तान्या का चेहरा गुस्से और अचरज से लाल हो गया। उसने तल्ख़ आवाज़ में कहा, “केशव जी, आप बहुत भावुक हो रहे हैं। ज़मीनी हकीकत को समझिए। आज के दौर में कोई भी आज़ाद खयालों की लड़की सास-ससुर के साथ रहकर अपनी ज़िंदगी खराब नहीं करना चाहती। आपको लगता है कि आपकी इस हालत के साथ आपको कोई और बेहतर मिल जाएगी?”
ग्वालियर के एक पुराने मोहल्ले की संकरी गलियों में जब सुबह की पहली किरण उतरती, तो सबसे पहले केशव के जूतों की ताल सुनाई देती। एक कदम सीधा, सधा हुआ और दूसरा कदम थोड़ा खिंचता हुआ, जिसमें कैलिपर की धातु की हल्की सी खनक शामिल रहती। बचपन के एक तेज़ बुखार ने केशव के दाएँ पैर की ताकत सदा के लिए छीन ली थी। पर जिसने उस लड़के की आँखों में कभी देखा हो, वह यह कभी नहीं कह सकता था कि उसमें किसी चीज़ की कमी है। पिता हरिशंकर जी डाक विभाग से एक साधारण क्लर्क के रूप में सेवानिवृत्त हुए थे और माँ जानकी देवी ने जीवन भर अपनी साड़ियों के पल्लू में घर की हर छोटी-बड़ी ज़रुरत को बांधकर रखा था। केशव ने अपनी शारीरिक दुर्बलता को कभी अपनी नियति का रोना नहीं बनने दिया। उसने रातों को जागकर पसीने की स्याही से अपनी तकदीर लिखी और राज्य प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पास करके कोषागार अधिकारी के पद पर नियुक्त हुआ।
उम्र के बत्तीसवें पड़ाव पर पहुँचते-पहुँचते केशव की ज़िंदगी में सब कुछ स्थिर हो चुका था। एक सम्मानजनक पद, सरकारी आवास, समाज में आदर और माता-पिता के चेहरे पर वर्षों की तपस्या के बाद आई निश्चिंतता की चमक। बस एक ही कसर थी, जिसे लेकर हरिशंकर जी और जानकी देवी अक्सर रात को चिंता में डूब जाते थे—केशव का घर बसना। समाज में जब भी रिश्ते की बात चलती, लोग पद और वेतन की प्रशंसा तो खूब करते, मगर पैर की बात आते ही कतरा जाते। कुछ लोग ऐसे भी आते जो केशव के शारीरिक दोष के बदले भारी दहेज या अजीबोगरीब शर्तें रखते, जिन्हें हरिशंकर जी पहली ही फुर्सत में हाथ जोड़कर विदा कर देते।
फिर एक दिन केशव के एक दूर के रिश्तेदार ने इंदौर के एक प्रतिष्ठित परिवार से रिश्ता सुझाया। लड़की का नाम था तान्या। तान्या आधुनिक, पढ़ी-लिखी और एक निजी बैंक में कार्यरत थी। रिश्तेदार का कहना था कि लड़की वाले लड़के के गुणों और उसकी ईमानदारी की कद्र करते हैं, इसलिए उन्हें केशव के पैर से कोई परेशानी नहीं है। हरिशंकर जी और जानकी देवी की आँखों में आशा की एक नई ज्योति जल उठी। दोनों परिवारों की सहमति से इंदौर के एक शांत और सभ्य रेस्तराँ में दोनों को अकेले बैठकर बात करने का अवसर दिया गया।
रेस्तराँ के कोने वाली मेज़ पर केशव समय से दस मिनट पहले ही पहुँच गया था। उसने अपने कैलिपर वाले पैर को मेज़ के नीचे इस तरह रखा था कि आने-जाने वालों की अनावश्यक नज़रें उस पर न टिकें। ठीक पाँच बजे तान्या अंदर आई। हल्के गुलाबी रंग के फॉर्मल कुर्ते में वह आत्मविश्वास से भरी दिख रही थी।
“नमस्ते केशव जी,” तान्या ने कुर्सी खींचते हुए कहा।
“नमस्ते तान्या जी, बैठिए। सफर में कोई परेशानी तो नहीं हुई?” केशव ने बेहद शालीनता से पूछा।
“नहीं, बिल्कुल नहीं। सीधे मुद्दे पर आते हैं,” तान्या ने अपने हैंडबैग को मेज़ पर रखते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक खास किस्म का रूखापन और व्यावहारिकता थी, जिसने केशव को थोड़ा सतर्क कर दिया।
तान्या ने वेटर को पानी लाने का इशारा किया और फिर केशव की आँखों में सीधे देखते हुए बोली, “देखिए केशव जी, मैं बातें घुमा-फिराकर करने की आदी नहीं हूँ। मुझे प्रैक्टिकल लाइफ पसंद है। हमारे समाज में जब किसी रिश्ते की बात होती है, तो लोग अक्सर कमियों को छिपाने की कोशिश करते हैं। मैं ऐसा नहीं करती। मुझे अच्छी तरह पता है कि आपके दाएँ पैर में पोलियो है और आप सामान्य लोगों की तरह नहीं चल सकते। आपकी उम्र भी मुझसे करीब सात साल ज़्यादा है।”
केशव के चेहरे पर कोई शिकन नहीं आई। उसने बस एक हल्की सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया। उसने ज़िंदगी में ऐसे कई वाक्य सुने थे, इसलिए इन शब्दों का डंक अब उसे घायल नहीं करता था। उसने शांत स्वर में कहा, “हाँ, यह सच है। इसमें छिपाने जैसा कुछ नहीं।”
तान्या ने आगे कहा, “यही स्पष्टता मुझे पसंद है। सच कहूँ तो अगर आप किसी प्राइवेट नौकरी में होते, तो मैं शायद आपकी प्रोफाइल देखती भी नहीं। मगर आपकी क्लास-वन गज़ेटेड पोस्ट, आपका सरकारी बंगला, पेंशन की सुरक्षा और समाज में मिलने वाला रुतबा—ये वो चीज़ें हैं जो मुझे इस रिश्ते के लिए आकर्षित करती हैं। एक समझदार लड़की हमेशा भविष्य की सुरक्षा देखती है। इसलिए आपकी इस शारीरिक कमी के बावजूद, मैं आपसे शादी करने के लिए तैयार हूँ। लेकिन मेरी कुछ बुनियादी शर्तें हैं।”
केशव ने पानी का घूँट भरा। उसे लगा जैसे सामने कोई जीवनसंगिनी की तलाश में नहीं, बल्कि किसी सौदे की शर्तें तय करने बैठा हो। फिर भी उसने संयम बनाए रखते हुए पूछा, “शर्तें कैसी तान्या जी?”
तान्या ने अपने कंधे उचकाए और बड़े स्वाभाविक लहज़े में बोली, “देखिए, मैं एक न्यूक्लियर फैमिली में पली-बढ़ी हूँ। मुझे अपनी आज़ादी और अपना स्पेस बहुत अज़ीज़ है। आपके माता-पिता सीधे-सादे, पुराने ज़माने के लोग हैं। मुझे पुराने खयालात, रीति-रिवाजों का ढोंग और रोज़-रोज़ की रोक-टोक बिल्कुल बर्दाश्त नहीं है। शादी के बाद हम दोनों भोपाल या जहाँ भी आपकी पोस्टिंग हो, वहाँ अलग रहेंगे। आपके माता-पिता ग्वालियर वाले अपने पुश्तैनी मकान में ही रहें। मैं उनके बुढ़ापे की तीमारदारी और घरेलू ज़िम्मेदारियों का बोझ अपने सिर नहीं ले सकती। साल में एकाध बार त्योहार पर मिलना अलग बात है, लेकिन एक ही छत के नीचे रहना मेरे लिए संभव नहीं होगा।”
कमरे में कुछ पलों के लिए सन्नाटा पसर गया। केशव के कानों में तान्या का एक शब्द बार-बार गूँज रहा था—’बोझ’।
उसी पल केशव के मानस पटल पर तीस साल पुरानी एक तस्वीर कौंध गई। जब वह छह साल का था, तो पूरे शरीर में भयानक दर्द था। डॉक्टर ने कह दिया था कि लड़का शायद अब कभी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकेगा। उस रात उसकी माँ ने अन्न का एक दाना भी मुँह में नहीं डाला था। मंदिर की चौखट पर माथा रगड़ते-रगड़ते माँ के माथे से खून छलक आया था। और पिता… पिता ने अपनी पुरानी साइकिल के पीछे एक छोटी सी लकड़ी की गद्दी खुद बनाई थी, जिस पर केशव को बिठाकर वे हर रोज़ दस किलोमीटर दूर शहर के अस्पताल में फिजियोथेरेपी के लिए ले जाते थे। बारिश हो, कड़कड़ाती ठंड हो या चिलचिलाती धूप, पिता के पाँव कभी नहीं थमे। जब केशव गिरता, तो पिता उसे सहारा देकर कहते, “उठ बेटा, तू गिरेगा तो क्या हुआ, तेरे हौसले के तो दो नहीं, चार पैर हैं।”
कॉलेज के दिनों में जब केशव की बस छूट जाती, तो पिता खुद अपनी थकी हुई देह के साथ उसे परीक्षा केंद्र तक छोड़कर आते। माँ ने अपनी सोने की इकलौती चेन बेच दी थी ताकि केशव के लिए प्रतियोगिता परीक्षाओं की महंगी किताबें और अध्ययन सामग्री खरीदी जा सके। उन दोनों ने अपनी पूरी ज़िंदगी, अपनी हर ख्वाहिश, अपनी हर बचत सिर्फ इसलिए न्योछावर कर दी ताकि उनका यह बेटा कभी समाज में सिर झुकाकर न चले। आज बत्तीस साल की उम्र में जब वह अपने पैरों पर इस लायक बना कि उनका सहारा बन सके, तो सामने बैठी यह पढ़ी-लिखी स्त्री उन्हें ‘बोझ’ कह रही थी?
केशव की आँखों में एक गहरी, अडिग चमक उभर आई। उसके चेहरे का सौम्य भाव अब एक चट्टानी आत्मसम्मान में बदल चुका था।
उसने मेज़ पर दोनों हाथ रखे और तान्या की ओर देखा। “तान्या जी, आपने अपनी बात बहुत साफगोई से कही, इसके लिए आपका धन्यवाद। अब मेरी बात भी उतनी ही साफगोई से सुन लीजिए।”
तान्या ने भौंहें सिकोड़ते हुए उसे देखा।
केशव ने अत्यंत धीमे मगर बेहद दृढ़ स्वर में कहा, “मेरा पैर कमज़ोर ज़रूर है, लेकिन मेरी रीढ़ की हड्डी आज भी बिल्कुल सीधी है। आप सोचती हैं कि आप मेरी शारीरिक कमी पर तरस खाकर, मेरी सरकारी कुर्सी के एवज में मुझ पर कोई एहसान कर रही हैं? यह आपकी सबसे बड़ी भूल है। जिस पद और रुतबे को देखकर आप आकर्षित हुई हैं, वह पद मुझे किसी लाटरी में नहीं मिला। उस पद के पीछे मेरे उन माँ-बाप के तीस साल के आँसू, उनका त्याग और उनकी तपस्या है, जिन्हें आप एक झटके में ‘बोझ’ करार दे रही हैं।”
केशव एक पल रुका, फिर आगे बोला, “मेरे पिता ने मुझे अपनी पीठ पर उठाकर दुनिया दिखाई है जब मेरे पैर काम नहीं करते थे। मेरी माँ ने अपने हाथों से मुझे खिलाया है जब मैं दर्द से कराहता था। उन्होंने मुझे कभी अपनी ज़िंदगी पर बोझ नहीं समझा। और आज जब मेरी बारी है उनका साया बनने की, तो आप चाहती हैं कि मैं अपने उन जीवित देवताओं को उनके ही हाल पर छोड़कर अपनी झूठी गृहस्थी सजाऊँ? तान्या जी, शारीरिक रूप से कमज़ोर होना कोई अपराध नहीं है, लेकिन संस्कारों और संवेदनाओं से अपाहिज हो जाना सबसे बड़ी विकलांगता है। मुझे एक पत्नी की ज़रूरत हो सकती है, लेकिन अपने आत्मसम्मान और अपने माता-पिता की बलि देकर मिले किसी रिश्ते की मुझे रत्ती भर भी ज़रूरत नहीं।”
तान्या का चेहरा गुस्से और अचरज से लाल हो गया। उसने तल्ख़ आवाज़ में कहा, “केशव जी, आप बहुत भावुक हो रहे हैं। ज़मीनी हकीकत को समझिए। आज के दौर में कोई भी आज़ाद खयालों की लड़की सास-ससुर के साथ रहकर अपनी ज़िंदगी खराब नहीं करना चाहती। आपको लगता है कि आपकी इस हालत के साथ आपको कोई और बेहतर मिल जाएगी?”
केशव अपनी कुर्सी से उठा। उसने अपनी छड़ी को हाथ में थामा और उस पर अपना वज़न टिकाते हुए पूरी गरिमा के साथ सीधा खड़ा हो गया।
“मुझे कोई मिले या न मिले तान्या जी, यह ऊपर वाले की मर्ज़ी है। लेकिन जो मुझे मेरे माता-पिता के बिना चाहे, वह मुझे कभी स्वीकार्य नहीं हो सकती। जो स्त्री उन माँ-बाप का आदर नहीं कर सकती जिन्होंने मुझे चलना सिखाया, वह मेरे जीवन की हमसफ़र बनने के काबिल ही नहीं है। मेरी लाठी मेरा सहारा हो सकती है, लेकिन मेरे माँ-बाप मेरी आत्मा हैं। और इंसान अपनी आत्मा बेचकर कभी सुखी नहीं रह सकता।”
केशव ने वेटर को बुलाकर बिल का भुगतान किया और तान्या की ओर देखकर सिर्फ इतना कहा, “ईश्वर करे कि आपको अपनी सोच के मुताबिक कोई साथी मिले, मगर प्रार्थना यह भी करूँगा कि किसी दिन आप रिश्तों की असली कीमत समझ सकें।”
तान्या स्तब्ध बैठी रह गई। केशव बिना पीछे मुड़े, अपनी उसी खनकती और सधी हुई चाल के साथ रेस्तराँ के दरवाज़े की ओर बढ़ गया। हर कदम पर उसके कैलिपर की आवाज़ अब किसी लाचारी का रोना नहीं, बल्कि उसके स्वाभिमान की जयकार लग रही थी।
घर पहुँचकर जब केशव ने अपने माता-पिता के पाँव छुए, तो जानकी देवी ने उसके माथे पर हाथ फेरते हुए पूछा, “क्या हुआ बेटा? लड़की कैसी लगी? कुछ बात बनी?”
केशव ने माँ को अपने सीने से लगा लिया और पिता का हाथ थामते हुए मुस्कुराकर बोला, “बाबूजी, वह रिश्ता हमारे घर के लायक नहीं था। आप दोनों निश्चिंत रहिए, जो घर अपने बुजुर्गों की छांव को बोझ समझे, उस घर की छत कभी सुरक्षित नहीं रह सकती। आपका बेटा अपने पैरों से भले थोड़ा धीमा चलता हो, मगर अपने धर्म और फ़र्ज़ की राह से कभी पीछे नहीं हटेगा।”
हरिशंकर जी की आँखें भर आईं। उन्होंने अपने बेटे की पीठ थपथपाते हुए कहा, “बेटा, तूने आज साबित कर दिया कि असली इंसानियत शरीर के अंगों में नहीं, मन के संस्कारों में होती है।”
समय बीतता गया। केशव अपने काम में निष्ठा से लगा रहा। उसके विभाग में उसके काम की ईमानदारी और जनता के प्रति उसकी संवेदनशीलता की मिसालें दी जाने लगीं। कुछ ही महीनों बाद, उसी के विभाग में कार्यरत एक महिला अधिकारी की नज़र केशव के काम और उसके व्यक्तित्व पर पड़ी। उनका नाम था सुमेधा।
सुमेधा एक उच्च शिक्षित, विचारशील और संस्कारी युवती थीं, जो स्वयं एक प्रतिष्ठित परिवार से थीं। उन्होंने केशव के काम के प्रति समर्पण और अपने माता-पिता के प्रति उसके अपार स्नेह को बहुत करीब से देखा था। एक दिन जब कार्यालय के एक कार्यक्रम में केशव के माता-पिता भी उपस्थित थे, तब सुमेधा ने जिस आदर और आत्मीयता से जानकी देवी और हरिशंकर जी से बात की, उसने हर किसी का दिल जीत लिया।
कुछ दिनों बाद सुमेधा के पिता, जो स्वयं एक सेवानिवृत्त प्राध्यापक थे, केशव के घर एक सीधा और सम्मानजनक प्रस्ताव लेकर पहुँचे। उन्होंने हरिशंकर जी से कहा, “हरिशंकर जी, आज के ज़माने में शरीर की सुंदरता और दौलत देखने वाले तो बहुत मिल जाते हैं, लेकिन जो लड़का अपने माता-पिता को भगवान की तरह पूजता हो और अपने स्वाभिमान से कभी समझौता न करता हो, उससे बड़ा कोई धन नहीं हो सकता। मेरी बेटी सुमेधा आपके घर की बहू और आपकी बेटी बनकर आने के लिए पूरी तरह तैयार है, बशर्ते आपको हमारा यह रिश्ता मंज़ूर हो।”
केशव और सुमेधा की शादी अत्यंत सादगी और वैदिक मर्यादाओं के साथ संपन्न हुई। शादी के मंडप में जब फेरे लेने का समय आया, तो केशव के लड़खड़ाते कदमों के साथ सुमेधा ने इस तरह कदम मिलाया कि एक बार भी किसी को यह महसूस नहीं हुआ कि दोनों की चाल में कोई अंतर है। सुमेधा ने सिर्फ केशव का हाथ नहीं थामा था, बल्कि उस पूरे परिवार के सुख-दुख की ज़िम्मेदारी को अपने आँचल में समेट लिया था।
विवाह के बाद सुमेधा ने कभी भी हरिशंकर जी और जानकी देवी को सास-ससुर का दर्जा नहीं दिया, बल्कि अपनी सगी माँ और पिता की तरह उनकी सेवा की। शाम को जब घर के आंगन में हरिशंकर जी अखबार पढ़ते, जानकी देवी तुलसी के पौधे में दीया जलातीं और केशव व सुमेधा चाय की चुस्कियों के साथ दिन भर की बातें साझा करते, तो उस घर का कोना-कोना संस्कारों की महक से खिल उठता।
एक दिन संयोगवश शहर के एक बड़े मॉल में केशव और सुमेधा की मुलाकात तान्या से हो गई। तान्या के चेहरे पर थकान और एक अजीब सा अकेलापन था। उसने देखा कि सुमेधा बड़े गर्व और प्रेम से केशव का हाथ थामे हुए थी और जानकी देवी के कंधे पर हाथ रखकर हँस-हँस कर बातें कर रही थी। केशव के चेहरे पर वही शालीन और निश्चिंत मुस्कान थी। तान्या ने कुछ कहना चाहा, मगर उसकी नज़रें केशव के उस स्वाभिमानी चेहरे के सामने ठहर नहीं सकीं। वह बिना कुछ कहे चुपचाप भीड़ में आगे बढ़ गई।
ज़िंदगी ने केशव को सिखा दिया था कि जो लोग अपनी कमियों को स्वीकार कर अपने नैतिक मूल्यों पर अडिग रहते हैं, ईश्वर उनके जीवन को देर-सवेर सबसे खूबसूरत उपहारों से भर देता है। सच्चे रिश्ते कभी सौदों की मेज़ पर नहीं बनते; वे तो त्याग, आदर और परस्पर सम्मान की पवित्र ज़मीन पर पनपते हैं।
दोस्तों, आज के आधुनिक दौर में अक्सर बुजुर्ग माता-पिता को पुरानी पीढ़ी मानकर अलग कर दिया जाता है या उन्हें जीवन पर बोझ समझा जाता है। केशव का फैसला आपको कैसा लगा? क्या माता-पिता के सम्मान की खातिर एक सुविधाजनक रिश्ते को ठुकराना सही था? अपनी राय हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर बताएं।
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