“मर्यादा सिर्फ एक इंसान के कंधे पर नहीं टिकती, बाबूजी। बाहर होटल में खाना खाया जा सकता है, तो घर में भी आज सब अपनी व्यवस्था खुद कर सकते हैं।” इतना कहकर अनुराग ने मेरा हाथ मजबूती से थामा और मुझे अपनी पुरानी बजाज चेतक स्कूटर पर बिठा लिया।
उस दिन पहली बार मुझे लगा कि मेरे पति सिर्फ मेरे साथ खड़े नहीं हैं, बल्कि वे मेरे आत्मसम्मान के लिए एक दीवार बन चुके हैं।
हाथ में पकड़े भूरे रंग के सरकारी लिफाफे की सील तोड़ते हुए अनुराग की उंगलियाँ काँप रही थीं, लेकिन उनके चेहरे पर एक ऐसी अलौकिक चमक थी जो मैंने पिछले सात सालों में कभी नहीं देखी थी। बाहर आँगन में सावन की पहली फुहारें गिर रही थीं और मिट्टी की सौंधी खुशबू सीधे मेरे कमरे तक खिंच आई थी। कमरे की पुरानी खिड़की से छनकर आती रोशनी सीधे उस सफेद पन्ने पर पड़ी, जिस पर लाल स्याही की मुहर चमक रही थी।
“अर्चना! अपनी आँखों से देख लो, तुम्हारी वर्षों की तपस्या आज सफल हो गई। तुम अब केवल एक गृहणी नहीं, बल्कि इस जिले की शिक्षा अधिकारी बन चुकी हो!” अनुराग के शब्द गले में ही अटक गए और उनकी आँखें छलक पड़ीं।
मेरे भीतर जैसे कोई बाँध टूट गया। पिछले कई महीनों से दिल में जो आशंकाओं का धुँधलका छाया हुआ था, वह एक झटके में काफूर हो गया। मेरा आत्मविश्वास कई बार डगमगाया था, लगता था कि शायद मुझसे नहीं हो पाएगा, मगर सामने खड़े इस इंसान ने मुझ पर तब भी भरोसा किया था जब मुझे खुद अपने वजूद पर तरस आता था। मैंने बिना कुछ सोचे अपनी काँपती बाहें अनुराग के गले में डाल दीं और उनका कंधा मेरे आंसुओं से भीगता चला गया।
“यह मेरी नहीं, आपके उस मौन संघर्ष की जीत है अनुराग, जो आपने उस दिन मेरे लिए पूरे परिवार के सामने छेड़ा था,” मेरी सिसकियों के बीच बस यही शब्द निकल सके।
उनकी मजबूत छाती से लगकर जब मैंने आँखें मूँदीं, तो जिंदगी की पुरानी परतें एक-एक करके उधड़ने लगीं। स्मृतियों का एक पूरा कारवां मेरी आँखों के सामने घूमने लगा।
मेरा मायका भोपाल के पास के एक छोटे से पिछड़े गाँव में था। बचपन में ही जब सर से माता-पिता का साया उठ गया, तो बड़े ताऊजी ने जैसे-तैसे पाल-पोसकर बड़ा किया। पढ़ाई-लिखाई के नाम पर गाँव के ही टूटे-फूटे स्कूल से सातवीं तक की पढ़ाई किसी तरह घिसटते हुए पूरी हुई थी, पर आठवीं की परीक्षा में गणित और अंग्रेजी ने मेरा रास्ता ऐसा रोका कि मैं आगे बढ़ ही न सकी। ताऊजी पर अपनी तीन बेटियों की शादी का बोझ था, इसलिए अठारह की दहलीज छूते ही उन्होंने इंदौर के एक खाते-पीते, तथाकथित संभ्रांत परिवार में मेरा ब्याह तय कर दिया। उन्हें लगा कि लड़की का भविष्य संवर जाएगा, मगर उन्हें क्या पता था कि उस बड़े से मकान में बहू नहीं, बल्कि बिना वेतन वाली एक स्थायी नौकरानी की तलाश की जा रही थी।
ससुराल की चौखट लांघते ही मेरी जिंदगी का नया अध्याय शुरू हुआ, जो जिल्लतों और तानों की स्याही से लिखा गया था। सुबह चार बजे उठकर पूरे घर का झाड़ू-पोछा, भारी-भरकम पीतल के बर्तनों की माँज-धोई और सोलह सदस्यों के लिए अंगीठी पर रोटियाँ सेकते-सेकते मेरी हथेलियों के छाले कभी सूखते ही नहीं थे। ऊपर से मेरी सीधी-सादी देहाती बोली और ‘आठवीं फेल’ का ठप्पा हर पल मेरे मुँह पर मारा जाता।
मेरी सास सुमित्रा देवी बात-बात पर अपनी सहेलियों के सामने कहतीं, “अरे, किस्मत फूट गई हमारे बड़े बेटे की! गाँव से ऐसी गँवार उठा लाए कि जिसे यह भी नहीं पता कि चम्मच कैसे पकड़ी जाती है। बस पेट भरने और कोल्हू के बैल की तरह जुतने के काम की है।”
ननद शालिनी अपनी सहेलियों को बुलाकर मेरे हाथ की बनी चाय पीती और फिर मेरे फटे हुए ब्लाउज व मैले पल्लू का मजाक उड़ाती। उस भरे-पूरे परिवार में मेरे पति अनुराग ही अकेले ऐसे इंसान थे जो बैंक में एक साधारण क्लर्क होते हुए भी असाधारण दिल रखते थे। वे रात को जब काम से लौटते और मुझे रसोई के कोने में बिलखते देखते, तो चुपचाप मेरे सिर पर हाथ रख देते। उनका वह स्पर्श मेरे दिन भर के ज़ख्मों पर मरहम का काम करता था। वे अक्सर कहते, “अर्चना, सब्र रखो। वक्त एक सा नहीं रहता, बस अपनी आत्मा को मत मरने देना।”
हालात तब और ज्यादा बदतर हो गए जब अनुराग के छोटे भाई निशांत की शादी ग्वालियर के एक बड़े रईस खानदान में तय हुई। छोटी बहू विशाखा जब एम.ए. की डिग्री और साथ में चमचमाती होंडा सिटी कार लेकर घर आई, तो मेरे बचे-खुचे आत्मसम्मान की भी धज्जियाँ उड़ने लगीं। विशाखा के आते ही घर के नियम बदल गए। उसके लिए डाइनिंग टेबल पर नाश्ता सजता, उसके कमरे में नया एसी लगवाया गया और मुझे उसकी व्यक्तिगत सेविका बना दिया गया। उसके गंदे कपड़े धोने से लेकर उसके जूतों की पॉलिश तक की जिम्मेदारी सास ने मेरे मत्थे मढ़ दी।
अनुराग कई बार इस अन्याय के खिलाफ बोलने की कोशिश करते, पर ससुर ओंकारनाथ जी अपनी भारी आवाज में उन्हें यह कहकर दबा देते कि “तुम बड़े हो, परिवार की मर्यादा बनाए रखना तुम्हारा काम है। विशाखा बड़े घर की बेटी है, वह चौका-बर्तन करने नहीं आई है। यह काम तो इसी अनपढ़ के लायक है।” अनुराग अंदर ही अंदर घुटते रहते थे और उनकी यह बेबसी मुझे अंदर तक तोड़ देती थी।
फिर आया वह रविवार, जिसने मेरी तकदीर का रुख ही मोड़ दिया।
शहर के सबसे बड़े पांच सितारा होटल में उस दिन एक मशहूर शेफ का फूड फेस्टिवल और साथ में एक भव्य संगीत संध्या का आयोजन था। छोटी बहू विशाखा ने अपनी किटी पार्टी और परिवार के सभी सदस्यों के लिए महंगे पासेस का इंतजाम किया था। दोपहर के समय पूरा घर सज-धज कर तैयार हो रहा था।
मेरी सासुमाँ रेशमी साड़ी पहनकर इतराती हुई कमरे से निकलीं और जोर से बोलीं, “विशाखा बहू ने हम सबके लिए बड़े होटल में दावत रखी है। आज तो पूरे शहर के बड़े-बड़े लोग वहाँ जुटेंगे। हमारे परिवार की तो शान ही अलग होगी।”
मैं उस वक्त पसीने से तरबतर होकर आँगन में पड़े कपड़ों का ढेर धो रही थी। मेरे भीगे आँचल को देखकर अनुराग का दिल भर आया। उन्होंने हिम्मत जुटाकर पूरे परिवार के सामने कहा, “माँ, अर्चना भी तो इस घर की बड़ी बहू है। इसे भी तैयार होने को कहिए, यह भी आप सबके साथ चलेगी।”
यह सुनते ही ननद शालिनी खिलखिलाकर हँस पड़ी, “अरे भैया! होश में तो हो? उस फाइव स्टार होटल में अंग्रेजी बोलने वाले लोग आएंगे। यह गँवार भाभी वहाँ जाएगी तो चम्मच की जगह उंगलियों से खाना खाएगी और हमारी पूरी इज्जत का कचरा कर देगी।”
विशाखा ने अपनी हीरे की अंगूठी घुमाते हुए उपहास भरी नजरों से मुझे देखा और बोली, “मम्मी जी, अगर जेठानी जी वहाँ चलेंगी, तो घर के कुत्तों को खाना कौन देगा? और शाम को पापा जी के काढ़े का क्या होगा? इनका तो असली ठिकाना यही रसोई है।”
सासुमाँ ने तीखी आवाज में बात खत्म करते हुए कहा, “चल री विशाखा, देर हो रही है। और सुन अर्चना, हमारे लौटने से पहले सारा काम खत्म हो जाना चाहिए।”
सब लोग हँसते-खिलखिलाते गाड़ियों में बैठकर चले गए। उनके जाने के बाद मैं अपने कमरे के अंधेरे कोने में जाकर औंधे मुँह गिर पड़ी और फूट-फूट कर रोने लगी। अपमान का यह जहर मेरी नसों में दौड़ रहा था। मुझे लग रहा था कि शायद अनपढ़ होना दुनिया का सबसे बड़ा गुनाह है।
तभी कमरे का दरवाजा खुला। अनुराग अंदर आए। उनके चेहरे पर आज वह पुराना संकोच या बेबसी नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी दृढ़ता और संकल्प का तेज था। उन्होंने मुझे बांहों से पकड़कर सीधा खड़ा किया और बोले, “अर्चना, आँसू पोंछो और अपनी सबसे अच्छी साड़ी पहनो। हम बाहर जा रहे हैं।”
मैंने हैरत से उन्हें देखा, “बाहर? लेकिन घर पर खाना… और बाबूजी का काढ़ा?”
“बाबूजी अपने कमरे में आराम कर रहे हैं और उनके लिए खिचड़ी बन चुकी है। आज कोई सवाल नहीं, तुम बस तैयार हो जाओ,” उनके स्वर में ऐसा आदेश था जिसे टालने की मुझमें हिम्मत न थी।
मैंने डरते-कांपते अपनी वही शादी की पुरानी पीली सिल्क की साड़ी निकाली। अनुराग ने खुद अलमारी से निकालकर मुझे हल्का सा पाउडर और बिंदी लगाने को कहा। जब हम कमरे से बाहर निकले तो बाबूजी चश्मा ठीक करते हुए चौंके, “अरे, तुम दोनों कहाँ की तैयारी में हो?”
अनुराग ने अत्यंत शांत और सधे हुए स्वर में कहा, “बाबूजी, आपकी बड़ी बहू पिछले सात सालों में कभी किसी रेस्तरां की चौखट तक नहीं गई है। आज मैं इसे शहर घुमाने ले जा रहा हूँ।”
बाबूजी ने त्यौरियां चढ़ाईं, “लेकिन घर की मर्यादा… और शाम का खाना?”
“मर्यादा सिर्फ एक इंसान के कंधे पर नहीं टिकती, बाबूजी। बाहर होटल में खाना खाया जा सकता है, तो घर में भी आज सब अपनी व्यवस्था खुद कर सकते हैं।” इतना कहकर अनुराग ने मेरा हाथ मजबूती से थामा और मुझे अपनी पुरानी बजाज चेतक स्कूटर पर बिठा लिया।
उस दिन पहली बार मुझे लगा कि मेरे पति सिर्फ मेरे साथ खड़े नहीं हैं, बल्कि वे मेरे आत्मसम्मान के लिए एक दीवार बन चुके हैं। हम शहर के सबसे शांत और खूबसूरत पार्क में गए, जहाँ ठंडी हवा चल रही थी। वहाँ उन्होंने मुझे चाट खिलाई और फिर एक ऐसे आलीशान रेस्तरां में ले गए जिसके शीशे देखकर ही मुझे अंदर जाने में झिझक हो रही थी। अनुराग ने वेटर से बड़े सलीके से बात की और मुझे तसल्ली से खाना खिलाया। जब मैं कांटा-चम्मच उठाने में हिचकिचाई तो अनुराग ने मुस्कुराते हुए कहा, “कोई तुम्हें यहाँ जज नहीं कर रहा अर्चना, जैसे सहज महसूस हो वैसे खाओ।” उस दिन रेस्तरां के खाने का स्वाद मुझे जीवन भर याद रहा, क्योंकि उसमें मेरे आत्मसम्मान की खुशबू घुली थी।
शाम को जब हम घर लौटे, तो घर का माहौल किसी युद्धक्षेत्र जैसा था। सासुमाँ और विशाखा का चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था। पता चला कि होटल में भारी अव्यवस्था के कारण उन्हें अंदर प्रवेश ही नहीं मिला और वे सब भूखे-प्यासे, बेइज्जत होकर लौट आए थे।
हमें मुस्कुराते हुए अंदर आते देखकर सासुमाँ आगबबूला हो उठीं, “बड़ी महारानी बनकर घूम रही है! घर में सास-ससुर भूखे बैठे हैं और तुम दोनों ऐश कर रहे हो? हमने तुम्हारे लिए कोई खाना नहीं बनाया है, भूखे ही सो जाना आज।”
अनुराग का धैर्य अब पूरी तरह जवाब दे चुका था। वे आगे बढ़े और उन्होंने जो कहा, उसने पूरे घर की चूलें हिला दीं। उनकी आवाज में एक ऐसा रौब था जो मैंने पहले कभी नहीं सुना था।
“माँ! बहुत हो गया। आज के बाद अगर किसी ने भी अर्चना को गँवार, अनपढ़ या नौकरानी कहा, तो याद रखना कि वह अपमान मेरा होगा। यह इस घर की बड़ी बहू है, कोई दासी नहीं। अगर यह आप सबके लिए हर रोज, बिना किसी शिकायत के तीन वक्त का खाना बना सकती है, तो एक दिन अगर यह बाहर चली गई तो आपके हाथ-पैर नहीं टूटने चाहिए थे। और रही बात खाने की, तो हम दोनों बाहर से खाना खाकर आए हैं।”
विशाखा ने बीच में बोलने की कोशिश की, “भैया, लेकिन बड़ों से ऐसे बात…”
“तुम तो चुप ही रहो विशाखा!” अनुराग ने उसे कड़े शब्दों में टोका, “तुम्हारे पास डिग्रियों का घमंड हो सकता है, लेकिन संस्कारों की कमी साफ दिखती है। शिक्षा अगर इंसान को दूसरों का अपमान करना सिखाए, तो वह शिक्षा किसी काम की नहीं।”
अनुराग ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे सीधे हमारे कमरे में ले आए और अंदर से कुंडी लगा दी। उस रात उन्होंने टेबल लैंप जलाया और मेरे सामने एक सादा पन्ना और कलम रख दी।
“अर्चना, तुम्हारी बेबसी की वजह यह समाज नहीं, तुम्हारी यह चुप्पी और अशिक्षा है। इन्होंने तुम्हें अनपढ़ मानकर तुम्हारी आत्मा को कुचलने की कोशिश की है ना? अब तुम इन्हें अपने हुनर से जवाब दोगी। तुम पढ़ोगी।”
“मैं? अनुराग, मेरी उम्र निकल चुकी है… मैं तो आठवीं में फेल हो गई थी,” मैंने कांपते हुए कहा।
“उम्र सिर्फ एक संख्या है अर्चना। जब तक मैं तुम्हारे साथ हूँ, तुम्हें किसी से डरने की जरूरत नहीं है,” उन्होंने मेरे हाथ में मजबूती से पेन थमा दिया।
उस रात के बाद से हमारी एक नई जिंदगी शुरू हुई। अनुराग ने अगले ही दिन राज्य ओपन स्कूल से मेरा दसवीं का फॉर्म भरवा दिया। घर के काम का बँटवारा तो नहीं हुआ, लेकिन अनुराग ने सख्त नियम बना दिया कि दोपहर में दो घंटे और रात को तीन घंटे कोई भी मुझे किसी काम के लिए नहीं बुलाएगा। शुरुआत बहुत कठिन थी। सालों बाद हाथ में कलम पकड़ी थी, उंगलियाँ दुखने लगती थीं, अंग्रेजी के शब्द किसी पहेली की तरह लगते थे। कई बार मैं थककर रो पड़ती, लेकिन अनुराग मेरे साथ जागते। वे मुझे गणित के सवाल समझाते, सामाजिक विज्ञान की कहानियाँ सुनाते और मेरी हिम्मत बांधते।
ससुराल वालों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। कभी पढ़ने बैठती तो सासुमाँ बिजली का मेन स्विच बंद करवा देतीं, कभी विशाखा ताने मारती कि “बुढ़ापे में तोता पढ़ा रहे हैं, देखें कौन सा तीर मार लेंगी।” लेकिन उन तानों ने मेरे भीतर एक आग जला दी थी। मैंने मोमबत्ती की रोशनी में पढ़ाई की, भोर में चार बजे उठकर नोट्स याद किए।
मेरी मेहनत रंग लाई। मैंने प्रथम श्रेणी में दसवीं पास की। जब रिजल्ट आया तो घर के किसी सदस्य ने बधाई तक नहीं दी, लेकिन अनुराग पूरे मोहल्ले में मिठाई बाँटकर आए थे। उस एक सफलता ने मेरे अंदर के सोए हुए स्वाभिमान को जगा दिया। इसके बाद मैंने बारहवीं कला संकाय से उत्कृष्ट अंकों से उत्तीर्ण की। फिर कॉलेज की प्राइवेट पढ़ाई, ग्रेजुएशन और उसके बाद बी.एड.।
जब बी.एड. पूरा हुआ, तो अनुराग ने मुझे मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) की तैयारी के लिए प्रेरित किया। यह राह कांटों भरी थी। घर के काम, ताने और साथ में सिविल सेवा की कठिन परीक्षा का दबाव। लेकिन मैंने हार नहीं मानी। मैंने दिन-रात एक कर दिया। रसोई में खाना बनाते समय मैं दीवारों पर चिपकाए गए सामान्य ज्ञान के चार्ट्स दोहराती थी।
और आज, उसी सात साल की तपस्या का परिणाम इस लिफाफे में बंद था। मैंने राज्य प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में पूरे संभाग में तीसरा स्थान प्राप्त किया था और मुझे जिला शिक्षा अधिकारी का पद मिला था।
अनुराग ने मेरे आंसू पोंछे और मुझे प्यार से देखते हुए बोले, “अब बाहर चलो, पूरा परिवार आँगन में चाय पी रहा है।”
जब मैं हाथ में वह नियुक्ति पत्र लेकर कमरे से बाहर निकली, तो मेरे चेहरे पर न कोई घमंड था और न ही कोई गुस्सा, सिर्फ एक शांत गरिमा थी। आँगन में बाबूजी, सासुमाँ, निशांत और विशाखा सब बैठे थे। अनुराग ने आगे बढ़कर वह सरकारी पत्र बाबूजी की मेज पर रख दिया।
“बाबूजी, आपकी अनपढ़ और गँवार बड़ी बहू अब इस जिले की शिक्षा अधिकारी बन चुकी है। अगले सोमवार को इसका पदभार ग्रहण समारोह है।”
बाबूजी ने कांपते हाथों से चश्मा लगाकर उस पत्र को देखा। उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। सासुमाँ के हाथ से चाय का कप छूटते-छूटते बचा और विशाखा का चेहरा ऐसा सफेद पड़ गया मानो उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई हो। जिस बहू को उन्होंने जिंदगी भर नौकरानी समझा था, वह अब जिले भर के स्कूलों की व्यवस्था संभालने वाली अफसर बन चुकी थी।
बाबूजी अपनी कुर्सी से उठे, उनके चेहरे पर पश्चाताप की गहरी लकीरें थीं। उन्होंने अपने कांपते हाथ मेरे सिर पर रख दिए और भरभराई आवाज में बोले, “बहू… हमें माफ कर देना। हमने हीरे को कोयला समझकर जिंदगी भर चूल्हे की आग में झोंकने की कोशिश की। आज तुमने हमारे इस पूरे खानदान का सिर गर्व से ऊँचा कर दिया।”
सासुमाँ अपनी नजरें नहीं मिला पा रही थीं। विशाखा चुपचाप सिर झुकाए अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। मैंने झुककर बाबूजी और सासुमाँ के पैर छुए। मुझे उनसे कोई बदला नहीं लेना था, मेरी सफलता ही उनके हर ताने का सबसे बड़ा जवाब थी।
तभी कमरे से दौड़ती हुई मेरी छह साल की बेटी आन्या आई। उसने अपने नन्हे हाथों से मेरी साड़ी का पल्लू पकड़ा और बड़ी मासूमियत से पूछा, “माँ, सब लोग कहते हैं कि हर कामयाब आदमी के पीछे एक औरत का हाथ होता है, क्या यह सच है?”
मैंने प्यार से आन्या को गोद में उठाया, अनुराग की तरफ देखा जिनकी आँखों में अब भी गर्व के आँसू छलक रहे थे, और मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ बेटा, यह सच हो सकता है; लेकिन तेरी माँ आज जिस मुकाम पर खड़ी है, उसके पीछे तेरे पापा के अटूट विश्वास, त्याग और सच्चे प्रेम का हाथ है।”
मेरी बात सुनकर अनुराग ने मुस्कुराते हुए हम दोनों को अपनी बाहों में समेट लिया। आँगन में धूप खिल चुकी थी और जिंदगी की दहलीज़ पर अब केवल उजाला ही उजाला था।
क्या आपको भी लगता है कि अगर परिवार और विशेष रूप से पति का साथ मिले, तो एक साधारण और संघर्षरत महिला भी दुनिया का कोई भी मुकाम हासिल कर सकती है? अपनी राय हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखकर बताएं।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद