अपने हुए पराए  – मधु वशिष्ठ

 हेलो दीदी, सोनम दी के बारे में कुछ पता पड़ा? नहीं ,मेरे से भी काफी समय से कोई बात नहीं हुई, उसका फोन भी स्विच ऑफ ही जा रहा है। “परमात्मा करे सब ठीक हो”। सारी बहनें आपस में फोन करके सोनम दी के बारे में बातें जरूर कर रही थी, लेकिन मन सब का … Read more

उम्मीद का नया सवेरा – मधु वशिष्ठ

पापा, आप तो कह रहे थे कि प्रिया को  मम्मी जैसा अच्छा खाना बनाना आता है।  गट्टे की‌ सब्जी और साग तो वह मम्मी से भी अच्छा बनाती है।  यहां तो हालत यह है कि सवेरे की चाय अभी भी मैं ही बनाता हूं। हम तो सोच रहे थे की मां के जाने के बाद … Read more

गर्व – बिमला रावत जड़धारी

काव्य आज बहुत खुश थी। जिसका सपना मैंने देखा था, उसे सुभाष ने पूरा करने में मेरा पूरा साथ दिया।सुभाष मेरे पति को पता चला कि मुझे पेंटिंग बनाने का बहुत शौक है और मैं बहुत अच्छी पेंटिंग बनती हूॅं। मेरी इच्छा है किसी आर्ट गैलेरी में मेरी बनाई पेंटिंग की प्रदर्शनी लगे।उन्होंने मुझे कभी … Read more

*अभिमान* – तोषिका

ये कहा से रोने की आवाज़ें आ रही है? क्या तुम्हे भी सुनाई दे रही है नितिन? परेशान स्वर में गायत्री बोली। नितिन बोला “आवाज़ तो मुझे भी आ रही है, पर इतनी रात गए, अंधेरे में आवाज कहा से आ रही है पता ही नहीं चल रहा। दोनों आवाज को सुनते सुनते एक कूड़े … Read more

“बेटा-बहू तो अपने होते हैं…” – खुशबू गर्ग

सावित्री देवी का छोटा-सा घर था, लेकिन उसमें यादों और रिश्तों की गर्माहट भरी हुई थी। पति के गुजर जाने के बाद उनका सहारा सिर्फ उनके दो बच्चे थे—बेटा रोहित और बेटी पूजा। पूजा की शादी हो चुकी थी और वह अपने ससुराल में खुश थी, जबकि रोहित अपनी पत्नी नेहा के साथ माँ के … Read more

काश !हम भी पराए होते ।। – अंजना ठाकुर

किशन  मां के कमरे में आया तो देखा मां मुक्ता के सर में तेल लगा रही है ठीक वैसे ही जैसे बचपन में लगाती थी देखकर  किशन बोला मां मेरे सर में भी लगाओ ना मां , मां बोली अरे तू तो बहू से लगवा लेना अब मेरा इतना शरीर नहीं चलता वो तो मुक्ता … Read more

सुयोग्य बहू की तलाश – साधना वैष्णव

गौरव आज बहुत खुश है। खुश क्यों न हो उसे आज पहली तनख्वाह जो मिली है। वह खुशी-खुशी लगभग दौड़ता हुआ माँ के पास पहुँचा। उनको अपनी आँखें बंद करने कहा। माँ बोलीं- क्यों? मैं अभी संध्या आरती की तैयारी कर रही हूँ, मेरे पास तुम्हारे साथ खेलने के लिए समय नहीं है।         गौरव ने … Read more

घर की लक्ष्मी – मंजू ओमर

अरे उठ जा कलमुँही कबतक लेटी रहेगी, सुबह के आठ बजे रहे है चाय नाश्ता नहीं बनाएगी क्या, सर दर्द से फटा जा रहा है मेरा बिना चाय के। अरे अब उठ, इतना धीरे धीरे क्यों उठ रही है शरीर मे जान नहीं है क्या, कामचोर कहीं की। बस काम से जी चुराती रहती है। … Read more

अपमान – करुणा मलिक

 बहुत बधाई हो मंजू, नए प्यारे से घर की, बहुत सुंदर मकान बनाया है।  धन्यवाद जी, क्या करे ं …. मेरी पसंद तो थी ही अव्वल, मेरे तो बच्चों को भी कोई चीज आसानी से पसंद नहीं आती। तुम्हें पता है कुमुद, ठेकेदार ने छह- सात महीने का टाइम दिया था मकान पूरे करने का…..पर … Read more

उम्मीदों का नया सवेरा – विनीता सिंह

रामपुर गाँव में सूखे की मार ने हर चेहरे पर मायूसी लिख दी थी। धूल भरी पगडंडियों पर अब बच्चों के पैरों की चाप कम और बड़ों की चिंताओं की गूँज ज़्यादा सुनाई देती थी। माधव, जिसका पूरा जीवन इन खेतों की मिट्टी से जुड़ा था, हर सुबह फटी हुई ज़मीन को इस उम्मीद में … Read more

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