“बेटा-बहू तो अपने होते हैं…” – खुशबू गर्ग

सावित्री देवी का छोटा-सा घर था, लेकिन उसमें यादों और रिश्तों की गर्माहट भरी हुई थी। पति के गुजर जाने के बाद उनका सहारा सिर्फ उनके दो बच्चे थे—बेटा रोहित और बेटी पूजा। पूजा की शादी हो चुकी थी और वह अपने ससुराल में खुश थी, जबकि रोहित अपनी पत्नी नेहा के साथ माँ के पास ही रहता था।

शुरुआत में सब कुछ बहुत अच्छा था। नेहा नई-नई बहू बनकर आई थी और उसने घर को अपनेपन से भर दिया था। वह सावित्री देवी की हर छोटी-बड़ी बात का ध्यान रखती, उनकी पसंद का खाना बनाती और उनके साथ बैठकर बातें करती। रोहित भी ऑफिस से लौटकर माँ के पास बैठता और दिनभर की बातें साझा करता। सावित्री देवी अक्सर भावुक होकर कहतीं,

“बेटा-बहू तो अपने होते हैं, बस दिल से निभाने वाले चाहिए।”

लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, जिंदगी की रफ्तार तेज होती गई। रोहित की नौकरी में जिम्मेदारियाँ बढ़ गईं और नेहा भी अपने करियर में व्यस्त हो गई। घर में अब पहले जैसी चहल-पहल नहीं रही। जहाँ पहले हंसी गूंजती थी, अब वहाँ खामोशी रहने लगी।

सावित्री देवी यह बदलाव महसूस करती थीं, लेकिन उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। वह चुपचाप अपने कमरे में बैठ जातीं, पुराने एल्बम देखतीं और बीते दिनों की खुशियों में खो जातीं। कई बार उनका मन करता कि रोहित और नेहा से बात करें, लेकिन वह खुद को रोक लेतीं—“बच्चे व्यस्त हैं, क्यों उन्हें परेशान करूं…”

एक दिन अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई। तेज बुखार और कमजोरी के कारण वह बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थीं। उन्होंने फिर भी किसी को नहीं बुलाया। उनके मन में वही ख्याल था—“मैं ठीक हो जाऊंगी, बच्चों को परेशान करने की जरूरत नहीं।”

लेकिन नेहा को कुछ अजीब लगा। उसने देखा कि माँ आज पूरे दिन कमरे से बाहर नहीं आईं। वह तुरंत उनके कमरे में गई और उन्हें इस हालत में देखकर घबरा गई। उसने बिना देर किए रोहित को फोन किया और डॉक्टर को बुलाया।

रोहित भी सब काम छोड़कर तुरंत घर पहुँचा। उस दिन पहली बार उसे एहसास हुआ कि वह अपनी जिम्मेदारियों में इतना उलझ गया था कि माँ की हालत पर ध्यान ही नहीं दे पाया। पूरी रात रोहित और नेहा ने बारी-बारी से सावित्री देवी का ख्याल रखा।

सुबह जब सावित्री देवी की आँख खुली, तो उन्होंने देखा कि नेहा उनके सिरहाने बैठी थी और रोहित उनके लिए दवा लेकर खड़ा था। यह दृश्य देखकर उनकी आँखें भर आईं।

धीरे से उन्होंने कहा,

“मैं सोचने लगी थी कि तुम दोनों अब पहले जैसे नहीं रहे… लेकिन आज समझ आया कि बेटा-बहू तो अपने ही होते हैं… बस वक्त की कमी हो जाती है।”

नेहा ने उनका हाथ थामते हुए मुस्कुराकर कहा,

“माँ, अपने कभी दूर नहीं होते… बस जिंदगी की भागदौड़ में थोड़ा खो जाते हैं।”

उस दिन के बाद घर का माहौल बदल गया। रोहित ने तय किया कि वह चाहे कितना भी व्यस्त क्यों न हो, माँ के लिए समय जरूर निकालेगा। नेहा भी रोज उनके साथ बैठकर बातें करती, उनका ख्याल रखती और घर में फिर से वही पुरानी खुशियाँ लौट आईं।

सीख:

रिश्ते कभी कमजोर नहीं होते, बस उन्हें समय और प्यार की जरूरत होती है।

जब समझ और अपनापन साथ हो, तो हर दूरी मिट जाती है। 💛

खुशबू गर्ग 

जयपुर राजस्थान

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