रेत की दीवारें

 “आठ लाख रुपये? क्या पागलपन है! माँ, आपको समझ भी आता है कि आठ लाख होते क्या हैं? इस उम्र में इतनी बड़ी सर्जरी का कोई तुक है? अगर ऑपरेशन के बाद भी आप चलने लायक नहीं हुईं तो? सारा पैसा पानी में बह जाएगा। आजकल डॉक्टर सिर्फ बिल बनाने के लिए सर्जरी की सलाह देते हैं।” रोहन गुस्से में हाथ नचाते हुए बोला।

विशाखा ने चाय का कप पटकते हुए कहा, “और क्या! सरसठ साल की उम्र में लोग पूजा-पाठ करते हैं, यहाँ आठ लाख की सर्जरी करानी है। अभी ये बीमारी आई है, कल कोई दूसरी आ जाएगी। हम कहाँ से लाएंगे इतने पैसे? रोहन का बिजनेस अभी ठीक से जमा भी नहीं है, हमारे बच्चे की स्कूल फीस भरनी है। हमें अपना भविष्य भी तो देखना है!”

भोपाल  के शांत से मकान में बैठी शारदा जी जब भी अपनी हथेलियों को देखतीं, तो उन्हें अपने स्वर्गीय पति कैलाश जी का चेहरा याद आ जाता। कैलाश जी सिंचाई विभाग से बड़े पद से रिटायर हुए थे। उनके गुजरने के बाद शारदा जी को एकमुश्त मोटी रकम, ग्रेच्युटी और अच्छी-खासी पारिवारिक पेंशन मिली थी। कैलाश जी हमेशा एक बात कहा करते थे, “शारदा, दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है। अपनी तिजोरी की चाबी कभी किसी दूसरे के हाथ में मत सौंपना, चाहे वो अपनी सगी औलाद ही क्यों न हो। पैसा जब तक हाथ में रहता है, दुनिया झुककर सलाम करती है।”

लेकिन ममता से भरी माँ का दिल हिसाब-किताब कहाँ समझता है? शारदा जी हमेशा हँसकर बात टाल देतीं और कहतीं, “आप भी न हर बात में शक करते हैं। हमारे रोहन और रुचि ऐसे थोड़ी न हैं! मैंने अपने खून-पसीने से सींचा है दोनों को। औलाद से भी भला कोई हिसाब रखता है?”

कैलाश जी के जाने के बाद शारदा जी अपने बेटे रोहन और बहू विशाखा के साथ उसी पुश्तैनी घर में रहने लगीं। बेटी रुचि की शादी इंदौर में एक बड़े कारोबारी घराने के लड़के अमित से हुई थी। शारदा जी का एक ही उसूल था—बेटा और बेटी दोनों उनकी आँख के तारे हैं, दोनों में कभी रत्ती भर का फर्क नहीं करना। रोहन जब मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी छोड़कर खुद का सॉफ्टवेयर स्टार्टअप शुरू करना चाहता था, तो फंड की कमी आड़े आ रही थी। रोहन मुँह लटकाए माँ के पास आया और बोला, “माँ, अगर मुझे पंद्रह लाख रुपये मिल जाएं तो मैं अपनी कंपनी खड़ी कर लूँगा, वरना ज़िंदगी भर दूसरों की गुलामी करनी पड़ेगी।”

शारदा जी ने एक पल भी नहीं सोचा। अपने नाम की फिक्स्ड डिपॉजिट तुड़वाकर पूरे पंद्रह लाख रुपये बेटे के हाथ में रख दिए। बहू विशाखा उस दिन इतनी खुश हुई कि उसने पूरे मोहल्ले में अपनी सास की तारीफों के पुल बांध दिए।

कुछ ही महीनों बाद जब बेटी रुचि मायके आई, तो उसके चेहरे पर उदासी छाई थी। शारदा जी ने कुरेदकर पूछा तो रुचि रो पड़ी, “माँ, अमित के भाई ने नई चमचमाती एसयूवी खरीदी है। हमारे पास वही पुरानी गाड़ी है। समाज में उठने-बैठने में शर्म आती है। अमित को नया मॉडल पसंद आया है, पर बिजनेस में सारा पैसा फंसा है। आठ-दस लाख का इंतजाम नहीं हो पा रहा।” शारदा जी से बेटी के आँसू देखे न गए। दामाद अमित को उन्होंने हमेशा अपने सगे बेटे जैसा मान-सम्मान दिया था। अगले ही दिन बैंक जाकर उन्होंने म्यूचुअल फंड से पैसे निकाले और पूरे दस लाख रुपये रुचि के खाते में ट्रांसफर करवा दिए।

शारदा जी परिवार का ऐसा कल्पवृक्ष बन चुकी थीं, जिसकी छाँव में बैठकर सब अपनी-अपनी झोलियाँ भर रहे थे। किसी को नए घर का इंटीरियर कराना हो, किसी को विदेश घूमने जाना हो या महंगे शौक पूरे करने हों—शारदा जी का बैंक खाता हर वक्त खुला रहता था। वे खुद सादी सूती साड़ियों में गुजारा कर लेतीं, पर बच्चों की हर फरमाइश पलक झपकते पूरी कर देतीं।

ज़िंदगी की रफ्तार यूँ ही चल रही थी कि अचानक वक्त ने करवट बदली। शारदा जी की उम्र अब सरसठ के करीब पहुँच चुकी थी। कुछ महीनों से उनके कूल्हे और रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से में असहनीय दर्द उठने लगा। सुबह सोकर उठतीं तो कमर इतनी अकड़ जाती कि बिस्तर से पाँव नीचे रखना दूभर हो जाता। एक दिन जब दर्द बर्दाश्त से बाहर हो गया, तो उन्होंने रोहन और विशाखा से कहा, “बेटा, कमर और कूल्हे का दर्द अब सहा नहीं जाता। मुझसे चला भी नहीं जा रहा। किसी अच्छे ऑर्थोपेडिक डॉक्टर को दिखा दो।”

रोहन अपने लैपटॉप पर आँखें गड़ाए बैठा था। उसने बिना सिर उठाए कहा, “माँ, आप सारा दिन कमरे में लेटी रहती हैं, इसीलिए हड्डियाँ जाम हो गई हैं। सुबह उठकर छत पर टहलने जाया करो। थोड़ा बहुत घर की सब्जियाँ काट दिया करो, हाथ-पाँव चलेंगे तो अपने आप सब ठीक हो जाएगा।”

बहू विशाखा ने भी सुर में सुर मिलाया, “और नहीं तो क्या माँ जी! इस उम्र में थोड़ी बहुत तकलीफ तो सबको होती ही है। आप बात का बतंगड़ बना देती हैं। डॉक्टर के पास जाओ तो वो फालतू की दवाइयाँ लिखकर बैठ जाते हैं।”

शारदा जी ने बच्चों की बात को सच मान लिया। वे दर्द से कराहते हुए भी सुबह-शाम छत पर चक्कर काटने लगीं। लेकिन टहलने से दर्द कम होने के बजाय और ज्यादा भड़क गया। एक सुबह तो हालत यह हो गई कि वे चक्कर खाकर फर्श पर गिर पड़ीं।

संयोग से उसी दिन इंदौर से बेटी रुचि और दामाद अमित भी आए हुए थे। शारदा जी की हालत देखकर रुचि उन्हें पास के एक बड़े निजी अस्पताल ले गई। डॉक्टर ने कई सारे एक्स-रे और एमआरआई करवाए। रिपोर्ट देखने के बाद डॉक्टर ने गंभीर होकर कहा, “शारदा जी के हिप जॉइंट की कार्टिलेज पूरी तरह घिस चुकी है और रीढ़ की नस दब रही है। स्थिति बहुत नाजुक है। अगर तुरंत हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी और स्पाइनल डीकंप्रेशन नहीं कराया गया, तो ये हमेशा के लिए बिस्तर पर आ जाएँगी और चलना-फिरना बिल्कुल बंद हो जाएगा।”

रुचि ने घबराते हुए पूछा, “डॉक्टर साहब, इस पूरे इलाज और सर्जरी में कितना खर्चा आ जाएगा?”

डॉक्टर ने पर्चे पर हिसाब जोड़ते हुए कहा, “दोनों तरफ का ऑपरेशन, इम्प्लांट्स और पोस्ट-ऑपरेटिव केयर मिलाकर लगभग छह से आठ लाख का खर्च आएगा।”

“आठ लाख रुपये!” रुचि के मुँह से चीख जैसी निकली। शारदा जी ने सहमकर बेटी का हाथ पकड़ लिया और डॉक्टर से धीरे से कहा, “ठीक है डॉक्टर साहब, हम घर पर सलाह करके बताते हैं।”

घर लौटते ही जैसे भूचाल आ गया। जब रोहन और विशाखा को पता चला कि इलाज में आठ लाख रुपये लगेंगे, तो घर का माहौल तनावपूर्ण हो गया। डाइनिंग टेबल पर सन्नाटा छा गया, जिसे रोहन की तीखी आवाज ने तोड़ा।

“आठ लाख रुपये? क्या पागलपन है! माँ, आपको समझ भी आता है कि आठ लाख होते क्या हैं? इस उम्र में इतनी बड़ी सर्जरी का कोई तुक है? अगर ऑपरेशन के बाद भी आप चलने लायक नहीं हुईं तो? सारा पैसा पानी में बह जाएगा। आजकल डॉक्टर सिर्फ बिल बनाने के लिए सर्जरी की सलाह देते हैं।” रोहन गुस्से में हाथ नचाते हुए बोला।

विशाखा ने चाय का कप पटकते हुए कहा, “और क्या! सरसठ साल की उम्र में लोग पूजा-पाठ करते हैं, यहाँ आठ लाख की सर्जरी करानी है। अभी ये बीमारी आई है, कल कोई दूसरी आ जाएगी। हम कहाँ से लाएंगे इतने पैसे? रोहन का बिजनेस अभी ठीक से जमा भी नहीं है, हमारे बच्चे की स्कूल फीस भरनी है। हमें अपना भविष्य भी तो देखना है!”

शारदा जी ने नम आँखों से दामाद अमित और बेटी रुचि की तरफ देखा। अमित जिसे वे अपना दूसरा बेटा समझती थीं, उसने अपनी नज़रें मोबाइल स्क्रीन में गड़ा लीं।

रुचि ने दबी जुबान में कहा, “माँ, भैया और भाभी सही तो कह रहे हैं। इतनी बड़ी उम्र में हड्डी का ऑपरेशन सफल होना बहुत मुश्किल होता है। आप फिजियोथेरेपी करा लो या कोई आयुर्वेदिक तेल मालिश कर लो, इतने लाख रुपये फूँकने की क्या ज़रूरत है?”

कमरे में खड़े इन चार लोगों के चेहरे देखकर शारदा जी के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उनके कानों में कैलाश जी के शब्द गूँजने लगे—‘अपनी तिजोरी की चाबी कभी किसी को मत सौंपना।’ आज सिर्फ उनकी हड्डियों के जोड़ नहीं सूखे थे, बल्कि रिश्तों की सारी नमी, सारा प्यार और सारी ममता भी सूख चुकी थी।

शारदा जी का भीतर तक काँप उठा। उन्होंने दीवार का सहारा लेकर खुद को संभाला। उनकी आँखों के आँसू सूख चुके थे और उनकी जगह एक अजीब सी तल्खी ने ले ली थी।

“बस करो तुम सब!” शारदा जी की आवाज में वो कड़क थी जो उनके बच्चों ने पहले कभी नहीं सुनी थी।

वे रुचि की तरफ मुड़ीं, “रुचि, आज तुम्हें अपनी माँ की हड्डियों के इलाज के लिए आठ लाख रुपये बहुत भारी लग रहे हैं? उस दिन जब तुम नई गाड़ी के लिए मेरे सामने गिड़गिड़ा रही थीं, तब मैंने तुम्हें पूरे दस लाख रुपये दिए थे! क्या उस लोहे की गाड़ी की कीमत तुम्हारी माँ की इस टूटी हड्डियों से ज्यादा थी? तब तुम्हारे पति का बिजनेस फंसा था, पर आज माँ के लिए तुम्हारे पास एक रुपया नहीं है?”

रुचि और अमित ने शर्म से अपना सिर झुका लिया। उनके पास बोलने के लिए कोई शब्द नहीं बचा था।

फिर शारदा जी रोहन की ओर घूमीं, “और रोहन, तू अपनी नौकरी छोड़कर बिजनेस का सपना देख रहा था। मैंने अपने बुढ़ापे का सहारा, अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट तोड़कर तुझे पंद्रह लाख रुपये दिए थे ताकि तू अपने पैरों पर खड़ा हो सके। आज तक तूने उस बिजनेस से एक नया पैसा कमाकर मुझे नहीं दिया। जब भी तुझे ज़रूरत पड़ी, मैंने अपनी पेंशन और जमा पूँजी तेरे हवाले कर दी। और आज जब मुझे इलाज की ज़रूरत है, तो तू कह रहा है कि पैसा पानी में बह जाएगा? ये घर, ये छत जिसके नीचे तुम सब ऐश कर रहे हो, ये तुम्हारे पिता ने मेरे नाम छोड़ी थी!”

रोहन ने नजरें चुराते हुए धीमे से कहा, “माँ, आप बात को गलत दिशा में ले जा रही हैं…”

“मैं गलत दिशा में नहीं ले जा रही, मेरी आँखें तो आज खुली हैं!” शारदा जी रोते हुए अपने कमरे में चली गईं और अंदर से कुंडी लगा ली।

कमरे में आकर उन्होंने कांपते हाथों से अलमारी खोली। पुरानी पासबुक और दस्तावेज निकाले। हिसाब लगाया तो पैरों तले से ज़मीन फिर सरक गई। पिछले चार सालों में बच्चों की फरमाइशें पूरी करते-करते उनके बचत खाते में मात्र पचास-साठ हजार रुपये बचे थे। पेंशन का बड़ा हिस्सा भी वे हर महीने घर के राशन और बच्चों के खर्चों में दे देती थीं।

अगले दिन सुबह शारदा जी ने हिम्मत जुटाई। उन्होंने सोचा कि वे इस पुश्तैनी मकान के कागजात ले जाकर बैंक से लोन लेंगी और अपना इलाज खुद करवाएंगी। किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएंगी। वे ऑटो पकड़कर चुपचाप बैंक पहुँचीं। लेकिन वहाँ मैनेजर ने जो बताया, उसने शारदा जी की बची-खुची आत्मा को भी झकझोर दिया।

मैनेजर ने कागजात देखकर कहा, “शारदा जी, इस प्रॉपर्टी पर आप लोन नहीं ले सकतीं। दो साल पहले ही इस मकान की पावर ऑफ अटॉर्नी और ट्रांसफर डीड के जरिए ये घर आपके बेटे रोहन और बहू विशाखा के नाम ट्रांसफर हो चुका है। आप तो अब सिर्फ इसमें रहने की हकदार हैं, मालिकाना हक आपका नहीं है।”

शारदा जी को याद आया, दो साल पहले रोहन ने किसी टैक्स के कागजात बताकर उनसे कई खाली और भरे हुए कागजों पर दस्तखत करवाए थे। ममता में अंधी माँ ने बिना पढ़े अपने ही आशियाने का सौदा अपने बेटे के नाम कर दिया था।

वे बैंक की सीढ़ियों पर बैठ गईं। दोपहर की धूप उनके चेहरे पर पड़ रही थी, पर उनका शरीर अंदर से बर्फ की तरह ठंडा पड़ चुका था। जिस औलाद को नौ महीने कोख में पाला, उँगली पकड़कर चलना सिखाया, उसने उन्हें जिंदा ही बेघर और लाचार बना दिया था। दर्द आर्थ्राइटिस और रीढ़ का नहीं था, दर्द उस विश्वासघात का था जो कलेजे के टुकड़ों ने दिया था।

शारदा जी तीन दिन तक अपने कमरे में बंद रहीं। न किसी से बात की, न ढंग से खाना खाया। रोहन और विशाखा ने एक-दो बार औपचारिकता के लिए दरवाजा खटखटाया, फिर अपने काम में लग गए। रुचि और अमित उसी शाम इंदौर लौट गए थे।

चौथे दिन शारदा जी के कमरे का दरवाजा खुला। लेकिन बाहर निकली शारदा पहले वाली लाचार और बेबस माँ नहीं थीं। उनके चेहरे पर आँसू नहीं थे, बल्कि एक चट्टानी दृढ़ता थी। उन्होंने समझ लिया था कि रोने-धोने और सहानुभूति की भीख माँगने से ज़िंदगी नहीं बदलती। अगर सम्मान से जीना है, तो खुद अपनी लड़ाई लड़नी होगी।

शारदा जी ने अपनी एक पुरानी सहेली मालती जी को फोन किया। मालती जी के पति एक वरिष्ठ वकील थे। शारदा जी ने उनसे मिलकर पूरी बात बताई। मालती जी और उनके पति एडवोकेट नारायण जी ने तुरंत मोर्चा संभाला।

नारायण जी ने समझाया, “शारदा, घबराने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है। भारत सरकार का वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक कानून है—‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम’ (Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act)। इसके तहत अगर कोई बच्चा अपने माता-पिता से संपत्ति लेकर उनकी देखभाल और इलाज से मुकरता है, तो वह ट्रांसफर डीड तुरंत रद्द कराई जा सकती है और बच्चों से कानूनी रूप से भरण-पोषण का खर्च वसूला जा सकता है।”

शारदा जी ने पहला कदम उठाया। उन्होंने मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल (एसडीएम कोर्ट) में शिकायत दर्ज करवाई। जैसे ही रोहन और विशाखा के हाथ में कोर्ट का कानूनी नोटिस पहुँचा, उनके पैरों तले की ज़मीन खिसक गई। नोटिस में साफ लिखा था कि अगर वे अपनी माँ के इलाज का पूरा खर्च नहीं उठाते और उनके साथ दुर्व्यवहार बंद नहीं करते, तो मकान की रजिस्ट्री तुरंत रद्द कर दी जाएगी और मकान वापस शारदा जी के नाम कर दिया जाएगा। साथ ही धोखाधड़ी के आरोप में कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।

रोहन का सारा घमंड पल भर में हवा हो गया। जिस बिजनेस की वह डींगें हाँकता था, उसकी साख भी दांव पर लग गई थी। विशाखा के चेहरे का रंग उड़ चुका था। दोनों भागते हुए शारदा जी के पैरों में गिर पड़े।

“माँ, हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई। हमें माफ कर दो। हम आज ही आपका ऑपरेशन करवाएंगे, सारा खर्च हम उठाएंगे। प्लीज ये केस वापस ले लो।” रोहन गिड़गिड़ाने लगा।

लेकिन शारदा जी अब पिघलने वाली नहीं थीं। उन्होंने शांत भाव से कहा, “रोहन, उठो। मुझे तुम्हारे एहसान या भीख के पैसों से इलाज नहीं कराना। जो पैसा मैंने तुम्हें बिजनेस के लिए दिया था, वह पंद्रह लाख रुपये तुम मुझे ब्याज सहित वापस करोगे। और रुचि से कहो कि जो दस लाख उसने गाड़ी के लिए लिए थे, वो चेक मेरे नाम भेजे। यह कोई दान नहीं था, मेरे पति की मेहनत की कमाई थी।”

कानूनी दबाव और सामाजिक बदनामी के डर से रोहन को अपनी कुछ संपत्तियां और शेयर्स बेचकर माँ का पैसा उनके खाते में जमा करना पड़ा। रुचि और अमित ने भी बदनामी से बचने के लिए अपने हिस्से का पैसा शारदा जी के खाते में ट्रांसफर कर दिया।

शारदा जी के खाते में जब उनके अपने पच्चीस लाख रुपये वापस आ गए, तो उन्होंने सबसे पहले घर की रजिस्ट्री अपने नाम बहाल करवाई। इसके बाद उन्होंने किसी बेटे या बेटी का सहारा लिए बिना, अपनी सहेली मालती जी के साथ मिलकर शहर के सबसे बेहतरीन सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में अपना दाखिला कराया।

डॉक्टरों की एक कुशल टीम ने उनका हिप रिप्लेसमेंट और स्पाइनल ऑपरेशन किया। ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा। शारदा जी ने अस्पताल में अपने लिए एक फुल-टाइम केयरटेकर और फिजियोथेरेपिस्ट का इंतजाम किया। अस्पताल के कमरे में रोहन और विशाखा हाथ जोड़े खड़े रहते, रुचि भी इंदौर से आकर सेवा करने का नाटक करती, लेकिन शारदा जी के दिल के दरवाजे अब उनके लिए बंद हो चुके थे। वे उनके साथ शालीनता से पेश आतीं, लेकिन अब उनके जीवन की बागडोर किसी औलाद के हाथ में नहीं, बल्कि उनके अपने हाथ में थी।

तीन महीने की कड़ी फिजियोथेरेपी और अपनी अदम्य इच्छाशक्ति के बल पर शारदा जी अपने पैरों पर खड़ी हो गईं। जिस दिन उन्होंने बिना किसी सहारे के, बिना छड़ी के अपने कदमों से दालान में चहलकदमी की, उस दिन उनकी आँखों में स्वाभिमान की चमक थी।

उन्होंने अपने बड़े से घर के निचले हिस्से को एक सीनियर सिटीजन डे-केयर और वेलनेस सेंटर में बदल दिया, जहाँ उम्रदराज महिलाएँ आकर योग सीखतीं, किताबें पढ़तीं और अपने सुख-दुख साझा करतीं। शारदा जी ने अपनी वसीयत भी तैयार करवा दी—उनके जाने के बाद उनका पुश्तैनी मकान और उनकी सारी पूँजी एक ट्रस्ट को जाएगी जो बेसहारा बुजुर्गों के मुफ्त इलाज का जिम्मा उठाएगा। औलाद के लिए उन्होंने सिर्फ अपना आशीर्वाद छोड़ा था, दौलत नहीं।

आज शारदा जी शाम की चाय अपने बगीचे में अकेले बैठकर पीती हैं। उनके जोड़ों का दर्द अब पूरी तरह गायब हो चुका है, और उससे भी बड़ी बात यह कि उनके दिल से वह झूठा मोह भी हमेशा के लिए मिट चुका है जो इंसान को लाचार बनाता है। उन्होंने साबित कर दिया कि उम्र चाहे सरसठ की हो या सत्तर की, अगर आत्मसम्मान जिंदा है तो इंसान किसी भी तूफान से लड़कर अपनी नई राह खुद बना सकता है।

अगर आप शारदा जी की जगह होते, तो क्या अपनी औलाद को माफ करके फिर से गले लगा लेते या जो फैसला शारदा जी ने अपने स्वाभिमान के लिए लिया, वही करते? अपनी राय कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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