परिवार – करुणा मालिक 

शांति काकी……जरा देखना, बाहर गुड़िया को….बकरियों और भेड़ों की आवाज आ रही है, मेरी मीटिंग चल रही है।

सौम्या ने अपने कंप्यूटर को म्यूट करके अपनी घरेलू सहायिका शांति को आवाज लगाते हुए कहा क्योंकि वह जानती थी कि उसकी दो साल की बेटी बकरियों की आवाज सुनकर बाहर की तरफ भागती है और अगर गलती से दरवाजा खुला रह जाए तो उनके बीच पहुँचने में उसे देर नहीं लगाती।

शांति काकी की तरफ से कोई उत्तर न पाकर सौम्या वीडियो बंद करके जल्दी से उठी और बाहर का दरवाजा चेक किया, इसका मतलब गुड़िया अंदर है…..बस तसल्ली होते ही यह सोचकर कि काकी गुड़िया के साथ व्यस्त होंगी, सौम्या अपने कंप्यूटर पर जा बैठी।

सौम्या डेढ़ साल पहले ही शांति काकी को अपने साथ गाँव से लेकर आई थी। वह वर्क फ्रोम होम करती थी, महीने में एक दिन उसे अपने आफिस जाना पड़ता था। सौम्या पति के साथ पंचकुला में रहती थी। गुड़िया के होने से पहले नोएडा में रहती थी पर मेटरनिटी लीव के बाद उसने वर्क फ्रोम होम को प्राथमिकता दी थी। गुड़िया के होने के बाद छह महीने सास उसके साथ रही फिर सौम्या ने अपनी माँ से शांति काकी को उसके पास भेजने का अनुरोध किया…. शांति काकी को सौम्या की माँ अपने मायके से अपने साथ लेकर आई थी। 

शांति काकी सौम्या की नानी की पड़ोसन थी, अच्छे परिवार से थी पर काका की मृत्यु के बाद दोनों लड़कों ने उनका जीना हराम कर दिया था, यहाँ तक की वे अपनी रोटी अलग बनाती पर बहुओं को यह भी सहन नहीं हुआ और एक दिन उन्होंने सास को  दिन ढले घर से निकाल दिया। उस समय काकी  ने नानी के पास आकर रात गुजारने की प्रार्थना की…… संयोग से सौम्या की माँ उस दिन उनसे मिलने मायके गई थी , उस समय सभी को लगा कि जब सुबह काकी के बेटों को उनके घर से निकाले जाने की खबर मिलेगी तो वे शायद अपनी माँ को ढूँढते हुए नानी के घर आएँगे और अपनी गलती स्वीकार करके माँ को मनाकर ले आएँगे। 

अगला पूरा दिन बीत गया पर काकी की खोज-खबर तो क्या, उनके घर में न होने की बात भी नहीं की गई। शांति काकी तो अपने मायके जाना चाहती थी पर सौम्या की माँ के जोर देने पर वह कुछ दिनों के लिए उनके साथ आ गई थी। फिर गुड़िया के होने के बाद सौम्या ने उन्हें अपने पास बुला लिया क्योंकि सौम्या चाहती थी कि सास या माँ बेटी को पालने पोसने में उसकी मदद करें….. ऐसे में शांति काकी के नाम का सुझाव मिलने पर सौम्या की सारी समस्या का समाधान हो गया। 

सौम्या के पास आ जाने पर शांति काकी का जीवन ही बदल गया। वे कब सौम्या और नकुल की आंटी से काकी बनकर घर की एक अहम सदस्या बन गई, उन्हें पता ही नहीं चला । शांति काकी ने गुड़िया की दादी और नानी दोनों का स्थान ले लिया था। 

पंद्रह मिनट के बाद मीटिंग खत्म होने के बाद सौम्या उठी और बोली–

काकी, कहाँ बिजी हो आज दोनों नानी- धेवती….. घर में एक घंटे से बिलकुल सन्नाटा छाया है ….. 

बोलते-बोलते सौम्या ने बेडरूम में झाँका तो गुड़िया बिस्तर पर सोई हुई थी…. उसके बाद रसोई में झाँकते ही सौम्या जोर से चीखी…… 

का…. की….. का…. की…. 

शांति काकी फर्श पर गिरी हुई थी, सौम्या ने उन्हें सीधा किया और जल्दी से एंबुलेंस का नंबर मिलाया। रसोई के पीछे का दरवाजा खोलकर पड़ोस में आवाज लगाई। इतना हो हल्ला सुनकर गुड़िया भी जागकर रोने लगी थी, उसने गुड़िया को बड़ी मुश्किल से पड़ोसन के हवाले किया और काकी को लेकर अस्पताल पहुँची….. इसी बीच नकुल भी अस्पताल में पहुँच गए थे। डाक्टरो ं ने बताया कि काकी को ब्रेन हेमरेज हो गया है और वे कोमा में हैं। 

उसी दिन सौम्या ने अपनी माँ और सास को इस हादसे के बारे में बताया। सौम्या की माँ तो अगले दिन ही पहुँच गई पर उसके सास-ससुर तीन दिन के बाद पहुँचे क्योंकि ससुर का रूटिन मेडिकल चेकअप का अपाइंटमेंट था। 

शांति काकी अस्पताल में थी और कोमा से बाहर नहीं आई थी। माता-पिता के आने से नकुल और सौम्या को बहुत बड़ी राहत मिल गई थी। काकी को अस्पताल में भरती हुए बीस दिन हो गए थे पर आशा की कोई किरण नजर नहीं आ रही थी। 

एक दिन नकुल की माँ ने कहा —

अब शांति जी के घर वालो ं को इनके बारे में सूचना भेज देनी चाहिए….. आखिर बच्चे  भी कब तक छुट्टियाँ लेकर एडजस्ट करेंगे। 

देख लीजिए, समधन जी….. वैसे उनके लिए तो शांति भाभी मर चुकी हैं….. पर आपका कहना भी सही है कि हम भी कब तक रहेंगे और बच्चे भी कैसे एडजस्ट करेंगे….. ऐसा करती हूँ कि मैं सौम्या के पापा से बोलती हूँ….. वे एक बार गाँव जाकर सूचित तो कर आएँगे पर शांति भाभी के बच्चों से उम्मीद कुछ नहीं है, उल्टा वे हमें परेशानी में ना डाल दें। 

मम्मी जी…. मैं और सौम्या शांति काकी को कहीं नहीं भेजेंगे…. अगर हमारे परिवार के किसी सदस्य के साथ ऐसा हादसा हो जाता तो क्या हम उन्हें इस तरह इधरउधर भेजने के बारे में बात करते….. अब हम ही काकी का परिवार हैं। 

हाँ मम्मी…. मैंने और नकुल ने उन्हें माँ ही माना है और उनकी देखभाल करना हमारी जिम्मेदारी है। हमने डाॅक्टर से बात कर ली है, उनका कहना है कि जब तक साँसे है, घर में सेवा करना ही बढ़िया विकल्प है इसलिए काकी की देखभाल के लिए चौबीस घंटे के लिए नर्स का इंतजाम कर रहे हैं….. बाकी मैं तो घर में होती ही हूँ, आप चिंता मत कीजिये  जब सब रूटीन में आ जाएगा तो कोई मुश्किल नहीं होगी। 

सौम्या की माँ हैरान होकर सब सुन रही थी, उन्होंने तो सोचा भी नहीं था कि उनका दामाद इतनी पोजिटिवली हर बात का समाधान कर लेगा…… अचानक उन्होंने अपनी समधन के हाथों को अपने हाथों में लेकर कहा —

समधन जी, आपने अपने बेटे की बहुत अच्छी परवरिश की है….. सचमुच हीरा है आपका बेटा….. 

नहीं मधु जी, सौम्या को भी आपने बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं….. जो अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारी को इतनी गंभीरता से निभाना जानती है। चलो…. अब हम ऐसा करते हैं कि हम अपने बच्चों को जितना सहयोग दे सकते हैं, उतना देंगे। मैं और नकुल के पापा यहाँ रूकते है ं कुछ महीने….. उसके बाद आप आ जाना, इसी तरह समय निकल जाएगा। 

दो-तीन बाद शांति काकी को घर में शिफ्ट कर दिया गया और नर्स ने भी अपनी ड्यूटी संभाल ली। कंपनी के माध्यम से नर्स का इंतजाम हुआ था इसलिए दिन के लिए अलग और रात के लिए अलग नर्स आती थी। 

बारी-बारी से सौम्या की माँ और सास आती रहती थी इसलिए उसे कभी कोई तकलीफ नहीं हुई। करीब दस- ग्यारह महीने के बाद एक दिन शांति काकी अपने परिवार को अलविदा कह कर इस दुनिया से चली गई।

करुणा मालिक 

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