ममता का तराज़ू
दरवाज़े के बाहर, सुमित्रा देवी का पूरा अस्तित्व जैसे काँप उठा था। उनके पैरों तले ज़मीन खिसक चुकी थी। उनके सीने में एक ऐसा दर्द उठा, जिसने उनके भीतर जमे अविश्वास, स्वार्थ और संकीर्णता के सारे पहाड़ों को एक पल में ढहा दिया। उनकी आँखों से पश्चाताप के आँसू गंगा-जमुना की तरह बह निकले। वे … Read more