अंकिता का एक-एक शब्द सुमित के अंतर्मन पर हथौड़े की तरह लगा। एक पर्दा सा उसकी आंखों से हट गया। उसने महसूस किया कि वह अपने खोखले पौरुष के गुरूर में कितना अंधा हो चुका था। जिस औरत ने इस घर को मंदिर बनाया, उसी के सपनों की बलि चढ़ाकर वह खुद को बड़ा साबित करने की बचकानी कोशिश कर रहा था। वह अपनी ही पत्नी को पीछे धकेल कर अपने परिवार और बच्चों की नजरों में कितना गिर चुका था।
इंदौर के पुराने मोहल्ले के एक शांत कोने में बने दोमंजिला मकान की बालकनी से ढलती शाम का मंजर बड़ा खूबसूरत दिख रहा था, लेकिन अंदर का माहौल उतना ही तप रहा था। ड्राइंग रूम में रखी चाय की प्याली ठंडी पड़ चुकी थी। मेज पर मिट्टी और सिरेमिक के कुछ खूबसूरत हस्तनिर्मित बर्तन, दीये और सजावटी कलाकृतियां सजी हुई थीं। उनकी महीन नक्काशी और चटक रंगों का तालमेल देखते ही बनता था। उन्हें देखकर कोई भी कह सकता था कि इन्हें बनाने वाले हाथों में केवल हुनर नहीं, बल्कि रूह बसी हुई है। लेकिन वहीं सोफे पर बैठे सुमित का चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था।
“देखा मां तुमने! इसके तेवर तो देखो जरा!” सुमित ने अपनी मां सुभद्रा जी की ओर रुख करते हुए ऊंची आवाज में कहा। “मैं पहले ही कहता था कि जितना सीधा और सरल ये बाहर से बनने का ढोंग करती है, भीतर से उतनी ही जिद्दी है। अरे, क्या कयामत आ जाएगी अगर यह अपने इस शौक को घर की चारदीवारी तक ही सीमित रखे? मायके में मां-बाप ने इसकी कला की नुमाइश देख ली, ससुराल में हमने भी इसे सराह दिया, अब इस पूरे शहर को, सारे बाजार को अपना फन दिखाने की क्या तुक है? सीधे शब्दों में कहूं मां, तो इसके पर निकल आए हैं और वक्त रहते अगर इन परों को कतरा न गया, तो यह हमारे पूरे खानदान की नाक कटवा कर रख देगी!”
सुभद्रा जी ने अपने चश्मे को नाक पर ठीक किया, हाथ में पकड़ी हुई माला को फेरते हुए धीमी आवाज में बोलीं, “शांत हो जा बेटा सुमित। औरत की जात है, दो दिन का नया-नया जोश है। घर-गृहस्थी के बोझ तले जब दबेगी, तो अपने आप यह सारा फितूर दिमाग से उतर जाएगा। तू खामखां अपना खून मत जला, थोड़े दिन में सब ठीक हो जाएगा।”
किचन के दरवाजे के पास खड़ी अंकिता ने अपने पति और सास की हर एक बात बहुत गौर से सुनी। उसके सीने में दर्द की एक तेज लहर उठी, पर उसकी आंखों से आंसू नहीं गिरे। आंसुओं की जगह एक गहरी, पत्थर जैसी चुप्पी ने ले ली थी। अंकिता को बचपन से ही मिट्टी से मूर्तियां और बारीक नक्काशीदार बर्तन गढ़ने का शौक था। शादी के दस साल उसने पूरी निष्ठा से इस घर को संवारने में लगा दिए। सुबह पांच बजे उठने से लेकर रात के ग्यारह बजे तक वह सास की सेवा, पति की पसंद-नापसंद और दोनों बच्चों, आरव और मिष्टी की पढ़ाई-लिखाई में ही खप जाती थी।
हाल ही में जब शहर की एक जानी-मानी हस्तकला प्रदर्शनी में अंकिता के बनाए मिट्टी के सजावटी दीयों और कलाकृतियों को पहला पुरस्कार मिला और कुछ बड़े बुटीक से उसे भारी ऑर्डर मिलने लगे, तो सुमित को खुशी होने के बजाय एक अजीब सी हीनभावना ने घेर लिया। सुमित एक प्रतिष्ठित फर्म में सीनियर मैनेजर था। उसे हमेशा से यह गुमान था कि वह इस घर का अकेला कर्ता-धर्ता है। मोहल्ले और दोस्तों के बीच जब यह चर्चा होने लगी कि सुमित की पत्नी तो कमाल की आर्टिस्ट है और उससे भी ज्यादा कमाने का माद्दा रखती है, तो सुमित का पुरुषवादी अहंकार बुरी तरह आहत हो गया। उसी अहंकार ने आज घर में यह बवंडर खड़ा कर दिया था।
अगले दिन से घर की फिजा पूरी तरह बदल गई। अंकिता ने कोई चीख-पुकार नहीं की, न ही उसने कोई बर्तन पटका। उसने वही किया जो एक स्वाभिमानी इंसान करता है जब उसकी आत्मा पर बार-बार वार किया जाए। उसने मिट्टी, चाक और रंगों को एक कोने में समेटकर रख दिया। सुबह उठती, बच्चों का टिफिन बनाती, उन्हें स्कूल भेजती, घर का खाना बनाती और फिर अपने कमरे में जाकर चुपचाप बैठ जाती। कोई कुछ पूछता तो केवल ‘हां’ या ‘ना’ में सिर हिला देती। उसकी वह खिलखिलाती हुई हंसी, जो कभी पूरे घर को जीवंत रखती थी, एकदम गायब हो चुकी थी।
सुभद्रा जी को अंकिता का यह रूप बिल्कुल रास नहीं आया। उन्हें लगा कि बहू काम से बचने के लिए यह नाटक कर रही है। अपनी नाराजगी जताने के लिए उन्होंने अंकिता को रसोई से दूर करने की नीयत से दो कामवालियां रख लीं। एक को खाना बनाने के लिए और दूसरी को साफ-सफाई के लिए। पर किराए की मदद कभी घर की धुरी नहीं बन सकती। एक दिन सब्जी में नमक तेज हो जाता, तो दूसरे दिन दाल कच्ची रह जाती। सफाई वाली कभी आती, कभी बिना बताए गायब हो जाती। नतीजतन, सत्तर बरस की उम्र में सुभद्रा जी को खुद रसोई में खटना पड़ा। उनके घुटनों का दर्द फिर से उभर आया।
शाम को जब सुमित थका-हारा ऑफिस से लौटता, तो घर में फैली अव्यवस्था, बिखरा हुआ सामान और मां की कराहती आवाजें उसका स्वागत करतीं। घर जो कभी सुकून का आशियाना था, अब किसी तनावपूर्ण जेल जैसा लगने लगा था। मां की यह तकलीफ सुमित से ज्यादा दिन बर्दाश्त नहीं हुई।
करीब दो हफ्ते इसी घुटन में बीत गए। एक शाम जब सुमित घर लौटा, तो ड्राइंग रूम में अंधेरा था और अंकिता अपनी डायरी में कुछ लिख रही थी। सुमित का सब्र जवाब दे गया। वह उसके कमरे में दाखिल हुआ और झुंझलाते हुए बोला, “आखिर तुम साबित क्या करना चाहती हो अंकिता? यह क्या तमाशा बना रखा है तुमने? घर का माहौल ऐसा कर दिया है जैसे कोई मातम पसरा हो! कोई तुमसे बात करने की कोशिश करे तो तुम पत्थर की मूरत बन जाती हो। यह घमंड किस बात का है?”
अंकिता ने बहुत ही शांत भाव से अपनी डायरी बंद की। उसने सुमित की आंखों में सीधे देखते हुए एक सधे हुए लहजे में कहा, “सबसे पहली बात सुमित, जिस तरह मैंने हमेशा आपसे तहजीब और अदब से बात की है, मैं उम्मीद करती हूं कि आप भी मुझसे उसी लहजे में बात करेंगे। चीखने से बात में वजन नहीं आता।”
सुमित इस सीधे और बेबाक जवाब की उम्मीद नहीं कर रहा था। वह सकपका गया, पर अपनी झेंप मिटाने के लिए दोबारा कड़वाहट से बोला, “अच्छा! अब तुम मुझे तमीज सिखाओगी? तुम जानती भी हो कि बाहर मेरी क्या हालत हो रही है? तुमने अपनी कॉलोनी और किटी पार्टी की औरतों के सामने यह ढिंढोरा पीट दिया है कि मैंने तुम्हें कलाकृतियां बनाने और अपना काम करने से रोक दिया है! आज कॉलोनी के प्रेसिडेंट रस्तोगी जी मुझे रास्ते में रोककर कह रहे थे कि सुमित भाई, अपनी पत्नी की प्रतिभा का गला मत घोंटो, उन्हें काम करने दो, हम सब उनकी कला के कद्रदान हैं। सोचो, मेरे ही जान-पहचान वाले मुझ पर उंगलियां उठा रहे हैं! क्या यही दिन देखना बाकी रह गया था? घर की जिम्मेदारियों से तुम मुंह मोड़ लो और बाहर वालों के लिए बैठकर मिट्टी के खिलौने बनाओ?”
अंकिता के चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान तैर गई। उसने कहा, “सुमित, मैंने किसी से जाकर आपकी कोई शिकायत नहीं की। जब प्रदर्शनी के आयोजक और कॉलोनी के लोग मुझसे नए ऑर्डर्स के बारे में पूछने आए, तो मैंने केवल सच कहा। मैंने साफ लफ्जों में बता दिया कि मेरे पति और मेरी सास को मेरा यह हुनर पसंद नहीं है, इसलिए मैं यह सब बंद कर रही हूं। क्या सच बोलना गुनाह है? और जहां तक घर की जिम्मेदारियों की बात है, तो पिछले दस सालों में मैंने किस दिन अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ा? घर का हर कोना मैंने अपने हाथों से संवारा, आप दोनों की हर जरूरत का ख्याल रखा, बच्चों की परवरिश में अपनी रातों की नींद कुर्बान की। लेकिन आपने क्या कहा था उस दिन? आपने कहा था कि मैं जमीन पर रहूं, आसमान में उड़ने की औकात न भूलूं! तो बस, मैंने उड़ना छोड़ दिया और खुद को इस जमीन पर समेट लिया। अब जब मैं वही कर रही हूं जो आप चाहते थे, तो आपको तकलीफ क्यों हो रही है?”
सुमित के पास कोई ठोस जवाब नहीं था। अगले दो-चार दिनों तक उसने अंकिता को तरह-तरह से समझाने और बातों में उलझाने की कोशिश की। कभी उसने प्यार से फुसलाना चाहा, तो कभी पति होने का रौब दिखाया। लेकिन अंकिता अपने फैसले पर अडिग थी। उसने अपने भीतर यह पक्का संकल्प ले लिया था कि अब वह दूसरों के खोखले अहंकार को सहलाने के लिए अपने वजूद को कुर्बान नहीं करेगी। अपनी आत्मा को मारकर किसी की झूठी शान का जरिया नहीं बनेगी। जब कुदरत ने नर और नारी को समान बुद्धि, समान भावनाएं और बराबर का हुनर बख्शा है, तो फिर समाज की बनाई यह दीवारें एक औरत की प्रतिभा को क्यों कैद करें?
हालात तब और बिगड़ने लगे जब सुमित का बाहर निकलना दूभर हो गया। कॉलोनी की औरतें जब भी उसे देखतीं, आपस में कानाफूसी करने लगतीं। ऑफिस में भी किसी तरह यह बात पहुंच गई थी कि सुमित अपनी बेहद प्रतिभाशाली पत्नी पर पाबंदियां लगाता है। लोग उसे दकियानूसी और संकुचित सोच वाला समझने लगे थे। बाहर की यह तिरछी नजरें और घर के भीतर का सन्नाटा सुमित के भीतर एक अजीब सी बेचैनी भर रहा था। वह अंदर ही अंदर टूटने लगा था।
आखिरकार, एक इतवार की दोपहर सुमित हार मानकर अंकिता के सामने आ बैठा। उसके चेहरे पर गुस्से की जगह गहरी लाचारी और थकान थी। उसने बेहद दबी आवाज में कहा, “अंकिता, मैं सच में हाथ जोड़ता हूं तुम्हारे आगे। तुम्हें जो करना है करो, जितने बर्तन बनाने हैं बनाओ, जितनी प्रदर्शनी लगानी है लगाओ, पर खुदा के वास्ते इस घर का माहौल पहले जैसा कर दो। मैं थक गया हूं बाहर वालों के ताने सुनकर और घर के इस दमघोंटू सन्नाटे को झेलकर। मुझसे अब यह सब और बर्दाश्त नहीं होता।”
अंकिता ने उसकी तरफ देखा, उसकी आंखों में कोई जीत का उन्माद नहीं था, बल्कि एक गहरा दर्द था। उसने ठहरे हुए स्वर में कहा, “सुमित, आपको क्या लगता है कि मुझे यह सब करके खुशी मिल रही थी? मैं आपके साथ ऐसा बर्ताव कभी नहीं करना चाहती थी, पर आपके बर्ताव ने मुझे इस मोड़ पर लाकर खड़ा किया। हर मोड़ पर, हर तंगी में मैंने आपकी ताकत बनकर आपका साथ निभाया। कभी अपनी किसी ख्वाहिश का बोझ आप पर नहीं डाला। लेकिन जब मेरे हुनर को थोड़ी पहचान मिलने लगी, तो आपने अपनी असुरक्षा और स्वार्थ के चलते मुझे कुचलने की कोशिश की। आप यह भी भूल गए कि हमारा यह तनाव हमारे बच्चों पर क्या असर डाल रहा है। आरव और मिष्टी बड़े हो रहे हैं। वे देख रहे हैं कि उनका पिता अपनी ही पत्नी की कामयाबी से जलता है और उसे दबाता है। क्या आप चाहते हैं कि आपका बेटा कल को अपनी पत्नी के साथ यही करे? या आपकी बेटी यह सीखे कि एक औरत को हमेशा अपनी पहचान मारनी पड़ती है? क्या यही संस्कार देना चाहते हैं आप उन्हें?”
अंकिता का एक-एक शब्द सुमित के अंतर्मन पर हथौड़े की तरह लगा। एक पर्दा सा उसकी आंखों से हट गया। उसने महसूस किया कि वह अपने खोखले पौरुष के गुरूर में कितना अंधा हो चुका था। जिस औरत ने इस घर को मंदिर बनाया, उसी के सपनों की बलि चढ़ाकर वह खुद को बड़ा साबित करने की बचकानी कोशिश कर रहा था। वह अपनी ही पत्नी को पीछे धकेल कर अपने परिवार और बच्चों की नजरों में कितना गिर चुका था।
सुमित की आंखें भर आईं। उसने आगे बढ़कर अंकिता के हाथ थाम लिए और रुंधे गले से बोला, “मुझे माफ कर दो अंकिता… सच में मुझे माफ कर दो। जब चारों तरफ तुम्हारी कला की तारीफ हो रही थी, तो मेरे भीतर का वह छोटा, असुरक्षित इंसान बौखला गया था। मुझे लगने लगा था कि लोग मुझे भूलकर सिर्फ तुम्हारी बात करेंगे। मेरी अपनी पहचान कहीं खो जाएगी। पर मैं यह भूल गया था कि एक औरत जब आगे बढ़ती है, तो वह पूरे परिवार को साथ लेकर चलती है, किसी को पीछे छोड़कर नहीं। तुम्हारी कामयाबी मेरी हार नहीं, बल्कि मेरी भी शान है। अब तुम्हें रुकने की कोई जरूरत नहीं है। तुम अपने पर फैलाओ, जितनी ऊंची उड़ान भर सकती हो भरो, मैं हमेशा तुम्हारे पंखों की हवा बनकर तुम्हारे साथ खड़ा रहूंगा।”
सुमित के इन शब्दों ने अंकिता के दिल पर जमी सारी बर्फ पिघला दी। उसकी आंखों से बरसों का दबा हुआ दर्द आंसुओं के रूप में बह निकला। यह पहली बार था जब सुमित ने अपनी गलती को सच्चे दिल से स्वीकार किया था।
लेकिन कमरे के दरवाजे पर खड़ी सुभद्रा जी को यह सब बिल्कुल पसंद नहीं आया। उन्होंने मुंह बिचकाते हुए तंज कसा, “वाह बेटा वाह! आखिरकार तुमने अपनी बीवी के आगे घुटने टेक ही दिए! अरे, जो औरत अपने पति को झुका दे, वह इस घर को क्या संभालेगी? कल को यह सिर पर चढ़कर नाचेगी।”
सुमित उठा और अपनी मां के पास जाकर बहुत ही शांत और दृढ़ लहजे में बोला, “नहीं मां, यह झुकना नहीं है, यह अपनी भूल को सुधारना है। यह पुरानी और सड़ी-गली मानसिकता है कि पत्नी का साथ देना या उसकी तरक्की में खुश होना पति का झुकना कहलाता है। बराबरी के रिश्ते में कोई झुकता या उठता नहीं है, दोनों कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं। मैं चाहता हूं कि हमारे बच्चे अपनी मां को देखकर यह सीखें कि सपने देखना और उन्हें पूरा करना कोई गुनाह नहीं है। अगर इंसान में लगन हो, तो वह घर की खुशियों को संजोते हुए भी अपने सपनों को नया आकाश दे सकता है।”
सुभद्रा जी बेटे के इस बदले हुए और परिपक्व रूप को देखकर निरुत्तर हो गईं। उन्हें समझ आ गया कि अब पुरानी बंदिशों का दौर बीत चुका है।
इसके बाद घर का मंजर पूरी तरह बदल गया। ड्राइंग रूम का एक बड़ा हिस्सा अंकिता के स्टूडियो में तब्दील हो गया। अब जब चाक घूमता, तो मिट्टी से खूबसूरत आकार बनते और उस मिट्टी की सोंधी खुशबू पूरे घर में बिखर जाती। सुमित ऑफिस से लौटने के बाद कभी पैकिंग में अंकिता की मदद करता, तो कभी बच्चों की पढ़ाई खुद संभाल लेता। सुभद्रा जी भी धीरे-धीरे इस बदलाव को स्वीकार करने लगीं और जब अंकिता की बनाई कलाकृतियां देश के अलग-अलग हिस्सों में जाने लगीं, तो वह भी गर्व से पड़ोसियों को बहू की सफलता की कहानियां सुनाने लगीं।
कुछ ही महीनों में अंकिता का हस्तकला का काम एक स्थापित ब्रांड बन गया। एक दिन रोटरी क्लब के एक बड़े जलसे में अंकिता को शहर की उभरती हुई महिला उद्यमी का सम्मान मिला। जब मंच पर सुमित को भी बुलाया गया, तो एंकर ने माइक थमाते हुए पूछा, “सुमित जी, कैसा लगता है जब लोग आपको एक बेहद कामयाब और मशहूर महिला के पति के रूप में पहचानते हैं?”
सुमित ने मुस्कुराते हुए अंकिता का हाथ थामा और बड़े गर्व से कहा, “पहले लोग मुझे केवल मेरे नाम और पद से जानते थे, आज मुझे गर्व है कि मेरी पहचान मेरी इस होनहार पत्नी के नाम से होती है, और आने वाले कल में हम दोनों अपने बच्चों की नेक पहचान से जाने जाएंगे। एक पुरुष के लिए इससे बड़े गर्व और खुशी की बात और क्या हो सकती है?”
पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। अंकिता ने जब सुमित की तरफ देखा, तो उसकी आंखों में कृतज्ञता और प्यार का वह समंदर था जो किसी भी पुरस्कार से कहीं ज्यादा कीमती था।
जिंदगी का फलसफा भी कितना अजीब है। बहुत से पुरुष यह मान बैठते हैं कि अगर जीवनसाथी उनसे एक कदम आगे निकल गई, तो समाज में उनका रसूख कम हो जाएगा या उनका मान घट जाएगा। लेकिन सच तो यह है कि रिश्ते कोई होड़ या मुकाबला नहीं होते। जब शादी के पवित्र बंधन में एक स्त्री को ‘अर्धांगिनी’ का दर्जा दिया जाता है, जिसका अर्थ ही आधा अंग होता है, तो फिर सुख, दुख और जिम्मेदारियां ही क्यों आधी-आधी बांटी जाएं? खुशियों, सपनों और कामयाबी में भी तो उसका आधा हिस्सा होना चाहिए। पत्नी की पहचान से अगर पति का मान बढ़े, तो वह छोटा नहीं होता, बल्कि उसका दिल और उसका कद जमाने की नजरों में और भी बड़ा हो जाता है।
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