सुमित्रा जी ने नीलिमा को गले से लगा लिया और ममता भरे स्वर में कहा, “बहू, तू हमारी बेटी जैसी है। नए घर में आकर खुद को ढालना आसान नहीं होता, हम तेरी परेशानी समझते हैं। इस घर पर जितना सौरभ का हक है, उतना ही तेरा भी है। तेरे माता-पिता हमारे समधी हैं, उनका आदर करना हमारा सबसे पहला फर्ज है।”
शाम के करीब सात बज रहे थे। जयपुर शहर की ठंडी हवाएं खिड़कियों से टकरा रही थीं, लेकिन घर के अंदर का माहौल किसी धधकती भट्टी से कम नहीं था। अलमारी के पट जोर से बंद करते हुए नीलिमा ने साड़ियों का ढेर बेड पर पटका। उसके चेहरे पर नाराजगी की लकीरें साफ देखी जा सकती थीं। कमरे में लैपटॉप पर काम कर रहे उसके पति सौरभ ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और एक गहरी सांस ली। वह जानता था कि यह सन्नाटा किसी बड़े तूफान की दस्तक है।
नीलिमा ने कमर पर हाथ रखा और सीधे सौरभ की आंखों में देखते हुए तल्ख लहजे में कहा, “सुनिए, हर बार दिवाली या होली आते ही आपका बैंक बैलेंस सिर्फ अपने ही रिश्तेदारों पर लुटाने के लिए क्यों तैयार रहता है? कभी आपने मेरे मायके के बारे में भी सोचा है? पूरे साल आप अपने माता-पिता की हर छोटी-बड़ी फरमाइश पूरी करते हैं, उनके इलाज से लेकर उनकी तीर्थयात्रा तक का खर्च उठाते हैं। मुझे उससे ऐतराज नहीं, लेकिन जब मेरे माता-पिता की बारी आती है, तो आपका हाथ क्यों रुक जाता है? साल में एकाध बार जब हम इंदौर जाते हैं, तो आप बस रस्म अदायगी के तौर पर कुछ लेकर जाते हैं। मैं यहां सुबह से रात तक आपके पूरे कुनबे की चाकरी करूं और बदले में मेरे अपने परिवार की कोई अहमियत ही न रहे?”
सौरभ ने लैपटॉप बंद किया और शांत स्वर में समझाने की कोशिश की, “नीलिमा, तुम बेवजह बात को तूल दे रही हो। जब भी हम तुम्हारे मायके जाते हैं, हम कभी खाली हाथ नहीं गए। तुम्हारे पापा की दवाइयों का खर्च हो या मम्मी के लिए कोई खास साड़ी, मैंने कभी किसी चीज के लिए मना किया क्या? तुम्हें जो पसंद हो, तुम अपनी मर्जी से खरीदो। मैंने तो कभी तुम्हारे हाथ नहीं रोके। फिर यह पक्षपात का इल्जाम मुझ पर क्यों लगा रही हो?”
“हां, सब मुझे ही करना पड़ता है ना!” नीलिमा का पारा और चढ़ गया, “आप कभी खुद आगे बढ़कर पूछते हैं कि बाबूजी को किस चीज की जरूरत है? मेरे माता-पिता ने मुझे पढ़ा-लिखाकर इतना बड़ा किया, काबिल बनाया और आज मैं यहां दूसरों के मां-बाप की सेवा में अपनी जिंदगी खपा रही हूं। क्या मेरी अपनी कोई पहचान नहीं है? क्या मेरा अपने परिवार के प्रति कोई फर्ज नहीं बचा?”
सौरभ ने झुंझलाते हुए कहा, “नीलिमा, शादी के बाद हर लड़की नए घर को अपनाती है। तुम इसे ‘दूसरों के मां-बाप’ कहकर रिश्तों को इतना पराया क्यों बना रही हो? आखिर तुम चाहती क्या हो? पहेलियां बुझाना बंद करो और साफ-साफ बताओ कि तुम्हारे दिमाग में चल क्या रहा है।”
नीलिमा ने अपनी आंखें तरेरते हुए कहा, “साफ सुनना है तो सुन लीजिए। अभी दोपहर में आपकी मां कह रही थीं कि इस दिवाली पर आपकी छोटी बहन श्वेता अपने पूरे ससुराल वालों के साथ यहां आएगी। मुझे यह सब तमाशा नहीं चाहिए। हर त्योहार पर श्वेता का यहां डेरा जम जाता है। कभी वो अपने सास-ससुर की सेवा क्यों नहीं करती? इस बार दिवाली पर मेरे मम्मी-पापा यहां आएंगे, बस बात खत्म। और अपनी मां और बाबूजी को समझा दीजिएगा कि अगर उन्हें समय पर गरम-गरम खाना और दवाइयां चाहिए, तो मेरी मर्जी के खिलाफ जाने की गलती न करें। अगर मैं रसोई में हड़ताल पर चली गई, तो सबको अपनी औकात समझ आ जाएगी।”
इतना कहकर नीलिमा पैर पटकती हुई कमरे से बाहर निकल गई।
सौरभ का सिर दर्द से फटने लगा था। ऑफिस के काम का दबाव, ईएमआई का बोझ और अब घर में यह रोज-रोज का कलेश। वह भारी कदमों से लिविंग रूम में आया और सोफे पर गिर सा पड़ा। उसने टीवी का रिमोट उठाया और चैनल बदलने लगा ताकि उसका दिमाग थोड़ा शांत हो सके।
तभी अंदर के कमरे से उसकी मां, सुमित्रा जी बाहर आईं। उनके चेहरे पर वही सहज ममता थी। उन्होंने बेटे के चेहरे पर थकान देखी तो बोलीं, “अरे सौरभ बेटा, तू आ गया? जरा आस्था चैनल लगा दे ना, वो शाम की आरती और कथा का समय हो गया है। मन को बड़ी शांति मिलती है।”
इससे पहले कि सौरभ चैनल लगाता, उसके पिता हरिप्रसाद जी भी लाठी टेकते हुए वहां आ पहुंचे। उन्होंने सुमित्रा जी को टोकते हुए कहा, “अरे भाग्यवान, दिन भर तो तुम भजन-कीर्तन सुनती रहती हो। आज भारत और ऑस्ट्रेलिया का बहुत अहम मैच आ रहा है। बेटा सौरभ, जरा स्पोर्ट्स चैनल लगा। आज हम दोनों बाप-बेटा मिलकर मैच का आनंद लेंगे। बहुत दिन हो गए साथ बैठकर कोई खेल देखे।”
सुमित्रा जी हंसकर बोलीं, “सुनिए जी, मैच तो कल भी आ जाएगा, पर यह कथा का आखिरी भाग है। आज इसे देख लेने दीजिए।”
माता-पिता आपस में मीठी नोकझोंक कर रहे थे, लेकिन सौरभ के अंदर का सब्र का बांध टूट चुका था। पत्नी के ताने और माता-पिता की यह साधारण सी बातें उसके दिमाग में हथौड़े की तरह बज रही थीं।
अचानक सौरभ अपनी जगह से उछलकर खड़ा हो गया और जोर से चिल्लाया, “बस कीजिए आप दोनों! क्या एक पल के लिए भी इस घर में मुझे शांति नहीं मिल सकती? सबको अपनी-अपनी पड़ी है! कोई यह नहीं देखता कि मैं किस हाल में जी रहा हूं। मां, जब आपके कमरे में अलग से टीवी लगवा दिया है, तो आप लोग यहां मेरे सिर पर क्यों सवार रहते हैं? सुबह से रात तक गधों की तरह कमाता हूं ताकि आप सबकी फरमाइशें पूरी कर सकूं, लेकिन खुद अपने ही घर में मुझे दो पल का सुकून मयस्सर नहीं है। क्या मेरी पूरी जिंदगी सिर्फ आप लोगों की गुलामी करने के लिए बनी है? आखिर आप लोग मुझसे चाहते क्या हैं? जान ले लीजिए मेरी!”
कमरे में सन्नाटा पसर गया। टीवी की स्क्रीन पर कोई विज्ञापन चल रहा था, लेकिन कमरे में मौजूद तीनों इंसानों की सांसें मानो थम गई थीं।
हरिप्रसाद जी और सुमित्रा जी सन्न रह गए। जिस बेटे को उन्होंने अपनी उंगलियों के सहारे चलना सिखाया था, जिसे कभी ऊंची आवाज में बोलने तक की इजाजत नहीं दी थी, आज वही बेटा उनके सामने आंखें लाल किए खड़ा था। वह जमाना बीत चुका था जब बच्चे माता-पिता के सामने नजरें झुकाकर बात करते थे। आज बूढ़े मां-बाप अपने ही बच्चों के गुस्से और बदमिजाजी से सहम जाते हैं।
हरिप्रसाद जी की आंखों में पानी उतर आया। उनके होंठ कुछ कहने के लिए कांपे, लेकिन सुमित्रा जी ने चुपचाप अपने पति का हाथ थाम लिया। उन्होंने नम आंखों से बेटे को देखा और बेहद धीमी, टूटी हुई आवाज में बोलीं, “चलिए जी, हम अपने कमरे में चलते हैं। बेटा थक गया है।”
दोनों बुजुर्ग धीरे-धीरे अपने कमरे की ओर बढ़ गए। दरवाजा हल्के से बंद हुआ, लेकिन उस बंद दरवाजे ने सौरभ के दिल पर एक भारी बोझ छोड़ दिया।
पुराने दौर में जब माता-पिता को बच्चों को कोई बात समझानी होती थी, तो वे प्यार से, संस्कार और समझाइश से माहौल को संभालते थे। लेकिन आज की पीढ़ी जब अपनों पर दबाव बनाना चाहती है, तो चिल्लाकर, अपमानित करके घर के पूरे वातावरण में जहर घोल देती है। सौरभ ने भी अपनी खीझ और लाचारी का गुस्सा उन बेबस कंधों पर उतार दिया था, जिन्होंने कभी उसे अपने कंधों पर बिठाकर पूरी दुनिया दिखाई थी।
अगले दो दिन तक घर का नजारा बदल गया। घर में अजीब सी खामोशी छा गई थी। हरिप्रसाद जी और सुमित्रा जी सिर्फ खाना खाने के वक्त ही अपने कमरे से बाहर निकलते थे। वे चुपचाप डाइनिंग टेबल पर बैठते, जितना रूखा-सूखा मिलता, चुपचाप खाकर वापस अपने कमरे में चले जाते। न कोई बात, न कोई फरमाइश, न टीवी देखने की जिद। घर में रहते हुए भी वे जैसे उस घर से पूरी तरह कट चुके थे।
नीलिमा को अपनी जीत का अहसास हो रहा था, लेकिन सौरभ के अंदर एक गहरा अपराधबोध पनप रहा था। तीसरे दिन दोपहर में सौरभ किसी काम से जल्दी घर आ गया। घर में सन्नाटा था। नीलिमा किसी काम से पड़ोस में गई हुई थी। सौरभ जैसे ही अपने माता-पिता के कमरे के पास से गुजरा, उसे अंदर से फुसफुसाहट सुनाई दी।
दरवाजा थोड़ा सा खुला था। सौरभ अनजाने में ही वहां रुक गया।
अंदर हरिप्रसाद जी अपनी पुरानी संदूक से कुछ कागजात और एक छोटी सी मखमली डिब्बी निकाल रहे थे। सुमित्रा जी बेड पर बैठी थीं।
हरिप्रसाद जी ने कहा, “सुमित्रा, यह मेरी पुरानी एफडी के कुछ पैसे हैं जो इस महीने पूरे हुए हैं। और यह तुम्हारी वो सोने की चेन है जो तुमने बचाकर रखी थी। नीलिमा के माता-पिता आ रहे हैं दिवाली पर। हमें उनके स्वागत में कोई कमी नहीं रखनी चाहिए। बेटी के मां-बाप जब पहली बार किसी बड़े त्योहार पर आ रहे हों, तो उनका मान-सम्मान राजाओं जैसा होना चाहिए। नीलिमा को लगना चाहिए कि यह उसका अपना घर है।”
सुमित्रा जी ने मुस्कुराते हुए अपनी आंखों के आंसू पोंछे और बोलीं, “हां जी, आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। मैं तो सोच रही थी कि नीलिमा की मां को यह सोने की चेन भेंट कर दूं और उसके बाबूजी के लिए अच्छे से शॉल और कपड़े ले आऊं। बहू हमारी है, उसका मान हमारा मान है। बस मुझे चिंता सौरभ की है। बच्चा बहुत तनाव में रहता है। दिन-रात काम करता है, उसका स्वभाव ऐसा तो कभी नहीं था। उस दिन उसने गुस्से में जो कहा, मुझे उसका बुरा नहीं लगा, मुझे बस यह डर सताता है कि कहीं वो अपने अंदर ही अंदर घुट न रहा हो।”
हरिप्रसाद जी ने गहरी सांस ली, “सुमित्रा, बच्चे जब बड़े होते हैं, तो जिम्मेदारियों के बोझ तले दब जाते हैं। हमें उनका सहारा बनना चाहिए, बोझ नहीं। अगर हमारे चुप रहने से और अलग रहने से इस घर में शांति रहती है, तो हम यही करेंगे। बस हमारे बच्चे खुश रहें।”
कमरे के बाहर खड़े सौरभ के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसकी आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। जिन माता-पिता को वह अपने तनाव का कारण समझ रहा था, जो पत्नी के तानों के आगे उसे बोझ लग रहे थे, वे अपनी बची-खुची पूंजी भी उसकी पत्नी के माता-पिता के सम्मान के लिए न्योछावर करने को तैयार बैठे थे।
सौरभ को लगा कि उससे बड़ा पापी और नालायक बेटा इस दुनिया में कोई नहीं हो सकता। उसने अपने ही माता-पिता के आत्मसम्मान को अपने अहंकार की भेंट चढ़ा दिया था।
वह और खुद को रोक न सका। वह तेजी से कमरे के अंदर गया और सीधे अपने पिता के पैरों में गिर पड़ा।
“बाबूजी! मां! मुझे माफ कर दीजिए… मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया है,” सौरभ बच्चों की तरह बिलख-बिलख कर रोने लगा।
हरिप्रसाद जी और सुमित्रा जी घबरा गए। हरिप्रसाद जी ने झुककर अपने बेटे को उठाया और अपने सीने से लगा लिया। “अरे बेटा, क्या हुआ? ऐसे क्यों रो रहा है? तू तो हमारा अभिमान है।”
“नहीं बाबूजी, मैं एक बहुत बुरा बेटा हूं। मैंने अपनी खीझ, अपनी नाकामियों का गुस्सा आप दोनों पर निकाल दिया। आपने पूरी जिंदगी मेरे लिए कुर्बान कर दी और मैंने… मैंने दो कौड़ी के आराम के लिए आप दोनों को बेगाना कर दिया।” सौरभ का रोना थम नहीं रहा था। सुमित्रा जी ने भी बेटे के सिर पर हाथ फेरा और उसके आंसू पोंछते हुए बोलीं, “पगले, मां-बाप कभी अपने बच्चों से नाराज होते हैं क्या? तू शांत हो जा।”
उसी समय नीलिमा भी घर वापस आई और कमरे के बाहर खड़े होकर यह सब देखने लगी। उसने जब ससुर जी के हाथ में वो मखमली डिब्बी और पैसे देखे, और सौरभ को इस तरह रोते हुए देखा, तो उसका दिल भी कांप उठा।
सौरभ ने पलटकर नीलिमा को देखा। उसने नीलिमा का हाथ पकड़ा और उसे भी कमरे के अंदर ले आया।
सौरभ ने बेहद संजीदगी से कहा, “नीलिमा, आज मुझे समझ आ गया कि परिवार हिसाब-किताब से नहीं चलता। तुमने मुझसे कहा था कि मैं तुम्हारे माता-पिता के बारे में नहीं सोचता, शायद तुम सही थीं। लेकिन देखो, जिन सास-ससुर को तुम पराया समझ रही थीं, वे अपनी जिंदगी की आखिरी जमा-पूंजी तुम्हारे माता-पिता के स्वागत में लगाने की तैयारी कर रहे थे। क्या यही वो ‘दूसरे के मां-बाप’ हैं जिनकी सेवा करना तुम्हें गुलामी लग रहा था?”
नीलिमा की नजरें शर्म से झुक गईं। उसके कानों में अपनी ही कही हुई वो कड़वी बातें गूंजने लगीं—’गरम-गरम रोटी मिलना बंद हो जाएगी’, ‘दूसरों के मां-बाप की सेवा’।
नीलिमा के अंदर का सारा अहंकार, सारी कड़वाहट उस एक पल में आंसुओं के रूप में बह निकली। वह आगे बढ़ी और उसने सुमित्रा जी के हाथ पकड़ लिए।
“मां जी… मुझे माफ कर दीजिए। मैं स्वार्थ और ईर्ष्या के अंधेपन में इतनी अंधी हो गई थी कि रिश्तों की पवित्रता ही भूल गई। मैंने कभी आपको अपनी मां समझा ही नहीं, बस एक सास की नजर से देखा। मुझे अपनी गलती पर बहुत पछतावा हो रहा है।”
सुमित्रा जी ने नीलिमा को गले से लगा लिया और ममता भरे स्वर में कहा, “बहू, तू हमारी बेटी जैसी है। नए घर में आकर खुद को ढालना आसान नहीं होता, हम तेरी परेशानी समझते हैं। इस घर पर जितना सौरभ का हक है, उतना ही तेरा भी है। तेरे माता-पिता हमारे समधी हैं, उनका आदर करना हमारा सबसे पहला फर्ज है।”
हरिप्रसाद जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “तो फिर तय रहा! इस दिवाली पर श्वेता भी अपने परिवार के साथ आएगी और नीलिमा के माता-पिता भी हमारे मेहमान बनेंगे। सब मिलकर यह त्योहार मनाएंगे। घर में जब तक चार बर्तन न खटकें, तब तक परिवार का आनंद कैसा?”
उस दिन उस घर की फिजा बदल गई। जो दीवारें तनाव और कड़वाहट से घिरी हुई थीं, वे प्यार और सम्मान की खुशबू से महक उठीं। नीलिमा ने समझ लिया था कि सम्मान मांगने से नहीं, सम्मान देने से मिलता है। और सौरभ ने यह सीख लिया था कि चाहे बाहर की दुनिया में कितना भी तनाव क्यों न हो, उसका असर कभी अपने बूढ़े माता-पिता के आत्मसम्मान पर नहीं पड़ना चाहिए।
उस रात बहुत दिनों बाद घर में एक साथ बैठकर सबने खाना खाया। टीवी पर मैच भी चला और आरती भी हुई, और उन सबसे बढ़कर, पूरे घर में अपनों के ठहाकों की गूंज थी।
दोस्तों, अक्सर आधुनिकता की दौड़ और जिम्मेदारियों के दबाव में हम उन रिश्तों की कद्र करना भूल जाते हैं, जिन्होंने हमें इस काबिल बनाया। क्या आपको भी लगता है कि रिश्तों में संतुलन बनाए रखने के लिए सिर्फ बच्चों को ही नहीं, बल्कि दोनों पक्षों को एक-दूसरे के माता-पिता को समान आदर देना चाहिए? इस कहानी पर आपकी क्या राय है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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लेखिका : निधि गुप्ता