नींव का मौन पत्थर

सरिता की आँखों से एक बूँद आँसू छलक कर गाल पर ढुलक गया। आज उसके भीतर बरसों से जमी बर्फ पिघलने लगी थी। उसने अपने काँपते होठों को संभाला और बहुत ही संयमित आवाज़ में कहा, “दिनेश जी, शादी के बाद इस घर को संभालना और अपना पूरा जीवन इस चौखट पर न्योछावर करना मेरी … Read more

आईने का सच

 गरिमा ने अपनी आवाज को थोड़ा ऊँचा करते हुए कहा, “माँ जी, इसमें बेहूदगी कैसी? शादी के तीन साल हो गए मुझे इस घर में रहते हुए। अब मैं इस पुराने ढर्रे और संयुक्त परिवार की रोज-रोज की बंदिशों से तंग आ चुकी हूँ। सुबह से शाम तक बस परिवार की खिदमत करो, सबकी पसंद-नापसंद … Read more

किस्मत का फैसला

 मान्या ने अपना घूंघट पीछे किया। उसकी आँखों में आंसू नहीं, बल्कि एक अजीब सी दृढ़ता थी। उसने विक्रम की आँखों में देखते हुए कहा, “विक्रम जी, मैं जानती हूँ कि आप खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं, और आपका गुस्सा पूरी तरह जायज़ है। स्नेहा ने जो किया, वह गलत था। लेकिन … Read more

सादगी का स्वाद 

 “अब क्या होगा? वो लोग आ गए,” सुनीता के हाथ-पैर ठंडे पड़ रहे थे। “राजीव, मेरी तो कुछ समझ नहीं आ रहा। मैं क्या मुंह दिखाऊंगी उन्हें?” “हिम्मत रखो सुनीता, जो होगा देखा जाएगा। अब दरवाज़ा तो खोलना ही पड़ेगा,” राजीव जी ने खुद को संभालते हुए दरवाज़ा खोला। सामने आनंद जी और रमा जी … Read more

स्मृतियों का आंगन

सुमन ने जब से होश संभाला था, अपने छोटे भाइयों, आलोक और सुमित के लिए वह बहन कम और माँ ज्यादा थी। माता-पिता के असमय निधन के बाद, सुमन ने अपनी पढ़ाई और अपनी खुशियों को ताक पर रखकर दोनों भाइयों को पाला। जब सुमन की शादी राजीव से हुई, तो उसे लगा कि भाइयों … Read more

ढलती धूप की नई सुबह

“इस घर में पत्ता भी हिलेगा तो मेरी आज्ञा से! जो मैंने कह दिया, वो पत्थर की लकीर है। अगर किसी को मेरे उसूलों पर चलना मंज़ूर नहीं, तो मेरी राह अलग और तुम्हारी अलग, मैं आज ही यह चौखट छोड़कर चला जाऊँगा।” कभी इन भारी-भरकम शब्दों की गूँज से इस हवेलीनुमा घर की दीवारें … Read more

बँटवारे की लकीर

“हेलो… दीदी! कैसी हैं आप?” फोन के दूसरी तरफ से आती उस जानी-पहचानी आवाज़ को सुनकर सविता के हाथ से सब्जी काटने वाला चाकू छूटते-छूटते बचा। यह आवाज़ उसके छोटे भाई अमित की थी। पूरे पाँच साल बाद आज अमित ने उसे फोन किया था। सविता की आँखें छलक आईं और गला रुँध गया। वह … Read more

बेइंतहा दर्द – मंजू ओमर

सुमित्रा के अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही थी। घर में सभी इधर-उधर तैयारी में लगे हुए थे । लेकिन बेटे मनीष की आंखों में आंसू रोकने का नाम नहीं ले रहे थे । बेटा भी बेइंतहा दर्द से तड़प रहा था । और मन ही मन सोचा  रहा था काश मां की बात मान … Read more

ममता का स्पर्श

“पगली, किसने कह दिया कि तेरा मायका लुट गया? क्या मायका सिर्फ मां-बाप के जीवित रहने तक ही होता है? सुन बिटिया, मां-बाप शरीर से चले जाते हैं, पर उनका आशीष और उनकी आत्मा इसी चौखट, इसी आंगन और इसी मिट्टी में रची-बसी रहती है। तूने सोचा कि भाभी ने कमरा बदल दिया तो अपनापन … Read more

जड़ों की पुकार

“अरे मेरी सबसे सुंदर दादी जान! हमें बहुत तेज भूख लगी है, प्लीज अपने हाथों से हमें वो खीर और चूरमा खिला दो ना… हम बहुत भूखे हैं,” अयान ने एक मासूम पोते की तरह लाड़ जताते हुए कहा। कायरा ने देवकी जी के गाल चूमते हुए कहा, “दादी, हमें माफ कर दीजिए। हम अपनी … Read more

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