सहारा – खुशी

रामनाथ अपने परिवार में अकेले कमाने वाले थे।घर में पत्नी नीता 3 बच्चे नवीन ,विवेक और आरती।बड़ी बहन कमला जो विधवा हो गई थी इसी कारण वो भी मायके वापस आ गई ।उसकी भी दो बेटियां थीं और मां शीला ये परिवार था।रामनाथ एक प्राइवेट कंपनी में काम करते थे। सब बच्चे पढ़ने वाले थे।नीता … Read more

अपने कब पराए बन जाते है वक्त ने बताएं – मंजू ओमर

मांजी ओ मांजी विमला ने रजनी जी को झकझोरा तो रजनी जैसे नींद से जाग उठी हो, क्या हुआ मांजी आप ऐसे कैसे गुमसम सी उदास बैठी हो। इतना सुनते ही रजनी के गालों पर दो आसूं की बूंदें लुढक गई। फिर विमला ने उनको जमीन से उठाया और सोफे पर बिठाया। विमला जल्दी से … Read more

अनजाना बना जीने का सहारा – अंजना ठाकुर

अम्मा सब्जी ले लो आज तुम्हारी पसंद की भिंडी लाया हूं एक दम ताजी और नरम  ,और अम्मा तुम बनाती भी बहुत अच्छी हो ऐसी भिंडी मैने किसी के हाथ की नहीं खाई  ।वैसे तो तुम सब खाना अच्छा बनाती हो पर भिंडी की बात ही अलग है एक ही साँस मै कमल बोलता चला … Read more

असली खूबसूरती शरीर नहीं मन होता है। – मधु वशिष्ठ

मम्मी मैंने तो अब के बैकलेस गाउन ही लेना है, लहंगा-चोली तो मामा जी के घर वाली शादी में ही पहना था। जब से मौसी जी के बेटे निखिल की सगाई की तारीख निर्धारित हुई है,ऐसा लगता है घर में शौपिंग का मौसम आ गया हो। फोन पर भी अगर बात होती थी तो सिर्फ़ … Read more

सहारा – एम. पी. सिंह 

बिल माँ बाप का रामु अपने दादा दादी के साथ गाँव में रहता था. जब वो 5 साल का था, दादी भी नही रही, इसलिए दादा ने जैसे तैसे बड़ा किया। 14 साल की उम्र में दादा भी साथ छोड़ गए। पेट भरने के लिए उसने पढ़ाई छोड़ दी और एक स्कूटर रिपेयर की दुकान … Read more

“सहारा” – गीता अस्थाना

प्रभात -बेला की सूर्य -किरणें क्षितिज पर आगमन कर चुकी थीं। धरती पर सुनहरी रश्मियाँ  बिखर कर अपने आने का आभास से जनजीवन में उर्जा भर रही थीं। वृक्षों पर पक्षियों का चहचहाना,गायों का रंभाना सूर्योदय होने का प्रमाणित कर रही थीं। कुछ लोग अपने दैनिक जीवन कार्य में संलग्न हो चुके थे और कुछ … Read more

सहारा – करुणा मलिक 

अम्मा, मैं बता रही हूँ कि इस मकान का सहारा है बस तुम्हें, हरगिज़ भी सुनील की बात मानकर इसे बेचने की मत सोचना , याद है ना ताई की दुर्गति, मकान नाम करते ही बिल्लू भाई ने जीते जी मार ही डाला था।  ना लाली, ऐसी बात नहीं है । पहली बात तो अपना … Read more

बेसहारों का सहारा – गीता वाधवानी

 मालती अपनी मां सुषमा के गले रखकर रो पडी और कहने लगी-” मम्मी, यह आप क्या कह रही हो, पापा आप कह दो यह सब झूठ है। ”   मम्मी और पापा दोनों ने कहा-” नहीं मालती, यह सब झूठ नहीं है सच है। ”   मालती -” नहीं मैं नहीं मानती इस सच को? ”   मम्मी-”  … Read more

सहारा – आरती झा आद्या

“माँ, आज फिर देर हो जाएगी?” रसोई से आती हल्की-सी खनखनाहट के बीच श्रेयांश की आवाज़ में झुँझलाहट साफ़ थी। सावित्री ने पलटकर बेटे को देखा। चेहरे पर थकान थी, पर मुस्कान वैसे ही सजी थी जैसे बरसों से सजी रहती थी। “बस आधा घंटा और… तेरे पापा की दवा दे दूँ, फिर नाश्ता लगाती … Read more

 बेनाम रिश्तों की अनकही दास्तान – आर्या विनोद

 श्रुति अपनी डेस्क पर रखा अपना सारा सामान समेट रही थी। पिछले दो सालों से जिस आर्किटेक्चरल प्रोजेक्ट पर वह और उसकी कंपनी काम कर रही थी, वह आज सफलतापूर्वक पूरा हो गया था। अब उसकी कंपनी का कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो चुका था और कल से उसे इस ऑफिस में नहीं आना था। फाइलों को … Read more

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