रामपुर गाँव में सूखे की मार ने हर चेहरे पर मायूसी लिख दी थी। धूल भरी पगडंडियों पर अब बच्चों के पैरों की चाप कम और बड़ों की चिंताओं की गूँज ज़्यादा सुनाई देती थी। माधव, जिसका पूरा जीवन इन खेतों की मिट्टी से जुड़ा था, हर सुबह फटी हुई ज़मीन को इस उम्मीद में निहारता कि शायद बादलों का कोई टुकड़ा राह भटककर यहाँ आ जाए।
माधव का घर मिट्टी और खपरैल से बना था, जहाँ उसकी पत्नी सुमति और सात साल का बेटा आर्यन रहते थे। सुमति अक्सर रात को खाली बर्तनों को ढँकते हुए लंबी आह भरती। जब घर में दाने कम होने लगे, तो गाँव के कई परिवारों ने शहर की ओर पलायन करना शुरू कर दिया। माधव पर भी दबाव था। उसके पड़ोसियों ने कहा, “माधव, इस बंजर ज़मीन से अब कुछ नहीं निकलेगा, शहर चलकर मज़दूरी कर लो।”
लेकिन माधव का मन नहीं माना। वह अपनी मिट्टी को ‘माँ’ कहता था और उसे मरते हुए छोड़ना उसके लिए संभव नहीं था।
एक दिन माधव को पता चला कि पास के शहर में कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा एक कार्यशाला आयोजित की जा रही है। फटे हुए जूतों और जेब में चंद रुपयों के साथ वह पैदल ही निकल पड़ा। वहाँ उसने सीखा कि कैसे कम पानी में ‘ड्रिप सिंचाई’ और ‘जैविक खाद’ के जरिए बंजर ज़मीन को भी पुनर्जीवित किया जा सकता है।
लौटकर उसने सुमति से बात की। उनके पास जमा-पूँजी के नाम पर बस सुमति के कान के छोटे से झुमके बचे थे। सुमति ने बिना कुछ कहे वे झुमके माधव की हथेली पर रख दिए। उसकी आँखों में आँसू थे, पर विश्वास अटूट था।
माधव ने काम शुरू किया। गाँव वालों ने उसका मज़ाक उड़ाया। कोई कहता, “पागल हो गया है,” तो कोई कहता, “रेत में खेती कर रहा है।” पर माधव ने कान बंद कर लिए और दिन-रात एक कर दिया। उसने पथरीली ज़मीन को खोदकर पाइप बिछाए और गाय के गोबर से खाद तैयार की। दोपहर की चिलचिलाती धूप हो या रात का सन्नाटा, माधव खेतों में ही मिलता।
महीनों की मशक्कत के बाद, एक सुबह जब आर्यन दौड़ता हुआ खेत पर पहुँचा, तो उसकी चीख गूँज उठी—”बापू! देखो, छोटा सा पौधा!”
माधव भागा हुआ आया। भूरी मिट्टी को फाड़कर एक नन्हा, हरा अंकुर बाहर झाँक रहा था। वह माधव की मेहनत और सुमति के त्याग का फल था। धीरे-धीरे, पूरा खेत हरी फसलों से लहलहा उठा। माधव की तकनीक ने वह कर दिखाया जो बरसों से नहीं हुआ था। कम पानी में भी उसकी फसलें गाँव में सबसे बेहतर थीं।
फसल कटने वाले दिन, पूरा गाँव माधव के खेत पर जमा था। जो लोग मज़ाक उड़ाते थे, आज वे माधव से तकनीक सीखने आए थे। सूरज की पहली सुनहरी किरण जब खेतों पर पड़ी, तो ऐसा लगा मानो पूरी धरती सोने की तरह चमक रही हो।
माधव ने हाथ जोड़कर आसमान की ओर देखा। उसकी आँखों से खुशी के आँसू बह निकले। उसने आर्यन को कंधे पर बिठाया और मुस्कुराते हुए कहा, “याद रखना बेटा, जब तक मन में विश्वास और हाथों में मेहनत का हुनर है, तब तक कोई भी अंधेरा स्थायी नहीं होता। हर काली रात के बाद उम्मीदों का एक नया सवेरा ज़रूर आता है।”
रामपुर गाँव के लिए वह सिर्फ एक सुबह नहीं, बल्कि एक नए युग की शुरुआत थी।
विनीता सिंह