दर्पण का सच

  बड़े से शीशे के सामने खड़ी तान्या अपनी लंबी ज़ुल्फ़ों को संवार रही थी। उसकी दूधिया गोरी रंगत, तीखे नैन-नक्श और लंबी कद-काठी किसी को भी पहली नज़र में ठहरकर देखने पर मजबूर कर देती थी। कॉलेज के गलियारों से लेकर मोहल्ले की हर शादी-समारोह तक, तान्या की तारीफ़ों के पुल बंधते थे। इसी तारीफ़ … Read more

रिश्तों की मिठास

“अल्पना, मुझे अपनी बड़ी बहन समझकर माफ कर दे,” कामिनी ने रुंधे हुए गले से कहा, “दौलत के घमंड ने मुझे इतना अंधा कर दिया था कि मैं अपनों और पराए का फर्क भूल गई थी। तूने दोनों डिब्बे लौटाकर मेरी वो आंखें खोल दीं जो शायद कभी नहीं खुलतीं। तू सही थी, रिश्ते डिब्बों … Read more

अहंकार की दीवार

 “रश्मि जी, पुरानी बातों को दिल पर मत लीजिए,” कल्पना ने बेहद मीठे स्वर में कहा। “भूल जाइए जो बीत गया। भगवान ने हम सबको अलग-अलग परिस्थितियाँ दी हैं, लेकिन दिल तो सबका एक जैसा ही धड़कता है। आप बस जल्दी से पूरी तरह ठीक हो जाइए, फिर हम सब मिलकर बालकनी में साथ बैठकर … Read more

स्वाभिमान की दहलीज

माइक के सामने खड़े होकर, ट्रॉफी को अपने हाथों में लेकर वैदेही ने पूरे आत्मविश्वास और नम आँखों के साथ कहा, “यह सम्मान केवल एक बिजनेस की कामयाबी का नहीं है। यह सम्मान उस संकल्प का है जो हर उस बेटी को यह सिखाता है कि किसी शारीरिक कमी या समाज के खोखले मापदंडों से … Read more

अनमोल सौगात

अनामिका अपनी लाल, सूजी हुई आँखों से उस नजारे को देखती रही। वह समझ नहीं पा रही थी कि यह क्या हो रहा है। क्या उसके परिवार को पता नहीं है कि वह किस हाल में वापस आई है? या वे सब इतने निष्ठुर हो गए हैं कि अपनी बेटी की उजड़ती दुनिया को देखकर … Read more

बंद दरवाज़े का फ़रिश्ता

बुज़ुर्ग की आवाज़ में न कोई दर्द था, न शिकायत, बल्कि एक असीम कृतज्ञता थी। वे बोले, “पूरे दो साल मैं बिस्तर पर पड़ा रहा बिटिया। करवट बदलने के लिए भी अपनी धर्मपत्नी और बच्चों का मोहताज था। जब एक स्वाभिमानी इंसान खुद के मलमूत्र तक के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाता है ना, … Read more

चौखट का मान

“चाय तो पी लूंगा प्रभा, लेकिन जो कड़वाहट तुम इस घर की हवा में घोल रही हो, उसका क्या करूं?” हरिशंकर जी ने सीधे प्रभा जी की आंखों में देखते हुए कहा। प्रभा जी का चेहरा तमतमा उठा। उन्हें अपने पति का यह अंदाज बिल्कुल पसंद नहीं आया, खासकर बहू के सामने। उन्होंने तुनककर कहा, … Read more

ढलती उम्र का आईना

जानकी जी ने बिना एक पल गँवाए सहारा देकर रोहिणी को धीरे-धीरे उठाया, लेकिन जब देखा कि रोहिणी वजन बिल्कुल नहीं ले पा रही है, तो उन्होंने अपनी कमजोर देह का पूरा सहारा बहू को दे दिया। किसी तरह घसीटते हुए वे उसे हॉल के सोफे तक लाईं। जानकी जी की खुद की सांस फूल … Read more

जिंदगी फिर नहीं मिलती

“अरे भाग्यवान, जरा इधर तो देखो!” रमेश जी ने सूटकेस को तखत पर रखते हुए बड़े उत्साह से कहा, “ये देखो, मैंने हमारे पुराने बक्से से यह सूटकेस निकाल लिया है। आज सुबह ही बैंक गया था तो रास्ते में ट्रेवल एजेंट के दफ्तर से होकर आया हूँ। नैनीताल और अल्मोड़ा का पाँच दिन का … Read more

साझी छत का सुकून

शशांक ने आगे बढ़कर अपने पिता के घुटनों को छुआ और धीरे से पूछा, “बाबूजी, अब जब शादी निपट गई है और रोहिणी भी हमारे साथ नीचे ही रहेगी, तो क्या ऊपर वाले उस नए फ्लोर को किसी अच्छे परिवार को किराए पर दे दिया जाए?” ओंकारनाथ जी ने अपनी सफेद मूँछों पर हाथ फेरते … Read more

error: Content is protected !!