कशमकश – प्रतिमा श्रीवास्तव

लड़कियों की उम्र गुजर जाती है दो घरों को आपस में बांधने की लेकिन सच कहूं तो वही घर हमेशा की तरह इतिहास दोहराते हुए प्रश्न पूछ ही बैठता है कि आखिर कौन से घर को वो अपना कहें? एक मायका जहां के आंगन के हर कोनों में उसकी मौजूदगी दर्ज है,दूसरा ससुराल जहां वो अनगिनत ख्वाबों को पंख लगा कर कदम रखती हैं।

उम्र का कोई भी पड़ाव क्यों ना हो दोनों के मोह-माया से खुद को अलग नहीं कर पातीं हैं। शिखा भी आम भारतीय लड़कियों में से एक थी।उसको भी सुबह से शाम तक अपने अस्तित्व के लिए जूझते देखा था। गर्मी की छुट्टियां आई तो बच्चे जिद्द करने लगे की नानी के घर चलना है। ‘नानी का घर ‘ अब मामा मामी का घर हो चुका था। शिखा को खास मन नहीं था पर भइया ने कहा ” आजाओ शिखा इसी बहाने हम सब मिलकर रहेंगे और मां – पापा के जाने के बाद हम भाई बहन ही तो परिवार हैं ना।”

मां – पापा का घर? शिखा सोचने लगी कि कैसे उस घर से उसका अस्तित्व ही नहीं रहा। अगर भइया कहते कि ” ये तुम्हारा घर भी तो है,तो शायद और भी अच्छा लगता।”

वो दिन भी आया और बच्चों के साथ वो मायके पहुंच गई। भाभी भैया ने कोई कसर नहीं छोड़ी सबका ध्यान रखने में लेकिन कहीं ना कहीं उसे घर कम मेहमान सा महसूस हो रहा था। शायद दुनिया का दस्तूर ही यही है कि लड़कियों को अपना घर छोड़ कर दूसरे घर को घर बनाना पड़ता है।सात फेरे सात वचनों में बंधी एक लड़की जब मायके की दहलीज पीछे छोड़ कर अपने ससुराल में कदम रखती है तो उसी दिन से वो पराई हो जाती है।

सभी खाना कर बैठे तो बच्चों ने कैरम बोर्ड निकाल लिया। शिखा के चेहरे पर चमक आ गई कि वो कितने वर्षों के बाद खेलेगी।” भइया याद है ना आप कैसे उल्लू बना कर क्वीन डालते थे और हम सब हार जाते थे ” । शरद के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई।” चल शिखा आज फिर से एक – एक गेम खेलते हैं और हां ये बिल्कुल नहीं सोचना की तू सयानी हो गई है,हार का मुंह तो आज भी देखना होगा तुझे” शरद और शिखा बच्चों से लड़ रहे थे और उनके बच्चे सौरभ और संजना देख कर हंस रहे थे। “मां को कभी ऐसे देखा नहीं? कितनी खुश हैं ना सौरभ? संजना ने भाई से कहा।  ” होंगी क्यों नहीं ये मां का घर जो है। यहां मां ने अपना बचपन गुजारा है।” ”  सचमुच सौरभ अपना घर छोड़कर जाना मां के लिए कितना कठिन होगा ना? “संजना थोड़ी भावुक सी हो गई थी । कहीं ना कहीं वो उस पीड़ा को महसूस कर रही थी।

” मां आपको बहुत याद आती होगी ना अपने घर की?” संजना के सवाल का जबाब भतीजी माला ने देते हुए कहा कि ” अरे बुआ का घर तो अब दूसरा हो गया है ना ये तो हमारा घर है ना?” उसके इस सवाल ने जैसे माहौल को ही बदल दिया। भाभी कुछ नहीं बोली पर भइया ने डांटते हुए कहा कि,” ये घर जैसे हम सबका है वैसे बुआ का भी है।”

शिखा की आंखें नम हो गई, उसे लगा की वो कितनी पराई हो गई की बच्चों को भी लगने लगा की ये मेरा घर नहीं है। उसने अपनी भावनाओं को छिपाते हुए माला को पास बुलाया और कहा कि,” बेटा तुम तो बड़ी समझदार हो तो जैसे ये घर मेरा नहीं है तो तुम्हारा भी नहीं है।” माला एकदम चौंक गई बोली,” बुआ ये क्या कह रहीं हैं? मैं यहीं पैदा हुई हूं,मेरा बचपन यहीं बीत रहा है तो ये घर तो मेरा ही हुआ ना?” माला!” जैसे तुम्हारा बचपन बीत रहा है वैसे ही मैं भी यहीं पली बढ़ी हूं। तुम भी तैयार हो जाओ भविष्य में ये सवाल तुमसे भी कोई पूछेगा।” आज मैं जहां हूं कल तुम होगी। हमेशा याद रखना इस बात को जिस तरह तुम्हारा लगाव इस घर से है मेरा भी वैसे ही है। लड़कियों को माता पिता के घर को छोड़कर जाना ही होता है लेकिन इसका मतलब ये नहीं की ये घर उनका नहीं है।”

माला की आंखों में आसूं आ गया और बुआ से लिपट कर बोली मुझे माफ कर देना बुआ। मैं तो सोच कर ही घबरा गई की कल को कोई मुझसे ऐसा कहेगा तो मुझे कैसा लगेगा?”

बड़ी भाभी ने डांटते हुए कहा कि,” तुम्हारे दिमाग में ये बात कैसे आई? ये हमारा घर है। पापा और बुआ की यादों की धरोहर है और तुम्हारे बचपन का आसियान है बेटा।”

शिखा को लगने लगा था कि मायके, ससुराल के बीच की खींचतानी में एक सिरा हमेशा ढीला ही रहता है लेकिन भइया – भाभी ने कभी एहसास नहीं होने दिया की ये घर पराया हो गया है। मां – पापा ने बहुत अच्छी तरह से घर परिवार में संस्कार दिए थे,भले ही आज उनकी कमी बहुत खलती है लेकिन आज लगा की ये घर भइया भाभी के साथ – साथ मेरा भी है।इसकी पहचान जरुर मामा मामी के घर में परिवर्तित हो गई हो और ये घर अब मेरे बच्चों के नाना – नानी का घर कहलाता हो फिर भी छत से लेकर आंगन तक में कहीं ना कहीं मै अपने बचपन को तलाशती  हूं और फिर वो मुस्कुरा देती है।

सचमुच ये सवाल आम है औरत के लिए। कहीं ना कहीं अधूरेपन का अहसास और अपनों के बीच में पराया सा व्यवहार तिल – तिल मारता है लेकिन फिर भी बड़ी ईमानदारी से वो दोनों सिरों को पकड़ कर उम्र के हर पड़ाव से गुजरती है। उम्र कोई भी हो उसका मोह माया भंग नहीं होता है और वो खुशी – खुशी सारी जिम्मेदारियां निभाया करती है। माला का मासूमियत से पूछे गए एक सवाल ने उसे झकझोरा जरूर था लेकिन भाभी के जबाब ने धूल पड़ी परतों को धीरे से झाड़ दिया था।अब उसके मन की में चल रही’ कशमकश’ कम हो गई थी और वो दिल खोलकर अपनी छुट्टी का आनंद उठा रही थी अपने घर में।

                                    प्रतिमा श्रीवास्तव

                                     नोएडा

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