बिस्तर से लग चुकीं थीं मां।छाती में कफ बैठ गया था।खांसी ठीक होने का नाम ही नहीं ले रही थी।सुधा ने हर जतन किए, पर स्वास्थ्य में सुधार हो ही नहीं रहा था। होमियोपैथी की दवा भी खिलाई, जो कि उन्हें कभी पसंद नहीं थी। अस्पताल में भर्ती करना पड़ेगा, ऐसा डॉक्टर ने बोला।सुधा हर दिन समझाती”मां,
नहाना मत।कपड़े बदल लिया करो।बदन पोंछ लिया करो।बाल गीले करने से ठंड लग जाती है। गर्म पानी भी नहीं पीती तुम।अब तुम्हें भर्ती ही करना पड़ेगा, अस्पताल में।”
सफाई पसंद और नियम मानने वाली अठासी साल की सास को समझाना बड़ी टेढ़ी खीर थी।
शांत होकर कहतीं”थोड़ा गुनगुना पानी देना,ज्यादा गर्म पानी गले से नहीं उतरता।क्या बार-बार अस्पताल में भर्ती होने की बात करती हो बहू।मैं नहीं जाने वाली।अब इस उम्र में खुराक तो कम हो ही जाती है।
बुढ़ापे में खांसी होना कोई अजूबा थोड़े ही है।इतना तो जानती हूं कि टी बी नहीं है।ठंड कम होगी ,तो अपने आप ठीक हो जाएगी खांसी देखना।तुम इतनी चिंता मत किया करो।”
मां तो यह बोलकर चुप हो जातीं,पर सुधा को हमेशा डर लगा रहता।ज्यादा एंटीबायोटिक खाने से उन्हें तकलीफ हो जाती है। इंसुलिन का इंजेक्शन लेकर,यदि ठीक से दो रोटी भी नहीं खाई तो शुगर फॉल हो जाएगा रात में।छोटी ननद को भी फोन पर बताया मां की तबीयत के बारे में।बेटी की बात शायद सुनें।
दो दिनों बाद नम्रता(छोटी ननद)ने फोन किया और कहा”भाभी,मां को समझाना मेरे भी बस का नहीं।इस दुनिया में वो सिर्फ अपने पोते(सुधा के बेटे)की बात सुनती हैं।तुम राघव से ही कहना ना,दादी को समझाने के लिए।मां ने तो साफ कह दिया है कि मेरा पोता मुझे अस्पताल में भर्ती करेगा ही नहीं।उसे ही कहना समझाए मां को।”
सुधा ने हार कर बेटे(राघव)से कहा” दादी की खांसी ठीक नहीं हो रही है बेटा।तू तो नौकरी पर चला जाता है,और वो रोज बाल गीले कर नहातीं हैं।अस्पताल ले गई थी,
तो डॉक्टर ने एडमिट करने के लिए कहा।सुनते ही सिर घुमाकर कह दिया कि मैं ठीक हूं।खाना भी पूरा नहीं खातीं।”उसने झट से कहा” मैंने तो पहले ही कहा था आपसे,उनका इलाज नए डॉक्टर से करवाने से कोई फायदा नहीं होगा।जो पहले उन्हें देखते थे,उन्हीं के पास ले जाएंगे कल। प्राइवेट देखते हैं अब।आप बस तैयार रहना,कल।”
अगले ही दिन किसी महारानी की तरह हांथ में डंडा लेकर,सफेद प्रैस की हुई तांत की साड़ी,मैचिंग ब्लाउज,कमर में सफेद रुमाल खोंसकर जब दादी पोते के साथ कार में बैठी,सुधा ने गजब का आत्मविश्वास देखा उनके चेहरे पर।पोते की बगल वाली सीट पर बड़े अधिकार के साथ बैठीं वे।
हांथ की छड़ी को पोते ने कायदे से नीचे रख लिया।दोनों में बातचीत होती रही रास्ते भर।और सुधा सोचती रही कि अगर आज ही भर्ती कर दें तो अच्छा रहेगा।दो दिन की छुट्टी भी है, मैनेज हो जाएगा। क्लीनिक पहुंचते ही एक गार्ड आकर कार का दरवाजा खोला, और बोला” अम्मा , आप पकड़िये मेरा हांथ और नीचे उतरिये।
वह थोड़ा ज्यादा ही सीरियस हो रहा था , तब मां ने कहा”नहीं बेटा, मैं उतर सकती हूं खुद से, बस पोता एक हांथ पकड़ ले।वही हुआ, पोते ने आकर दादी को जरा सा सहारा दिया, और वो आराम से कार से उतर आईं। डॉक्टर के पास रिसेप्शनिस्ट के द्वारा नंबर लगाने सुधा आगे-आगे दौड़कर पहुंची।
नंबर लग चुका था मां का(चौथा नंबर )।लौटते हुए डॉक्टर सिंह से ही मुलाकात भी हो गई।वो किसी एडमिट पेशेंट को देखकर चैम्बर में बैठने जा रहे थे।सुधा को लगा, यही सही मौका है।उनसे सब सच बता देना उचित होगा।रास्ते में ही उनसे बात की सुधा ने”सर, पिछले कुछ महीनों से लगातार खांसी हो रही है मां को।
बहुत दवा दी, पर ठीक नहीं हो रहा पूरी तरह से।आप प्लीज़ उन्हें एडमिट कर लीजिए।यहां खिचड़ी और दलिया खा लेंगीं कम से कम।घर पर तो अपनी ही मर्जी चलाती हैं।शुगर को लेकर भी बहुत चिंता होती है मुझे।इन्हें शायद किसी और डॉक्टर की दवा में भरोसा ही नहीं है।
शुरू से आपका ही इलाज चला है ना।पापा को भी आपने ही देखा।अमित(पति)भी आपकी ट्रीटमेंट में थे।आप यदि बोलेंगें तो बेटा भी मान जाएगा, नहीं तो वह भी भर्ती करने से सहमत नहीं हैं।दादी को भर्ती ना करना पड़े , उसके लिए वह कुछ भी करेगा।”
डॉक्टर सिंह हंस कर बोले”आप बहू होकर अपने ससुर और सास के प्रति कितनी संवेदनशील हैं।आपकी रूटीन दवाई और खाने के कारण ही आज चल फिर पा रहीं हैं आपकी मां।मैं चैम्बर में बैठूंगा,तब आपके बेटे और माताजी से खुलकर बोल दूंगा,भर्ती करने की बात।आप चिंता मत करिए मैडम ,मैं देखता हूं।”
अब सुधा थोड़ी सहज हुई।नंबर आने पर ले जाया गया मां को चैम्बर के अंदर।चेहरे में कोई डर की छाप तक नहीं।उन्हीं के सामने कितने मरीजों को स्ट्रेचर पर लेकर कमरों में ले जाया जा रहा था।सुधा का मन धड़कने लगा था जोर-जोर से।कहीं कोई सीरियस बात हो,और मां हल्के में ले रही हैं।
सुधा बाहर रुकी थी।दादी और पोता गए थे अंदर।आधे घंटे बाद डॉक्टर ने सुना को भी अंदर बुलवाया।अंदर मां के पास वाली कुर्सी पर जैसे ही बैठी सुधा,मां खुश होकर बताने लगीं” सुन लो बहू , डॉक्टर साहब ने तो कहा कि भर्ती करने की जरूरत ही नहीं।तुम तो जबरन इतनी चिंता करती हो ।
अब डॉक्टर साहब अच्छी दवा देंगे,मैं झट से ठीक हो जाऊंगी।हैं ना सर?अपने चश्मे को पोंछते हुए कहा उन्होंने।”,सुधा निःशब्द हो चुकी थी।
बेटे की तरफ देखा तो वह इशारे से बताने लगा,कि दादी को अस्पताल में भर्ती होने में बहुत डर लगता है।इस उम्र में इस असुरक्षा की भावना से उन्हें दूसरी मानसिक बीमारी लग सकती है।मैंने बता दिया है डॉक्टर से, इनहेलर ले जाएंगे खरीदकर। दवाइयां भी बदल देंगे सर।ठीक हो जाएंगी दादी , तुम चिंता मत करो मां।”
दवाईयां, इंजेक्शन और इनहेलर लिखकर लेने के लिए कहा उन्होंने।सुधा उठने को हुई तो डॉक्टर ने बैठने के लिए कहा।फिर बड़े सलीके से समझाया उन्होंने” देखिए मैडम, अपनी पूरी जिंदगी में मुश्किल से चार या पांच बार ही अस्पताल में रही।अब पति को, जवान बेटे को अस्पताल से घर मृत आते देखा है इन्होने।
काफी करीब हैं अपने पोते से।पोते से दूर नहीं रह सकतीं वो।आप चिंता मत करिए।मैंने विटामिन के इंजेक्शन भी दिए हैं।अब वो जल्दी ही ठीक हो जाएंगी।”,
सुधा समझती नहीं थी,ऐसा नहीं था।लौटते हुए इंजेक्शन का पैकेट सुधा के हाथों में देते हुए कहा मां ने कहा(अब ये पूरा डोज़ लेना होगा।वापस फिर वही महारानी की ठाट-बाट के साथ,पोते की बगल में निश्चिंत होकर बैठी वो।दवा दिए हुए दो तीन दिन ही हुए थे,उनकी तबीयत में काफी सुधार होने लगा था।
कार में वापस आते समय उनका चेहरा मानो चमक रहा था।उनकी चमक के सामने सुधा धुंधली पड़ रही थी।
अगले दिन से दादी को ना नहाने की हिदायत देकर,काफी सारे फल (जो खाए जा सकते हैं)लेकर वापस लौटता।फिर हर रेस्ट के दिन हम उन्हे साथ लेकर डॉक्टर को दिखाने जाते।पंद्रह बीस मिनट तक उनसे बात करतीं।फिर हंसते हुए वापस आ जातीं।यह उन डॉक्टर का चमत्कार था,या पोते के प्रति आसक्ति, बहुत जल्दी ही ठीक हो गईं वे।आखिरी बार जब लेकर गए डॉक्टर के पास, उन्होंने सारी दवाईयां बंद कर दी।अब बस एक -आध हफ्ते में उनके पूरी तरह से ठीक होने का भरोसा दिया।
घर आते दोपहर हो चुकी थी।घर की मेड तब काम कर ही रही थी।उसने आश्चर्य से पूछा मां को देखकर”अरे मां! आप एडमिट नहीं हुए?”
उनका तो सातवें आसमान से भी ऊपर चढ़ गया पारा।झट से बोलीं”देखा श्यामा,बचपन से जिसे सीने से लगाकर पाला,आज वह मेरा सहारा है बड़ा।वो कुछ भी हो जाए ,मुझे अस्पताल में भर्ती करेगा ही नहीं।अब। मैं इस उम्र में पोते को छोड़कर सिर्फ अंतिम यात्रा में ही जाऊंगीं।हमारे और उसके बीच कोई नहीं आ सकता।मैं तो उसके डांटने को भी प्यार मानती हूं।उसके जैसा कोई देखभाल कर सकता है भला बुढ़िया का।”,
श्यामा के साथ मां के संवाद समाप्त हुए।सुधा ने कुछ खाना बनाने के निर्देश दिए श्यामा को।पोते ने अगले दिन शांति से समझाया उन्हें बस”दादी,ज्यादा तबीयत खराब हुई या खाना ठीक से नहीं खाया तुमने तो,मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा।तुम्हें कब क्या करना है,लिस्ट बना दिया हूं।खाना जब मां दे,खाना है तुम्हें जबरदस्ती ही सही।तुम समझती हो ना,अब पापा नहीं हैं।तुम्हें बड़े अस्पताल रैफर नहीं करेगा अपना अस्पताल।तुम्हें ठीक होना पड़ेगा ना जल्दी।बोलो,होगी ना तुम जल्दी ही स्वस्थ पूरी तरीके से?” “
“जल्दी,अरे मैं अभी दो दिन में ही फिट हो गई देख।मां से पूछ सब खाती हूं अब।रोज बाल भी नहीं भिंगाती अब।तू दुखी हो जाता है ना जब मेरी वजह से ,मैं सहन नहीं कर सकती थे।तू देखना ,मैं अब दो दिन में पहले जैसी हो जाऊंगी ,वादा।”,दादी ने वादा किया।
बचपन से अपने सीने से लगाकर पाला था पोते को।सुधा तो स्कूल जाती थी।दाल की जगह कटोरी में सिर्फ घी डालकर चिपोड़ कर भात खिलाती थीं वो।वो भी गोद में उठा कर, बंदर मिट्ठू दिखाकर।आज उसी पोते के रहते एक बहू की क्या मजाल, जो उन्हें भर्ती करवाए।पूरी दुनिया में एक पोता ही था, जो उन्हें अपने से अलग कहीं नहीं जाने देगा।यम को भी लौटना पड़ेगा।यह भरोसा ही उनके जीवन की आस और अधिकार दोनों हैं।
शुभ्रा बैनर्जी
साप्ताहिक विषय-भरोसा