मां का काम होता है।”
घर का काम, बच्ची की देखरेख, और अपनी शारीरिक कमजोरी—सब कुछ अवनि के सिर पर था। जब अवनि ने कहा कि उसे एक महीने के लिए कम से कम खाना बनाने और मालिश के लिए कोई सहायिका रखनी चाहिए, तो सिद्धार्थ ने साफ़ इंकार कर दिया, “हमारे पास फालतू पैसे नहीं हैं। तुम्हारी पगार बंद है, अस्पताल में लाखों फूंक चुके हैं। अब यह फिजूलखर्ची मुझसे नहीं झेली जाएगी।”
अवनि भीतर तक टूट गई। उसने अपनी वर्षों की बची-खुची व्यक्तिगत जमा-पूंजी निकाली और गुपचुप तरीके से एक महिला को रख लिया, जो दिन में दो घंटे आकर बच्ची के कपड़े धो देती और घर में पोछा लगा देती। उन दो घंटों में अवनि दीवार से टेक लगाकर चुपचाप आंसू बहाती। उस वक्त उसे अहसास हुआ कि उसने जिस पुरुष के लिए अपने पूरे परिवार को छोड़ दिया था, वह असल में केवल सुख का साथी था; जिम्मेदारियों का बोझ पड़ते ही उसके सारे वादे रेत की दीवार साबित हुए थे।
अवनि के मन में सिद्धार्थ के प्रति जो कोमल प्रेम था, वह धीरे-धीरे सूखने लगा। उसकी जगह एक खामोश कड़वाहट और चिड़चिड़ेपन ने ले ली।
समय का पहिया घूमा। नव्या अब डेढ़ साल की हो चुकी थी। घर के बढ़ते खर्चों और सिद्धार्थ के रोज़-रोज़ के तानों से तंग आकर अवनि ने फिर से एक आईटी फर्म में नौकरी शुरू कर दी। उसने अपनी बेटी को डे-केयर में डाला। अब अवनि की दिनचर्या किसी मशीन जैसी हो गई थी। सुबह पांच बजे उठना, बच्ची का खाना तैयार करना, उसे डे-केयर छोड़ना, नौ घंटे की नौकरी करना, शाम को बच्ची को वापस लाना, फिर रात का खाना बनाना और घर समेटना।
सिद्धार्थ की दिनचर्या इसके बिल्कुल उलट थी। वह काम से लौटकर सीधे सोफे पर पसर जाता, मोबाइल में रील्स देखता या दोस्तों से घंटों गपशप करता। नव्या अगर रोती हुई उसके पास जाती, तो वह उसे डांटकर भगा देता। सिद्धार्थ को अच्छी तरह मालूम था कि अवनि अब पूरी तरह बेबस है। न तो उसका मायका उसे अपनाएगा और न ही ससुराल। वह मन ही मन मान चुका था कि अवनि कहीं नहीं जा सकती, इसलिए वह और भी लापरवाह और अहंकारी हो गया था।
अवनि अक्सर रात को रोते हुए यही सोचती कि बस कुछ महीने की बात है। सिद्धार्थ को कंपनी में अपनी परफॉर्मेंस के दम पर सीनियर मैनेजर का पद मिलने वाला था। सिद्धार्थ हमेशा कहता था कि प्रमोशन होते ही उसकी सैलरी दोगुनी हो जाएगी। अवनि सोचती थी कि जैसे ही उसकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी, वह अपनी नौकरी छोड़कर कुछ साल सिर्फ अपनी बच्ची और खुद के स्वास्थ्य पर ध्यान देगी। उसने इसी एक उम्मीद के सहारे अपनी हर तकलीफ को सीने में दबाए रखा था।
लेकिन उस शाम जो हुआ, उसने अवनि के पैरों तले से ज़मीन ही खिसका दी।
सिद्धार्थ शाम को जब घर लौटा, तो उसका चेहरा तमतमाया हुआ था। उसने अपने जूते लात मारकर सोफे के नीचे फेंके और बैग टेबल पर पटक दिया। नव्या उसके पास जाने लगी, तो उसने बच्ची को झटके से दूर हटा दिया।
अवनि रसोई से बाहर आई और उसने घबराते हुए पूछा, “क्या हुआ सिद्धार्थ? आज तो तुम्हारी पदोन्नति का रिजल्ट आने वाला था ना? सब ठीक तो है?”
सिद्धार्थ चीख पड़ा, “कुछ ठीक नहीं है! उन कंबख्तों ने मुझसे जूनियर लड़के को प्रमोट कर दिया। मेरे काम की कोई कद्र ही नहीं है उस दफ्तर में!”
अवनि ने अपने दिल को संभाला और पानी का गिलास उसकी तरफ बढ़ाते हुए बहुत नरमी से कहा, “कोई बात नहीं सिद्धार्थ। कॉर्पोरेट में ऐसा कभी-कभी राजनीति की वजह से हो जाता है। आप शांत हो जाइए। इस साल नहीं हुआ, तो अगले साल पक्का हो जाएगा। आप अपनी मेहनत जारी रखिए, हौसला मत हारिए।”
“अगले साल का क्या खाक इंतज़ार करूं!” सिद्धार्थ ने पानी का गिलास मेज पर पटकते हुए कहा, “मैंने आज ही अपना इस्तीफा फेंक दिया उनके मुंह पर! जहां मेरे आत्मसम्मान की कद्र न हो, वहां मैं एक पल काम नहीं कर सकता। मैंने नौकरी छोड़ दी है!”
अवनि सन्न रह गई। उसे लगा जैसे किसी ने उसकी छाती पर भारी पत्थर रख दिया हो। उसकी सांसें अटक गईं। उसने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा, “यह आपने क्या किया सिद्धार्थ? बिना किसी दूसरी नौकरी के आपने इस्तीफा दे दिया? बच्ची का स्कूल, मकान का किराया, घर का राशन… ये सब कैसे चलेगा?”
सिद्धार्थ ने बड़ी बेपरवाही और बेशर्मी से अवनि की तरफ देखा और अपने कंधे उचकाते हुए बोला, “तुम किसलिए हो? तुम्हारी नौकरी तो चल ही रही है ना! कौन सा भूखे मर रहे हैं हम। जब तक मुझे कोई बड़ी पोस्ट नहीं मिलती, तब तक तुम संभालो घर। वैसे भी तुम दिन-रात वुमन एम्पावरमेंट की बातें करती हो, अब साबित करो।”
सिद्धार्थ के इन शब्दों ने अवनि के भीतर बची हुई आख़िरी उम्मीद को भी भस्म कर दिया। वह उस इंसान को देखती रह गई जिसे उसने अपना जीवन सौंपा था। एक पुरुष का अहंकार इतना बड़ा था कि उसने बिना सोचे-समझे नौकरी छोड़ दी, लेकिन उसके अंदर अपने परिवार और नन्हीं बच्ची के भरण-पोषण की रत्ती भर भी फिक्र नहीं थी। वह अवनि को सिर्फ़ एक कमाने वाली मशीन और मुफ्त की नौकरानी समझ रहा था। उस रात अवनि सोई नहीं। वह रात भर बालकनी में खड़ी होकर आसमान को देखती रही।
अगले ही दिन शालिनी का यूं अचानक आ जाना अवनि के सब्र का बांध तोड़ गया था। अवनि ने शालिनी की गोद में सिर रखकर अपने पिछले चार सालों की पूरी दास्तान कह सुनाई। एक-एक आंसू के साथ उसका बरसों का दर्द बह निकला।
शालिनी की आंखें भी नम हो गईं। उसने गुस्से और अफ़सोस के मिले-जुले स्वर में कहा, “अवनि! मुझे यकीन नहीं हो रहा कि तू इस नरक में जी रही थी और हम सोच रहे थे कि तू सबसे खुश है। अब तू क्या करेगी? क्या ऐसे ही इस गैर-जिम्मेदार इंसान के तानों और आलस का बोझ जिंदगी भर ढोती रहेगी?”
अवनि ने अपने आंसू पोंछे। उसके चेहरे पर अब लाचारी की जगह एक अजीब सा ठहराव और दृढ़ता थी। उसने बहुत शांत लहजे में कहा, “नहीं शालिनी। अब और नहीं। मैंने अब तक जो सहा, वह प्यार और रिश्ते को बचाने के लिए था। लेकिन जब सामने वाले को आपकी मजबूरी में ही अपना आराम दिखने लगे, तो वहां प्यार नहीं, सिर्फ शोषण बचता है। मैं आज ही सिद्धार्थ से बात करूंगी। मैं उसे ठीक तीन महीने की मोहलत दूंगी। अगर इन तीन महीनों में उसने कोई भी काम ढूंढकर अपनी जिम्मेदारी नहीं उठाई और घर तथा बच्ची के प्रति अपना रवैया नहीं बदला, तो मैं अपनी बच्ची को लेकर इस घर से अलग हो जाऊंगी। बच्ची का पालन-पोषण तो मैं वैसे भी अकेले ही कर रही हूं, तो फिर इस खोखले रिश्ते का ढोंग क्यों ढोना? मैं एक सिंगल मदर बनकर अपनी बेटी को आत्मसम्मान के साथ पाल लूंगी, लेकिन किसी का बोझ बनकर या किसी का अहंकार पालने के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान नहीं करूंगी।”
शालिनी ने अवनि की पीठ थपथपाई और कहा, “मुझे अपनी वही पुरानी, मजबूत अवनि वापस दिख रही है। तू जो भी फैसला करेगी, मैं हमेशा तेरे साथ खड़ी रहूंगी।”
शालिनी के जाने के बाद अवनि ने सिद्धार्थ को ड्राइंग रूम में बुलाया। उसने कोई झगड़ा नहीं किया, कोई चीख-पुकार नहीं मचाई। उसने बिल्कुल सपाट और सख्त शब्दों में सिद्धार्थ के सामने अपनी बात रख दी, “सिद्धार्थ, तुम्हारे पास सिर्फ़ नब्बे दिन हैं। मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हें छोटी कंपनी में काम मिलता है या बड़ी में, लेकिन अगर तीन महीने के भीतर तुमने नौकरी शुरू नहीं की और घर की जिम्मेदारियों में आधा हाथ नहीं बंटाया, तो मैं नव्या को लेकर हमेशा के लिए तुमसे अलग हो जाऊंगी। और याद रखना, यह कोई धमकी नहीं है, यह मेरा अंतिम निर्णय है।”
सिद्धार्थ पहले तो हंसा। उसे लगा कि अवनि हमेशा की तरह सिर्फ गुस्सा दिखा रही है। उसने तंज कसा, “जाओगी कहां? तुम्हारे मां-बाप तो तुम्हें पानी भी नहीं पूछेंगे!”
अवनि ने उसकी आंखों में आंखें डालकर कहा, “मैं किसी के सहारे के भरोसे यह फैसला नहीं ले रही सिद्धार्थ। मैं पढ़ी-लिखी हूं, अपने पैरों पर खड़ी हूं। जो औरत दिन भर दफ्तर का काम करके रात भर अकेले बीमार बच्ची को संभाल सकती है, वह अपने दम पर एक सम्मानजनक जिंदगी भी जी सकती है। मुझे अब तुम्हारे या किसी और के सहारे की ज़रूरत नहीं है।”
अवनि की आवाज़ में जो चट्टान जैसी दृढ़ता और आंखों में जो आत्मसम्मान की ज्वाला थी, उसने पहली बार सिद्धार्थ की रीढ़ में एक सिहरन पैदा कर दी। सिद्धार्थ ने अवनि के चेहरे को देखा; वहां कोई डर या गिड़गिड़ाहट नहीं थी। वह समझ गया कि जिस अवनि को वह अब तक बेसहारा और मजबूर समझ रहा था, वह असल में अपने आत्मसम्मान के उस मुकाम पर पहुंच चुकी थी जहां से वापसी का कोई रास्ता नहीं था। उसे यह भी अहसास हुआ कि अगर अवनि सचमुच चली गई, तो वह समाज, परिवार और खुद अपनी नज़रों में कहीं का नहीं रहेगा।
उस एक झटके ने सिद्धार्थ के सिर से अहंकार और आलस का सारा नशा उतार दिया। अगले ही दिन से उसने अपनी ईगो को किनारे रखकर रिज्यूमे अपडेट किया और हर जगह इंटरव्यू देने शुरू किए। एक महीने की कड़ी मशक्कत के बाद उसे एक मध्यम स्तर की कंपनी में प्रोजेक्ट लीड की नौकरी मिल गई, भले ही पद उसकी पुरानी नौकरी से थोड़ा छोटा था, लेकिन उसने बिना किसी नखरे के उसे स्वीकार कर लिया।
नौकरी शुरू करने के साथ-साथ सिद्धार्थ के व्यवहार में भी ज़मीन-आसमान का बदलाव आने लगा। अब वह शाम को लौटकर नव्या को संभालता, उसे खाना खिलाता और रात को जब नव्या जागती, तो वह खुद उठकर अवनि को सोने के लिए कहता। रविवार को रसोई में अवनि का हाथ बंटाना और घर की सफाई करना अब उसकी आदत बन गई थी।
अवनि के उस एक कड़े और साहसी कदम ने न केवल उसके पति को उसकी जिम्मेदारियों का अहसास कराया, बल्कि उस बिखरते हुए परिवार को एक नई दिशा और मज़बूती भी दी।
जीवन की सच्चाई यही है कि किसी के बाहरी ठाठ-बाट या तथाकथित आज़ादी को देखकर उसकी खुशियों का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता। हर रिश्ते की अपनी धूप-छांव होती है। लेकिन जब प्यार की आड़ में आपका आत्मसम्मान छीना जाने लगे, तो मौन रहकर आंसू बहाने के बजाय अपनी शक्ति को पहचानना और सही समय पर सही कदम उठाना ही एक स्त्री का सबसे बड़ा धर्म बन जाता है।
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