*ममता की कोई कीमत नहीं* – तोषिका

मां इस डायरी में तुम हमेशा क्या लिखती रहती हो? सावी ने अपनी मां सावित्री से पूछा।

जब मैं ये दुनिया छोड़ कर जाऊं, तब तुम इसको पढ़ सकती हो, मुस्कुराते हुए सावित्री बोली।

सावी अपनी मां को बचपन से लिखते हुए देखती आ रही है, पर आज तक उसको यह नहीं पता था कि उसकी मां क्या लिखती है।

तो उसने एक रात उस डायरी में पढ़ने का सोचा और जब वो उसको पढ़ना शुरू हुई तो बहुत खुश थी पर अंत तक आते आते कुछ ऐसा हुआ कि वो समझ ही नहीं पाई ये क्या से क्या हो गया।

१२ जनवरी १९९०

ये डेयरी मैने आज से लिखना शुरू किया है, और जब भी मेरी  मां से लड़ाई होगी, मैं इसमें लिखूंगी।

जब सावी ने ये पढ़ा, तो उसको हंसी आई कि उसकी मां सावित्री भी ऐसे काम करती थी।

उसने अगला पन्ना खोला उस पर तारीख थी २० जनवरी १९९०

आज मेरी मां से अब तक की सबसे बड़ी लड़ाई हुई। मैने उनको बोला कि अब मैं बड़ी हो गई हू, बीस साल की और आप मुझे अब भी कही बाहर घूमने नहीं जाने देते। तभी मेरी मां मुझे बोली “तुम अभी छोटी हो, दुनिया की समझ नहीं है तुममें।”

मैने उनकी बात काट ते हुए तुरंत बोला “पर जब आप घर का काम करवाती हो, ये कह कर कि तुम बड़ी हो गई हो, उसका क्या? तब मैं बच्ची नहीं हू?” जैसे ही मेरी मां ने ये सुना, मां ने मुझे चिल्लाते हुए अपने कमरे m जाने को कहा और कॉलेज का काम करने को कहा।

सावी को ये पढ़कर बहुत हंसी आ रही थी और मन ही मन बोली “अच्छा तो मतलब मेरे अंदर भी ये सारी आदतें आपसे ही आई है।”

ऐसे करते करते उसने कई सारे ऐसे पन्ने पढ़े, जिस पर सावित्री और उसकी मां के बीच बहुत लड़ाई हुई थी और आधे से ज्यादा मुद्दे तो सावी और सावित्री के लड़ाई से मिल रहे थे। 

फिर ऐसे कई किस्से पढ़ने के बाद एक ऐसे तारीख आई जिसको देख कर सावी को पहले तो कुछ एहसास नहीं हुआ पर जैसे जैसे धीरे धीरे वो पढ़ी, उसको सब समझ में आने लग गया।

२ नवंबर २०१५

मैं आपसे बात नहीं करूंगी। 

आपने ऐसा क्यों किया मेरे साथ मां? मैने कभी भी नहीं सोचा था कि मुझे आपसे रोज लड़ना पड़ेगा। आप इतनी जल्दी मुझे छोड़ कर चले जाओगे, ऐसा मैने कभी नहीं सोचा था। पर जब मैं खुद मां बनी तब मुझे पता चला कि मां तो बस मा होती है, और उस मा की *ममता की कोई कीमत नहीं* होती है। ज़माना गलत हो सकता है लेकिन मा कभी गलत नहीं हो सकती।

जिसने मां की कदर ना करी समझो उसने भगवान का अनादर किया।

मां की वो एक ऐसा शख्स है जो सब कुछ कर सकती है, हमारी खुशी के लिए।

एक बार तो मा ने अपने लिए कपड़े छोड़ कर, मुझे जूते दिलाए थे क्योंकि मेरा बस उन पर दिल आ गया था।

अब मेरे से कौन लड़ेगा।

अब मुझे कौन संभालेगा।

अब मुझे कौन रोकेगा।

अब मुझे प्यार से कौन बुलाएगा।

अब मुझे कौन सलाह देगा।

अब मेरी फिक्र कौन करेगा मां? जिसका ये किरदार था वो मुझे छोड़ कर चला गया और आपका किरदार कौन बखूबी निभाएगा।

सावी को ये पढ़ते पढ़ते आंसू आ गए। जब उसकी नानी मां की मृत्यु हुई थी, तो वो मात्र ९ साल की थी और आज जब वो ये सब पढ़ रही है तो उसको एहसास हुआ कि उसकी मां ये डेयरी उसके जाने के बाद की क्यों उसे पढ़वाना चाहती थी।

उसके बाद से उस डायरी में लड़ाई तो होती थी पर लड़ाई इस बात की होती थी कि काश उस समय सावित्री ने अपनी मां की सुनी होती, काश उसने अपनी मां के लिए कुछ कर होता, काशी वो लड़ने से ज्यादा प्यार भरे यादों की डेयरी बनाती। पर अब वो काश, काश ही रह गया।

अगले दिन जब सुबह हुई, तो सावी ने अपनी मां के लिए चाय बनाई और उनको कस कर गले लगा लिया और फिर अपनी सारी दिल की बाते की जो वो नहीं करती थी।

लेखिका

तोषिका

error: Content is protected !!