अनदेखी तपस्या

 सुहानी की आंखें तुरंत खुल जाती हैं। वह इंसान है आलोक, कोई मशीन नहीं। उसे भी थकान होती है, उसे भी दर्द होता है। पर बदले में वह क्या मांगती है? बस तुम्हारे दो मीठे बोल और थोड़ा सा सम्मान। और तुम उसे क्या देते हो? ताने और तिरस्कार?”

आलोक फूट-फूट कर रो पड़ा। “दीदी, मुझे माफ कर दो। मैं सच में अंधा हो गया था। मुझे कभी लगा ही नहीं कि जिसे मैं ‘घर पर बैठना’ कहता था, वह दरअसल चौबीस घंटे की हाड़-तोड़ तपस्या है। मैंने सुहानी के साथ बहुत बुरा किया है। मैंने उसके आत्मसम्मान की धज्जियां उड़ाई हैं। मैं अपनी नजरों में गिर चुका हूं दीदी। मैं अभी जाऊंगा और उससे माफी मांगूंगा।”

सुबह के ठीक छह बजे जब अलार्म की घंटी बजी, तो सुहानी हड़बड़ा कर बिस्तर से उठ बैठी। उसकी रात भर की अधूरी नींद आंखों में भारीपन बनकर तैर रही थी। सर्दियों की ठंडी हवाएं कमरे की खिड़की से छनकर आ रही थीं। सुहानी ने सबसे पहले पास के झूले में सो रही अपनी डेढ़ साल की नन्हीं बेटी पंखुड़ी पर नजर डाली, जो ठंड के कारण चादर से मुंह ढके चैन की नींद सो रही थी। उसने बच्ची को ठीक से ढका और बिना कोई आवाज किए कमरे से बाहर निकल आई। हॉल पार करके वह सीधे अपनी सास, सरला जी के कमरे में गई। सरला जी पिछले छह महीनों से गठिया और पक्षाघात के कारण बिस्तर पर थीं। उनकी दवाइयों का समय, गर्म पानी का थैला और शरीर को पोंछने का काम सुहानी ही रोज बिना किसी शिकायत के करती थी।

सास को ताज़ा गर्म पानी पिलाने, उनकी दवाइयां देने और उनके बिस्तर को व्यवस्थित करने के बाद सुहानी दौड़ती हुई रसोई में पहुंची। आज का दिन उसके लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। सुबह आठ बजे उसके पति आलोक को दफ्तर निकलना था, सवा आठ बजे ससुर जी के नाश्ते का वक्त था और नौ बजे बच्ची को दलिया खिलाकर मालिश करनी थी। गैस के चूल्हे पर एक तरफ चाय की केतली खदबद कर रही थी, दूसरी तरफ कुकर में दाल चढ़ी थी और सुहानी के हाथ तेजी से आटे की लोइयां बेल रहे थे।

तभी बेडरूम से आलोक की गरजती हुई आवाज गूंजी, “सुहानी! अरे सुहानी, कहां मर गई हो तुम? सुनाई नहीं देता क्या?”

आलोक हाथ में सफेद फॉर्मल शर्ट लिए कमरे के बाहर आया। उसके चेहरे पर चिढ़ और गुस्सा साफ झलक रहा था।

“क्या हुआ आलोक? मैं रसोई में नाश्ता बना रही थी,” सुहानी ने अपनी साड़ी के पल्लू से माथे का पसीना पोंछते हुए कहा।

“क्या हुआ? तुम्हें यह पूछने की हिम्मत कैसे हुई? यह देखो मेरी शर्ट! इसका कॉलर ठीक से प्रेस नहीं हुआ है और नीचे का बटन अब तक टूटा हुआ पड़ा है। कल रात मैंने तुमसे साफ-साफ कहा था कि आज मेरी बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के साथ प्रेजेंटेशन है। पर तुम्हें तो जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता! तुम औरतें दिन भर घर में बैठकर करती क्या हो, मुझे तो आज तक समझ नहीं आया!” आलोक ने शर्ट को सोफे पर पटकते हुए चीख कर कहा।

सुहानी का सिर झुक गया। उसकी आंखों के कोरों से आंसू छलकने ही वाले थे कि उसने खुद को संभाल लिया। “आलोक, कल रात माताजी की कमर में बहुत तेज दर्द था, उन्हें बाम लगाकर दबाते-दबाते रात के दो बज गए। फिर पंखुड़ी रोने लगी थी। सुबह उठते ही चाय-नाश्ते में लग गई, बिल्कुल ध्यान से उतर गया। मैं बस पांच मिनट में सुई-धागा लेकर बटन टांक देती हूं।”

“रहने दो! तुम्हारी रोज की यही बहानेबाजी है। बीमार मां का बहाना, बच्ची का बहाना! खुद से कुछ नहीं संभलता तो दूसरों पर मढ़ दो। बाहर निकलकर देखो दुनिया कितनी तेज भाग रही है। हम पुरुष बारह-बारह घंटे बाहर खून-पसीना बहाकर पैसा कमाते हैं, तब जाकर यह घर चलता है। और तुम लोगों से बस एक घर और हमारा थोड़ा सा काम नहीं संभाला जाता। आलसी हो गई हो तुम बिल्कुल!” आलोक के शब्द तीरों की तरह सुहानी के कलेजे में चुभ रहे थे।

हॉल के एक कोने में खड़ी आलोक की बड़ी बहन, नीरजा, यह सब खामोशी से देख और सुन रही थी। नीरजा दो दिन पहले ही जयपुर से अपने मायके आई हुई थी। उसने देखा कि सुहानी ने बिना पलटकर एक भी जवाब दिए, कांपते हाथों से सोफे से शर्ट उठाई, अलमारी से धागा निकाला और तेजी से बटन लगाने लगी। उसकी उंगली में सुई भी चुभी, खून की एक हल्की सी बूंद उभरी, लेकिन उसने उंगली को साड़ी से दबाया और काम पूरा करके आलोक को शर्ट थमा दी।

आलोक बड़बड़ाते हुए कमरे में गया और शर्ट पहनकर डाइनिंग टेबल पर आ बैठा। सुहानी ने फुर्ती से उसके आगे भाप उड़ती चाय और परांठे रख दिए। आलोक ने मोबाइल की स्क्रीन पर नजरें गड़ाए हुए चाय का पहला घूंट भरा। घूंट गले से नीचे उतरते ही उसका चेहरा तमतमा गया। उसने झटके से कप टेबल पर पटका, जिससे गरम चाय की कुछ बूंदें टेबल क्लॉथ पर फैल गईं।

“हे भगवान! इस औरत का दिमाग पूरी तरह सड़ चुका है। यह चाय है या चीनी का शर्बत? कितनी बार कहा है कि मुझे फीकी चाय पसंद है। तुम जैसी अनपढ़ और लापरवाह औरत के साथ जिंदगी बिताना सजा बन गया है। काम करने का कोई सलीका नहीं, बस चौबीसों घंटे घर में बैठकर हुक्म चलाओ या रोटी तोड़ो। तुमसे तो एक कप चाय तक ढंग से नहीं बनती!” आलोक गुस्से में अपनी ब्रीफकेस उठाकर बाहर की ओर बढ़ गया। “आज मुझे नाश्ता नहीं करना। बाहर ही कुछ खा लूंगा।”

दरवाजा जोर से बंद हुआ। उस धमक से पूरा घर सिहर उठा।

सुहानी वहीं फर्श पर बैठ गई और अपने दोनों हाथों में चेहरा छुपाकर फफक-फफक कर रो पड़ी। उसका पूरा शरीर सिसकियों से कांप रहा था। नीरजा धीरे से आगे बढ़ी और उसने सुहानी के कंधे पर हाथ रखा।

“भाभी…” नीरजा का स्वर गीला था। “तुम चुप क्यों रह जाती हो? तुम उसके सामने अपना पक्ष क्यों नहीं रखतीं? क्यों सहती हो यह सब? क्या तुम इस घर की नौकरानी हो? बोलो भाभी, जब वह चिल्लाता है तो तुम उसे यह सब गिनाती क्यों नहीं जो तुम सुबह से रात तक करती हो?”

सुहानी ने भीगी आंखों से ननद की तरफ देखा और फीकी सी मुस्कान के साथ बोली, “दीदी, पति हैं वो मेरे। बाहर काम का बहुत तनाव रहता है। अगर मैं भी आगे से बोलने लगूंगी, तो घर का माहौल खराब होगा। माताजी बीमार हैं, उन पर क्या बीतेगी? पंखुड़ी डर जाएगी। मैं सह लेती हूं तो घर में शांति बनी रहती है। बस कभी-कभी दिल टूट जाता है जब वो कहते हैं कि मैं दिन भर करती ही क्या हूं…”

नीरजा ने एक गहरी सांस ली। उसने मन ही मन कुछ ठान लिया था। वह जानती थी कि चुपचाप सहने से कभी हालात नहीं बदलते, बल्कि सामने वाले का अहंकार और बढ़ जाता है। उसने सुहानी के आंसू पोंछे और कहा, “भाभी, बस बहुत हो गया। अब वक्त आ गया है कि आलोक को यह आईना दिखाया जाए कि घर चलाने का असली मतलब क्या होता है।”

दोपहर को नीरजा ने एक सोची-समझी योजना बनाई। उसने सुहानी से कहा, “भाभी, तुम्हारी मौसी का घर यहीं पास के इलाके में है ना? तुम पंखुड़ी को लेकर दो-तीन दिनों के लिए वहां जाओगी।”

“नहीं दीदी, यह कैसे हो सकता है? माताजी की देखभाल कौन करेगा? आलोक का खाना, घर के सौ काम… सब बिखर जाएगा,” सुहानी घबराकर बोली।

“माताजी को आज दोपहर का खाना, दवाइयां और उनकी जरूरत का सब सामान मैं पहले ही दे चुकी हूं। और आगे की चिंता तुम मत करो। जब तक आलोक को अपनी गलती का अहसास नहीं होगा, वह तुम्हारा सम्मान कभी नहीं करेगा। अगर तुम चाहती हो कि तुम्हारी आने वाली जिंदगी में तुम्हें इंसान समझा जाए, तो तुम्हें मेरी बात माननी होगी। चलो, कपड़े पैक करो।” नीरजा का स्वर इतना दृढ़ था कि सुहानी चाहकर भी मना नहीं कर सकी। आधे घंटे के भीतर सुहानी अपनी बच्ची को लेकर मौसी के घर चली गई।

शाम के करीब सात बजे जब आलोक थका-हारा घर लौटा, तो घर में अजीब सा सन्नाटा था। आमतौर पर जब वह आता था, तो दरवाजे पर सुहानी मुस्कुराते हुए मिलती थी, उसके हाथ से बैग लेती थी, पंखे का स्विच ऑन करती थी और दो मिनट में ठंडा पानी हाजिर हो जाता था।

आज दरवाजा खुला था, पर कोई सामने नहीं था।

“सुहानी! अरे कहां हो तुम? जरा एक गिलास ठंडा पानी तो लाना, गला सूख रहा है,” आलोक ने जूते उतारते हुए आवाज लगाई।

कोई जवाब नहीं आया। आलोक झुंझलाता हुआ अंदर गया। सोफे पर उसकी बहन नीरजा बैठी किताब पढ़ रही थी।

“अरे दीदी, आप यहां बैठी हैं? यह सुहानी कहां है? मेरी आवाज नहीं सुन रही क्या?”

नीरजा ने किताब से नजरें हटाकर शांत भाव से कहा, “सुहानी अपनी मौसी के घर गई है। पंखुड़ी को भी साथ ले गई है।”

“क्या? मौसी के घर? मुझसे बिना पूछे? उसकी इतनी हिम्मत कैसे हुई? मां बीमार पड़ी हैं और वह सैर-सपाटे पर निकल गई?” आलोक का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया।

“चिल्लाओ मत आलोक, मां सो रही हैं,” नीरजा ने टोकते हुए कहा। “सुहानी अपनी मर्जी से नहीं गई, मैंने उसे भेजा है। बेचारी महीनों से कहीं बाहर नहीं निकली थी। और वैसे भी, तुम तो कहते हो कि घर में कोई काम ही नहीं होता। जब कोई काम ही नहीं है, तो उसके यहां रहने या न रहने से क्या फर्क पड़ता है? वैसे मैं भी आज रात अपने कॉलेज के दोस्तों के साथ डिनर पर जा रही हूं। तो आज रात का खाना और मां की देखभाल तुम्हें ही करनी होगी।”

“दीदी, यह आप क्या कह रही हैं? मैं खाना कैसे बनाऊंगा? मुझे तो चाय के अलावा कुछ बनाना नहीं आता!” आलोक की घबराहट साफ झलक रही थी।

“अरे, इसमें क्या रॉकेट साइंस है भाई? तुम तो इतने बड़े कॉरपोरेट मैनेजर हो, सैकड़ों लोगों की टीम संभालते हो। जब तुम बाहर इतना बड़ा काम कर सकते हो, तो यह घर का मामूली काम तो तुम्हारे बाएं हाथ का खेल होना चाहिए। आखिर घर का काम होता ही क्या है!” नीरजा ने मुस्कुराते हुए आलोक की ही बात उस पर लौटा दी और अपना पर्स उठाकर बाहर निकल गई।

आलोक सन्न रह गया। घर में अब केवल वह और उसकी बीमार मां थे।

रात के आठ बजते ही मां के कमरे से कराहने की आवाज आई। आलोक दौड़कर वहां पहुंचा।

“बेटा आलोक… सुहानी कहां है? मेरी कमर में बहुत तेज दर्द हो रहा है, थोड़ा तेल मालिश कर देती और मेरी रात की बीपी वाली गोली दे देती,” सरला जी ने दर्द से कराहते हुए कहा।

“मां, वो… वो बाहर गई है। मैं दवा देता हूं।” आलोक ने दवाइयों के डिब्बे में हाथ डाला। वहां दर्जनों स्ट्रिप्स रखी थीं। वह उलझ कर रह गया कि कौन सी गोली रात की है और कौन सी दोपहर की। पंद्रह मिनट तक वह प्रिस्क्रिप्शन और पत्तों को मिलाकर देखता रहा, तब जाकर सही गोली ढूंढ पाया। पानी पिलाते समय आधा पानी बिस्तर पर गिर गया, जिसे साफ करने में उसे पसीने छूट गए। फिर उसने मां की कमर पर बाम लगाया, पर उसके अनाड़ी हाथों के दबाव से मां और दर्द से कराह उठीं। आलोक का खुद का दम फूलने लगा था।

जैसे-तैसे मां को लिटाकर वह रसोई में आया। भूख के मारे उसके पेट में चूहे कूद रहे थे। उसने सोचा कि खिचड़ी बना लेता हूं, सबसे आसान वही होगी।

उसने कुकर निकाला। उसे यह नहीं पता था कि एक कटोरी दाल में कितना पानी डलता है। उसने अंदाजे से दाल-चावल धोए, कुकर में डाले और पानी भर दिया। फिर उसने सोचा कि इसमें नमक और हल्दी डालनी चाहिए। जल्दीबाजी में उसने चम्मच की जगह सीधे डिब्बे से नमक उड़ेल दिया।

गैस जलाकर उसने कुकर चढ़ाया और इतने में उसके मोबाइल की घंटी बजी। उसके ऑफिस के बॉस का फोन था। आलोक फोन कान पर लगाकर हॉल में टहलते हुए प्रोजेक्ट की बातें करने लगा। बातों में ऐसा उलझा कि उसे रसोई से आती जलने की बदबू का अहसास ही नहीं हुआ। जब अचानक सीटी से पानी की जगह गाढ़ा काला धुआं निकलने लगा, तो आलोक होश में आया।

उसने भागकर गैस बंद की। पूरा किचन धुएं से भर चुका था। जब उसने कुकर का ढक्कन खोला, तो नीचे खिचड़ी पूरी तरह जलकर काली हो चुकी थी और ऊपर का पानी सूख चुका था। जो थोड़ी बहुत खिचड़ी बची थी, उसे जब उसने चख कर देखा, तो उसमें इतना तेज नमक और कड़वाहट थी कि वह निगल भी नहीं सका।

थक-हारकर आलोक ने सिर पकड़ लिया। घड़ी में रात के दस बज रहे थे। भूख से उसका सिर चकरा रहा था। रसोई का प्लेटफॉर्म गंदा पड़ा था, सिंक में बर्तन जमा थे और गैस चूल्हे पर दाल का जला हुआ पानी फैला हुआ था। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि एक वक्त का खाना बनाना और बीमार मां को संभालना इतना बड़ा मानसिक और शारीरिक परिश्रम हो सकता है।

तभी बाहर का दरवाजा खुला और नीरजा अंदर आई। उसने रसोई की हालत देखी और फिर फर्श पर बेबस बैठे आलोक को देखा।

नीरजा धीरे से उसके पास आई और एक कुर्सी खींचकर बैठ गई। “क्या हुआ भाई साहब? बन गया खाना? हो गया घर का मामूली सा काम?”

आलोक ने अपनी लाल और थकी हुई आंखें ऊपर उठाईं। उसकी आंखों में आंसू थे। उसका सारा पुरुष दंभ, सारा कॉरपोरेट का घमंड उस जले हुए कुकर के सामने चूर-चूर हो चुका था।

“दीदी… मुझसे नहीं हो रहा,” आलोक का गला रुंध गया। “मैं तो सिर्फ तीन घंटे में ही पागल होने की कगार पर पहुंच गया हूं। मां की दवाइयां समझ नहीं आ रही थीं, उनका दर्द कम करने की जगह मैंने बढ़ा दिया। यह खाना… यह खाना मुझसे बन ही नहीं पाया। मैं तो भूखा रह लूंगा, पर मां को क्या खिलाऊं? मेरी रीढ़ की हड्डी टूट रही है दीदी।”

नीरजा ने उसके कंधे पर हाथ रखा और बेहद गंभीर स्वर में बोली, “आलोक, अब समझ आया तुम्हें? सुहानी रोज यही करती है। बिना किसी संडे के, बिना किसी सैलरी के, बिना किसी प्रमोशन या अप्रेजल के! वह सुबह छह बजे से लेकर रात के बारह बजे तक इसी रसोई, इसी घर और हम सबकी तीमारदारी में जुटी रहती है। उसकी खुद की कोई ख्वाहिश नहीं बचती। अगर उसकी एक दिन चाय में चीनी ज्यादा हो गई, तो तुमने उसे अनपढ़ और निकम्मी कह दिया? अगर कभी काम के बोझ में वह तुम्हारी शर्ट का बटन लगाना भूल गई, तो तुमने उसके पूरे वजूद को नकार दिया?”

आलोक का सिर शर्म से झुकता चला गया।

नीरजा आगे बोली, “तुम बाहर आठ या दस घंटे काम करते हो और घर आकर सोफे पर पसर जाते हो कि तुम बहुत थक गए। सुहानी चौबीस घंटे ऑन-ड्यूटी रहती है। जब तुम रात को खर्राटे मारते हो, तब भी अगर पंखुड़ी जरा सी कुनमुनाए, तो सुहानी की आंखें तुरंत खुल जाती हैं। वह इंसान है आलोक, कोई मशीन नहीं। उसे भी थकान होती है, उसे भी दर्द होता है। पर बदले में वह क्या मांगती है? बस तुम्हारे दो मीठे बोल और थोड़ा सा सम्मान। और तुम उसे क्या देते हो? ताने और तिरस्कार?”

आलोक फूट-फूट कर रो पड़ा। “दीदी, मुझे माफ कर दो। मैं सच में अंधा हो गया था। मुझे कभी लगा ही नहीं कि जिसे मैं ‘घर पर बैठना’ कहता था, वह दरअसल चौबीस घंटे की हाड़-तोड़ तपस्या है। मैंने सुहानी के साथ बहुत बुरा किया है। मैंने उसके आत्मसम्मान की धज्जियां उड़ाई हैं। मैं अपनी नजरों में गिर चुका हूं दीदी। मैं अभी जाऊंगा और उससे माफी मांगूंगा।”

“आज रात नहीं आलोक,” नीरजा ने शांत स्वर में कहा। “मैंने आते वक्त मां के लिए दलिया बना कर टिफिन में पैक करवा लिया था और तुम्हारे लिए भी खाना लाई हूं। आज रात तुम अपनी इस गलती और इस अहसास के साथ सोओ। कल सुबह हम खुद चलेंगे।”

उस रात आलोक सो नहीं सका। वह बार-बार करवटें बदलता रहा। उसे हर कोने में सुहानी की मेहनत दिखाई दे रही थी—सलीके से सजे हुए पर्दे, साफ-सुथरे फर्श, दवाइयों की व्यवस्थित कतारें… सब कुछ सुहानी के चुपचाप किए गए त्याग की गवाही दे रहे थे।

अगली सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही आलोक उठ गया। उसने खुद झाड़ू उठाई और पूरे घर को साफ किया। रसोई का जला हुआ कुकर अपने हाथों से मांजा। फिर उसने मां को नहलाने में मदद की और ताज़ा नाश्ता तैयार करने की कोशिश की।

इसके बाद वह नीरजा को लेकर सीधे अपनी ससुराल यानी सुहानी की मौसी के घर पहुंचा।

सुहानी आंगन में बैठी पंखुड़ी को धूप दिखा रही थी। जब उसने अचानक आलोक और नीरजा को देखा, तो वह सहम कर खड़ी हो गई। उसे लगा कि शायद आलोक कल की बात को लेकर और ज्यादा गुस्सा करने आया है।

लेकिन यह क्या? आलोक तेजी से आगे बढ़ा और बिना किसी औपचारिकता के, सुहानी के सामने दोनों हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। उसकी आंखों से पश्चाताप के आंसू बह रहे थे।

“सुहानी… मुझे माफ कर दो,” आलोक की आवाज कांप रही थी। “मैं एक बहुत बुरा पति साबित हुआ हूं। मैंने कभी तुम्हारी मेहनत, तुम्हारे त्याग और तुम्हारे समर्पण को नहीं समझा। कल जब तुम घर में नहीं थीं, तब मुझे समझ आया कि तुम्हारे बिना उस घर की कोई औकात नहीं है। मैं तो कुछ घंटों में बिखर गया, और तुम सालों से यह सब मुस्कुरा कर झेल रही हो। मैंने तुम्हें जो भी कड़वे शब्द कहे, जो घाव तुम्हारे दिल को दिए, उनके लिए मैं जिंदगी भर शर्मिंदा रहूंगा। प्लीज, अपने इस मूर्ख पति को माफ कर दो और घर वापस चलो। वह घर तुम्हारे बिना सिर्फ ईंट-पत्थरों का ढेर है।”

सुहानी अवाक रह गई। जिस पति ने कभी अपनी गलती नहीं मानी थी, जो हमेशा अपने दंभ में चूर रहता था, आज वह भरी आंखों से उसके सामने हाथ जोड़े खड़ा था। एक भारतीय नारी का दिल कितना कोमल होता है, इसका प्रमाण सुहानी थी। आलोक के इस सच्चे पश्चाताप ने उसके सीने में दबे सारे गिलों-शिकवों को एक पल में धो दिया।

सुहानी ने आगे बढ़कर आलोक के हाथ थाम लिए और आंसुओं के बीच मुस्कुराते हुए कहा, “ऐसा मत कहिए। आप समझ गए, मेरे लिए यही बहुत है। चलिए, घर चलते हैं। माताजी की दवा का वक्त हो रहा होगा।”

नीरजा दूर खड़ी यह सब देख रही थी। उसके चेहरे पर एक गहरी और सुकून भरी मुस्कान तैर गई। उसने न सिर्फ अपने भाई का घर टूटने से बचा लिया था, बल्कि एक औरत के अस्तित्व, उसकी गरिमा और उसके श्रम को वह सम्मान दिलवा दिया था, जिसकी वह असली हकदार थी।

उस दिन के बाद से उस घर की आबो-हवा पूरी तरह बदल गई। अब आलोक जब भी ऑफिस से आता, सुहानी के कामों में हाथ बंटाता, कभी चाय वह खुद बनाता तो कभी मां की सेवा में सुहानी का सहारा बनता। उस घर में अब चीख-पुकार की जगह प्यार, समझदारी और आपसी सम्मान की मीठी खुशबू महक रही थी।

दोस्तों, एक गृहिणी यानी हाउसवाइफ का काम किसी भी दफ्तर की नौकरी से कहीं ज्यादा कठिन और थका देने वाला होता है, क्योंकि उसके काम में न कोई छुट्टी होती है और न ही कोई तय समय। अक्सर हमारे समाज में पुरुष यह कह देते हैं कि “तुम दिन भर करती ही क्या हो?” क्या आपके आसपास भी किसी ने कभी ऐसा अनुभव किया है? एक औरत की मेहनत और उसके सम्मान पर आपकी क्या राय है? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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