रूह के रिश्ते

बैकुंठ बाबू की आवाज़ में एक पिता का अधिकार और एक संत का आशीर्वाद गूंज उठा, “अनन्या बेटा, ईश्वर ने शायद उस स्वार्थी निशांत को हमारी ज़िंदगी से इसीलिए दूर किया था ताकि वह तुम्हारे जीवन में सिद्धार्थ जैसे फरिश्ते को भेज सके। जिस इंसान ने बिना किसी लालच के, सिर्फ हमारी तड़प देखकर हमें अपना माँ-बाप मान लिया, उससे ज्यादा नेक जीवनसाथी इस पूरी कायनात में तुम्हें कोई नहीं मिल सकता। यह लड़का तुम्हें सिर्फ प्यार नहीं देगा, तुम्हें वह सम्मान और सुरक्षा देगा जिसकी तुम हक़दार हो। 

कानपुर के सिविल लाइंस इलाके की पुरानी हवेलीनुमा इमारत में खिड़कियों से छनकर आती शाम की पीली धूप फर्श पर उदासी की चादर बिछा रही थी। कमरे में दीवार पर टिकी पेंडुलम वाली घड़ी की हर टिक-टिक सन्नाटे को और गहरा बना रही थी। आराम कुर्सी पर टिके बैकुंठ बाबू की पथराई आँखें छत की कड़ियों को ऐसे निहार रही थीं, मानो उन पुरानी लकड़ियों में अपने गुज़रे हुए कल की खुशियाँ तलाश रहे हों। उनके पास ही तख्त पर बैठी उनकी अर्धांगिनी मनोरमा देवी के हाथ में भगवान कृष्ण की एक पुरानी तुलसी की माला थी, जो उंगलियों के बीच स्थिर हो चुकी थी। उनकी गीली आँखों से ढुलकते आँसू चश्मे के शीशे को धुंधला कर रहे थे। आज चार नवंबर था—उनके इकलौते बेटे निशांत का बत्तीसवाँ जन्मदिन।

वही बेटा, जिसके पहले कदम पर बैकुंठ बाबू ने मोहल्ले भर में पेड़े बाँटे थे और जिसके हर ज़िद के आगे इस बाप ने अपनी ज़रूरतें कुर्बान कर दी थीं। मगर उसी निशांत ने तीन साल पहले अपनी बेलगाम महत्वाकांक्षाओं, झूठी प्रतिष्ठा और दौलत की अंधी दौड़ में अपने इन बूढ़े माँ-बाप को किसी पुराने, फालतू सामान की तरह पीछे छोड़ दिया था। निशांत सिर्फ अपने जन्मदाताओं को ही लाचार छोड़कर नहीं भागा था, बल्कि उस मंडप की पवित्र अग्नि को भी कलंकित कर गया था जहाँ उसका ब्याह होने वाला था।

अनन्या… एक साधारण, शालीन और संस्कारी बिटिया, जिसके पिता की असमय मृत्यु के बाद बैकुंठ बाबू ने उसे अपनी बहू बनाकर घर लाने का सपना देखा था। तिलक हो चुका था, बारात दरवाजे पर लगने ही वाली थी कि निशांत एक पत्र छोड़कर अपनी विदेशी बॉस के साथ उड़ गया। उस पत्र में लिखा था कि वह किसी आम लड़की से शादी करके अपनी उड़ान को सीमित नहीं कर सकता। उस रात जिस तरह मंडप उजड़ा, उसने दो घरों की आत्मा को झकझोर दिया था। मगर उस भयानक तबाही के मलबे से एक अनोखा रूप सामने आया। अनन्या टूटी नहीं, उसने अपने आँसुओं को हिम्मत की ढाल बनाया। जिस घर की देहरी पर वह कभी बहू बनकर कदम रखने वाली थी, उस घर के बूढ़े माँ-बाप को बेसहारा देखकर उसने फैसला किया कि वह उन दो बुजुर्गों की ढाल बनेगी। पिछले तीन सालों से वह उसी घर में एक बेटी, एक बेटे और एक संरक्षक की तरह खड़ी थी। स्कूल में पढ़ाने वाली अनन्या अपनी पूरी तनख्वाह, अपनी खुशियाँ और अपनी जवानी इन दो बीमार बुजुर्गों की सेवा में न्योछावर कर चुकी थी।

आज कमरे में बाहर से आती सर्द हवा के साथ दस्तक हुई। सोफे पर आकर बैठा सिद्धार्थ। सिद्धार्थ, जो अनन्या के स्कूल के पास वाली एक आर्किटेक्चर फर्म में सीनियर इंजीनियर था। अनन्या से उसकी जान-पहचान एक सामाजिक पुस्तकालय अभियान के दौरान हुई थी। धीरे-धीरे जब उसने अनन्या के त्याग और इस घर के संघर्ष को जाना, तो उसके दिल में इस परिवार के प्रति अगाध आदर भर गया। वह अक्सर रविवार को मनोरमा जी की दवाइयाँ लाने या बैकुंठ बाबू को डॉक्टर के पास ले जाने चला आता था।

बैकुंठ बाबू ने खांसते हुए अपनी कांपती आवाज़ में कहा, “सिद्धार्थ बेटा, आज फिर मन बहुत भारी है। हर साल यह तारीख हमारे सीने में खंजर की तरह चुभती है। हम दोनों बूढ़े दिन-रात ईश्वर के आगे यही हाथ जोड़ते हैं कि अनन्या बिटिया को इस दलदल से मुक्ति मिले। हमारी इस बेजान देह की सेवा करते-करते उसने अपनी ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत साल झोंक दिए। जिस बेटे को नौ महीने कोख में रखकर पाला, उसने तो मुड़कर यह भी नहीं पूछा कि हम ज़िंदा भी हैं या मर गए। पर यह बच्ची… जिसका हमारे साथ खून का कोई वास्ता नहीं था, उसने अपनी पूरी दुनिया हम पर न्योछावर कर दी। बेटा, हम कितने बड़े पापी हैं कि उसकी खुशियों की बलि लेकर जी रहे हैं। हमारी सेवा के चक्कर में कोई अच्छा रिश्ता भी उसके लिए नहीं आ पा रहा।”

मनोरमा जी अपनी साड़ी के पल्लू से सिसकियाँ दबाने की कोशिश कर रही थीं। सिद्धार्थ शांत भाव से उठा। उसने किसी औपचारिकता की परवाह नहीं की और सीधे फर्श पर घुटनों के बल मनोरमा जी के कदमों के पास बैठ गया। उसने अपने चौड़े, मजबूत हाथों में उस बूढ़ी माँ के झुर्रियों से भरे, ठंडे पड़ चुके हाथों को बहुत आदर से समेट लिया।

सिद्धार्थ की आँखें भी भीग चुकी थीं। उसने एक गहरी सांस ली और सीधे बैकुंठ बाबू की ओर देखा, “बाबूजी, आज मैं आपसे एक बात छिपाना नहीं चाहता। मैं अनाथालय की चारदीवारी में पला-बढ़ा हूँ। जब बाकी बच्चे स्कूल की छुट्टी पर अपने माता-पिता की उंगली पकड़कर घर लौटते थे, मैं गेट की जाली पकड़कर तन्हा खड़ा रहता था। मुझे नहीं मालूम माँ का आंचल क्या होता है या पिता की डांट में कितना प्यार छिपा होता है। ज़िंदगी की हर जंग अकेले लड़ी, मेहनत की, एक मुकाम भी हासिल किया, पैसे भी कमाए… लेकिन इस सीने के भीतर माँ-बाप के प्यार की भूख कभी नहीं मिटी। जब भी किसी बेटे को अपने माता-पिता के चरण छूते देखता, मेरी आत्मा रो पड़ती थी।”

कमरे में खामोशी इतनी गहरी थी कि सांसों की आवाज़ भी सुनाई दे रही थी। सिद्धार्थ ने मनोरमा जी के हाथों को अपने माथे से छुआया और रुंधे हुए गले से बोला, “माँ जी, क्या आपके इस विशाल दिल में उस भगोड़े बेटे की जगह मेरे जैसे अनाथ के लिए थोड़ी सी जगह बन सकती है? क्या मैं आज से आपको ‘माँ’ और बाबूजी को ‘पिताजी’ कह सकता हूँ? मुझे आपके इस घर की ईंट-पत्थर या जायदाद का एक तिनका नहीं चाहिए। मुझे बस वह खाली आँगन चाहिए जहाँ मैं शाम को दफ्तर से लौटकर किसी की गोद में सिर रख सकूँ, जहाँ कोई दरवाज़े पर मेरी राह देखे और कहे कि बेटा खाना खा ले। मुझे आपका बेटा बनना है, माँ।”

सिद्धार्थ के हर एक शब्द में आत्मा की वह सच्चाई थी जिसे किसी तराजू पर तौला नहीं जा सकता था। मनोरमा देवी का कलेजा फट पड़ा। उन्होंने बिना एक पल गंवाए सिद्धार्थ को खींचकर अपने सीने से लगा लिया। उनके आँसू सिद्धार्थ के बालों को भिगो रहे थे। बैकुंठ बाबू कुर्सी से उठ खड़े हुए, उनके पैर डगमगा रहे थे, लेकिन उनके चेहरे पर एक अलौकिक तेज था। उन्होंने आगे बढ़कर सिद्धार्थ के सिर पर अपने दोनों हाथ रख दिए। उस अंधेरे कमरे में किसी वसीयत या खून के रिश्ते ने नहीं, बल्कि रूह के पवित्रतम रिश्ते ने जन्म लिया था।

रसोई की चौखट के पीछे खड़ी अनन्या के हाथों में काढ़े का कटोरा थरथरा रहा था। उसके गालों पर आँसुओं की नदियाँ बह निकली थीं। पिछले तीन वर्षों से समाज के ताने, अकेलेपन का दंश और अपनी उजड़ी हुई तकदीर का बोझ ढोते-ढोते जो पत्थर उसने अपने दिल पर रख लिया था, वह आज मोम बनकर पिघल गया। सिद्धार्थ के प्रति उसके मन में पहले सिर्फ एक अच्छे इंसान की इज़्ज़त थी, पर आज उसने देखा कि एक मर्द ऐसा भी होता है जो किसी स्त्री को पाने के लिए उसकी मजबूरियों का सौदा नहीं करता, बल्कि उसकी जिम्मेदारियों को अपनी इबादत बना लेता है। सिद्धार्थ ने अनन्या के जीवन के सबसे बड़े दर्द को गले लगाकर उसे सम्मान का ताज पहना दिया था।

बैकुंठ बाबू ने मुड़कर देखा, अनन्या चौखट के सहारे खड़ी रो रही थी। उन्होंने अपनी कांपती लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा, “अनन्या, यहाँ आ मेरी बच्ची।”

अनन्या भीगी पलकों के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ी और कटोरा मेज पर रख दिया। बैकुंठ बाबू ने अनन्या का दायाँ हाथ उठाया और उसे बहुत आदर के साथ सिद्धार्थ की खुली हथेली पर रख दिया।

बैकुंठ बाबू की आवाज़ में एक पिता का अधिकार और एक संत का आशीर्वाद गूंज उठा, “अनन्या बेटा, ईश्वर ने शायद उस स्वार्थी निशांत को हमारी ज़िंदगी से इसीलिए दूर किया था ताकि वह तुम्हारे जीवन में सिद्धार्थ जैसे फरिश्ते को भेज सके। जिस इंसान ने बिना किसी लालच के, सिर्फ हमारी तड़प देखकर हमें अपना माँ-बाप मान लिया, उससे ज्यादा नेक जीवनसाथी इस पूरी कायनात में तुम्हें कोई नहीं मिल सकता। यह लड़का तुम्हें सिर्फ प्यार नहीं देगा, तुम्हें वह सम्मान और सुरक्षा देगा जिसकी तुम हक़दार हो। तूने एक बेटी बनकर हमारा हर फर्ज निभाया है, अब मुझे एक पिता बनकर अपनी बेटी का कन्यादान करने का सौभाग्य दे। मैं अपने कांपते हाथों से तेरा ब्याह सिद्धार्थ के साथ रचाऊंगा।”

मनोरमा जी ने दोनों के सिर पर एक साथ हाथ रखा। अनन्या ने सिर उठाकर सिद्धार्थ की उन ईमानदार और आदर से भरी आँखों में देखा, जहाँ उसके बिखरे हुए अतीत का कोई उपहास नहीं था, बल्कि आने वाले कल के लिए अथाह भरोसा और सुरक्षा थी। अनन्या की उंगलियों ने हौसले के साथ सिद्धार्थ के हाथ को थाम लिया।

उस घर में जो उदासी की धूल बरसों से जमी थी, वह एक झटके में उड़ गई। बाहर खिड़की पर अब भी शाम की ठंडी हवाएं चल रही थीं, लेकिन कमरे के भीतर तीन बुजुर्ग और दो नौजवान दिलों ने मिलकर एक ऐसा परिवार रच दिया था, जिसकी नींव स्वार्थ और खून पर नहीं, बल्कि त्याग, समर्पण और निस्वार्थ प्रेम के अमर संकल्प पर टिकी थी।

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