जेठ राकेश जी और मयंक के चेहरे का रंग उड़ चुका था। जिस भतीजी और भाभी को वे कल तक बोझ और ताने की वस्तु समझते थे, आज उनके सम्मान के छींटे अपने ऊपर लेने के लिए वे आगे-आगे होकर लोगों को चाय-पानी पूछ रहे थे। मयंक बार-बार मीडिया वालों से कह रहा था, “मेरी बेटी है, मुझे तो पहले से पता था कि यह एक दिन हमारा नाम रोशन करेगी।” पर सच्चाई क्या थी, यह उस घर की हर दीवार जानती थी।
आज तो अपमान ने सारी सीमाएँ लांघ दी थीं। नलिनी की आँखों से बहते आँसू उसके पुराने सूती दुपट्टे को भिगो रहे थे।
नलिनी एक पढ़ी-लिखी, गणित में परास्नातक और बेहद सुलझी हुई स्त्री थी। चौदह वर्ष पहले जब वह ब्याह कर इस घर में आई थी, तो उसने गृहस्थी के सुनहरे सपने देखे थे। पर नियति का खेल अजीब था। उसका पति मयंक काम-धंधे के नाम पर सिर्फ बातें बनाना जानता था। किसी काम में हफ्ता-भर मन लगाना और फिर किसी न किसी से झगड़ा करके घर बैठ जाना उसकी पुरानी आदत थी। घर का खर्च ससुर जी की रेलवे की पेंशन से चलता था, और इसी पेंशन की आड़ में पूरे परिवार को नलिनी और उसके बच्चों को जलील करने का खुला अधिकार मिल गया था। नलिनी ने कभी हिम्मत नहीं हारी थी, उसने बच्चों को पालते हुए खुद प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की, प्राथमिक शिक्षिका की लिखित परीक्षा भी सम्मानजनक अंकों से पास की, लेकिन अंतिम मेरिट सूची में मात्र दो अंकों से उसका नाम छूट गया। बस, उस दिन के बाद से ससुराल वालों को उस पर हँसने और उसकी काबिलियत की धज्जियाँ उड़ाने का एक नया बहाना मिल गया।
आज दोपहर की बात नलिनी के दिल को छलनी कर गई थी। हुआ यह था कि नलिनी की बारह वर्ष की बेटी दृष्टि और नौ वर्ष के बेटे शौर्य ने शाम के नाश्ते में मेज़ पर रखी सेवइयों में से एक-एक चम्मच खा लिया था। बस इसी बात पर उसके जेठ राकेश जी बिफर पड़े। उन्होंने बच्चों के हाथ से प्लेट छीनते हुए पूरे घर के सामने चिल्लाना शुरू कर दिया था, “मुफ्त की रोटियाँ तोड़-तोड़ कर जबानें तो बहुत चल रही हैं! बाप यहाँ निकम्मा बैठा है, खुद दो कौड़ी कमा नहीं सकती और बच्चों को देखो, राजघरानों की तरह ठाठ चाहिए। अरे नलिनी, अगर इतनी ही भूख लगती है अपने बच्चों को, तो जा बाज़ार में दो-चार हज़ार की झाड़ू-पोंछे की नौकरी पकड़ ले! तेरे बाप ने कौन सी सोने की खदान हमारे नाम कर दी थी जो तेरे कुनबे का खर्च हम अपनी जेब से उठाते रहें?”
मयंक भी वहीं सोफे पर बैठा मोबाइल चला रहा था। अपनी पत्नी और बच्चों के सम्मान की रक्षा करना तो दूर, उसने उल्टा नलिनी पर ही आँखें तरेर दीं, “सही तो कह रहे हैं भैया। दिन भर घर में पड़े रहने के अलावा आता ही क्या है तुम्हें? बच्चों को भी वही संस्कार दे रखे हैं।” सास ने भी तड़का लगाते हुए कह दिया था, “अपनी औकात भूलकर जो ऊँचे ख्वाब देखते हैं, उनका यही हश्र होता है।”
उस समय दृष्टि अपनी माँ के आँचल के पीछे खड़ी कांप रही थी और छोटा शौर्य अपनी बहन की उँगली पकड़े रो रहा था। नलिनी चुपचाप दोनों बच्चों को लेकर अपने कमरे में आ गई थी। भीतर से वह पूरी तरह टूट चुकी थी। उसके मन में बार-बार यही भयानक विचार कौंध रहा था कि ऐसी जिल्लत भरी ज़िंदगी से तो मौत भली है। क्या कसूर था इन मासूम बच्चों का? क्यों रोज़-रोज़ इन्हें हर निवाले के लिए चोरों की तरह आँखें चुरानी पड़ती हैं? क्यों उसके मायके की गरीबी का ताना हर दूसरे दिन उसके चेहरे पर दे मारा जाता है? जब अपने ही घर में इंसान की कोई कीमत न हो, तो जीने का क्या फायदा?
नलिनी ने रोते हुए अलमारी के ऊपरी ताक पर रखी कीटनाशक की शीशी की तरफ देखा ही था कि एक नन्हे, पर बेहद मजबूत हाथ ने उसका चेहरा अपनी ओर घुमा दिया। वह दृष्टि थी। बारह साल की उस बच्ची की आँखों में कोई खौफ नहीं था, बल्कि एक अजीब सा संकल्प और आत्मबल जल रहा था।
“मम्मी, मत रोइए!” दृष्टि की आवाज में एक ऐसा ठहराव था जिसने नलिनी को भीतर तक हिला दिया। दृष्टि ने अपनी नन्हीं हथेलियों से माँ के आँसू पोंछे और बोली, “मम्मी, आज बड़े पापा और पापा ने जो कुछ भी कहा, मैंने एक-एक शब्द अपने दिल में लिख लिया है। आप कभी यह मत सोचना कि हम लाचार हैं। आप पढ़ी-लिखी हैं, आपने हमें हमेशा मेहनत और ईमानदारी सिखाई है। आज मैं आपसे वादा करती हूँ, इस अपमान की आग को मैं बुझने नहीं दूँगी। आप बस मेरा साथ दीजिए और हिम्मत मत हारिए। मैं इन तानों का जवाब मुँह से नहीं, अपने मुकाम से दूँगी!”
अपनी बारह साल की बच्ची के मुँह से ये शब्द सुनकर नलिनी स्तब्ध रह गई। उसके भीतर का अंधकार जैसे एक झटके में छँट गया। उसने अपनी बेटी को सीने से चिपका लिया। दृष्टि ने उसी पल अपनी ज़िंदगी का मकसद तय कर लिया था। उसे किसी छोटी-मोटी नौकरी के फेर में नहीं पड़ना था, उसे सीधे उस मुकाम पर पहुँचना था जहाँ कोई किसी लाचार माँ की बेबसी का मज़ाक उड़ाने की जुर्रत न कर सके। उसका सपना था भारतीय प्रशासनिक सेवा (UPSC)।
उस रात के बाद से उस सीलन भरे कमरे की तस्वीर बदलने लगी। नलिनी ने फैसला कर लिया कि वह अब आंसुओं में वक्त बर्बाद नहीं करेगी। उसने मोहल्ले के छोटे बच्चों को अपने कमरे में ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। ससुराल वालों ने इस पर भी सौ ताने कसे कि “घर की बहू अब गलियों के बच्चों को पढ़ाकर हमारा नाम मिट्टी में मिलाएगी,” लेकिन नलिनी ने अपने कान बंद कर लिए थे। ट्यूशन से जो दो-चार पैसे मिलते, उससे वह घर के खर्च में हिस्सा देने के साथ-साथ दृष्टि और शौर्य के लिए किताबें, कॉपियाँ और ज़रूरी अध्ययन सामग्री लाती।
दृष्टि ने अपनी ज़िंदगी का हर एक पल अपनी पढ़ाई के नाम कर दिया था। न कोई त्यौहार, न कोई शादी-ब्याह, न सहेलियों के साथ सैर-सपाटा। गर्मी के दिनों में जब कमरे की छत तवे की तरह तपती और बिजली चली जाती, तो दृष्टि ढिबरी की रोशनी में या खिड़की से आती हवा के सहारे पन्ने पलटती रहती। नलिनी रात-रात भर जागकर उसके सिर पर हाथ फेरती, उसके लिए गुनगुना पानी लाती और उसका हौसला बँधाती। दृष्टि जब भी थकती, उसे उस दिन का मंज़र याद आ जाता जब उसकी माँ के हाथ से नाश्ते की प्लेट छीनकर उसे औकात दिखाई गई थी। वह अपमान दृष्टि के लिए सबसे बड़ी ऊर्जा बन चुका था।
समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। साल दर साल बीतते गए। दृष्टि ने बारहवीं की परीक्षा शहर में सर्वोच्च अंकों से उत्तीर्ण की, फिर स्नातक की डिग्री भी स्वर्ण पदक के साथ हासिल की। इस पूरे सफर में ससुराल वालों का रवैया कभी नहीं बदला। जब भी दृष्टि देर रात तक पढ़ती, जेठ राकेश कहते, “कलेक्टर बनने के ख्वाब देखना छोड़ दो, शादी की उम्र निकल रही है, किसी सामान्य घर में हाथ पीले कर दो।” मयंक भी अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह भागा हुआ था। पर नलिनी चट्टान की तरह अपनी बेटी के आगे खड़ी रही। उसने शौर्य को भी संस्कार दिए कि वह अपनी बहन की ढाल बने। शौर्य भी समझदार हो चुका था, उसने कॉलेज के साथ-साथ पार्ट-टाइम काम करके माँ और बहन का हाथ बँटाना शुरू कर दिया था।
स्नातक पूरा होते ही दृष्टि ने संघ लोक सेवा आयोग (सिविल सेवा परीक्षा) की तैयारी पूरे समर्पण के साथ शुरू कर दी। पहले प्रयास में वह मुख्य परीक्षा तक पहुँची, पर साक्षात्कार में कुछ अंकों से चूक गई। उस दिन ससुराल में ऐसा माहौल बना मानो दृष्टि की हार उनका कोई बहुत बड़ा जश्न हो। मयंक ने तंज कसा, “कहा था ना, यह सब बड़े लोगों के चोंचले हैं, हमारे बस की बात नहीं।” लेकिन दृष्टि डिगी नहीं। नलिनी ने अपनी बेटी की पीठ थपथपाई और कहा, “गिरते वही हैं जो मैदान में उतरते हैं। मुझे तुझ पर पूरा भरोसा है, मेरी बच्ची।”
दृष्टि फिर से जुट गई। इस बार उसकी मेहनत में एक तपस्या जैसी एकाग्रता थी। उसने अपनी गलतियों का बारीकी से विश्लेषण किया। नलिनी खुद दृष्टि के साथ समसामयिक विषयों पर चर्चा करती, क्योंकि वह खुद भी कभी एक मेधावी छात्रा रही थी। माँ और बेटी की यह जोड़ी सिर्फ परिवार नहीं, बल्कि एक-दूसरे की सबसे बड़ी ताकत बन चुकी थी।
और फिर वह ऐतिहासिक दिन आ ही गया।
मई की एक चिलचिलाती दोपहर थी। दृष्टि अपने कंप्यूटर पर परिणाम देख रही थी। अचानक पूरे घर में सन्नाटा छा गया। दृष्टि की आँखों से अविरल आँसू बहने लगे। उसने अपनी माँ को पुकारा, “मम्मी… मम्मी, यहाँ आइए!” नलिनी घबराती हुई कमरे में दौड़ी आई कि न जाने क्या हुआ। दृष्टि ने स्क्रीन की तरफ इशारा किया। संघ लोक सेवा आयोग की सूची में दृष्टि का नाम पूरे देश में 18वीं रैंक पर दर्ज था। वह भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के लिए सीधे चयनित हो चुकी थी।
नलिनी की आँखों के आगे चौदह साल का पूरा संघर्ष, वो भूखी रातें, वो रिश्तेदारों के तीखे बोल और वो अपमान का हर एक घूंट एक पल में तैर गया। उसने दृष्टि को गले से लगा लिया। कमरे में सिर्फ सिसकियों की आवाज थी, लेकिन वे लाचारी के आँसू नहीं थे, वे विजय के आँसू थे। शौर्य दौड़ता हुआ आया और उसने दीदी और माँ को अपने घेरे में ले लिया।
खबर जंगल में आग की तरह पूरे शहर में फैल गई। जिस पुराने मकान के उस छोटे से सीलन भरे कमरे की तरफ कभी कोई देखता भी नहीं था, आज उस घर के बाहर बड़ी-बड़ी गाड़ियों का ताँता लग गया। स्थानीय विधायक, जिलाधिकारी और शहर के तमाम गणमान्य लोग दृष्टि को बधाई देने पहुँचने लगे। मीडिया के कैमरे और पत्रकारों की भीड़ आँगन में जमा हो गई थी।
जेठ राकेश जी और मयंक के चेहरे का रंग उड़ चुका था। जिस भतीजी और भाभी को वे कल तक बोझ और ताने की वस्तु समझते थे, आज उनके सम्मान के छींटे अपने ऊपर लेने के लिए वे आगे-आगे होकर लोगों को चाय-पानी पूछ रहे थे। मयंक बार-बार मीडिया वालों से कह रहा था, “मेरी बेटी है, मुझे तो पहले से पता था कि यह एक दिन हमारा नाम रोशन करेगी।” पर सच्चाई क्या थी, यह उस घर की हर दीवार जानती थी।
अगले सप्ताह संभागीय आयुक्त कार्यालय और नागरिक समाज द्वारा शहर के मुख्य सभागार में दृष्टि के सम्मान में एक भव्य नागरिक अभिनंदन समारोह आयोजित किया गया। पूरे सभागार में हज़ारों की भीड़ थी। मंच पर मुख्य अतिथि के रूप में खुद राज्य के वरिष्ठ मंत्री और मुख्य सचिव उपस्थित थे। दृष्टि को पूरे परिवार के साथ आमंत्रित किया गया था।
ससुराल वाले सबसे आगे की कतार में नए कपड़े पहनकर इतराते हुए बैठे थे। जब मंच से दृष्टि का नाम पुकारा गया, तो पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। दृष्टि मंच पर पहुँची। उसे शॉल, स्मृति-चिह्न और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। इसके बाद जब दृष्टि को अपने विचार रखने के लिए माइक सौंपा गया, तो उसने जो कहा, उसने पूरे सभागार को भावुक कर दिया।
दृष्टि ने माइक थामा और गहरी सांस लेते हुए सीधे सामने बैठी अपनी माँ नलिनी की तरफ देखा। उसकी आवाज में एक अद्वितीय गरिमा थी।
“यहाँ उपस्थित सभी आदरणीय जनों को मेरा प्रणाम। आज जब सब मुझे इस ऊँचे पद और सफलता के लिए बधाई दे रहे हैं, तो मैं एक बात बहुत स्पष्ट कर देना चाहती हूँ। दृष्टि आज जो कुछ भी है, वह सिर्फ और सिर्फ एक इंसान की बदौलत है—मेरी माँ, श्रीमती नलिनी। मेरी माँ सिर्फ मेरी जन्मदात्री नहीं हैं, वे मेरी पहली गुरु, मेरी प्रेरणा और मेरी सबसे बड़ी शक्ति हैं।
एक वक्त था जब हमारी क्षमता, हमारे अस्तित्व और यहाँ तक कि हमारे खाने के एक-एक दाने पर सवाल उठाए जाते थे। मेरी माँ को ताने दिए गए कि उनकी कोई औकात नहीं है। लेकिन मेरी माँ ने कभी किसी के तानों का जवाब गाली या झगड़े से नहीं दिया। उन्होंने अपनी पीड़ा को अपनी चुप्पी में समेट लिया और अपनी पूरी ऊर्जा मुझे और मेरे भाई को पढ़ाने में झोंक दी। जब हमारे पास किताबें खरीदने के पैसे नहीं होते थे, तब मेरी माँ ने रात-रात भर ट्यूशन पढ़ाकर हमारे लिए कॉपियाँ जुटाईं। आज मैं जो यह अधिकारी का तमगा पहन रही हूँ, यह मेरी जीत नहीं है, यह मेरी उस माँ के त्याग और तपस्या की गुरुदक्षिणा है! मैंने बचपन में अपनी माँ की आँखों में जो आँसू देखे थे, आज ईश्वर की कृपा से मैंने उन आँसुओं को सम्मान के मोतियों में बदल दिया है।”
दृष्टि मंच से नीचे उतरी और सीधे पहली कतार में बैठी अपनी माँ के पास गई। उसने अपना स्वर्ण पदक और प्रशस्ति पत्र अपनी माँ के चरणों में रख दिया और झुककर उनके पैर छुए। नलिनी ने कांपते हाथों से अपनी बेटी को उठाया और अपने सीने से लगा लिया।
उस समय सभागार में उपस्थित हर व्यक्ति की आँखें नम थीं और तालियाँ थमने का नाम नहीं ले रही थीं। पीछे बैठे मयंक और राकेश जी का सिर शर्म से इतना झुक गया था कि वे नज़रें उठाकर मंच की तरफ देखने का साहस भी नहीं जुटा पा रहे थे। जिस औरत को उन्होंने ज़िंदगी भर जलील किया था, आज उसी के नाम से पूरे ज़माने में उनका परिचय हो रहा था।
दृष्टि ने फिर मंच की ओर मुड़कर कहा, “मेरा छोटा भाई शौर्य भी आज अपनी कड़ी मेहनत से बैंक अधिकारी बनने की दहलीज़ पर खड़ा है। हमने सीखा है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, यदि आपके पास एक ऐसी माँ का आशीर्वाद है जो कभी टूटना नहीं सिखाती, तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती।”
उस दिन नलिनी के चेहरे पर जो शांति और आत्मसम्मान का तेज था, उसने चौदह वर्षों के हर एक घाव को हमेशा के लिए भर दिया था।
दोस्तों, इस कहानी पर आपकी क्या राय है? क्या परिवार में किसी के निकम्मेपन की सज़ा उसकी संस्कारी पत्नी और बच्चों को दी जानी चाहिए? और क्या दृष्टि की तरह हर बच्चे को अपनी माँ के स्वाभिमान की ढाल बनना चाहिए? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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