रिश्तों की बगिया

शकुंतला देवी ने तुरंत वंदना को उठाया और उसे अपने गले से लगा लिया। उन्होंने वंदना के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “पागल लड़की, इस हालत में तुझे सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आने की क्या ज़रूरत थी? कुछ ऊँच-नीच हो जाती तो? माँ कभी अपने बच्चों से हमेशा के लिए रूठ सकती है क्या? मेरा … Read more

अफसोस नहीं …. – आराधना श्रीवास्तव

कितना सुंदर ,मासूम सा चेहरा ,,,,मदमस्त काया,, गोरी सुंदर ,,,”नैना,”,,, मात्र अठारह वर्ष की थी l गांव में अपनी सहेलियों के साथ निश्चल हंसी  ठिठोली करते हुये कब वह बड़ी हो गई उसे खुद भी पता नहीं चला ।  उसका चंदन सा महकता बदन ,,,चंचल चितवन,, और उस पर से उसका खिलखिला कर हंसना उसके … Read more

सात समंदर पार की छांव

“जा यशोदा… एक नया आसमान, एक नया सवेरा और तेरे अपने बच्चे पलकें बिछाए तेरा इंतजार कर रहे हैं। इस उम्र में बहुत कम माताओं को यह सौभाग्य मिलता है कि वे अपने बच्चों के साथ उस आंगन में रह सकें जिसे उनके बच्चों ने अपने सपनों से सींचा है। खूब खुश रहना, अपनी सेहत … Read more

स्वाभिमान की नींव

 तान्या का चेहरा गुस्से और अचरज से लाल हो गया। उसने तल्ख़ आवाज़ में कहा, “केशव जी, आप बहुत भावुक हो रहे हैं। ज़मीनी हकीकत को समझिए। आज के दौर में कोई भी आज़ाद खयालों की लड़की सास-ससुर के साथ रहकर अपनी ज़िंदगी खराब नहीं करना चाहती। आपको लगता है कि आपकी इस हालत के … Read more

अंगूठे से हस्ताक्षर तक

 “बाबूजी, यह आपकी बड़ी बहू की सरकारी नौकरी का नियुक्ति पत्र है। यह किसी धोखे का कागज नहीं है, यह उसकी चौदह साल की तपस्या और आपके बेटे के विश्वास की जीत है।” प्रभाकर जी की आवाज़ में एक ऐसा ठहराव और गरिमा थी कि कमरे का माहौल एकदम बदल गया। ससुर जी ने चौंककर … Read more

पराया गहना

“और आप सब चुप रहे?” राधिका के चेहरे पर अविश्वास की लकीरें खिंच गईं। “एक स्त्री के मायके की इकलौती यादगार, उसकी मां का आशीर्वाद, आपने सिर्फ समाज में झूठा रुतबा दिखाने के लिए उससे छीन लिया? और मुझे दे दिया? किस बात का घमंड है हमें? किस अमीरी का ढोंग कर रहे हैं हम, … Read more

धूप की छांव

“माँ, संसाधन मेहनत से कमाए जा सकते हैं, पर सच्चा दिल और वफादारी खरीदी नहीं जा सकती। मिहिर आज भी किसी अच्छे पद पर है, उसने मुझसे सच्चा प्रेम किया था और जब आपने उस रिश्ते से इनकार किया, तो उसने किसी और से शादी करने के बजाय अपनी जिंदगी को माँ-बाप की सेवा और … Read more

उजालों की दहलीज़

“मर्यादा सिर्फ एक इंसान के कंधे पर नहीं टिकती, बाबूजी। बाहर होटल में खाना खाया जा सकता है, तो घर में भी आज सब अपनी व्यवस्था खुद कर सकते हैं।” इतना कहकर अनुराग ने मेरा हाथ मजबूती से थामा और मुझे अपनी पुरानी बजाज चेतक स्कूटर पर बिठा लिया। उस दिन पहली बार मुझे लगा … Read more

रूह के रिश्ते

बैकुंठ बाबू की आवाज़ में एक पिता का अधिकार और एक संत का आशीर्वाद गूंज उठा, “अनन्या बेटा, ईश्वर ने शायद उस स्वार्थी निशांत को हमारी ज़िंदगी से इसीलिए दूर किया था ताकि वह तुम्हारे जीवन में सिद्धार्थ जैसे फरिश्ते को भेज सके। जिस इंसान ने बिना किसी लालच के, सिर्फ हमारी तड़प देखकर हमें … Read more

धुंध से परे का सवेरा

पंखुड़ी उठी, उसने झुककर मेरे माथे को चूमा और बोली, “मैं समर के साथ लिव-इन में इसलिए रह रही हूँ माँ, ताकि मैं अपने फैसले खुद ले सकूं। मैं आपकी तरह किसी डर के साए में घुट-घुट कर नहीं जीना चाहती। और हाँ… आलोक चाचा पिछले हफ्ते ही यूनिवर्सिटी से रिटायर हुए हैं। वे आज … Read more

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