ममता का तराज़ू

  दरवाज़े के बाहर, सुमित्रा देवी का पूरा अस्तित्व जैसे काँप उठा था। उनके पैरों तले ज़मीन खिसक चुकी थी। उनके सीने में एक ऐसा दर्द उठा, जिसने उनके भीतर जमे अविश्वास, स्वार्थ और संकीर्णता के सारे पहाड़ों को एक पल में ढहा दिया। उनकी आँखों से पश्चाताप के आँसू गंगा-जमुना की तरह बह निकले। वे … Read more

प्रायश्चित की छांव

 आज जब मैं अपने बेटे आरव को देखता हूं, तो सोचता हूं कि जमाना कितना बदल गया है। आज भौतिक चीजों की कोई कद्र नहीं बची। बच्चे गलतियां करते हैं, चीजें गंवाते हैं और हम माता-पिता अपनी आधुनिकता और लाड़-प्यार के नाम पर उन्हें तुरंत नई चीजें दिलाकर उनकी गलतियों पर पर्दा डाल देते हैं। … Read more

पंखों को मिला आकाश

तान्या को अपने पास बुलाया और उसका हाथ पकड़कर भरे गले से कहा, “तान्या, देख अपनी बहन को। मैं सोचती थी कि तुझे काम न करने देकर मैं तुझे महारानी बना रही हूँ, लेकिन सच तो यह है कि मैंने तुझे अपाहिज बना दिया। ज़िंदगी में किताबें पढ़कर डिग्रियां हासिल कर लेना बहुत आसान है, … Read more

समर्पण का दूसरा नाम

अगर यह व्रत प्रेम का प्रतीक है, अगर यह दो आत्माओं के एक होने का उत्सव है, तो फिर तपस्या सिर्फ एक तरफ से क्यों? अगर अनन्या उसके स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए प्यासी रह सकती है, तो क्या उसका यह कर्तव्य नहीं बनता कि वह भी उस पीड़ा और उस भाव का भागीदार बने? … Read more

ममता की कोई कीमत नहीं

“सुनीता भाभी, कुछ तो मर्यादा रखिए अपनी जुबान की। मैं इस घर की बेटी हूँ, कोई बाहर से आई लालची औरत नहीं,” अंजलि ने अपने आंसुओं को पलकों पर ही रोकते हुए भारी गले से कहा। वह अभी-अभी अपनी बीमार माँ के कमरे से बाहर निकली थी और वापस अपने घर जाने के लिए अपना … Read more

संस्कारों की धरोहर (एक अनोखा जन्मदिन)

हल्की गुलाबी धूप ड्रॉइंग रूम की खिड़कियों से छनकर कांच की मेज पर बिछी सफेद चादर को रोशन कर रही थी। रविवार की सुबह का माहौल हमेशा की तरह खुशनुमा और सुकून भरा था। रेडियो पर धीमे सुरों में पुराना हिंदी गीत बज रहा था और रसोई से गर्म-गर्म कचौड़ियों और अदरक वाली चाय की … Read more

राख से उठी उड़ान

सावन का महीना अपने पूरे शबाब पर था। बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी और मिट्टी की सौंधी महक से पूरा वातावरण महक रहा था। आज हरियाली तीज का त्योहार था। महिलाओं के लिए यह दिन सुहाग और अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। शहर की हर सड़क, हर मोहल्ले में सुहागिनें हरे रंग … Read more

अपना आसमान

कौशल्या देवी की आँखों से भी आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी। उन्होंने झुककर अपने घर की उस पावन चौखट को चूमा। दीनानाथ जी ने कांपते हाथों से उस नेमप्लेट को छुआ। अपनी खुरदुरी उंगलियों से उन्होंने अपने नाम के एक-एक अक्षर को ऐसे महसूस किया जैसे कोई अंधा व्यक्ति वर्षों बाद अचानक रोशनी … Read more

ढीठ – संध्या त्रिपाठी 

बड़ी ढीठ हो यार तुम… एक बार मना कर दिया फिर भी मानती नहीं हो…जिद पकड़ कर बैठी हो …आखिर चाहती क्या हो तुम…?  तुम्हारे अंदर थोड़ा भी आत्मसम्मान है या नहीं ….बिल्कुल चिल्लाने वाले अंदाज में प्रत्यूष ने कहा… आपने मेरी ढिठाई अभी देखी कहां है प्रत्युष…?  बचपन से ये ढीठ शब्द सुनते आई … Read more

ऐसी भाभियों सबको मिले –  आराधना श्रीवास्तव

एक बार फिर नंदनी गर्मी की छुट्टियां मनाने अपने मायके जा रही थी । वैसे तो वह हमेशा जब बच्चों की स्कूल की गर्मी की छुट्टी होती थी तो मायके जाने की योजना बना लेती थी । बच्चे भी नानी के घर जाने का जैसे इंतजार करते थे।  नंदनी के पति दिवाकर उन सबको रेलवे … Read more

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