दृष्टिकोण का दर्पण

मनोरमा देवी ने कांपते हाथों से पल्लवी का हाथ पकड़ लिया और रुंधे हुए गले से बोलीं, “डॉक्टर को नहीं, मुझे अपने भगवान से माफी मांगनी है। मैंने कभी तुझे बेटी नहीं समझा, हमेशा तुझमें बुराई ही ढूंढी। लोग सही कहते हैं, जब आंखों पर गलतफहमी की पट्टी बंधी हो, तो हीरा भी पत्थर नजर … Read more

विश्वास की टूटी डोर

“मैं अब इस बारे में एक शब्द भी नहीं सुनना चाहता, मां! बस बहुत हो चुका। जिस इंसान ने मेरे विश्वास का कत्ल कर दिया हो, उसके साथ मेरा कोई नाता नहीं रह सकता,” अनिरुद्ध की आवाज में इतनी कड़वाहट थी कि हवा भी भारी लगने लगी। पास ही बैठी कल्याणी देवी ने अपनी कांपती … Read more

धूप की छांव

 उन्होंने मेरी पीठ पर हाथ फेरते हुए आगे कहा, “जा, सबसे पहले उन लोगों का कर्ज चुका और उनका हिसाब साफ कर। अपनी आत्मा पर किसी का कर्ज मत रहने देना। और याद रख, यह पैसा मैंने तुझे दान नहीं दिया है। यह मेरा तुझ पर किया गया निवेश है। मुझे ब्याज में पैसा नहीं … Read more

फ़ासलों के पार एक मां की पुकार

 गरिमा को इस चौखट को पार किए लगभग ढाई साल बीत चुके थे। इन ढाई सालों में उसने घर के हर कोने को अपने प्यार और सलीके से सजाया था। परिवार छोटा पर भरा-पूरा था—ससुर हरीश जी, सास कल्याणी जी, ननद तान्या और गरिमा के पति निशांत। ससुराल में गरिमा को कभी यह एहसास ही … Read more

माटी की पुकार

“सुमित,” प्रशांत ने भर्राए गले से कहा, “अगर उस दिन हम बाबूजी की बात न मानते, अगर हम अपनी सहूलियतों और दलीलों के पीछे छुपकर उन्हें गाँव न ले जाते, तो आज हम जीवन भर उस अपराधबोध की आग में जलते रहते। बाबूजी अपनी मौत से नहीं हारे, वे तो अपनी जिंदगी को उसकी पूरी … Read more

घूंघट की मर्यादा

सच ही तो है, किसी भी कुल की असली मर्यादा और इज्जत बहू को चारदीवारी और भारी पर्दों में कैद करने से नहीं बचती। मर्यादा तब बचती है जब बहू को पराए घर की अमानत समझने के बजाय उसे अपनी कोख से जन्मी बेटी जितना स्नेह और सम्मान दिया जाए। जब किसी बहू को ससुराल … Read more

स्वाभिमान की दहलीज

 “दामाद जी, हमारी बेटी हमारे जिगर का टुकड़ा है। कभी कोई भूल हो जाए तो समझा लीजिएगा, पर इसके मान-सम्मान पर आंच मत आने दीजिएगा।” उस वक्त आलोक ने मुस्कुराते हुए हामी भरी थी, लेकिन वक्त के साथ वे वादे, वे कसमें जाने कहां हवा में बिखर गए। वंदना ने कभी सुख-सुविधाओं की मांग नहीं … Read more

ममता का कर्ज

वंदना का मन एक पल के लिए सिहर उठा, लेकिन माहौल की आपाधापी ऐसी थी कि वह आलोक की बात पर ज्यादा सोच नहीं सकी। शगुन की थालियां सजीं, बारात की अगवानी हुई, जयमाला के फूल बरसे और रात भर वेदी के सामने मंत्रोच्चार गूंजते रहे। वंदना ने पूरी निष्ठा से कन्यादान से लेकर कलेवा … Read more

इंतज़ार की राख में दहकती प्रीत

 कल्याणी ने आंसुओं के बीच मुस्कुराते हुए समरवीर का चेहरा अपने हाथों में उठाया, “तो फिर यह त्याग कहां हुआ समर? यह तो हमारी उस मोहब्बत की जीत है जो जिस्म और दुनियावी रिश्तों से परे थी। हमने एक-दूसरे को कोई वचन नहीं दिया था, अग्नि के फेरे नहीं लिए थे, फिर भी पैंतीस साल … Read more

संस्कारों की छाँव

 मयंक ने आगे बढ़कर अपनी माँ के आँसू पोंछे और बहुत ही कोमल स्वर में कहा, “माँ, जब बाबूजी अस्पताल में थे, तो वे अक्सर मुझसे कहते थे कि ‘मयंक, तुम्हारी माँ को सीढ़ियाँ चढ़ने में घुटनों में बहुत दर्द होता है। जब मैं ठीक होकर घर लौटूंगा, तो हम नीचे बगीचे वाली ज़मीन पर … Read more

error: Content is protected !!