*उम्मीदों का नया सवेरा* – तोषिका

इतने साल हो गए तुम्हे जहां जेल में अपनी सजा काट ते हुए पर तुम्हारा बर्ताव देख कर तो नहीं लगता कि तुमने कभी किसी का खून किया होगा। आरक्षी ने बड़े सामान्य स्वर में पूछा। उधर सेल में बैठा साहिल बोला “सर अब मैं आपको क्या बताऊं, जब किसी की जिंदगी में *उम्मीदों का … Read more

अभी मुझे और जीना है – शुभ्रा बैनर्जी

पिछले छह महीने से लगातार बीमार रहने की वजह से,मां बहुत कमजोर हो गई थी।पिछले बत्तीस सालों से साथ में रह रही थी निशा।मां का जीवन के प्रति मोह छूट रहा था धीरे-धीरे।अपने जीते जी पति, इकलौते बेटे और दामाद को खोया था उन्होंने।अब उनकी बड़ी बेटी , जो दो साल पहले विधवा हुई थी … Read more

उम्मीदों का त्याग ।। – अंजना ठाकुर

नमिता ससुराल में कदम रखते ही एक पल के लिए ठिठक गई बिल्कुल साधारण घर लग रहा कमरे में चार कुर्सी और एक टेबल पड़ी थी साइड में एक पलंग रखा था बहु का स्वागत करने के बाद उसे अंदर कमरे में ले गए नमीता ने देखा वहां भी एक लोहे की अलमारी और एक … Read more

“मैं हूं ना ” – कमलेश आहूजा

“पापा,ये माथे पे चोट आपको कैसे लगी?”प्रिशा ने परेशान होकर बोला। “कुछ नहीं बेटा,बस ऐसे ही वो रोहित की दुकान पर समान लेने गया था तो मुड़ते समय दीवार से टकरा गया था।” रमेश जी ने बात बनाते हुए बोला। “पापा आप झूठ बोल रहें हैं,दीवार के टकराने से इतना गहरा जख्म नहीं होता।सच बताइए … Read more

वही अपनी है – शुभ्रा बैनर्जी 

जया जब से शादी करके ससुराल गई थी,ससुर को हमेशा शांत और अनुशासित ही देखा था।नौकरी से रिटायर होने के बाद भी, हर सुबह ठीक नौ बजे प्रेस किए कपड़े पहने घूमने निकल जाते थे। अपने पुराने दोस्तों के साथ मिलकर चाय पीना उनकी दिनचर्या में शामिल था।जया को जब भी कुछ खाने का मन … Read more

पिता का स्वाभिमान – बिमला रावत जड़धारी

पापा आप क्यों भाभी को परेशान कर रहे हो? पहले तो आप इतनी तारीफ करते थे। हमारी बहू तो बहुत अच्छी है, सर्व गुण संपन्न है, हमारा बहुत घ्यान रखती है। घर में कोई आता है तो उनकी बहुत आवभगत करती है। किसी को कुछ भी बोलने का मौका नहीं देती। अब ऐसा क्या हो … Read more

पिता का स्वाभिमान – डाॅ संजु झा

कुछ संतानें पिता के स्वाभिमान को  अपने कर्मों से आसमान की ऊॅॅंचाईयों तक पहुॅंचा देखतीं हैं और कुछ संतानें ऐसी भी होती  हैं, जिनके कारण पिता का स्वाभिमान खंड-खंड होकर बिखर जाता है। पौराणिक कथा का  अष्टावक्र ऐसा ही पात्र हैं, आरंभ में जिसके आचरण के कारण उसके पिता कहोड़ ऋषि के स्वाभिमान को ठेस … Read more

पिता का स्वाभिमान – तोषिका

अपने *पिता का स्वाभिमान* हमेशा रखना बेटा। तुम्हारे पिताजी बोलेंगे कुछ नहीं, पर तुम उनका ध्यान रखना। अपने बेटे केशव के सर पर हाथ फेरती हुई हीना बोली। अगले दिन जब वो सुबह सुबह उठा और हॉस्पिटल जाने की तैयारी कर ही रहा था कि उसके पिताजी माधव का उसको कॉल आया। उस कॉल को … Read more

हाथ जुड़े पर बराबरी के लिए – लतिका श्रीवास्तव

यजमान को बुलाइए कन्यादान की रस्म करनी है पंडित त्रिभुवन प्रसाद की आवाज गूंज उठी और सबकी निगाहें वधू शिवांगी के पिता दिनकर जी को ढूंढने लगीं। विशाल शानदार शामियाना लंबी लंबी कनातें दूधिया रोशनी में सतरंगी आभा बिखेर रहीं थीं। पीले गुलाबी लाल सुर्ख गुलाब से लेकर बसंती गेंदे शुभ्र सेवंती की लटकने गुच्छों … Read more

स्वाभिमान – खुशी

राम कुमार एक दुकान पर मुनीम की नौकरी करते थे। उनका हिसाब इतना अचूक होता था कि सेठ कैलाश चंद्र कहते कि राम तेरे जैसा हिसाब जमाने वाला कोई नहीं कभी एक पैसे का भी हेर फेर नहीं।राम कुमार की इस ईमानदारी के कारण कैलाश चंद्र तो उन्हें बहुत मानते थे और राम कुमार के … Read more

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