सासू मां की लाल डायरी

  घर के मुख्य द्वार पर बंधे आम के पत्तों के तोरण और आंगन में बिखरे रंगोली के रंग नई नवेली दुल्हन के आगमन की गवाही दे रहे थे। दुल्हन बनकर आई थी अनन्या। रूप-रंग और संस्कारों में अनन्या जितनी परिपक्व थी, रसोई के काम-काज में उतनी ही कच्ची। पढ़ाई-लिखाई में हमेशा अव्वल रहने वाली अनन्या … Read more

मैली चादर

 मंगल गीतों के बीच लाल रेशमी जोड़े में सजी तन्वी की विदाई का वक्त करीब आ चुका था। यूँ तो तन्वी मेरी सगी बेटी थी, मेरी कोख से जन्मी थी, लेकिन आज मंडप की वेदी पर खड़े होकर वर-वधू का हाथ एक-दूसरे के हाथ में सौंपने और कन्यादान का सबसे बड़ा पुण्य कमाने का सौभाग्य … Read more

अपनों के आने की चमक

  कल्याणी जी बैठी हुई पूजा की थाली सजा रही थीं। उनकी आँखों में अपनों के आने की चमक थी। कुछ ही देर में मुख्य दरवाज़े पर ऑटो आकर रुका और उनकी छोटी बेटी नीलिमा अपने दोनों बच्चों के साथ उतरती दिखाई दी। “अरे आ गई नीलिमा! कितनी देर कर दी तूने बेटा, सुबह से आँखें … Read more

हुनर की उड़ान

 दोपहर का वक्त था, डाकिया दरवाजे पर एक लाल रंग का लिफाफा दे गया। मैंने दौड़कर लिफाफा उठाया और खोलकर देखा तो खुशी से उछल पड़ा। मैंने जोर से चिल्लाते हुए मां को आवाज दी, “मां, जल्दी आओ! सुरेश भैया की शादी का कार्ड आ गया है।” मां रसोई से हाथ पोंछते हुए बाहर आईं … Read more

रिश्तों की धूप

 उस रात मीरा जब सोने के लिए लेटी, तो उसका मन बहुत हल्का था। वह सोच रही थी कि हमारे समाज में सास-बहू के रिश्ते को हमेशा एक कलंक और नफरत के चश्मे से देखा जाता है। टीवी सीरियलों और समाज की बातों ने यह धारणा बना दी है कि एक सास कभी मां नहीं … Read more

पराए आँगन की छाँव

 अनन्या ने उनके दोनों पैर पकड़ लिए और सिसकते हुए बोली, “दर्द हाथ में नहीं माँ, मेरे दिल में है। मुझे माफ कर दीजिए माँ! मैं इस घर में बहू बनकर नहीं, एक दीवार बनकर आई थी। मेरे मन में आपको लेकर बहुत मैल था, मैं तो इस भरे-पूरे घर को तोड़ने का इरादा लेकर … Read more

रेत पर लिखी लकीरें

 अवनि की आंखों के कोरों से एक बूंद आंसू ढुलक कर गाल पर आ गिरा, लेकिन वह आंसू किसी दुख या पछतावे का नहीं था, बल्कि मुक्ति और असीम शांति का था। अवनि ने भी हल्के से मुस्कुराकर सिर हिलाया और तन्मय का हाथ और अधिक मजबूती से थाम लिया। उस रात घर लौटते समय … Read more

जीत का भरोसा

 देवेन के इन शब्दों ने मनोरमा के दिल पर एक जोरदार प्रहार किया। उसकी आंखों के सामने अपनी ही संकीर्णता का आईना आ गया था। उसे समझ आया कि जिसे वह दौलत समझ रही थी, वह तो सिर्फ कागजों की चमक थी; असली इंसानियत और खानदानी संस्कार तो इस लड़के के भीतर थे, जो इतनी … Read more

मर्यादा की चौखट

 “माफ़ कर दे मुझे बेटा…” ओंकारनाथ जी की आवाज़ भर्रा गई। “मेरा अहंकार बहुत बड़ा था, लेकिन तेरे प्यार और मेरी बेटी के संस्कारों ने आज मुझे हरा दिया। और सच कहूँ, तो इस हार में मुझे ज़िंदगी की सबसे बड़ी जीत महसूस हो रही है। जिस लड़के ने मेरी बेटी के सम्मान के लिए … Read more

पराया, जो अपना सा लगे – मंजू ओमर

बाबूजी थोड़ा सा और पी लीजिए दो चम्मच कुछ खाएगें पियेंगे नहीं तो कैसे ठीक होंगे ।मनुहार और प्यार से अनंत राम जी को राधा सूप पिला रही थी। करीब 3 महीने से अनंत राम जी बीमार चल रहे थे और बिस्तर पर थे । राधा ही उनकी देखभाल करती थी । उनके चार बेटे … Read more

error: Content is protected !!