“बाबूजी, यह आपकी बड़ी बहू की सरकारी नौकरी का नियुक्ति पत्र है। यह किसी धोखे का कागज नहीं है, यह उसकी चौदह साल की तपस्या और आपके बेटे के विश्वास की जीत है।” प्रभाकर जी की आवाज़ में एक ऐसा ठहराव और गरिमा थी कि कमरे का माहौल एकदम बदल गया।
ससुर जी ने चौंककर चश्मा ठीक किया और पत्र को उठाया। जैसे-जैसे वे उस पत्र की इबारत पढ़ते गए, उनके चेहरे के भाव बदलते गए। सेवानिवृत्त हेडमास्टर की आँखें, जो कभी उस बहू को देखकर शर्म से झुक जाती थीं, आज गर्व और पश्चाताप से नम हो गईं।
शाम के ढलते सूरज की सुनहरी किरणें जब आँगन के कोने में रखे तुलसी के चौरे पर पड़ रही थीं, तब डाकिए की घंटी ने उस पुरानी हवेलीनूमा मकान के सन्नाटे को तोड़ दिया। प्रभाकर जी बाहर से ही लगभग दौड़ते हुए अंदर आए। उनके चेहरे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सी दीवानगी और चमक थी। उन्होंने कमरे में घुसते ही चप्पलें एक तरफ उतारीं और सीधे पूजा घर में दीया जला रही अपनी पत्नी के पास पहुँचे। उनके हाथ में एक बड़ा सा सरकारी लिफाफा था।
“सुनती हो कल्याणी! तुम्हारा चयन हो गया है। महिला एवं बाल विकास विभाग में तुम्हारी सुपरवाइजर पद की नियुक्ति आ गई है।”
प्रभाकर जी की आवाज़ में जो थरथराहट थी, वह खुशी की थी या उन पिछले चौदह सालों के संघर्ष के फलने की, यह कहना मुश्किल था। कल्याणी के हाथ से आरती की थाली छूटते-छूटते बची। वह मूर्तिवत खड़ी रह गई। उसकी आँखें चौड़ी हो गईं और दिल की धड़कनें इतनी तेज़ हो गईं कि मानो कानों में हथौड़े बज रहे हों। उसने कांपते हाथों से उस लिफाफे को छुआ, जिस पर मोटे अक्षरों में राजपत्रित मोहर लगी थी।
कल्याणी का मन एक झटके में चौदह साल पीछे उस मनहूस शाम की ओर लौट गया, जब वह ब्याह कर पहली बार कानपुर के इस संयुक्त परिवार में आई थी। कल्याणी के माता-पिता बचपन में ही एक सड़क दुर्घटना में चल बसे थे। उसका पालन-पोषण उसके लालची चाचा और चाची ने किया था। कल्याणी घर के चूल्हे-चौके और मवेशियों की देखरेख में ऐसी उलझी कि पाँचवीं कक्षा के बाद स्कूल की चौखट कभी लांघ ही न सकी। जब वह विवाह योग्य हुई, तो चाचा-चाची ने सोचा कि अगर सच बताएंगे तो कोई अच्छा रिश्ता नहीं मिलेगा और शायद दहेज भी बहुत देना पड़ेगा।
सामने प्रभाकर जी का परिवार था। प्रभाकर जी रेलवे में सीनियर क्लर्क थे, सीधे-सादे, सुलझे हुए और बेहद स्वाभिमानी। उनके पिता सेवानिवृत्त हेडमास्टर थे। चाचा ने झूठ का एक ऐसा ताना-बाना बुना कि सब दंग रह गए। उन्होंने कल्याणी की सहेली के बी.ए. के प्रमाणपत्र दिखाकर प्रभाकर जी के पिता को आश्वस्त कर दिया कि लड़की न केवल सुशील है, बल्कि स्नातक पास भी है। कल्याणी को शादी के मंडप तक यह भनक भी नहीं लगने दी गई कि उसके बारे में क्या झूठ बोला गया है। उससे बस यही कहा गया था, “शादी के बाद ससुराल वालों के सामने कम ही बोलना, बड़ों के आगे ज्यादा बोलना अशोभनीय माना जाता है।”
सच्चाई की परतें शादी के महज तीन दिन बाद ही उधड़ गईं।
सत्यनारायण भगवान की कथा के बाद जब कुलदेवता की डायरी में सभी बहुओं के नाम और हस्ताक्षर करवाने का रिवाज आया, तो प्रभाकर जी के छोटे भाई की नई-नवेली पत्नी नीलिमा, जो शहर के एक बड़े कॉलेज से एम.ए. कर चुकी थी, उसने बड़ी नजाकत से अंग्रेजी में दस्तखत किए। जब कलम कल्याणी के हाथ में थमाई गई, तो उसका हाथ थर-थर कांपने लगा। उसने भीगी पलकों से सिर झुका लिया।
“दीदी, कलम से लिखिए, इसे सिर्फ थामे रहने से नाम नहीं छप जाएगा,” नीलिमा ने मुस्कुराते हुए चुटकी ली थी।
कल्याणी की आँखों से दो बूँद आँसू उस कोरे पन्ने पर टपक पड़े। उसने रुंधे गले से कहा था, “मुझे… मुझे तो सिर्फ अँगूठा लगाना आता है।”
उस एक वाक्य ने उस घर में भूचाल ला दिया था। सन्नाटा ऐसा खिंच गया मानो किसी ने मौत की खबर सुना दी हो। प्रभाकर जी के पिता, जो जिंदगी भर शिक्षा के सिपाही रहे थे, अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए। उनकी सास ने छाती पीट ली। पूरा परिवार ठगा सा महसूस कर रहा था। उस दिन जो ताने, जो गालियां और जो अपमान कल्याणी के कानों में पड़े, वे किसी तेजाब की तरह उसकी आत्मा को झुलसा गए।
“धोखेबाज का खून है! एक अनपढ़, गँवार औरत को हमारे पढ़े-लिखे बेटे के सिर मढ़ दिया! मोहल्ले में क्या मुँह दिखाएंगे हम? लोग कहेंगे कि मास्टर जी का बड़ा बेटा अंगूठाछाप ले आया!” सास की तीखी आवाज़ आज भी कल्याणी के कानों में गूंजती थी।
उस रात प्रभाकर जी कमरे में आए तो कल्याणी जमीन पर घुटनों में सिर छुपाए सिसक रही थी। उसे लगा था कि आज प्रभाकर जी उसे पीटेंगे, घर से निकाल देंगे या हमेशा के लिए त्याग देंगे। आख़िरकार, पुरुष का अहंकार बहुत बड़ा होता है और यहाँ तो उनके सम्मान पर सार्वजनिक चोट लगी थी। लेकिन प्रभाकर जी चुपचाप उसके पास बैठ गए। उन्होंने कल्याणी के सिर पर हाथ रखा।
“क्या तुम्हें सच में पढ़ना नहीं आता, कल्याणी?” उनका स्वर कठोर नहीं, बल्कि एक असीम वेदना से भरा था।
“मुझे माफ कर दीजिए… मुझे सच में नहीं पता था कि चाचा जी ने क्या कहा है। अगर मुझे पता होता, तो मैं जहर खा लेती पर आपके जीवन में आकर आपको कलंकित न करती,” कल्याणी उनके पैरों में गिर पड़ी थी।
प्रभाकर जी ने उसे उठाया और पलंग पर बैठाया। उन्होंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा था, “धोखा तुम्हारे चाचा ने दिया है, तुमने नहीं। अनपढ़ होना कोई अपराध नहीं है कल्याणी, लेकिन जिंदगी भर अनपढ़ रहकर इस अपमान को अपनी नियति मान लेना सबसे बड़ा अपराध होगा। अगर समाज ने तुम्हारे हाथ में अँगूठा थमाया है, तो मैं तुम्हें कलम पकड़ना सिखाऊंगा। क्या तुम मेरा साथ दोगी?”
उस रात से एक ऐसा सफर शुरू हुआ जिसकी मिसाल मिलना मुश्किल था। संयुक्त परिवार में रहना और ताने सहना कल्याणी की रोज की दिनचर्या बन चुकी थी। छोटी बहू नीलिमा जब अंग्रेजी पत्रिकाएं पढ़ती, तो कल्याणी रसोई में चौका-बर्तन करती।
घर में कोई मेहमान आता तो सास पहले ही कह देती, “प्रभाकर, अपनी इस गँवार पत्नी को जरा अंदर के कमरे में ही रखना। बाहर चाय-नाश्ता नीलिमा परोस देगी। कहीं ऐसा न हो कि यह कुछ ऊटपटाँग बोल दे और हमारी इज्जत की धज्जियां उड़ जाएं।”
उस समय कल्याणी का कलेजा फट जाता था। वह चुपचाप कमरे में बंद होकर रोती, लेकिन प्रभाकर जी का हौसला कभी नहीं टूटा। वे दिन भर दफ्तर में फाइलों से जूझते और रात को थककर चूर होने के बावजूद कल्याणी को लेकर बैठ जाते। पहले उन्होंने कल्याणी को क, ख, ग सिखाया। स्लेट और खड़िया से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे कॉपियों तक पहुँचा।
कल्याणी सुबह चार बजे उठती, पूरे परिवार के लिए खाना बनाती, झाड़ू-पोछा करती, कपड़े धोती और फिर दोपहर में जब सब आराम करते, तब वह अपनी छिपाई हुई किताबों को निकालकर आँचल के पीछे बैठकर रटती। रात को ग्यारह बजे जब पूरा घर सो जाता, तब उस छोटे से कमरे में टेबल लैंप की मद्धिम रोशनी में प्रभाकर जी उसके शिक्षक बन जाते।
शुरुआत में कल्याणी का हाथ कांपता था, अक्षर टेढ़े-मेढ़े बनते थे। कई बार वह हताश होकर रोने लगती, “मुझसे नहीं होगा। मेरी उम्र अब पढ़ने की नहीं रही। लोग सही कहते हैं, पत्थर पर दूब नहीं जमती।”
तब प्रभाकर जी उसका हाथ थाम लेते और कहते, “पत्थर को चीरकर ही झरना निकलता है कल्याणी। तुम्हें अपने लिए नहीं, हमारे आत्मसम्मान के लिए पढ़ना है। मुझे लोगों को यह नहीं दिखाना कि मेरी पत्नी अनपढ़ है, मुझे यह दिखाना है कि मेरी पत्नी में सीखने की कितनी भूख है।”
प्रभाकर जी ने अपने निजी खर्चों में कटौती की। उन्होंने अपने लिए कई सालों तक नए कपड़े नहीं खरीदे, पुरानी साइकिल से दफ्तर जाते रहे ताकि कल्याणी के लिए किताबें, फॉर्म की फीस और ओपन स्कूलिंग की व्यवस्था कर सकें। उन्होंने कल्याणी का दाखिला राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय संस्थान (NIOS) में करवाया। पहले उसने दसवीं की परीक्षा दी।
जिस दिन दसवीं का परिणाम आया, कल्याणी प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुई थी। उस दिन प्रभाकर जी बाज़ार से एक किलो जलेबी लेकर आए थे। जब उन्होंने माँ के हाथ में जलेबी का डिब्बा रखा और बताया कि कल्याणी दसवीं पास हो गई है, तो सास ने मुँह बनाकर डिब्बा एक तरफ रख दिया और कहा, “दसवीं पास कर ली तो कौन सा कलेक्टर बन गई? चूल्हा तो यहीं फूँकना है।”
लेकिन प्रभाकर जी और कल्याणी के कदम अब रुकने वाले नहीं थे। कल्याणी ने बारहवीं भी अच्छे अंकों से पास की। इसके बाद प्रभाकर जी ने उसे दूरस्थ शिक्षा से समाजशास्त्र में स्नातक करवाया। इन सब में बारह साल बीत गए। इस दौरान कल्याणी ने एक बेटे को भी जन्म दिया। बच्चे का पालन-पोषण, घर के बुजुर्गों की सेवा, देवरानी के ताने और रात की पढ़ाई—कल्याणी की आँखों के नीचे काले घेरे बन गए थे, लेकिन उसकी आत्मा में एक नई रोशनी भर चुकी थी।
स्नातक पूरा होते ही राज्य लोक सेवा आयोग ने महिला एवं बाल विकास विभाग में सुपरवाइजर के पदों के लिए भर्ती निकाली। प्रभाकर जी ने फॉर्म भरवाया। कल्याणी दिन में तीन घंटे सोती और बाकी समय घर के काम और प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी में लगा देती। प्रभाकर जी सामान्य ज्ञान, गणित और तर्कशक्ति के सवाल खुद हल करके उसे समझाते थे।
और आज… आज वह दिन आ गया था।
हाथ में नियुक्ति पत्र लिए कल्याणी उस कागज़ पर अपना नाम देख रही थी—”श्रीमती कल्याणी प्रभाकर जोशी”। यह केवल एक नाम नहीं था, यह उन अनगिनत रातों का हिसाब था जो उन्होंने जागकर बिताई थीं। यह उन तानों का उत्तर था जो चौदह सालों तक इस हवेली की दीवारों से टकराकर उसकी छाती में चुभते रहे थे।
प्रभाकर जी ने कल्याणी के हाथ से वह पत्र लिया और सीधे अपने पिता के कमरे की ओर बढ़े। कल्याणी भी उनके पीछे-पीछे कांपते कदमों से चली।
कमरे में ससुर जी आरामकुर्सी पर बैठे चश्मा लगाए अखबार पढ़ रहे थे। सास पास ही बैठी पानदान से सुपारी निकाल रही थीं। देवरानी नीलिमा अपने पति के साथ बैठकर चाय की चुस्कियां ले रही थी।
प्रभाकर जी ने जाकर वह नियुक्ति पत्र सीधे अपने पिता के पैरों के पास मेज पर रख दिया।
“बाबूजी, यह आपकी बड़ी बहू की सरकारी नौकरी का नियुक्ति पत्र है। यह किसी धोखे का कागज नहीं है, यह उसकी चौदह साल की तपस्या और आपके बेटे के विश्वास की जीत है।” प्रभाकर जी की आवाज़ में एक ऐसा ठहराव और गरिमा थी कि कमरे का माहौल एकदम बदल गया।
ससुर जी ने चौंककर चश्मा ठीक किया और पत्र को उठाया। जैसे-जैसे वे उस पत्र की इबारत पढ़ते गए, उनके चेहरे के भाव बदलते गए। सेवानिवृत्त हेडमास्टर की आँखें, जो कभी उस बहू को देखकर शर्म से झुक जाती थीं, आज गर्व और पश्चाताप से नम हो गईं।
सास के हाथ से सुपारी की डिब्बी छूटकर फर्श पर गिर पड़ी। देवरानी नीलिमा की चाय की प्याली हाथ में ही रुक गई। जिस बहू को वे चौदह साल तक ‘गँवार’ और ‘अनपढ़’ कहकर शादी-ब्याह में पीछे छुपाते रहे थे, वह अब पूरे जिले के महिला कल्याण केंद्रों की निगरानी करने वाली अफसर बनने जा रही थी।
ससुर जी अपनी कुर्सी से उठे। उनके कांपते हाथ कल्याणी के सिर पर आ टिके।
“मुझे माफ कर देना बेटी,” ससुर जी का गला भर आया। “मैंने जिंदगी भर स्कूल में बच्चों को पढ़ाया कि विद्या सबसे बड़ा धन है, लेकिन जब मेरे अपने घर में एक अनपढ़ बेटी आई, तो मैं उसे शिक्षा देने के बजाय ताने देने वालों में शामिल हो गया। आज तुमने साबित कर दिया कि संस्कार और लगन किसी कागज़ की डिग्री के मोहताज नहीं होते। आज इस घर का मान तुमने बढ़ाया है।”
कल्याणी ने झुककर ससुर जी और सास के पैर छुए। सास की आँखें भी भीगी हुई थीं, वे कुछ बोल न सकीं, बस उन्होंने कल्याणी को सीने से लगा लिया। उस आलिंगन में चौदह साल की कड़वाहट जैसे एक पल में धुल गई। नीलिमा ने भी आगे बढ़कर कल्याणी के हाथ पकड़ लिए, उसकी आँखों में अब उपहास नहीं, बल्कि अपनी जेठानी के लिए अगाध सम्मान था।
उस शाम हवेली के मुख्य द्वार पर जब कल्याणी के नाम की नेमप्लेट लगाने के लिए प्रभाकर जी कील ठोंक रहे थे, तो कल्याणी पास आकर खड़ी हो गई। उसने प्रभाकर जी के कंधे पर हाथ रखा। उसकी आँखों से कृतज्ञता के आँसू बह रहे थे।
“अक्सर दुनिया कहती है कि हर कामयाब पुरुष के पीछे एक स्त्री का हाथ होता है। लेकिन कोई यह क्यों नहीं कहता कि जब एक टूटी हुई, अशिक्षित और तिरस्कृत स्त्री समाज के तानों से हारने लगती है, तब अगर एक पुरुष ढाल बनकर उसके पीछे खड़ा हो जाए, तो वह दुनिया जीत सकती है? आपने मुझे सिर्फ नाम नहीं दिया प्रभाकर जी, आपने मुझे मेरा खोया हुआ अस्तित्व लौटाया है।”
प्रभाकर जी मुस्कुराए। उन्होंने नेमप्लेट पर उकेरे गए अक्षरों को छुआ—”कल्याणी जोशी, सुपरवाइजर, महिला एवं बाल विकास विभाग”। उन्होंने कल्याणी का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, “मैंने सिर्फ बीज को सींचा था कल्याणी, वटवृक्ष बनने की ताकत तो हमेशा से तुम्हारे भीतर ही थी।”
दरवाजे पर लगी वह नेमप्लेट सिर्फ एक पद का नाम नहीं थी, वह उस प्रेम, त्याग और विश्वास का स्मारक थी जिसने एक अनपढ़ लड़की के अँगूठे को कलम की ताकत में बदल दिया था।
क्या कल्याणी की इस सफलता का असली हकदार प्रभाकर जी का अटूट विश्वास था या कल्याणी का खुद को साबित करने का अथक संघर्ष? आपकी नज़र में एक जीवनसाथी की सबसे बड़ी जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए—अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।
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