पराया गहना

“और आप सब चुप रहे?” राधिका के चेहरे पर अविश्वास की लकीरें खिंच गईं। “एक स्त्री के मायके की इकलौती यादगार, उसकी मां का आशीर्वाद, आपने सिर्फ समाज में झूठा रुतबा दिखाने के लिए उससे छीन लिया? और मुझे दे दिया? किस बात का घमंड है हमें? किस अमीरी का ढोंग कर रहे हैं हम, जो दूसरों के आंसुओं की नींव पर टिकी है?”

क्षितिज ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, “राधिका, मां का स्वभाव तुम नहीं जानतीं। वो खानदान की इज्जत को लेकर बहुत जिद्दी हैं। तुम्हारे परिवार का रसूख देखकर वो किसी भी हाल में खुद को कमतर नहीं दिखाना चाहती थीं। भैया सीधे हैं, मां के आगे कभी बोले नहीं। मैंने विरोध किया था, पर मां ने रो-धोकर घर सिर पर उठा लिया। अब जो हो गया सो हो गया, तुम इस बात को तूल मत दो। हार अब तुम्हारा है, तुम इसे पहनो। भाभी को कोई दूसरा गहना दिला देंगे…”

सूरज की मद्धिम किरणें जब इंदौर के उस पुराने, मगर भव्य मकान के आंगन में उतरीं, तो शहनाइयों की गूंज अब भी दीवारों में तैरती महसूस हो रही थी। घर में छोटे बेटे क्षितिज का ब्याह होकर आया था। दुल्हन थी राधिका—शहर के एक बेहद संपन्न, प्रतिष्ठित परिवार की लाडली बेटी। स्वभाव से शांत, गंभीर और बात की नजाकत को समझने वाली। उसकी विदाई के वक्त लाए गए सामान और चढ़ावे ने पहले ही पूरे मोहल्ले की आंखें चौंधिया दी थीं। लेकिन घर की मालकिन, यानी क्षितिज की मां सुमित्रा देवी, समाज में अपनी नाक हमेशा सबसे ऊंची रखने की आदी थीं। उनके लिए रिश्ते भावना से कम और दूसरों की नजरों में रुतबे से ज्यादा तौले जाते थे।

विवाह के तीसरे दिन मुंह दिखाई की बड़ी रस्म रखी गई थी। शहर के संभ्रांत लोग, रिश्तेदार और परिचितों का तांता लगा हुआ था। बैठक के बीचों-बीच सजी महफिल में राधिका लाल बनारसी साड़ी और घूंघट की ओट में बैठी थी। तभी सुमित्रा देवी ने अपनी मखमली डिब्बी खोली। उस डिब्बी के भीतर लाल मखमल पर कुंदन और मीनाकारी का एक अद्भुत, भारी हार चमक रहा था। कारीगरी ऐसी कि देखने वाले बस एकटक देखते रह जाएं।

सुमित्रा देवी ने भरे गले और चौड़े सीने के साथ घोषणा की, “यह हमारे खानदान की आन-बान-शान है। आज अपनी छोटी बहू के स्वागत में, उसकी मुंह दिखाई में, मैं यह अनमोल हार अपनी राधिका को सौंपती हूं।”

वहां मौजूद औरतों के मुंह से वाह-वाह निकल पड़ी। किसी ने कहा, “अरे वाह समधन जी, बहू सचमुच रानी बनकर आई है,” तो किसी ने फुसफुसाया, “किस्मत वाली है छोटी बहू, पहली ही रस्म में खानदानी खजाना हाथ लग गया।”

राधिका ने झुककर सास के पैर छुए। उसने उस हार को गले से लगाया तो उसे लगा जैसे वह केवल एक गहना नहीं, बल्कि इस परिवार का अटूट विश्वास और सम्मान पहन रही है। उसका मन कृतज्ञता से भर गया। लेकिन उसी महफिल के एक कोने में, शरबती ट्रे हाथों में थामे खड़ी थी घर की बड़ी बहू, जानकी। जानकी के चेहरे पर एक विचित्र-सा पीलापन था, जैसे किसी ने उसके सीने से लहू निचोड़ लिया हो। उसकी सूनी आंखें उस हार पर टिकी थीं और फिर पलकें भारी होकर झुक गईं। उसने अपनी कंपकंपाती उंगलियों से साड़ी का पल्लू कस लिया और चुपचाप रसोई की तरफ मुड़ गई।

भीड़ छंटने और रात का सन्नाटा गहराने तक राधिका उस हार को निहारती रही। उसके मायके में गहनों की कोई कमी न थी, पर इस हार का अहसास अलग था—यह ससुराल की मोहब्बत का प्रतीक जो था।

अगले दिन दोपहर के समय घर में एक अजीब-सी खामोशी पसरी हुई थी। सुमित्रा देवी अपनी सहेलियों के साथ मंदिर गई हुई थीं और क्षितिज अपने दफ्तर के काम से बाहर था। राधिका अपने कमरे में अलमारी व्यवस्थित कर रही थी कि तभी दरवाजे पर हल्की-सी दस्तक हुई। राधिका ने पलटकर देखा, तो बड़ी जेठानी जानकी चौखट पर खड़ी थीं। जानकी के हाथ आपस में बुरी तरह उलझे हुए थे और माथे पर पसीने की बारीक बूंदें छलक रही थीं।

जानकी इस घर में सात साल पहले ब्याह कर आई थी। उसके पिता एक सीधे-सादे स्कूल शिक्षक थे, जिन्होंने अपनी सीमित पूंजी में से बेटी को विदा किया था। जानकी हमेशा से शांत, सेवाभावी और घर के हर काम को बिना उफ किए संभालने वाली स्त्री थी।

“अरे भाभी, आप बाहर क्यों खड़ी हैं? आइए न, अंदर बैठिए,” राधिका ने मुस्कुराते हुए कहा और तुरंत पानी का गिलास आगे बढ़ाया।

जानकी कमरे के भीतर तो आ गई, पर दीवान के किनारे ऐसे बैठी जैसे किसी कांटों की सेज पर बैठ रही हो। उसने पानी का एक घूंट पिया, पर उसकी सांसें उखड़ी हुई थीं।

“भाभी, आपकी तबीयत तो ठीक है? चेहरा इतना उतरा हुआ क्यों लग रहा है?” राधिका ने चिंता से पूछा।

जानकी ने अपनी आंखें उठाईं, जिनमें आंसुओं का एक समंदर हिलोरें ले रहा था। उसके होंठ थरथराए, “राधिका… छोटी, मैं पिछले चौबीस घंटे से अपनी आत्मा से लड़ रही हूं। समझ नहीं आ रहा था कि जो कहने आई हूं, उसे जुबान पर कैसे लाऊं। कहीं तुम मुझे गलत न समझ लो, कहीं तुम्हें यह न लगे कि बड़ी जेठानी नई बहू से जल रही है…”

राधिका का दिल किसी अनहोनी की आशंका से धड़क उठा। उसने आगे बढ़कर जानकी के कांपते हाथों को अपने हाथों में थाम लिया, “भाभी, आप यह क्या कह रही हैं? आपने मुझे कल से एक बार भी पराया नहीं समझा, फिर यह संकोच कैसा? जो भी बात है, बेझिझक कहिए।”

जानकी ने एक गहरी, दर्दनाक सांस ली और नजरें झुकाकर कहा, “छोटी… कल मुंह दिखाई में मां जी ने जो कुंदन का हार तुम्हें दिया… और जिसे उन्होंने खानदानी धरोहर बताया… वह झूठ है।”

राधिका सन्न रह गई। “झूठ? मैं समझी नहीं भाभी।”

“वह हार खानदानी नहीं है राधिका। वह हार मेरी मां का है,” जानकी की आवाज टूट गई और बरसों का दबा हुआ दर्द आंसुओं की शक्ल में बह निकला। “मेरी मां को उनके नाना ने अपनी पुश्तैनी जायदाद बेचकर वह हार बनवाया था। मेरी शादी में मेरे बाबूजी ने अपनी पूरी जिंदगी की बचत झोंक दी थी, और मां ने अपनी छाती से लगाकर वह हार मुझे सौंपा था कि यह तेरी सबसे बड़ी पूंजी है, तेरी मां का आशीर्वाद है।”

राधिका की आंखें फटी की फटी रह गईं। “पर… पर वह मां जी के पास कैसे आया?”

जानकी ने अपने आंचल से आंखें पोंछीं, उसकी आवाज में गहरा आक्रोश और बेबसी घुल गई, “शादी के दो साल बाद जब मेरी ननद की शादी तय हुई, तो मां जी ने मुझसे कहा कि समधियों के सामने हमारा रुतबा कम नहीं होना चाहिए। उन्होंने मुझसे वह हार यह कहकर मांगा कि बस फेरों के समय ननद को पहनाएंगे, फिर मुझे लौटा देंगे। मैंने अपनी भोली समझ में वह हार उनके हाथों में सौंप दिया। शादी बीत गई, साल बीत गए, जब भी मैंने हार वापस मांगा, मां जी ने हर बार डांटकर चुप करा दिया कि ‘बड़ी बहू होकर गहनों का लालच करती हो? सब घर में ही तो है।’ और फिर… जब तुम्हारी शादी तय हुई, तो उन्होंने देखा कि समधी बहुत रईस हैं। उन्हें अपनी शान दिखानी थी कि उनके पास भी कुछ बेमिसाल है। उन्होंने उस हार को तिजोरी से निकाला और कल भरी सभा में तुम्हें ‘खानदानी धरोहर’ बताकर पहना दिया।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। इतना गहरा सन्नाटा कि दोनों औरतों की सांसों की आवाज भी गूंज रही थी। राधिका जड़वत बैठी रह गई। उसे अपने गले में उस हार की ठंडक अब दहकते हुए अंगारे जैसी महसूस हो रही थी। एक पल को उसके मन में संशय उठा कि क्या यह सच है? क्या कोई मां अपने ही घर की एक बहू के साथ इतना बड़ा छल कर सकती है?

जानकी ने शायद उसकी आंखों का संशय पढ़ लिया। वह भारी मन से उठी और बोली, “मुझे पता था राधिका, तुम शायद विश्वास न कर पाओ। मुझे लालची समझोगी। अगर तुम्हें मुझ पर रत्ती भर भी संदेह हो, तो क्षितिज से पूछ लेना। वह सब जानता है। जब मां जी ने मुझसे वह हार छीना था, क्षितिज वहीं मौजूद था। मैं यह सब कभी न कहती, पर… पर मेरी भी दो मासूम बेटियां हैं छोटी। मेरे पास उन्हें देने के लिए कोई बहुत बड़ी संपत्ति नहीं है। मैं बस अपनी मां की निशानी अपनी बेटियों के लिए बचाना चाहती थी। पर शायद मेरी किस्मत में यह भी नहीं…”

इतना कहकर जानकी मुंह पर पल्लू रखकर कमरे से बाहर भाग गई।

उस शाम जब क्षितिज दफ्तर से लौटा, तो उसने कमरे का माहौल बिल्कुल बदला हुआ पाया। राधिका बालकनी में खड़ी थी, गुमसुम, शून्य में ताकती हुई। मेज पर वह मखमली डिब्बी खुली पड़ी थी और हार रोशनी में चमक रहा था।

क्षितिज मुस्कुराते हुए पास आया, “क्या बात है राधिका? आज चाय की खुशबू नहीं आई? और यह हार बाहर क्यों निकाल रखा है? तिजोरी में नहीं रखा?”

राधिका धीरे से मुड़ी। उसकी आंखों में कोई बनावटी गुस्सा नहीं था, बल्कि एक गहरा, शांत ठहराव और तीखा सवाल था।

“क्षितिज, मुझे एक सच जानना है। और मुझे सिर्फ सच चाहिए, कोई बहाना या लीपापोती नहीं।”

क्षितिज उसकी गंभीरता देखकर थोड़ा ठिठक गया, “क्या हुआ राधिका? तुम इतनी तनाव में क्यों हो?”

“यह हार… यह आपकी मां की खानदानी धरोहर है, या भाभी के मायके की अमानत?” राधिका ने सीधे उसकी आंखों में देखकर पूछा।

क्षितिज के चेहरे का रंग पलक झपकत ही उड़ गया। उसकी नजरें झुक गईं। वह असहज होकर इधर-उधर देखने लगा, उसकी जुबान जैसे तालू से चिपक गई हो।

“राधिका… वो… भाभी ने तुमसे कुछ कहा क्या? देखो, यह पुराने पारिवारिक मामले हैं। तुम नई-नई आई हो, इन पचड़ों में मत पड़ो।”

“जवाब दीजिए क्षितिज!” राधिका का स्वर धीमा था, पर उसमें एक गजब की दृढ़ता थी। “क्या यह हार भाभी की मां का है?”

क्षितिज ने एक बेबस सांस छोड़ी और अपना सिर दोनों हाथों में थामकर बिस्तर पर बैठ गया। “हां राधिका… यह सच है। वह हार भाभी का ही है।”

“और आप सब चुप रहे?” राधिका के चेहरे पर अविश्वास की लकीरें खिंच गईं। “एक स्त्री के मायके की इकलौती यादगार, उसकी मां का आशीर्वाद, आपने सिर्फ समाज में झूठा रुतबा दिखाने के लिए उससे छीन लिया? और मुझे दे दिया? किस बात का घमंड है हमें? किस अमीरी का ढोंग कर रहे हैं हम, जो दूसरों के आंसुओं की नींव पर टिकी है?”

क्षितिज ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, “राधिका, मां का स्वभाव तुम नहीं जानतीं। वो खानदान की इज्जत को लेकर बहुत जिद्दी हैं। तुम्हारे परिवार का रसूख देखकर वो किसी भी हाल में खुद को कमतर नहीं दिखाना चाहती थीं। भैया सीधे हैं, मां के आगे कभी बोले नहीं। मैंने विरोध किया था, पर मां ने रो-धोकर घर सिर पर उठा लिया। अब जो हो गया सो हो गया, तुम इस बात को तूल मत दो। हार अब तुम्हारा है, तुम इसे पहनो। भाभी को कोई दूसरा गहना दिला देंगे…”

“नहीं क्षितिज,” राधिका ने दृढ़ता से उसकी बात काट दी। “अन्याय की कीमत पर मिला कोई भी गहना मेरे लिए श्रृंगार नहीं, मेरे आत्मसम्मान पर जंजीर बन जाएगा। उधार और छल के इस गहने से मैं अपनी पहचान नहीं बना सकती।”

पूरी रात राधिका सो नहीं सकी। उसने देखा कि समाज में अक्सर ‘बड़ी बहू’ को त्याग की मूरत मानकर उसकी भावनाओं को रौंद दिया जाता है, क्योंकि वह शांत रहती है। और ‘नई या अमीर बहू’ को खुश करने के लिए उसी के घर की ईंटें उखाड़कर सजावट की जाती है। उसने तय कर लिया कि वह इस अन्याय का हिस्सा नहीं बनेगी। लेकिन वह इस तरह से कदम उठाना चाहती थी जिससे घर की मर्यादा भी न टूटे और सत्य की विजय भी हो।

अगली सुबह घर में एक अलग ही हलचल थी। आंगन में तुलसी चौरे के पास सुमित्रा देवी पूजा की थाली लिए खड़ी थीं। बड़ा बेटा और क्षितिज चाय की चुस्कियां ले रहे थे और जानकी रोज की तरह रसोई में नाश्ता बनाने में जुटी थी।

तभी राधिका अपने कमरे से निकली। उसके हाथों में वही मखमली लाल डिब्बी थी। वह सीधे रसोई की ओर नहीं गई, बल्कि आंगन में, जहां सुमित्रा देवी खड़ी थीं, उनके सामने जाकर खड़ी हो गई। उसकी चाल में कोई हिचकिचाहट नहीं थी।

“अरे राधिका बहू, इतनी सुबह-सुबह सज-धज कर कहां जा रही हो? और हाथ में यह डिब्बी क्यों है?” सुमित्रा देवी ने आश्चर्य से पूछा।

राधिका ने हाथ जोड़कर शालीनता से सास को प्रणाम किया और फिर बड़े आदर से बोली, “मां जी, कल आपने मुझे मुंह दिखाई में यह अनमोल हार दिया। आपने कहा कि यह खानदानी धरोहर है। आपने मुझे जो मान दिया, उसके लिए मैं आपकी सदा ऋणी रहूंगी।”

सुमित्रा देवी मुस्कुरा दीं, “अरे पगली, तू इस घर की लक्ष्मी है, तेरे लिए तो सब कुछ न्योछावर है।”

“लेकिन मां जी,” राधिका ने अपनी आवाज को थोड़ा ऊंचा किया ताकि रसोई में काम कर रहीं जानकी और बैठक में बैठे दोनों भाई भी सुन सकें, “आज सुबह जब मैंने ठंडे दिमाग से सोचा, तो मुझे लगा कि मैं अभी इस घर में बहुत नई हूं। मैंने इस परिवार के लिए अभी तक एक तिनके का भी त्याग नहीं किया है। खानदान की धरोहर संभालने का पहला हक उसका होता है जिसने इस घर को सालों-साल अपने खून-पसीने से सींचा हो। जिसने हर सुख-दुख में इस चौखट का मान बढ़ाया हो।”

सुमित्रा देवी की मुस्कान धीरे-धीरे गायब होने लगी। उनका चेहरा सख्त हुआ, “तू क्या कहना चाहती है राधिका?”

राधिका ने डिब्बी खोली। कुंदन का वह हार सुबह की धूप में जगमगा उठा। राधिका ने सास की ओर देखते हुए कहा, “मां जी, कल आपने मुझसे कहा था कि यह हार अब मेरा है। यानी इस पर मेरा पूरा अधिकार है। तो अपनी मिल्कियत का फैसला लेने की छूट भी तो मेरी होनी चाहिए न?”

सुमित्रा देवी कुछ समझ पातीं, इससे पहले ही राधिका ने रसोई की तरफ कदम बढ़ा दिए। जानकी चौखट पर स्तब्ध खड़ी थी, उसकी आंखें भय और विस्मय से चौड़ी हो गई थीं।

राधिका जानकी के सामने पहुंची। उसने उस भारी हार को डिब्बी से निकाला। जानकी के कांपते हाथों को उसने अपनी हथेलियों में लिया और बड़े ही आदर और स्नेह के साथ वह हार जानकी के आंचल में रख दिया।

“यह क्या कर रही हो छोटी?” जानकी की आवाज कांप गई।

“भाभी,” राधिका ने भरे गले से कहा, “यह हार किसी खानदान की झूठी शान का नहीं, बल्कि आपकी मां के सच्चे प्यार और आशीर्वाद की धरोहर है। और मां का आशीर्वाद कभी किसी से छीना नहीं जा सकता। मेरी मां ने मुझे सिखाया है कि पराए हक पर कभी अपना महल नहीं बनाना चाहिए। यह आपका था, आपका है, और आपकी बेटियों की अमानत है। इसे अपने आंचल में संभालिए।”

पूरे आंगन में सन्नाटा खिंच गया। जेठ जी की नजरें शर्म से झुक गईं। सुमित्रा देवी के पैरों तले जैसे जमीन खिसक गई हो। उनके चेहरे पर शर्मिंदगी, पराजय और आत्मग्लानि के मिले-जुले भाव उभर आए। उनका वह झूठा अहंकार, जिसे उन्होंने सालों से पाल रखा था, आज नई बहू के इस अप्रत्याशित और निष्कलंक व्यवहार के आगे रेत की दीवार की तरह ढह गया।

जानकी के आंसुओं का बांध टूट पड़ा। उसने हार को अपनी छाती से लगा लिया, जैसे वह हार नहीं, अपनी मां के आंचल को छू रही हो। उसने रोते हुए राधिका को गले से लगा लिया। उस आलिंगन में जेठानी और देवरानी का कोई फासला नहीं था, बल्कि दो स्त्रियों का एक-दूसरे के प्रति अगाध सम्मान था।

कुछ पलों के सन्नाटे के बाद, सुमित्रा देवी धीरे-धीरे आगे बढ़ीं। उनकी आंखें भी पहली बार भीगी हुई थीं। उन्होंने दोनों बहुओं के सिर पर हाथ रखा। उनका सिर झुक चुका था, पर दिल का बोझ हल्का हो गया था।

“मुझे माफ कर दे जानकी,” सुमित्रा देवी की आवाज भर्रा गई। “अपने झूठे मान के अंधेपन में मैं यह भूल गई थी कि घर की असली दौलत तिजोरी में रखे गहने नहीं, बल्कि बहुओं के चेहरे की मुस्कान और उनके बीच का प्रेम होता है। आज छोटी ने मेरी आंखें खोल दीं।”

उस दिन घर में कोई कटुता नहीं बची। पराए गहने का मोह छूट चुका था, और उस आंगन में एक नए, सच्चे और पारदर्शी रिश्ते की नींव पड़ चुकी थी—जहां दिखावे की हार हुई थी और स्वाभिमान की जीत।

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 मूल लेखिका : सीमा वर्मा

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