शकुंतला देवी ने तुरंत वंदना को उठाया और उसे अपने गले से लगा लिया। उन्होंने वंदना के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “पागल लड़की, इस हालत में तुझे सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आने की क्या ज़रूरत थी? कुछ ऊँच-नीच हो जाती तो? माँ कभी अपने बच्चों से हमेशा के लिए रूठ सकती है क्या? मेरा गुस्सा तो बस पानी का बुलबुला था, जो तेरे इस नन्हे कबूतर की आवाज़ सुनते ही फूट गया।”
सुबह की गुनगुनी धूप हवेलीनुमा पुराने मकान की खुली छत पर आहिस्ता-आहिस्ता पैर पसार रही थी। शहर के कोलाहल से दूर, जबलपुर के एक शांत रिहायशी इलाके में स्थित यह दोमंजिला मकान केवल ईंट और गारे की इमारत नहीं था, बल्कि तीन पीढ़ियों के प्यार, तकरार और समझौतों का साक्षी था। छत के एक कोने में लोहे की पुरानी आरामकुर्सी पर शकुंतला देवी बैठी थीं। उनकी आँखों के चश्मे के पीछे आज वह चमक नहीं थी जो आमतौर पर परिवार को डांटते-दुलारते वक्त दिखाई देती थी। उनके गोरे, झुर्रीदार चेहरे पर एक तीखी नाराजगी की लकीरें खिंची हुई थीं। पास ही रखे दाने के कटोरे से दो मुट्ठी बाजरा उन्होंने सीमेंट की मुंडेर पर बिखेर दिया था, जहाँ दर्जनों नीलकंठ और सलेटी कबूतर गुटरगूँ करते हुए दाना चुग रहे थे। शकुंतला देवी अपने कांपते हाथों से अपनी बनारसी सूती शॉल को कसते हुए एकटक उन परिंदों को देख रही थीं, मानो आज उनके मन की बात सुनने वाला इस पूरे भरे-पूरे संसार में कोई इंसान नहीं, सिर्फ ये बेजुबान ही बचे हों।
पीछे से हल्की आहट हुई। हाथों में तुलसी वाली चाय के दो कुल्हड़ थामे, सफेद धोती-कुर्ते में सजे विश्वंभर जी धीमे कदमों से चले आ रहे थे। विश्वंभर जी और शकुंतला देवी का साथ पचास बरसों का था। वे अपनी पत्नी की हर सांस की गति, हर त्यौरी के मरोड़ और उनकी हर चुप्पी के मायने बखूबी समझते थे। उन्होंने चुपचाप एक कुल्हड़ मुंडेर के सहारे रखा और खुद दूसरी छोटी कुर्सी खींचकर उनके पास बैठ गए।
शकुंतला देवी ने अपनी गर्दन दूसरी दिशा में मोड़ ली, स्पष्ट संकेत था कि वे किसी से भी बात करने के मूड में नहीं हैं।
विश्वंभर जी ने हल्की मुस्कान के साथ उनकी ओर देखा और बड़े ही शांत, आत्मीय स्वर में बोले, “देखो भाग्यवान, यूँ रूठा न करो। तुम तो जानती हो कि तुम्हारा यह बेवजह का गुस्सा सीधे तुम्हारी सेहत पर असर डालता है। अभी पिछले हफ्ते ही डॉक्टर ने कहा था कि तुम्हारा ब्लड प्रेशर बढ़ रहा है, फिर भी अपनी ही ज़िद पर अड़ी हो। खुद ही तो कहती आई हो हमेशा कि जहाँ चार बर्तन होते हैं, वहाँ खटकने की आवाज़ तो आती ही है। अब जब घर में ज़रा सी खटपट हो गई, तो अपना ही कहा भूल गईं? बहू से दो बातें क्या हो गईं, तुम अपने घर के चहकते कबूतरों को छोड़कर यहाँ छत पर इन उड़ने वाले कबूतरों से गुफ्तगू करने आ बैठीं?”
शकुंतला देवी के होंठ हिले, मगर आवाज़ बाहर नहीं आई। आँखों के कोरों पर नमी तैर गई। बात इतनी बड़ी भी नहीं थी, पर बुजुर्ग मन अक्सर बहुत संवेदनशील और कांच जैसा हो जाता है। सुबह की बात थी। रसोई में पूजा के प्रसाद और नाश्ते को लेकर शकुंतला देवी और उनकी बड़ी बहू वंदना के बीच हल्की कहासुनी हो गई थी। शकुंतला देवी का मानना था कि आज एकादशी है, इसलिए रसोई में लहसुन-प्याज का स्पर्श भी नहीं होना चाहिए, जबकि वंदना ने बच्चों के स्कूल और कॉलेज के टिफिन के लिए जल्दी-जल्दी में कुछ ऐसा बना दिया था जो शकुंतला देवी के पुराने नियमों के विरुद्ध था। वंदना ने हड़बड़ाहट में कह दिया था, “मां जी, समय बदल चुका है, रोज़-रोज़ की इन बंदिशों से घर के काम नहीं चलते।”
बस, यही एक वाक्य शकुंतला देवी के दिल में तीर की तरह चुभ गया था। उन्हें लगा कि अब इस घर में उनके अस्तित्व, उनकी परंपराओं और उनके वजूद की कोई अहमियत नहीं रही। जिस घर को उन्होंने अपने खून-पसीने से सींचा था, आज उसी घर में उन्हें ‘अनावश्यक दखल देने वाली’ समझा जाने लगा था। स्वाभिमान से भरी शकुंतला देवी बिना कुछ कहे सीधे छत पर आ गई थीं और तब से वहीं बैठी थीं। न चाय पी, न किसी से बात की।
विश्वंभर जी ने उनकी हथेली पर अपना झुर्रीदार हाथ रखा। उनकी छुअन में वही पुराना अपनापन था। वे बोले, “शकुंतला, वंदना को क्या तुम नहीं जानती? सात साल पहले जब वह इस चौखट के अंदर आई थी, तो तुमने ही तो कहा था कि भगवान ने हमें बेटी नहीं दी, पर बेटी से बढ़कर बहू दे दी। याद करो, जब पिछले साल तुम्हें डेंगू हुआ था, तो इसी वंदना ने पंद्रह दिनों तक अपने हाथों से तुम्हारी सेवा की थी। न दिन देखा, न रात। अपनी सगी माँ की तरह तुम्हारे पैर दबाए थे। आज अगर सुबह काम के तनाव में उसके मुँह से कोई कड़वा शब्द निकल भी गया, तो क्या तुम उसकी बरसों की सेवा और प्रेम को एक झटके में भुला दोगी? और फिर ज़रा पीछे मुड़कर तो देखो, कौन आ रहा है।”
शकुंतला देवी ने अनिच्छा से अपनी गर्दन घुमाई। सीढ़ियों के दरवाजे पर वंदना खड़ी थी। वंदना सात महीने की गर्भवती थी। उसका भारी शरीर, चेहरे पर थकान और आँखों में पछतावे के गहरे बादल साफ दिखाई दे रहे थे। वह दोनों हाथों में एक थाली संभाले हुए थी जिसमें शकुंतला देवी के लिए बिना नमक का मखाने का फलाहार और गर्म दूध का गिलास रखा था। सीढ़ियाँ चढ़ने के कारण उसकी सांस फूल रही थी, फिर भी उसके चेहरे पर केवल अपनी सास को मनाने की व्याकुलता थी।
विश्वंभर जी ने धीमे से कहा, “लो देखो, वो भी तुम्हें मनाने आ रही है, वह भी अपनी इस अवस्था में! जिस बहू को हम दोनों ने बेटी की तरह चाहा, जिसे तुमने खुद अपने हाथों से गृहस्थी की हर बारीकी सिखाई, आज वही तुम्हारे एक रूठने से कितनी बेहाल है। क्या तुम्हें उस पर ज़रा भी तरस नहीं आ रहा?”
शकुंतला देवी का कठोर मन भीतर से पिघलने लगा था। एक माँ का दिल आखिर कब तक कठोर रह सकता है? उन्हें लगा कि वंदना को इस हालत में सीढ़ियाँ नहीं चढ़नी चाहिए थीं, कहीं पैर फिसल जाता तो? वे डांटने के लिए मुँह खोलने ही वाली थीं कि सीढ़ियों से एक नन्हीं, तेज़ दौड़ती आवाज़ गूंजी।
“दादी अम्मा! ओ दादी अम्मा!”
वह छह साल का आरव था, वंदना का बड़ा बेटा और शकुंतला देवी की जान। आरव स्कूल की ड्रेस आधा उतारे, गले में टाई ढीली किए छत की तरफ भागा चला आ रहा था। उसके नन्हे हाथों में कागज का एक फूल था जो उसने शायद स्कूल के क्राफ्ट पीरियड में बनाया था। छत पर पहुँचते ही वह दौड़कर शकुंतला देवी की गोद में जा समाया।
आरव ने अपनी नन्हीं बाहें दादी के गले में डाल दीं और अपनी तोतली, मधुर आवाज़ में वही पुराना बालगीत गाने लगा जो शकुंतला देवी उसे अक्सर बचपन में सुलाते हुए सुनाया करती थीं—
“दादी अम्मा, दादी अम्मा मान जाओ!
छोड़ो भी ये गुस्सा ज़रा हँस कर दिखाओ!
छोटी-छोटी बातों पे ना बिगड़ा करो,
हँसते-हँसते जिंदगी में रंग भरा करो!”
गीत की पंक्तियाँ उस शांत छत की हवा में घुल गईं। आरव का चेहरा इतना मासूम था और उसके गाने का अंदाज़ इतना नटखट था कि विश्वंभर जी अपनी हंसी नहीं रोक पाए। कबूतर भी फड़फड़ा कर मुंडेर से थोड़ा पीछे हट गए, मानो वे भी इस नन्हे गायक की प्रस्तुति का सम्मान कर रहे हों।
आरव ने अपने नन्हे हाथों से शकुंतला देवी के दोनों गाल पकड़े और अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से देखते हुए बोला, “दादी, मम्मी रो रही थीं नीचे। उन्होंने कहा कि दादी ने सुबह से कुछ नहीं खाया। अगर आप खाना नहीं खाओगी, तो मैं भी अपना फेवरेट चॉकलेट शेक नहीं पीऊँगा और स्कूल का होमवर्क भी नहीं करूँगा। अब जल्दी से हँसो, नहीं तो मैं आपकी गोद से कभी नहीं उतरूँगा।”
इतनी मनुहार, इतने सारे अपनों का सच्चा प्यार और यह निश्छल समर्पण देख कर शकुंतला देवी की आँखों से आंसुओं की दो बूंदें ढुलक कर आरव के माथे पर गिर पड़ीं। बरसों से जमा हुआ मान-अपमान का झूठा अहंकार एक पल में बह गया। उनके चेहरे की तनी हुई नसें ढीली पड़ गईं और उनके सूखे, कांपते होंठों पर एक बेहद खूबसूरत, ममतामयी मुस्कान खिल उठी। उन्होंने आरव को कसकर सीने से भींच लिया और उसके माथे को चूम लिया।
वंदना आगे बढ़ी और उसने थाली मुंडेर पर रखकर सीधे शकुंतला देवी के घुटने पकड़ लिए। उसकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली। “माँ जी, मुझे क्षमा कर दीजिए। सुबह काम की आपाधापी में मेरा दिमाग सुन्न हो गया था। मेरे मुँह से वो बातें कैसे निकल गईं, मुझे खुद नहीं मालूम। आपके बिना इस घर में न कोई नियम है, न कोई बरकत। अगर आप ही हमसे मुँह मोड़ लेंगी, तो मैं इस घर को कैसे संभालूंगी? आप मुझे डांट लीजिए, चाहे तो दो थप्पड़ लगा लीजिए, लेकिन इस तरह हमसे दूर मत बैठिए।”
शकुंतला देवी ने तुरंत वंदना को उठाया और उसे अपने गले से लगा लिया। उन्होंने वंदना के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “पागल लड़की, इस हालत में तुझे सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आने की क्या ज़रूरत थी? कुछ ऊँच-नीच हो जाती तो? माँ कभी अपने बच्चों से हमेशा के लिए रूठ सकती है क्या? मेरा गुस्सा तो बस पानी का बुलबुला था, जो तेरे इस नन्हे कबूतर की आवाज़ सुनते ही फूट गया।”
विश्वंभर जी ने दोनों को गले मिलते देखा तो उनका चेहरा भी तृप्ति और संतोष से खिल उठा। छत पर रखे गमलों में खिले मोगरे और गुलाब के फूल भी हवा के झोंकों से ऐसे झूम रहे थे, मानो वे भी इस पारिवारिक पुनर्मिलन का उत्सव मना रहे हों। रिश्तों की बगिया फिर से महक उठी थी। जो कड़वाहट सुबह के वक्त घर की नींव हिलाने की कोशिश कर रही थी, वह शाम ढलने से पहले ही अपनों के प्यार और समझदारी के आगे नतमस्तक हो चुकी थी।
विश्वंभर जी ने कुल्हड़ की ठंडी हो चुकी चाय को देखा और मुस्कुराते हुए बोले, “लो भाई, अदालत का फैसला तो हो गया और सुलह भी हो गई। अब क्या इस बूढ़े को कोई गर्म चाय पिलाएगा या मैं भी इन कबूतरों के साथ दाना चुगना शुरू कर दूँ?”
उनकी बात सुनते ही छत पर हंसी का एक जोरदार फव्वारा फूट पड़ा। आरव ताली बजाकर नाचने लगा, वंदना ने आँसू पोंछते हुए कहा कि वह अभी नीचे जाकर सबके लिए गरमा-गर्म अदरक वाली चाय और पकौड़े बनाकर लाती है। शकुंतला देवी ने वंदना का हाथ थामते हुए कहा, “नहीं, पकौड़े आज हम दोनों मिलकर बनाएंगे। तू बस बैठकर मुझे बताएगी कि आज बच्चों को क्या पसंद है।”
चारों ओर एक अद्भुत शांति और उल्लास छा गया था। यह दृश्य केवल एक परिवार की सुलह का नहीं था, बल्कि यह उस सनातन भारतीय पारिवारिक मूल्य का जीवंत प्रमाण था जहाँ रिश्तों की डोर तकरार से कमज़ोर नहीं होती, बल्कि क्षमा, समझ और परस्पर सम्मान से और अधिक मजबूत हो जाती है। घर के बड़े-बुजुर्ग मान-सम्मान के भूखे होते हैं, किसी धन-दौलत के नहीं। जब उन्हें यह अहसास होता है कि परिवार में उनकी जगह कोई नहीं ले सकता, तो वे अपनी सारी नाराजगी भूलकर अपना सर्वस्व लुटाने को तैयार हो जाते हैं।
नीचे उतरते हुए जब शकुंतला देवी ने हवेली के आँगन में कदम रखा, तो उन्हें लगा कि घर का हर कोना जैसे मुस्कुरा रहा है। तुलसी के चौरे के पास जलता हुआ दीपक हवा में डोल रहा था, पर बुझने का कोई डर नहीं था, क्योंकि उस दीपक को सहेजने के लिए अब तीन पीढ़ियों के हाथ एक साथ खड़े थे।
हर परिवार में कभी न कभी मनमुटाव की स्थिति बनती है, लेकिन जीत हमेशा उसी घर की होती है जहाँ झुकना कमजोरी नहीं, बल्कि रिश्तों को बचाने की ताकत समझा जाता है। क्या आपके घर में भी कभी ऐसा हुआ है कि किसी छोटे बच्चे की मुस्कान या किसी अपने की एक छोटी सी मनुहार ने बरसों की कड़वाहट को मिनटों में मिटा दिया हो? अपने अनुभव और इस कहानी पर अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर हमारे साथ ज़रूर साझा करें।
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