आंसुओं की छांव

 मेरे मन में उस समय चाचा और चाची के प्रति नफरत का एक ऐसा ज्वालामुखी धधक उठा था कि मैं रात को सोते हुए भी कांप उठती थी। सपने में भी अगर चाची का भयानक, तानों से भरा चेहरा नजर आता, तो मैं चीखकर उठ बैठती थी। जिस इंसान ने मेरी मां को बेबसी की … Read more

संस्कारों की अनमोल धरोहर

मगर कौशल्या जी का दिल पिघलने का नाम नहीं ले रहा था। जब भी कोई बात होती, वे ताना मारने से नहीं चूकतीं, “अरे बहू, तुम्हारे मायके में तो शायद साबुन भी गिनकर इस्तेमाल होता होगा, यहाँ थोड़ा सलीके से रहा करो। हमारे बड़े घरों के कायदे-कानून अलग होते हैं।” ऐसे कड़वे तीर रोज सृष्टि … Read more

दिल के रिश्ते

  “बाबूजी, आप हमसे नाराज हो लीजिए, हमें डांट लीजिए, लेकिन भगवान के लिए अब अपनी यह जिद छोड़ दीजिए। अगर कल रात माँ को कुछ हो जाता, तो हम जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाते। हमारा यह सारा पैसा, यह पद, यह प्रतिष्ठा किस काम की, अगर हम अपने माँ-बाप के काम ही … Read more

रोशनी की तलाश

कबीर ने सोहम को ऊपर से नीचे तक देखा। सोहम के पास न तो कोई खिलौना था, न ही कोई महँगे कपड़े। कबीर के मन में एक गहरा सवाल कौंधा। वह खुद को रोक नहीं पाया और संकोच करते हुए पूछ बैठा, “सोहम… तुम्हें दुख नहीं होता कि तुम इस दुनिया को नहीं देख सकते? … Read more

देवी का सच्चा दरबार

 वंदना ने झुककर एक-एक बच्ची के नन्हे-मुन्ने पाँव पीतल की परात में रखे, अपने हाथों से गंगाजल से उनके चरण धोए, उन पर महावर और रोली का लेप लगाया और झुककर उनके पाँव छुए। उन बच्चियों के चेहरों पर जो निश्छल, पवित्र और बेदाग आनंद था, वह किसी भी सांसारिक वैभव से परे था। बच्चियों … Read more

खून का मोल

फ्लैट की बालकनी में टहलते हुए सिद्धांत की नजर बार-बार कमरे के भीतर जाती, जहां प्रिया पलंग पर सिरहाने के सहारे बैठी गहरी-गहरी सांसें ले रही थी। डॉक्टर ने साफ कह दिया था कि नौवां महीना लग चुका है और किसी भी दिन खुशखबरी आ सकती है। सिद्धांत के चेहरे पर खुशी की जगह बेचैनी … Read more

जीवन संध्या की सुनहरी धूप

 “लेकिन बेटा, असली अग्निपरीक्षा तो तब शुरू हुई जब मेरे ससुर जी का अचानक निधन हो गया,” आंटी की आवाज थोड़ी भारी हो गई। “ससुर जी के जाने के बाद मेरी सास बिल्कुल अकेली हो गईं। वे स्वभाव से बेहद अधिकारवादी, तेज-तर्रार और दबंग महिला थीं। सत्यप्रकाश अपने भाइयों में सबसे सीधे और अपनी माँ … Read more

चक्रव्यूह से मुक्ति की भोर

विवाह को अभी मुश्किल से चालीस दिन ही हुए थे कि एक दोपहर वर्तिका ने अपने सारे कीमती जेवर और कपड़े सूटकेस में भरे और मुख्य द्वार की ओर बढ़ चली। कौशल्या जी ने घबराकर पूछा, “अरे बहू, यह क्या? अचानक कहाँ की तैयारी है?” वर्तिका ने मुड़कर देखे बिना रूखेपन से कहा, “बाजार तक … Read more

पुण्य की पूँजी

यशोदा के भीतर एक ऐसा आत्मसम्मान था जो कभी झुकना नहीं जानता था। गाँव में अगर कोई उन पर दया दिखाता या तरस खाकर यूँ ही बिना कुछ लिए पैसे देने की कोशिश करता, तो यशोदा का चेहरा सख्त हो जाता था। वे तुरंत कहतीं, “बेटा, जब तक विधाता ने इन हाथों में जान दी … Read more

मातृत्व की अधूरी प्यास

तीन होनहार बेटों और भरे-पूरे संसार के बीच जब एक माँ ने अचानक अनाथालय से नन्हीं जान को गोद लेने की ज़िद ठानी, तो पूरा परिवार स्तब्ध रह गया; पर उसके पीछे की जो वजह सामने आई, उसने हर किसी की आँखें नम कर दीं। शाम की हल्की ढलती धूप जब विशाल बैठक के बड़े … Read more

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