उजालों का सफर

शशिकांत जी ने आगे बढ़कर अपने बेटे की पीठ थपथपाई। उनका सीना आज गर्व से चौड़ा हो गया था। “बेटा, आज तूने साबित कर दिया कि आधुनिकता और बड़ी नौकरियाँ हमारे संस्कारों को तब तक नहीं छीन सकतीं, जब तक हमारे भीतर अपनों के लिए सच्चा प्रेम ज़िंदा है।”

कुछ ही देर में सदाशिव सदन का पूरा माहौल बदल गया। जो घर कुछ देर पहले तक उदासी के सन्नाटे में डूबा था, वहाँ अब हँसी के फव्वारे छूट रहे थे।

जयपुर के पुराने मोहल्ले में स्थित ‘सदाशिव सदन’ की छत पर लगी बिजली की लड़ियाँ मद्धिम रोशनी बिखेर रही थीं। आंगन में गेंदे के फूलों की महक तैर रही थी, पर उस महक में त्योहार की वो उमंग नहीं थी जो हर साल हुआ करती थी। रसोई में खड़ी जानकी देवी मावे के पेड़े बनाते-बनाते अचानक ठिठक गईं। उनके हाथ में पकड़ा चम्मच कड़ाही के किनारे ही छूट गया और निगाहें शून्य में खो गईं। उनके पति, शशिकांत जी, जो बैठक में बैठकर पीतल के दीपदानों को चमकाने में जुटे थे, काफी देर से अपनी पत्नी की खामोशी को भाँप रहे थे।

“क्या बात है जानकी? दोपहर से देख रहा हूँ, तुम्हारा मन किसी काम में नहीं लग रहा है। चेहरे पर ऐसा सन्नाटा क्यों छाया है?” शशिकांत जी ने चश्मा नाक पर टिकाते हुए पूछा।

जानकी देवी ने अपनी सूती साड़ी के पल्लू से आँखों के कोरों को हल्के से दबाया। उनकी आवाज़ भर्राई हुई थी, “क्या कहूँ जी! जब से दोपहर में पुणे से बहू अर्चना का फोन आया है, तब से कलेजे पर जैसे कोई भारी पत्थर रख दिया गया हो। उसने बताया कि इस बार दीपावली पर अनिरुद्ध को दफ्तर से छुट्टी नहीं मिल पाई है। वे लोग नहीं आ रहे हैं। मन बिल्कुल बुझ सा गया है। जब घर के बच्चे ही चौखट पर न हों, तो इन दीयों की रोशनी किसके लिए जलाएँ?”

शशिकांत जी के हाथ भी एक पल के लिए रुक गए। उनके चेहरे पर भी एक गहरी उदासी तैर गई, लेकिन एक पिता और परिवार के मुखिया होने के नाते उन्होंने अपने चेहरे के भावों को तुरंत संभाल लिया। वे एक फीकी मुस्कान के साथ बोले, “अरे पगली! अनिरुद्ध कोई आवारागर्दी करने तो नहीं रुका है वहाँ। इतनी बड़ी आईटी कंपनी में वरिष्ठ सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट है वो। ज़िम्मेदारियाँ भी तो उसी हिसाब से बड़ी होती हैं। प्राइवेट नौकरी में काम का कितना दबाव रहता है, यह हम सब जानते हैं। अर्चना ने बताया न कि कोई विदेशी क्लाइंट का ज़रूरी प्रोजेक्ट अचानक आ गया है। हमें समझना चाहिए।”

“मैं सब समझती हूँ जी,” जानकी देवी रुआंसी होकर बोलीं, “पर दिल को कैसे समझाऊँ? पूरे साल में बस ये दो ही तो मौके होते हैं जब हमारा भरा-पूरा परिवार एक छत के नीचे इकट्ठा होता है—होली और दीवाली। सात साल हो गए अनिरुद्ध की शादी को, आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि दीवाली की शाम उसने अपने हाथों से इस घर की देहरी पर पहला दीप न रखा हो। हमारी नन्हीं पोती, पीहू, पिछले एक महीने से फोन पर कह रही थी कि ‘दादी, इस बार मैं आपके साथ मिलकर आँगन में बड़ी वाली रंगोली बनाऊँगी।’ अर्चना ने भी सारी तैयारियाँ कर ली थीं, मिठाइयों के डिब्बे बाँध लिए थे। पर ऐन वक्त पर उस मैनेजर ने छुट्टी रद्द कर दी। ये कॉर्पोरेट कंपनियाँ इंसान को मशीन समझ लेती हैं, इन्हें किसी की भावनाओं और बूढ़े माँ-बाप के इंतज़ार से क्या वास्ता!”

उधर लगभग बारह सौ किलोमीटर दूर, पुणे के एक बहुमंजिला अपार्टमेंट में भी माहौल ऐसा ही मातम जैसा था।

अर्चना बालकनी में खड़ी बाहर की जगमगाती इमारतों को देख रही थी। लिविंग रूम में छह साल की पीहू अपने नए लहंगे को हाथ में लिए मुँह फुलाकर बैठी थी। “मम्मी, आपने तो कहा था कि हम जयपुर जाएँगे! दादू ने मेरे लिए मिट्टी के खिलौने मँगाए हैं। मुझे यहाँ नहीं रहना, मुझे दादी के पास जाना है!” पीहू लगभग रोने लगी।

अर्चना ने उसे अपनी गोद में समेट लिया और उसके आँसू पोंछते हुए बोली, “मेरी गुड़िया, पापा को ऑफिस में बहुत ज़रूरी काम आ गया है न। पापा बहुत मेहनत करते हैं। अगर पापा नहीं जाएँगे तो उनके बॉस नाराज़ हो जाएँगे। हम लोग वीडियो कॉल पर दादी-दादू के साथ पूजा करेंगे, ठीक है?”

तभी अनिरुद्ध थके-हारे कदमों से बेडरूम से बाहर निकला। उसके चेहरे पर गहरी लाचारी और आत्मग्लानि के भाव साफ झलक रहे थे। उसने लैपटॉप बैग सोफे पर पटका और सिर दोनों हाथों में थामकर बैठ गया।

अर्चना उसके पास आई और उसके कंधे पर हाथ रखा। “अनिरुद्ध, आपने कुछ खाया भी नहीं है। कब तक ऐसे खुद को कोसते रहोगे? माँ जी से बात हुई थी मेरी दोपहर में। वो बहुत दुखी थीं, उनकी आवाज़ कांप रही थी। वो कह रही थीं कि कोई बात नहीं, हम वीडियो कॉल पर जुड़ जाएँगे। लेकिन मुझे पता है कि उनका दिल अंदर से कितना रो रहा होगा।”

अनिरुद्ध ने अपनी लाल आँखों से अर्चना की तरफ देखा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी बेबसी थी, “अर्चना, तुम नहीं जानती कि मेरे सीने पर क्या बीत रही है। जब मैं इंजीनियरिंग पूरी करके पहली बार नौकरी के सिलसिले में घर से निकला था, तो माँ ने स्टेशन पर मेरा हाथ पकड़कर सिर्फ एक ही वचन माँगा था। माँ ने कहा था—’बेटा, दुनिया के किसी भी कोने में रहना, कितनी भी बड़ी तरक्की कर लेना, पर साल में दो बार, होली और दीवाली पर, अपनी इस माँ की चौखट को सूना मत छोड़ना।’ पिछले आठ सालों में मैंने हर मुश्किल से लड़कर वह वचन निभाया। चाहे टिकट न मिले, चाहे मुझे रात-रात भर जागकर अतिरिक्त काम करना पड़े, पर मैं हमेशा दीवाली पर माँ के पास पहुँचा। लेकिन इस बार…”

अनिरुद्ध का गला रुंध गया। उसने आगे कहा, “इस बार हमारे डायरेक्टर ने सीधे कह दिया कि अगर जर्मन क्लाइंट का यह माइग्रेशन प्रोजेक्ट कल रात तक लाइव नहीं हुआ, तो पूरी टीम के अप्रेजल पर बात आ जाएगी। मुझे टीम लीड होने के नाते वहीं रुकना पड़ा। अर्चना, मुझे ऐसा लग रहा है मानो मैं अपनी माँ का गुनहगार हूँ। वो बूढ़ी आँखें आज दरवाज़े की तरफ देख-देखकर थक जाएँगी।”

अर्चना ने धीमे से कहा, “मैं तुम्हारी मजबूरी समझती हूँ अनिरुद्ध। पर अब जो हमारे वश में नहीं है, उसके लिए इतना मत सोचो। चलो, हम भी यहाँ की तैयारी कर लेते हैं, वरना पीहू और उदास हो जाएगी।”

समय अपनी गति से बीतता रहा और दीपावली की पावन शाम आ पहुँची।

जयपुर के सदाशिव सदन में शशिकांत जी ने नए धोती-कुर्ते पहने और मंदिर में लक्ष्मी-गणेश जी की प्रतिमाओं को स्थापित किया। जानकी देवी ने पूजा की थाली सजाई—रोली, अक्षत, धूप, बताशे और घर के बने ताज़ा पेड़े। पर उनके पैरों में वो फुर्ती नहीं थी। वे बार-बार मुड़कर मुख्य दरवाज़े को देख लेती थीं, जहाँ हर साल अनिरुद्ध अपने हाथों से वंदनवार बाँधता था और अपनी हँसी से पूरे घर को गुंजायमान कर देता था।

“जानकी, अब थाली लेकर आ भी जाओ। शुभ मुहूर्त का समय हो रहा है,” शशिकांत जी ने मंदिर के पास से आवाज़ लगाई।

जानकी देवी भारी कदमों से पूजा घर में आईं और भगवान के सामने दीया जलाते हुए हाथ जोड़कर आँखें मूँद लीं। उनकी आँखों से दो बूँद आँसू टपक कर आरती की थाली में गिर पड़े। उन्होंने मन ही मन प्रार्थना की, “हे लक्ष्मी मैया, मेरे बच्चों को जहाँ भी रहें, खुश और सलामत रखना। बस उनकी तरक्की में कभी उनके अपनों का प्यार पीछे न छूटे।”

वे दोनों मिलकर आरती गाने ही वाले थे कि तभी अचानक—

‘टिंग-टॉन्ग… टिंग-टॉन्ग…’

मुख्य दरवाज़े की घंटी ज़ोर-ज़ोर से घनघना उठी।

जानकी देवी चौंक पड़ीं। हाथ में पकड़ी अगरबत्ती वहीं रुक गई। “अरे! इस वक्त कौन आ गया? शाम के सात बज रहे हैं, सब लोग तो अपने-अपने घरों में लक्ष्मी पूजन की तैयारी कर रहे होंगे। कोई पड़ोसी होगा शायद मिठाई देने आया होगा।”

शशिकांत जी ने कहा, “तुम रुको, मैं जाकर देखता हूँ।”

“नहीं, आप पूजा की बत्तियाँ ठीक कीजिए, मैं ही देख लेती हूँ,” कहते हुए जानकी देवी अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए दरवाज़े की तरफ बढ़ गईं।

जैसे ही जानकी देवी ने मुख्य दरवाज़े की सिटकनी खोली और पल्ला पीछे किया, उनके मुँह से एक चीख सी निकल गई। उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं और हाथ अपने आप मुँह पर चले गए।

सामने दरवाज़े पर अनिरुद्ध खड़ा था! उसके चेहरे पर रात भर के सफर की थकान ज़रूर थी, लेकिन उसकी आँखों में वही बचपन वाली शरारत और असीम प्यार चमक रहा था। उसके ठीक पीछे अर्चना खड़ी मुस्कुरा रही थी और नन्हीं पीहू दोनों हाथ फैलाए खड़ी थी!

“सरप्राइज़ दादी!!” पीहू ने चहकते हुए छलाँग लगाई और सीधे जानकी देवी के पैरों से लिपट गई।

जानकी देवी को लगा मानो वे कोई सपना देख रही हों। उनका शरीर काँपने लगा। उन्होंने अविश्वास से अपने हाथ आगे बढ़ाए और अनिरुद्ध के गालों को छुआ। “अ… अनिरुद्ध? मेरा बच्चा? तू… तुम लोग सच में आ गए?”

“हाँ माँ! आपका अनिरुद्ध आ गया,” अनिरुद्ध की आँखें भी भर आईं। उसने तुरंत झुककर अपनी माँ के दोनों पैरों को अपनी हथेलियों में थाम लिया और सिर उनके चरणों पर रख दिया।

शशिकांत जी भी भागते हुए दरवाज़े पर आ पहुँचे। सामने का दृश्य देखकर उनकी आँखों में भी खुशी के आँसू छलक आए। “अरे! तुम लोग? पर अनिरुद्ध, तेरी तो छुट्टी नहीं थी न बेटा? यह सब कैसे हुआ?”

अनिरुद्ध उठा और उसने अपनी माँ को कसकर अपने सीने से लगा लिया। काफी देर तक माँ और बेटा एक-दूसरे के गले लगकर सिसकते रहे। वह सिसकी किसी दुख की नहीं थी, वह तो महीनों के इंतज़ार और उस ममता के मिलन का सुकून थी जो शब्दों से परे होती है।

जब सब लोग अंदर बैठक में आए, तो अनिरुद्ध ने पानी का घूँट पिया और अपने आने की पूरी कहानी बताई।

“पापा, जब कल दोपहर को मैंने माँ की उदास आवाज़ सुनी और अर्चना को दुखी देखा, तो मेरा कलेजा फटने लगा। मुझे लगा कि जिस माँ ने मुझे उंगली पकड़कर चलना सिखाया, जिसने मेरे हर सपने के लिए अपनी ख्वाहिशें कुर्बान कर दीं, आज अगर मैं चंद कागज़ों और कोड्स के टुकड़ों के लिए उसका दिल तोड़ दूँगा, तो मेरी सारी कामयाबी बेमानी है। मैंने अपनी टीम के साथियों को इकट्ठा किया। मैंने उनसे कहा कि ‘दोस्तों, मुझे किसी भी कीमत पर आज रात अपनी माँ के पास पहुँचना है। क्या तुम सब मेरा साथ दोगे?'”

अनिरुद्ध की आवाज़ में गर्व था। वह आगे बोला, “माँ, मेरी टीम के लड़कों ने कहा—’भैया, आप बेफिक्र होकर जाइए, हम सब मिलकर रात भर में यह काम खत्म कर देंगे।’ मैंने लगातार अठारह घंटे बिना पलक झपकाए कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बैठकर अपना पूरा काम आधी रात तक ही खत्म कर दिया। सुबह चार बजे जब सिस्टम टेस्ट सफल हुआ, तो मैंने सीधे अपने डायरेक्टर को फोन मिलाया। मैंने उनसे कहा, ‘सर, मेरा काम पूरा हो चुका है। अब चाहे मेरी नौकरी रहे या जाए, मैं अपनी माँ के पास जा रहा हूँ।’ डायरेक्टर साहब मेरी निष्ठा और काम की गति देखकर इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरंत मुस्कुराते हुए मेरी चार दिन की छुट्टी मंजूर कर दी!”

अर्चना ने बीच में जोड़ते हुए कहा, “और पापा जी, सुबह की कोई भी सीधी फ्लाइट जयपुर के लिए खाली नहीं थी। इन्होंने बिना एक पल सोचे मुझे और पीहू को उठाया, हम मुंबई तक कनेक्टिंग फ्लाइट से गए और वहाँ से दूसरी फ्लाइट पकड़कर दोपहर में एयरपोर्ट पहुँचे और फिर टैक्सी करके सीधे यहाँ भागे चले आए। इन्होंने पिछले चौबीस घंटों से एक दाना भी मुँह में नहीं डाला है।”

यह सुनकर जानकी देवी ने अनिरुद्ध के सिर पर प्यार से एक हल्की सी चपत लगाई और फिर उसे अपने आँचल में समेट लिया। “पागल कहीं का! इतना कष्ट उठाने की क्या ज़रूरत थी? तू बस फोन पर हँस देता तो मेरी दीवाली वैसे ही मन जाती।”

“नहीं माँ,” अनिरुद्ध ने बहुत ही गंभीर और भावुक स्वर में कहा, “रिश्ते और माँ-बाप का आशीर्वाद स्क्रीन पर नहीं, सीने से लगकर महसूस किया जाता है। मैं चाहे कितना भी बड़ा अधिकारी बन जाऊँ, पर आपके लिए तो वही छोटा अनिरुद्ध रहूँगा। आपका दिया हुआ वचन मेरे लिए किसी भी नौकरी से कहीं बढ़कर है।”

शशिकांत जी ने आगे बढ़कर अपने बेटे की पीठ थपथपाई। उनका सीना आज गर्व से चौड़ा हो गया था। “बेटा, आज तूने साबित कर दिया कि आधुनिकता और बड़ी नौकरियाँ हमारे संस्कारों को तब तक नहीं छीन सकतीं, जब तक हमारे भीतर अपनों के लिए सच्चा प्रेम ज़िंदा है।”

कुछ ही देर में सदाशिव सदन का पूरा माहौल बदल गया। जो घर कुछ देर पहले तक उदासी के सन्नाटे में डूबा था, वहाँ अब हँसी के फव्वारे छूट रहे थे।

अर्चना ने तुरंत रसोई संभाल ली। पीहू ने अपनी दादी के साथ मिलकर आँगन में रंगों और फूलों से एक मनमोहक रंगोली सजाई। अनिरुद्ध ने नए कुर्ते पहने और अपने पिता के साथ मिलकर घर की छत, मुंडेरों और मुहाने पर मिट्टी के दीये कतार में सजा दिए।

शाम को जब पूरा परिवार एक साथ लक्ष्मी पूजन के लिए बैठा, तो जानकी देवी के चेहरे पर एक अलौकिक तृप्ति और आभा दमक रही थी। अनिरुद्ध और अर्चना ने मिलकर आरती गाई, शशिकांत जी ने शंख बजाया और नन्हीं पीहू ने पूरे घर में घंटी बजाते हुए फेरे लगाए। पूजा के बाद जब अनिरुद्ध ने अपने हाथों से पहला जगमगाता हुआ घी का दीया मुख्य द्वार की देहरी पर रखा, तो उस दीये की लौ में सिर्फ तेल और बाती नहीं जल रहे थे, बल्कि उसमें एक बेटे का समर्पण, एक माँ का अटूट विश्वास और एक भरे-पूरे परिवार का निस्वार्थ प्रेम जगमगा रहा था।

उस रात जयपुर के आसमान में छूटते पटाखों की गूँज के बीच, सदाशिव सदन की हर एक ईंट रिश्तों के उस पावन उजाले से नहा रही थी, जिसे दुनिया की कोई भी दूरी कभी मद्धिम नहीं कर सकती थी।

प्रिय पाठकों,

क्या आज के इस भागदौड़ और कॉर्पोरेट दबाव वाले युग में हम अपने बुजुर्ग माता-पिता की उस खामोश उम्मीद को समझ पाते हैं, जो हर त्योहार पर दरवाज़े की ओर टकटकी लगाए हमारा इंतज़ार करती है? क्या करियर की ऊँचाइयों के बीच परिवार के इन छोटे-छोटे पलों को बचाना ही जीवन की सबसे बड़ी सफलता नहीं है? इस प्रेरक और भावुक कहानी पर आपकी क्या राय है? अपने अनमोल विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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